मैसूर में कृष्णराज सागर बांध के पास निकलती कावेरी नदी की धारा 

मैसूर में कृष्णराज सागर बांध के पास निकलती कावेरी नदी की धारा 

फ़ोटो: अजय मोहन

बाढ़, सूखा और भूजल संकट: WWW और IIWW में किन मुद्दों पर होगी चर्चा?

World Water Week और India International Water Week के जरिए समझिए कि बदलती जलवायु में भूजल, बाढ़, सूखे, शहरों और पानी की मांग को साथ देखने की जरूरत क्यों बढ़ रही है।
Published on
16 min read

पानी का संकट अब सिर्फ पानी की कमी या उसकी उपलब्धता का सवाल नहीं रह गया है। कहीं भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है, तो कहीं कम समय में बहुत ज्यादा बारिश हो रही है। कई इलाकों में लंबे समय तक सूखा रहता है, जबकि कुछ जगहों पर पानी उपलब्ध होने के बावजूद वह इस्तेमाल के लायक नहीं होता। शहरों में पानी की मांग बढ़ रही है, जबकि भूजल का बड़ा हिस्सा अब भी खेती में इस्तेमाल होता है। इन सभी दबावों के बीच जलवायु परिवर्तन पानी से जुड़ी चुनौतियों को और बढ़ा रहा है।

इन्हीं बदलती परिस्थितियों के बीच अगस्त और सितंबर 2026 में पानी को लेकर दो बड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन होंगे - स्टॉकहोम में World Water Week और नई दिल्ली में India International Water Week।

World Water Week 2026 23 से 27 अगस्त तक स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में होगा। इसका आयोजन Stockholm International Water Institute (SIWI) करता है। SIWI के अनुसार इस साल सम्मेलन में जल शासन, जल कूटनीति, कारोबारी नेतृत्व, जलवायु-लचीलापन और सतत विकास जैसे मुद्दों पर चर्चा होगी।

इसके करीब एक महीने बाद 22 से 26 सितंबर तक नई दिल्ली में India International Water Week 2026 (IIWW) होगा। यह सम्मेलन भारत मंडपम में होगा और इसकी मेज़बानी जल शक्ति मंत्रालय कर रहा है। इस साल की थीम है  जलवायु परिवर्तन के असर को ध्यान में रखकर पानी का ऐसा प्रबंधन जो बदलती परिस्थितियों में भी टिकाऊ और मजबूत बना रहे अंग्रेजी में टाइटल - “Climate Resilient Water Management” है।

दोनों सम्मेलनों की प्राथमिकताएं अलग हैं, लेकिन पानी को देखने का एक साझा नजरिया दोनों में दिखाई देता है। पानी को सिर्फ एक प्राकृतिक संसाधन के रूप में देखने के बजाय उसे जलवायु, विकास, शासन और लोगों के जीवन से जुड़े सवाल के रूप में समझने की कोशिश हो रही है।

लेकिन इन सम्मेलनों के बहाने एक बड़ा सवाल सामने आता है कि बदलती जलवायु में पानी का प्रबंधन कैसे बदले, ताकि उपलब्ध पानी सुरक्षित भी रहे और उसका इस्तेमाल भी टिकाऊ हो?

दोनों सम्मेलनों में शामिल होने वाले देश और संस्थाएं

पानी का संकट किसी एक देश या संस्था तक सीमित नहीं है, इसलिए इन दोनों सम्मेलनों में सरकारों के साथ-साथ शोधकर्ता, जल विशेषज्ञ, निजी क्षेत्र, नागरिक संगठन और स्थानीय स्तर पर काम करने वाले लोग शामिल होंगे। World Water Week का आयोजन SIWI करता है और इसमें दुनिया भर से नीति-निर्माता, विशेषज्ञ, व्यवसायी, नागरिक समाज और युवा भाग लेते हैं, ताकि विज्ञान, नीति और व्यवहारिक अनुभव को एक साथ जोड़ा जा सके।

जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार नई दिल्ली में होने वाले IIWW में दुनिया भर के नीति-निर्माताओं, शोधकर्ताओं, विशेषज्ञों, योजनाकारों, नवाचार से जुड़े लोगों और समुदायों के शामिल होने की उम्मीद है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय संगठन, शोध संस्थान, एनजीओ, उद्योग, युवा पेशेवर और स्टार्टअप्स भी इसमें शामिल होंगे। इससे यह मंच नीति-निर्माण से लेकर जमीनी स्तर के अनुभवों तक को एक साथ लाने का प्रयास करता है।

दोनों सम्मेलनों में भागीदारी व्यापक है, लेकिन उनके उद्देश्य और फोकस पूरी तरह एक जैसे नहीं हैं। दोनों के बीच समानता और अंतर को साथ रखकर देखें तो उनका फर्क ज्यादा साफ होता है।

