

2 सितंबर को मनाया जाने वाला विश्व नारियल दिवस नारियल की खेती और इससे जुड़ी आजीविका पर बात करने का भी मौका है।
फ़ोटो: विकिमीडिया कॉमन्स
नारियल को भारत में लंबे समय से ‘कल्पवृक्ष’ कहा जाता है। फल से लेकर तेल, पानी, रेशा और पत्तियों तक, पेड़ का लगभग हर हिस्सा किसी न किसी उपयोग में आता है। लेकिन नारियल की एक ऐसी भूमिका भी है, जिस पर कम बात होती है। नारियल के बागान में अपनाए जाने वाले कुछ तरीके पानी और मिट्टी को बचाने में भी मदद कर सकते हैं।
2 सितंबर को मनाया जाने वाला विश्व नारियल दिवस नारियल की खेती और इससे जुड़ी आजीविका पर बात करने का भी मौका है। यह दिन International Coconut Community की स्थापना की याद में मनाया जाता है।
बदलते मौसम में नारियल को सिर्फ एक फसल मानकर देखना काफी नहीं है। इसके आसपास की खेती और इसकी प्रकृति से हम बारिश के पानी को रोकने के उपाय एक बारे में जान पाते हैं। साथ ही मिट्टी की नमी को बनाए रखने के तरीक़े और सिंचाई के पानी के बेहतर इस्तेमाल के बारे में भी पता चलता है।
नारियल की ऊंची छतरी, जमीन पर गिरने वाली पत्तियां और उसके आसपास उगने वाली वनस्पति मिलकर खेत की सतह को खुला नहीं रहने देतीं।
नारियल का जल-तंत्र एक नज़र में
नारियल की खेती मुख्य रूप से गर्म और नम इलाकों में होती है। लेकिन इन इलाकों में भी बारिश पूरे साल एक जैसी नहीं होती। मानसून के कुछ महीनों में खूब पानी मिलता है और फिर कई महीने अपेक्षाकृत सूखे रहते हैं। इसलिए नारियल के लिए चुनौती सिर्फ पानी की उपलब्धता नहीं, बल्कि पानी को खेत में टिकाए रखना भी है।
ICAR-CPCRI नारियल के बागानों में कई तरह के जल और मिट्टी संरक्षण उपायों की सिफारिश करता है। इनमें सूखी पत्तियों या भूसी से मिट्टी को ढकना, छोटी मेड़ और खाइयां बनाना, बारिश का पानी जमा करना और ड्रिप सिंचाई शामिल हैं। इनका मकसद पानी को बहने से रोकना और मिट्टी में नमी बनाए रखना है।
उसके आसपास की मिट्टी, पेड़ से गिरने वाली पत्तियां, नारियल की भूसी और खेत में बनाई गई छोटी जल-संरक्षण संरचनाएं भी पानी को रोकने और मिट्टी में नमी बनाए रखने में भूमिका निभाती हैं।
पेड़, मिट्टी, जैविक अवशेष और जल-संरक्षण संरचनाएं मिलकर एक ऐसी व्यवस्था बनाते हैं, जो बारिश के पानी को जल्दी बह जाने से रोकती है।
नारियल की पत्तियां पेड़ के ऊपर एक छतरी बनाती हैं। पेड़ से गिरने वाली सूखी पत्तियां जमीन को ढक सकती हैं। इन्हें खेत से हटाने के बजाय वहीं छोड़ दिया जाए तो ये प्राकृतिक मल्च का काम करती हैं। मल्च की परत मिट्टी को तेज धूप और हवा के सीधे संपर्क से बचाती है। इससे पानी का वाष्पीकरण कम होता है और मिट्टी में नमी बनी रहती है।
Coconut Development Board (CDB) के तकनीकी साहित्य में नारियल बागानों में सूखी पत्तियों, नारियल की भूसी और दूसरी जैविक सामग्री से मल्चिंग करने की सलाह दी गई है। बोर्ड के अनुसार, मल्च को तने से थोड़ा दूर रखना चाहिए, ताकि नमी के साथ सड़न का खतरा न बढ़े।
