

फ़ोटो: विकिमीडिया कॉमन्स
2026 जून: सामान्य से 35% कम बारिश
जुलाई: अखिल भारतीय स्तर पर सामान्य से 1% अधिक
जुलाई: 47% जिलों में कम या बहुत कम बारिश
2 अगस्त तक: मानसून की संचयी बारिश सामान्य से 12% कम
7 सितंबर तक: मानसून की संचयी बारिश सामान्य से 14% कम
4 सितंबर तक खरीफ क्षेत्र: पिछले साल से लगभग 1.6% कम
धान की बुवाई: पिछले साल की तुलना में 16.37 लाख हेक्टेयर कम
भारत में मानसून का मतलब सिर्फ़ खेतों में बारिश नहीं है। यही बारिश मिट्टी में नमी भरती है, जलाशयों को भरती है और भूजल के पुनर्भरण में मदद करती है। इसलिए मानसून कमजोर या असमान हो तो असर सिर्फ़ खरीफ की फसल पर नहीं पड़ता। इसका असर सिंचाई, भूजल और अगले रबी मौसम की पानी की उपलब्धता पर भी पड़ता है।
2026 का मानसून इस संबंध को समझने का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। जुलाई में अखिल भारतीय स्तर पर बारिश सामान्य से एक प्रतिशत अधिक रही, लेकिन कई इलाकों में कमी बनी रही। जुलाई में 47 प्रतिशत जिलों में बारिश कम या बहुत कम दर्ज की गई।
जुलाई की अपेक्षाकृत बेहतर बारिश के बाद अगस्त में फिर कमी दर्ज हुई। इससे मानसून की कुल स्थिति में सुधार नहीं हो सका। 7 सितंबर तक देश में दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान हुई कुल बारिश सामान्य से 14 प्रतिशत कम थी। हालांकि बारिश का वितरण बेहद असमान रहा। दक्षिणी प्रायद्वीप में यह कमी 27 प्रतिशत और पूर्व एवं पूर्वोत्तर भारत में 24 प्रतिशत थी। इसके मुकाबले उत्तर-पश्चिम भारत में 8 प्रतिशत और मध्य भारत में 6 प्रतिशत की कमी रही।
इसी दौरान प्रशांत महासागर में El Niño विकसित हुआ। जून में बनी कमजोर स्थिति जुलाई तक मध्यम स्तर की हो गई। IMD के अनुसार El Niño ने मानसून परिसंचरण को कमजोर करने वाले बड़े जलवायु कारकों में भूमिका निभाई।
लेकिन इस साल की कहानी को सिर्फ़ "El Niño आया और बारिश कम हो गई” के रूप में समझना ठीक नहीं होगा। सवाल यह है कि कम और असमान बारिश का असर खेत की मिट्टी से लेकर भूजल और जलाशयों तक कैसे पहुंचता है।
El Niño क्या करता है और भारत के लिए इसका मतलब क्या है?
El Niño प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय हिस्से में समुद्र की सतह के असामान्य रूप से गर्म होने और उससे जुड़े वायुमंडलीय बदलावों की स्थिति है। इससे दुनिया के कई हिस्सों में बारिश और तापमान के पैटर्न बदल सकते हैं। भारत में El Niño का संबंध अक्सर कमजोर मानसून से जोड़ा जाता है, लेकिन यह संबंध सीधा नहीं है।
El Niño को सूखे का पर्याय मानना सही नहीं होगा। मानसून पर हिंद महासागर की स्थितियों और समुद्र तथा वायुमंडल में होने वाले दूसरे बदलावों का भी असर पड़ता है।
इस साल भी तस्वीर एक जैसी नहीं है। कुछ क्षेत्रों में बारिश की भारी कमी है, तो कुछ जगहों पर कम समय में बहुत तेज बारिश हुई। यही वजह है कि कुल बारिश का आंकड़ा पानी की पूरी कहानी नहीं बताता।
बारिश कितनी हुई से ज्यादा जरूरी है कहां, कब और कितनी तेज हुई?