World Water Week और India International Water Week में समानता और अंतर

<div class="paragraphs"><p>2026 के&nbsp;World Water Week सम्मेलन में शामिल होने वाले सभी देश मिलकर जल शासन, जल कूटनीति, कारोबारी नेतृत्व, जलवायु-लचीलापन और सतत विकास जैसे मुद्दों पर चर्चा करेंगे। </p></div>

2026 के World Water Week सम्मेलन में शामिल होने वाले सभी देश मिलकर जल शासन, जल कूटनीति, कारोबारी नेतृत्व, जलवायु-लचीलापन और सतत विकास जैसे मुद्दों पर चर्चा करेंगे।

फ़ोटो: विकिमीडिया कॉमन्स

दोनों सम्मेलनों की सबसे बड़ी समानता यह है कि पानी को अब केवल संसाधन के रूप में नहीं देखा जा रहा। इसे जलवायु, विकास, शासन, अर्थव्यवस्था, समुदाय और प्रकृति से जुड़े सवालों के साथ देखा जा रहा है। फर्क यह है कि World Water Week का दायरा अधिक वैश्विक और बहु-विषयक है, जबकि IIWW 2026 ने जलवायु-लचीले जल प्रबंधन को अपनी केंद्रीय थीम बनाया है। साथ ही यहां भारत के परिपेक्ष में अधिक चर्चा होगी।

पानी पर दुनिया की नजर क्यों है?

पानी से जुड़ी कई समस्याएं अब एक-दूसरे को प्रभावित कर रही हैं। सूखे का असर सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रहता। बारिश की कमी और लंबे सूखे से फसल का उत्पादन घट सकता है, किसानों की आय प्रभावित हो सकती है और पूरे स्थानीय बाजार पर असर पड़ सकता है।

दूसरी ओर, कम समय में बहुत ज्यादा बारिश होने पर बाढ़ का खतरा बढ़ता है। शहरों के लिए ऐसी बारिश पानी की निकासी, जल स्रोतों की सुरक्षा और शहरी नियोजन एवं प्रबंधन के सामने कई चुनौतियां भी पैदा करती है। इससे एक ही क्षेत्र को कभी बहुत ज्यादा पानी और कभी पानी की कमी का सामना करना पड़ सकता है। जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश के समय और तीव्रता में बदलाव इस जोखिम को और बढ़ा सकता है।

इसलिए पानी पर वैश्विक बहस अब सिर्फ उपलब्ध पानी की मात्रा तक सीमित नहीं है। World Water Week 2026 में भी पानी को जल शासन, जल कूटनीति, जलवायु-लचीलापन और सतत विकास से जोड़कर देखा जा रहा है। SIWI के अनुसार इस साल के कार्यक्रम में जल शासन (water governance), जल कूटनीति (water diplomacy), कारोबारी नेतृत्व (business leadership), जलवायु-लचीलापन (climate resilience) और सतत विकास (sustainable development) जैसे विषयों पर चर्चा होगी।

इससे यह समझ आता है कि पानी पर बहस अब सिर्फ इस सवाल तक सीमित नहीं है कि कितना पानी उपलब्ध है। उदाहरण के तौर पर आप इस सूची में भारत के उन 10 राज्यों को देख सकते हैं जहां सबसे अधिक भूजल का दोहन होता है।

भारत के 10 राज्य जहां भूजल दोहन सबसे ज्यादा है:

भूजल का आंकलन जितना ज़रूरी है उतना ही महत्वपूर्ण है यह जानना कि पानी का प्रबंधन कौन करता है, फैसले कैसे लिए जाते हैं और उनमें किन लोगों की आवाज शामिल होती है। बदलती जलवायु में पानी को लोगों के साथ-साथ नदियों, झीलों, भूजल और दूसरे पारिस्थितिकी तंत्रों के लिए भी सुरक्षित रखना होगा। इन सभी सवालों के जवाब आगामी कार्यक्रम में संभव हैं।

भारत के लिए यह बहस क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत में पानी की चुनौती को समझने के लिए भूजल से शुरुआत करना जरूरी है। केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) देश के भूजल संसाधनों का नियमित आकलन करता है। इसमें यह देखा जाता है कि किसी इलाके में कितना भूजल उपलब्ध है, कितना दोहन हो रहा है और कितना पानी दोबारा जमीन में पहुंच रहा है। भूजल के इस्तेमाल और उपलब्धता के आधार पर इन इकाइयों को सुरक्षित (Safe), अर्ध-संकटग्रस्त (Semi-Critical), संकटग्रस्त (Critical) और अति-दोहित (Over-Exploited) श्रेणियों में रखा जाता है। 