ICAR-Central Plantation Crops Research Institute (ICAR-CPCRI) के 2024 के दस्तावेज के एक अध्ययन के अनुसार भूसी और पत्तियों के संयुक्त इस्तेमाल वाले उपचार में मिट्टी की नमी सबसे अधिक दर्ज की गई। केवल भूसी या केवल पत्तियों का इस्तेमाल भी बिना मल्च वाले भूखंड की तुलना में बेहतर रहा।
इन नतीजों से संकेत मिलता है कि नारियल बागान में जैविक अवशेषों को खेत में ही रखने से मिट्टी की नमी बनाए रखने में मदद मिल सकती है। यह तरीका खास तौर पर उन इलाकों में मददगार है जहां मानसून के बाद कई महीनों तक बारिश कम होती है।
हालांकि मल्चिंग करते समय कुछ सावधानियां जरूरी हैं। सूखी पत्तियों या भूसी को तने से सटाकर नहीं रखना चाहिए। इससे नमी के कारण तने में सड़न का खतरा बढ़ सकता है। इससे नमी के कारण तने में सड़न का खतरा बढ़ सकता है। सामग्री को पेड़ के चारों ओर समान रूप से फैलाना और समय-समय पर उसकी स्थिति देखना बेहतर है। यानी पानी बचाने की शुरुआत हमेशा सिंचाई से नहीं होती। कई बार मिट्टी को ढक देना ही पहला और सबसे आसान कदम होता है।
नारियल की भूसी खेत के काम आ सकती है
नारियल की भूसी को अक्सर प्रसंस्करण के बाद बचा हुआ अवशेष समझ लिया जाता है। लेकिन खेत में इसका एक उपयोगी काम हो सकता है। इसे पेड़ के आसपास मल्च की तरह बिछाया जा सकता है। इससे मिट्टी ढकी रहती है और पानी के वाष्पीकरण को कम करने में मदद मिलती है।
भूसी को खेत में बनाई गई खाइयों में भी रखा जा सकता है। इससे बारिश के पानी को कुछ देर रोकने और मिट्टी में नमी बनाए रखने में मदद मिलती है। CDB के अनुसार, नारियल की भूसी अपने वजन के करीब 3 से 5 गुना तक पानी सोख कर रख सकती है। बोर्ड पेड़ों के आसपास भूसी बिछाने और इसे खाइयों में इस्तेमाल करने की सलाह देता है।
भूसी से रेशा निकालने के बाद बचने वाला कोयर पिथ भी नमी बनाए रखने में उपयोगी है। CDB के अनुसार, यह अपने वजन से करीब पांच गुना तक नमी बनाए रख सकता है और मिट्टी में पानी रोककर रखने की क्षमता बढ़ाने में मदद करता है।
हालांकि भूसी का इस्तेमाल सिंचाई का विकल्प नहीं है। इसका फायदा मिट्टी, बारिश, पेड़ की उम्र और इस्तेमाल की गई मात्रा पर निर्भर करेगा। इसलिए इसे स्थानीय परिस्थितियों को देखते हुए मल्च या खाइयों में इस्तेमाल करना बेहतर है। नारियल की खेती की यह छोटी-सी सीख महत्वपूर्ण है। जिसे हम खेत का अवशेष समझते हैं, वही मिट्टी में नमी बचाने के काम आ सकता है।
बारिश का पानी खेत में रोकना क्यों जरूरी है
भारी बारिश का मतलब यह नहीं है कि खेत में पूरे साल पानी बना रहेगा। अगर बारिश का पानी तेजी से बहकर बाहर निकल जाए, तो कुछ दिनों या हफ्तों बाद वही जमीन सूख सकती है। तेज बहाव के साथ उपजाऊ मिट्टी भी बह जाती है।
नारियल के बागानों में यह समस्या खासकर ढलान वाली जमीन पर होती है। ऐसे इलाकों में कंटूर ट्रेंच, हाफ-मून बंड और कैच पिट जैसी छोटी संरचनाएं बनाई जाती हैं। ये बारिश के पानी के बहाव को धीमा करती हैं और उसे जमीन में समाने का समय देती हैं। कंटूर ट्रेंच ढलान के समानांतर बनाई जाती है, जबकि हाफ-मून बंड और कैच पिट पेड़ के आसपास पानी को कुछ देर रोकने में मदद करते हैं।