जल संसाधनों के लिए सिर्फ़ यह जानना काफी नहीं है कि कुल कितनी बारिश हुई। जुलाई 2026 इसका उदाहरण है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश की कुल बारिश सामान्य से एक प्रतिशत अधिक थी, लेकिन कई हिस्सों में कमी बनी रही।
2 अगस्त तक बिहार, अरुणाचल प्रदेश और असम-मेघालय जैसे कई पूर्वोत्तर और पूर्वी क्षेत्रों में बारिश सामान्य से काफी कम थी। दूसरी ओर, कुछ क्षेत्रों में कम समय में बहुत तेज बारिश हुई।
बारिश का पानी मिट्टी में कितना समाएगा, यह उसकी तीव्रता के साथ-साथ मिट्टी की प्रकृति, भूमि की स्थिति और पहले से मौजूद नमी पर भी निर्भर करता है।
इसका मतलब है कि एक इलाके में खेतों में नमी की कमी हो सकती है, जबकि दूसरे इलाके में कुछ ही घंटों की तेज बारिश से जलभराव और सतही बहाव बढ़ सकता है। यानी एक ही मानसून में अलग-अलग क्षेत्रों को अलग-अलग तरह के जल प्रबंधन की जरूरत पड़ सकती है। जहां बारिश कम है, वहां पानी बचाने और सिंचाई की योजना जरूरी है। जहां बारिश बहुत तेज है, वहां पानी को रोकने, जमीन में उतारने और जलभराव से बचाने की जरूरत है।
केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) के भूजल आकलन में वर्षा को भूजल पुनर्भरण के प्रमुख स्रोतों में माना गया है। मानसून के दौरान होने वाला पुनर्भरण उन इलाकों के लिए खास महत्व रखता है जहां खेती सिंचाई के लिए भूजल पर निर्भर है।
ऐसे क्षेत्रों में मानसून की कमी का दोहरा असर हो सकता है। एक ओर खेतों में प्राकृतिक नमी कम होती है और सिंचाई की जरूरत बढ़ती है। दूसरी ओर, भूजल का पुनर्भरण भी कम हो सकता है। अगर बारिश की कमी की भरपाई के लिए लगातार अधिक भूजल निकाला जाए, तो पानी की उपलब्धता पर आगे चलकर दबाव बढ़ सकता है।
धान, मक्का, सोयाबीन और कपास जैसी फसलों को विकास के अलग-अलग चरणों में पर्याप्त मिट्टी की नमी चाहिए।
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खरीफ की खेती में मानसून दोहरी भूमिका निभाता है। वह सीधे फसल को पानी देता है और सिंचाई की जरूरत भी तय करता है। बारिश के बीच लंबा अंतराल हो तो किसान को भूजल, नहर या दूसरे स्रोतों से अतिरिक्त सिंचाई करनी पड़ सकती है।
धान, मक्का, सोयाबीन और कपास जैसी फसलों को विकास के अलग-अलग चरणों में पर्याप्त मिट्टी की नमी चाहिए। समय पर बारिश न हो तो बुवाई में दिक्कत आ सकती है। फसल खड़ी होने के बाद बारिश में लंबा अंतराल आए तो सिंचाई की मांग बढ़ सकती है।
सामान्य तौर पर El Niño के दौरान भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून सामान्य से कमजोर रहता है। हालांकि, El Niño और बारिश के बीच संबंध मानसून के दूसरे भाग में, खासकर सितंबर की बारिश के दौरान, अधिक मजबूत होता है।
डॉ. जितेंद्र सिंह, केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार)
कमजोर मानसून की आशंका को देखते हुए केंद्र ने जून में 315 संवेदनशील जिलों के लिए आकस्मिक कृषि योजनाओं पर जोर दिया था। इनमें जल संरक्षण, खेत-तालाब और कम पानी की जरूरत वाली फसलों जैसे उपाय शामिल थे। यानी मानसून का जोखिम केवल फसल उत्पादन का सवाल नहीं है। यह स्थानीय स्तर पर पानी के प्रबंधन का भी सवाल है।
कृषि मंत्रालय के 4 सितंबर तक के आंकड़ों के अनुसार, खरीफ फसलों का कुल बोया गया क्षेत्र पिछले साल की समान अवधि से करीब 1.6 प्रतिशत कम था। धान का रकबा 421.82 लाख हेक्टेयर रहा, जो पिछले साल की तुलना में 16.37 लाख हेक्टेयर कम है। मक्के का क्षेत्र भी पिछले साल से करीब तीन लाख हेक्टेयर कम रहा।
हालांकि बुवाई के क्षेत्र में कमी को सीधे उत्पादन में कमी का संकेत नहीं माना जा सकता। आगे की बारिश, सिंचाई और फसल की स्थिति अंतिम उत्पादन तय करेंगी।
खेत की मिट्टी सिर्फ़ फसल को उगाने की जगह नहीं है। वह बारिश के पानी को कुछ समय के लिए अपने भीतर रोककर रखती है। यही मिट्टी की नमी बारिश के दो दौरों के बीच फसल के काम आती है।
बारिश का पानी मिट्टी में कितना समाएगा, यह उसकी तीव्रता के साथ-साथ मिट्टी की प्रकृति, भूमि की स्थिति और पहले से मौजूद नमी पर भी निर्भर करता है। बहुत तेज बारिश की स्थिति में सतही बहाव और जलभराव का जोखिम बढ़ सकता है।
इसलिए जलवायु-अनुकूल खेती में केवल अधिक पानी उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। बारिश के पानी को खेत में रोकना और मिट्टी में नमी को लंबे समय तक बनाए रखना भी जल प्रबंधन का हिस्सा है।
2026 में ICAR से जुड़ी जिला-स्तरीय तैयारियों में मृदा और जल संरक्षण, जलवायु-सहिष्णु फसलों और फसल विविधीकरण पर जोर दिया गया। ओडिशा के रायगढ़ा में स्थानीय बारिश के आंकड़ों, मौसम पूर्वानुमान और आकस्मिक फसल योजनाओं को साथ लेकर तैयारी की गई।
इससे एक अहम बात सामने आती है कि हर अतिरिक्त बूंद को सिंचाई के पानी में बदलना ही समाधान नहीं है। खेत में उपलब्ध पानी को ज्यादा समय तक रोककर रखना भी उतना ही जरूरी है।
जलवायु और कृषि के संबंध को केवल सूखे के नजरिये से देखना अधूरा होगा। बारिश की कमी की तरह बहुत अधिक बारिश भी फसल की उपज को प्रभावित कर सकती है।
2026 में Earth’s Future में प्रकाशित एक अध्ययन ने 1990 से 2017 के बीच भारत के जिलों में आठ प्रमुख खरीफ फसलों और बारिश के आंकड़ों का विश्लेषण किया। अध्ययन में पाया गया कि फसल के लिए बारिश की एक ऐसी सीमा होती है जिसमें पानी की मात्रा उपज के लिए अनुकूल रहती है। इसके बाद बारिश बढ़ने पर उपज घट सकती है। अध्ययन में बारिश की तीव्रता को बारिश वाले दिनों की संख्या की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण पाया गया।
उदाहरण के लिए, 100 मिलीमीटर बारिश अगर दो सप्ताह में धीरे-धीरे हो और वही बारिश कुछ घंटों में हो, तो दोनों स्थितियों का असर एक जैसा नहीं होगा। तेज बारिश में सतही बहाव और जलभराव बढ़ सकता है, जबकि धीरे हुई बारिश का अधिक पानी मिट्टी में समा सकता है।
अध्ययन के अनुसार, इष्टतम सीमा से अधिक बारिश का नुकसान कई फसलों में बारिश की कमी से होने वाले नुकसान के बराबर हो सकता है। बहुत तेज बारिश से खेतों में जलभराव, सतही बहाव और पोषक तत्वों के नुकसान का जोखिम बढ़ सकता है।
इसलिए मानसून के जोखिम को केवल ‘कम बारिश’ के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। कम बारिश, बारिश के बीच लंबा अंतराल और बहुत तेज बारिश तीनों ही खेती और जल प्रबंधन के लिए अलग-अलग जोखिम पैदा कर सकते हैं।
2023 में Climate Services में प्रकाशित एक अध्ययन ने 2002, 2004 और 2009 के El Niño वर्षों में भारत के जिलों में मानसूनी बारिश और धान, मक्का, बाजरा तथा ज्वार की उपज में हुए बदलावों का विश्लेषण किया। इस तरह के जिलेवार विश्लेषण का महत्व यह है कि El Niño का जोखिम पूरे देश में एक जैसा नहीं होता। इसलिए कृषि और जल प्रबंधन की तैयारी भी स्थानीय बारिश और फसल की स्थिति के आधार पर करनी होगी।
शोधकर्ताओं ने धान, मक्का, बाजरा और ज्वार के लिए अधिक और मध्यम जोखिम वाले कई जिलों की पहचान की। हालांकि प्रभाव हर फसल और हर क्षेत्र में एक जैसा नहीं था। इसलिए El Niño को फसल उत्पादन का अकेला निर्धारक नहीं, बल्कि जोखिम बढ़ाने वाले कारकों में से एक समझना अधिक उचित है।
कमजोर मानसून का असर खरीफ की कटाई के साथ खत्म नहीं होता। मानसून के आखिरी चरण की बारिश कई वर्षा-आधारित क्षेत्रों में मिट्टी की नमी और जल स्रोतों की स्थिति के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। अगर बारिश की कमी बनी रहती है, तो कुछ इलाकों में रबी की बुवाई और शुरुआती वृद्धि के दौरान सिंचाई की जरूरत बढ़ सकती है।