ICAR-CPCRI के अनुसार, नारियल की भूसी से भरी खाइयां, हाफ-मून बंड और कैच पिट मिट्टी और पानी के संरक्षण में उपयोगी रहे हैं। संस्थान ने सतही बहाव और छत से मिलने वाले वर्षाजल को जमा करके बाद में सिंचाई में इस्तेमाल करने के उदाहरण भी दर्ज किए हैं।
कासरगोड और तमिलनाडु के तिरुप्पुर स्थित नारियल बागानों में भी ट्रेंच, मल्चिंग और हाफ-मून बंड जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है। हालांकि इनका असर हर जगह एक जैसा नहीं होता। यह खेत की मिट्टी, ढलान, बारिश और पानी की निकासी पर निर्भर करता है। इसलिए ऐसी संरचनाएं बनाने से पहले खेत में पानी के प्राकृतिक बहाव को समझना जरूरी है।
बारिश के पानी को खेत से जल्दी बाहर निकालना ही हमेशा सही रास्ता नहीं है। कई जगह उसे कुछ देर रोकना और जमीन में समाने देना भी उतना ही जरूरी है।
सिंचाई में पानी की बर्बादी रोकना
नारियल की भूसी से भरी खाइयां, हाफ-मून बंड और कैच पिट मिट्टी और पानी के संरक्षण में उपयोगी होते हैं।
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नारियल को कम पानी में उगने वाली फसल मानना ठीक नहीं होगा। इसकी पानी की जरूरत मिट्टी के प्रकार, मौसम, पेड़ की उम्र और स्थानीय जलवायु के अनुसार बदलती है। इसलिए सिंचाई की कोई एक मात्रा हर बागान पर लागू नहीं की जा सकती। पानी बचाने का बेहतर तरीका है सिंचाई की मात्रा और समय को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार तय करना और पानी को सीधे पेड़ की जड़ वाले क्षेत्र तक पहुंचाना।
ICAR-CPCRI के अनुसार, कासरगोड की परिस्थितियों में दिसंबर से मई के बीच नारियल के पेड़ों में ड्रिप सिंचाई को खुले पैन वाष्पीकरण के लगभग 66 प्रतिशत के स्तर पर देने से 34 प्रतिशत पानी की बचत दर्ज की गई।
ड्रिप सिंचाई में पानी पाइप और एमिटर के जरिए धीरे-धीरे पेड़ के जड़ क्षेत्र में पहुंचता है। इससे पूरे खेत की सतह पर पानी फैलाने की जरूरत कम होती है और वाष्पीकरण तथा अनावश्यक बहाव से होने वाली बर्बादी घट सकती है। हालांकि इसका लाभ तभी मिलेगा, जब सिस्टम का रखरखाव ठीक हो, एमिटर बंद न हों और सिंचाई का समय स्थानीय मौसम के अनुसार तय किया जाए।
नारियल में ड्रिप सिंचाई पर प्रकाशित शोध-समीक्षाओं में भी अलग-अलग जलवायु और मिट्टी की परिस्थितियों में पानी की बचत तथा उपज पर सकारात्मक प्रभाव दर्ज किए गए हैं। इन अध्ययनों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि ड्रिप सिंचाई की प्रभावशीलता पेड़ की उम्र, मिट्टी की जल-धारण क्षमता, सिंचाई की मात्रा और प्रबंधन पद्धति पर निर्भर करती है।
हर बागान में सिंचाई की जरूरत अलग होती है। इसलिए ड्रिप सिंचाई के साथ मिट्टी की नमी पर भी नजर रखना जरूरी है। नारियल की पत्तियां, भूसी और कोयर पिथ जैसी जैविक सामग्री मिट्टी को ढककर नमी के नुकसान को कम कर सकती है।