इसलिए मानसून को केवल चार महीने की बारिश मानना पर्याप्त नहीं है। इसका असर पूरे कृषि और जल चक्र पर पड़ता है। खरीफ के दौरान बारिश की कमी से मिट्टी की नमी घट सकती है और भूजल तथा जलाशयों में पानी का पुनर्भरण प्रभावित हो सकता है। इसका असर अगले मौसम में पानी की उपलब्धता पर भी पड़ सकता है।
मौसम की जानकारी तभी उपयोगी है जब वह खेत के फैसले तक पहुंचे।
समाधान सिर्फ़ ज्यादा सिंचाई नहीं है
कम बारिश की स्थिति में पहला जवाब अक्सर अतिरिक्त सिंचाई होता है। लेकिन हर कमजोर मानसून में भूजल पंपिंग बढ़ाना लंबे समय का समाधान नहीं हो सकता। इसके लिए खेत, फसल और जल-संसाधन तीनों स्तरों पर तैयारी जरूरी है।
पहला, खेत स्तर पर: खेत-तालाब, वर्षा जल संचयन, मल्चिंग, मिट्टी में नमी बनाए रखना और बेहतर जल निकासी जैसे उपाय स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अपनाए जा सकते हैं। इनसे बारिश के पानी को खेत में रोकने और उसका बेहतर उपयोग करने में मदद मिल सकती है।
दूसरा, फसल स्तर पर: जहां पानी सीमित हो, वहां कम अवधि वाली और कम पानी की जरूरत वाली किस्मों को अपनाना उपयोगी हो सकता है। फसल विविधीकरण और आकस्मिक फसल योजनाएं भी जोखिम कम कर सकती हैं।
तीसरा, जल-संसाधन स्तर पर: कमजोर मानसून वाले क्षेत्रों में यह देखना जरूरी है कि सिंचाई के लिए कितने पानी की जरूरत है, भूजल की स्थिति क्या है और उपलब्ध जल स्रोत कितने हैं।
हर क्षेत्र के लिए एक ही जल प्रबंधन रणनीति काम नहीं करेगी। कम बारिश वाले क्षेत्रों में पानी बचाना और सिंचाई की मांग कम करना प्राथमिकता हो सकती है। वहीं बहुत तेज बारिश वाले क्षेत्रों में पानी को रोकना, जमीन में उतारना और जलभराव से बचाना जरूरी होगा।
महाराष्ट्र में ICRISAT ने El Niño से जुड़े कृषि जोखिमों के लिए पूर्वानुमान-आधारित अग्रिम कार्रवाई और प्रतिक्रिया योजना तैयार की। इस योजना का जोर जोखिम आने के बाद कदम उठाने के बजाय मौसम के पूर्वानुमान के आधार पर पहले से तैयारी करने पर है।
मौसम की जानकारी तभी उपयोगी है जब वह खेत के फैसले तक पहुंचे। बारिश की संभावना, मिट्टी की नमी और उपलब्ध पानी को साथ देखकर किसान बुवाई का समय, फसल का चुनाव और सिंचाई की जरूरत तय कर सकते हैं। इसके लिए स्थानीय कृषि विभाग, कृषि विज्ञान केंद्र और जल-संसाधन संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है।
2026 का मानसून एक महत्वपूर्ण सबक देता है। जलवायु जोखिम को केवल ‘कम बारिश’ के रूप में समझना पर्याप्त नहीं है। बारिश का समय, उसका वितरण और उसकी तीव्रता यह तय करते हैं कि पानी का कितना हिस्सा खेत की मिट्टी में टिकेगा, कितना सतही बहाव के साथ निकल जाएगा और कितना भूजल या जलाशयों तक पहुंच पाएगा।
इसलिए बदलते मौसम के दौर में खेती की योजना बनाते समय फसल, मिट्टी के साथ-साथ पानी को भी साथ देखना होगा। कमजोर मानसून में सिंचाई की जरूरत बढ़ सकती है, लेकिन उसका समाधान केवल अधिक भूजल पंपिंग नहीं हो सकता। स्थानीय जल उपलब्धता के अनुसार फसल चयन, मिट्टी में नमी संरक्षण, वर्षा जल संचयन और भूजल का विवेकपूर्ण उपयोग एक साथ जरूरी हैं।
सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि El Niño इस साल कितनी बारिश कम कराएगा। बड़ा सवाल यह है कि भारत को मिलने वाली बारिश का कितना हिस्सा खेत की मिट्टी में नमी, भूजल पुनर्भरण और तालाबों-जलाशयों में संग्रहित पानी में बदल पाएगा। मानसून की अनिश्चितता के दौर में यही जल-सुरक्षित और जलवायु-सहिष्णु खेती की बुनियाद बन सकती है।
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