इसका मतलब है कि पानी बचाने के लिए केवल ड्रिप सिंचाई लगाना पर्याप्त नहीं है। ड्रिप सिंचाई, मिट्टी की नमी की निगरानी और जैविक मल्चिंग, इन तीनों को साथ अपनाने से बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।
जल संरक्षण का मतलब सिर्फ कम पानी देना नहीं है। सही मात्रा में, सही समय पर और सीधे जड़ क्षेत्र में पानी पहुंचाना भी इसका अहम हिस्सा है।
गोवा में ICAR-CCARI ने नारियल आधारित सिल्वोपाश्चर प्रणाली में कई तरह की चारा प्रजातियों को शामिल कर एक मॉडल विकसित किया है। इसके साथ वर्षाजल संचयन की संरचनाएं भी बनाई गई हैं।
नारियल के साथ दूसरी फसलें भी
नारियल के पेड़ों के बीच की जमीन को खाली छोड़ना जरूरी नहीं है। स्थानीय जलवायु, मिट्टी और बाजार की स्थिति के अनुसार वहां केला, अनानास, काली मिर्च, अदरक, हल्दी, चारा और दूसरी फसलें उगाई जा सकती हैं।
ICAR-CPCRI ने नारियल आधारित बहुस्तरीय और बहुफसली खेती के कई मॉडल विकसित किए हैं। इन मॉडलों में नारियल की ऊंची छतरी के नीचे अलग-अलग तरह की फसलों को जगह दी जाती है। संस्थान के अनुसार ऐसी प्रणालियों में जमीन, धूप, पानी और पोषक तत्वों का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है।
बहुफसली खेती में नारियल की ऊंची छतरी के नीचे दूसरी फसलें जमीन की अलग-अलग परतों और उपलब्ध जगह का इस्तेमाल करती हैं। इससे खेत की जमीन लंबे समय तक वनस्पति से ढकी रहती है। ऐसी ढकी हुई मिट्टी पर धूप और हवा का सीधा असर कम पड़ता है, जिससे नमी के तेजी से उड़ने और बारिश के पानी के बहाव को कम करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, यह लाभ हर जगह अपने-आप नहीं मिलता। फसलों का चुनाव स्थानीय वर्षा, सिंचाई की उपलब्धता, पेड़ों की दूरी और मिट्टी की स्थिति के आधार पर करना पड़ता है। बहुत घनी फसलें लगाने से नारियल और सहफसलों के बीच पानी, रोशनी और पोषक तत्वों के लिए प्रतिस्पर्धा भी बढ़ सकती है। इसलिए बहुफसली मॉडल को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार तैयार करना जरूरी है।
ICAR की एक हालिया पहल में नारियल आधारित प्रणालियों में अलग-अलग चारा फसलों और वनस्पतियों को शामिल करने पर जोर दिया गया है। इसका उद्देश्य एक ही खेत से भोजन, चारा, जैविक पदार्थ और आय के कई स्रोत तैयार करना है।
गोवा में ICAR-CCARI ने नारियल आधारित सिल्वोपाश्चर प्रणाली में कई तरह की चारा प्रजातियों को शामिल कर एक मॉडल विकसित किया है। इसके साथ वर्षाजल संचयन की संरचनाएं भी बनाई गई हैं।
इस तरह नारियल आधारित खेती हमें यह समझने में मदद करती है कि खेत में पानी बचाने के लिए सिर्फ सिंचाई की मात्रा कम करना पर्याप्त नहीं है। मिट्टी को ढककर रखना, जैविक अवशेषों को खेत में लौटाना, वर्षाजल को रोकना और अलग-अलग फसलों का सोच-समझकर चुनाव करना, ये सभी उपाय एक-दूसरे से जुड़े हैं।
इससे एक व्यापक सीख निकलती है कि खेत में पानी बचाने के लिए सिर्फ पानी पर नहीं, पूरी खेती की बनावट पर ध्यान देना पड़ता है।
एक किसान ने इन तरीकों को खेत में कैसे अपनाया?
इन तकनीकों की उपयोगिता केवल शोध संस्थानों तक सीमित नहीं है। केरल के किसान फ्रांसिस का खेत दिखाता है कि ये उपाय जमीन पर कैसे काम आ सकते हैं। उनके खेत में कंटूर टेरेसिंग, मल्चिंग, नारियल के बेसिन में कोयर पिथ का इस्तेमाल, भूसी को जमीन में दबाना और पानी जमा करने वाले गड्ढे जैसी तकनीकें अपनाई गईं। इन उपायों का उद्देश्य मिट्टी में नमी बनाए रखना, बारिश के पानी को खेत में रोकना और नारियल की उत्पादकता सुधारना था।
इस उदाहरण में खास बात यह है कि किसान ने किसी एक उपाय पर निर्भर रहने के बजाय कई छोटे उपायों को एक साथ अपनाया। खेत की ढलान और पानी के बहाव को ध्यान में रखकर संरचनाएं बनाई गईं, जबकि नारियल की भूसी और कोयर पिथ जैसे स्थानीय अवशेषों का इस्तेमाल नमी बचाने के लिए किया गया।
ऐसे उदाहरण यह दिखाते हैं कि जल संरक्षण हमेशा बड़ी और महंगी परियोजना से शुरू नहीं होता। कई बार यह खेत में मौजूद सामग्री, फसल अवशेष और छोटी-छोटी संरचनाओं से शुरू हो सकता है।
नारियल की असली सीख: पानी को खेत में टिकाना
जल संरक्षण की बात होते ही हमारे सामने अक्सर बांध, तालाब और बड़े जलाशय आते हैं। नारियल आधारित खेती एक दूसरी तस्वीर दिखाती है।
यहां पानी बचाने की शुरुआत मिट्टी की सतह से होती है। सूखी पत्तियां मिट्टी को ढकती हैं। भूसी पानी रोकती है। छोटी खाइयां बहाव धीमा करती हैं। मेड़ पानी को खेत में रोकती है। वर्षाजल संचयन अतिरिक्त पानी को बाद के लिए बचा सकता है। ड्रिप सिंचाई पानी को जरूरत की जगह तक पहुंचाती है।
ICAR-CPCRI के अनुसार नारियल बागानों में मल्चिंग, भूसी से भरी खाइयां, कैच पिट, हाफ-मून बंड और ड्रिप सिंचाई जैसे उपाय मिट्टी की नमी और पानी के इस्तेमाल को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं।
इनमें से कोई भी उपाय अकेले जल संकट का समाधान नहीं है। लेकिन साथ मिलकर ये मिट्टी की नमी बचाने, पानी के बहाव और कटाव को कम करने और सिंचाई के पानी का बेहतर इस्तेमाल करने में मदद कर सकते हैं।
नारियल का सबसे बड़ा जल-संदेश शायद यही है कि पानी बचाने का मतलब सिर्फ पानी कम खर्च करना नहीं है।
असली सवाल यह है कि जो पानी हमारे पास आता है, उसे हम खेत में कितनी देर तक रोक पाते हैं।
शायद यही नारियल की सबसे बड़ी सीख है। वह बताता है कि जल संरक्षण किसी एक तकनीक का नाम नहीं, बल्कि पेड़, मिट्टी, पानी और खेती को एक साथ देखने की सोच है।
नारियल और पानी: 5 बातें जो शायद आप नहीं जानते
3-5 गुना: नारियल की भूसी अपने वजन के करीब 3 से 5 गुना तक पानी सोखकर रख सकती है।
करीब 5 गुना: कोयर पिथ अपने वजन से करीब पांच गुना तक नमी बनाए रख सकता है।
34% बचत: कासरगोड के एक अध्ययन में ड्रिप सिंचाई से 34% पानी की बचत दर्ज हुई।
मल्च का काम: सूखी नारियल पत्तियां खेत में छोड़ने पर मिट्टी को ढकने और नमी बचाने में मदद करती हैं।
छोटी संरचनाएं, बड़ा काम: कंटूर ट्रेंच और कैच पिट बारिश के पानी को बहने के बजाय जमीन में समाने का समय देते हैं।
नारियल का पेड़ कितना उपयोगी होता है ये बात आप इसके उपयोगों की सूची को देख कर समझ जाएंगे -
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