भारत में भूजल का सबसे बड़ा इस्तेमाल खेती में होता है। CGWB की वार्षिक भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट 2025 के अनुसार, देश में निकाले गए भूजल का करीब 87 प्रतिशत कृषि क्षेत्र में इस्तेमाल होता है। वहीं लगभग 11 प्रतिशत पानी घरेलू जरूरतों में जाता है।

<div class="paragraphs"><p>IIWW 2026 ने जलवायु-लचीले जल प्रबंधन को अपनी केंद्रीय थीम बनाया है। </p></div>

IIWW 2026 ने जलवायु-लचीले जल प्रबंधन को अपनी केंद्रीय थीम बनाया है।

फ़ोटो: विकिमीडिया कॉमन्स

भारत में जल सुरक्षा का सवाल सिर्फ पानी की मात्रा का नहीं है। पानी की गुणवत्ता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। CGWB की 2025 की रिपोर्ट में भूजल गुणवत्ता से जुड़े कई रासायनिक तत्वों की निगरानी की गई है। इसलिए जलवायु-लचीले जल प्रबंधन में यह देखना भी जरूरी है कि उपलब्ध पानी पीने, खेती और दूसरे इस्तेमाल के लिए कितना सुरक्षित है।

CGWB की अलग-अलग टीमें सभी राज्यों में पानी की टेस्टिंग करती हैं कि कहां आर्सेनिक ज्यादा है तो कहां फ्लोराइड। इसके अलग यूरेनियम और अन्य भारी धातुओं की जांच भी की जाती है। फिर सभी राज्यों की सूची जारी की जाती है।

Also Read
भूजल में नाइट्रेट: कैसे बढ़ रहा है खतरा, किन जिलों में सबसे ज्यादा समस्या और क्या है समाधान ?
<div class="paragraphs"><p>मैसूर में कृष्णराज सागर बांध के पास निकलती कावेरी नदी की धारा&nbsp;</p></div>

इससे साफ है कि भारत में जल सुरक्षा की चर्चा खेती और भूजल को अलग रखकर नहीं की जा सकती। अगर किसी इलाके में भूजल जितनी तेजी से निकाला जा रहा है, उतनी तेजी से उसकी भरपाई नहीं हो रही है, तो समस्या सिर्फ पानी की उपलब्धता तक सीमित नहीं रहती। इसका असर सिंचाई की लागत, किसान किन फसलों को चुनते हैं और ग्रामीण आजीविका पर भी पड़ सकता है।

इसीलिए जलवायु परिवर्तन के दौर में सिर्फ नए जल स्रोत तलाशना पर्याप्त नहीं होगा। यह भी देखना होगा कि बारिश का कितना पानी जमीन में पहुंच रहा है, भूजल कितना निकाला जा रहा है और उपलब्ध पानी अलग-अलग जरूरतों के बीच कैसे बांटा जा रहा है।

यही सवाल सितंबर में होने वाले India International Water Week की थीम से भी जुड़ता है। आखिर जलवायु परिवर्तन के बीच पानी का ऐसा प्रबंधन कैसे हो, जो लोगों और प्रकृति दोनों के लिए टिकाऊ हो?

Climate Resilient Water Management का मतलब क्या है?

सरल शब्दों में, Climate Resilient Water Management का मतलब है जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखकर पानी का प्रबंधन करना। ऐसी जल व्यवस्था बनाना, जो बदलते मौसम में भी काम करती रहे। इसमें बाढ़, सूखे और बारिश के बदलते तरीके जैसे जोखिमों को पहले से समझना शामिल है। साथ ही यह भी देखना होता है कि लोगों की जरूरत पूरी हो और नदियों, झीलों, भूजल जैसे प्राकृतिक जल स्रोत भी सुरक्षित रहें।

यहां ‘लचीला’ होने का मतलब सिर्फ संकट आने के बाद व्यवस्था को फिर सामान्य करना नहीं है। लचीली व्यवस्था वह भी है जो संकट के बाद जल्दी काम पर लौट सके और अगली घटना के लिए बेहतर तैयार हो। इस संदर्भ में इसका मतलब यह है कि पानी की व्यवस्था पहले से ऐसे जोखिमों के लिए तैयार हो और बदलती परिस्थितियों में भी काम करती रहे। ऐसी व्यवस्था की जरूरत इसलिए बढ़ रही है क्योंकि जलवायु परिवर्तन बारिश और पानी के पूरे चक्र को प्रभावित कर रहा है। 

जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (IPCC) के अनुसार दक्षिण एशिया के कई हिस्सों में भारी वर्षा की घटनाओं की तीव्रता में बदलाव देखा गया है और सूखे से जुड़े जोखिम भी बदल रहे हैं। इसका मतलब है कि जल प्रबंधन को केवल औसत सालाना बारिश के आधार पर नहीं चलाया जा सकता। बारिश कब, कितनी और किस जगह होती है, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। और तो और बढ़ते तापमान के कारण दुनिया के तमाम शहरों में गर्मी के मौसम में वेट बल्ब बन रहे हैं। इस पर भी निरंतर अध्ययन चल रहे हैं।

Also Read
दुनिया भर में दुगना हुआ ‘वेट बल्ब तापमान’, भारत के 50 शहर हाई रिस्क पर, देखें पूरी सूची
<div class="paragraphs"><p>मैसूर में कृष्णराज सागर बांध के पास निकलती कावेरी नदी की धारा&nbsp;</p></div>

भारत में इसका एक सीधा उदाहरण खेती और भूजल का है। Council on Energy, Environment and Water (CEEW) के 2025 के अध्ययन के अनुसार भारत में कुल पानी के इस्तेमाल का करीब 76 प्रतिशत हिस्सा कृषि में जाता है। भारतीय खेती सिंचाई के लिए भूजल पर भी काफी निर्भर है। ऐसे में अगर बारिश का समय और वितरण बदलता है, तो इसका असर केवल खेत में उपलब्ध पानी पर नहीं पड़ता; इससे सिंचाई, फसल का चुनाव और भूजल पर दबाव भी बदल सकता है।

इसीलिए CEEW ने कृषि जल प्रबंधन में IWRM को महत्वपूर्ण माना है। इसमें खेती, भूजल, सतही जल, ऊर्जा, पर्यावरण और लोगों की जरूरतों को एक-दूसरे से जोड़कर देखा जाता है। फिर इन्हीं को ध्यान में रखकर जल प्रबंधन के फैसले किए जाते हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण भविष्य में पानी की उपलब्धता को लेकर अनिश्चितता बढ़ रही है। इसलिए जल प्रबंधन में जलवायु जोखिमों को भी शामिल करना जरूरी है।

UN-Water भी जलवायु परिवर्तन और पानी के रिश्ते को सीधे तौर पर जोड़ता है। उसके अनुसार जलवायु परिवर्तन के असर बाढ़, सूखे, समुद्र के बढ़ते स्तर और पानी के चक्र में बदलाव के रूप में सामने आते हैं। चरम मौसम पानी को अधिक अनिश्चित बना सकता है और उसकी उपलब्धता तथा गुणवत्ता पर असर डाल सकता है।

इसलिए जलवायु-लचीला जल प्रबंधन केवल सूखे के समय पानी पहुंचाने या बाढ़ के समय पानी निकालने की व्यवस्था नहीं है। इसमें पहले से यह समझना भी शामिल है कि किसी इलाके में पानी से जुड़े जोखिम कैसे बदल रहे हैं और जल व्यवस्था को उनके अनुसार कैसे तैयार किया जाए।

इन बदलावों का असर सिर्फ लोगों पर नहीं पड़ता। नदियां, झीलें, आर्द्रभूमियां और दूसरे पारिस्थितिकी तंत्र भी इससे प्रभावित होते हैं। इसलिए जलवायु-लचीले जल प्रबंधन में लोगों की पानी की जरूरत के साथ इन प्राकृतिक जल तंत्रों की भूमिका को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

सिर्फ पानी के नए स्रोत जुटाना समाधान नहीं

इसके लिए पानी को देखने का तरीका बदलना होगा। पानी की कमी होने पर सिर्फ नए स्रोत तलाशना पर्याप्त नहीं है। उपलब्ध पानी को बचाना भी उतना ही जरूरी है। पानी की मांग कम करनी होगी। 

पानी की मांग कम करने का मतलब सिर्फ लोगों से कम पानी इस्तेमाल करने को कहना नहीं है। खेती में कौन-सी फसल उगाई जा रही है, सिंचाई कितनी कुशल है और शहरों में कितना पानी दोबारा इस्तेमाल हो रहा है, ये बातें भी मांग को प्रभावित करती हैं। इसलिए जल प्रबंधन में पानी की उपलब्धता के साथ उसकी मांग को भी समझना जरूरी है। बारिश के पानी को तालाबों, झीलों और जमीन के भीतर रोकने के तरीके भी बढ़ाने होंगे।

भारत में खेती के मामले में यह बदलाव खास तौर पर जरूरी है।CEEW के 2025 के एक अध्ययन के अनुसार, भारत में इस्तेमाल होने वाले कुल पानी का करीब 76 प्रतिशत हिस्सा खेती में जाता है। खेती सिंचाई के लिए भूजल पर भी काफी निर्भर है।

इसलिए खेती के पानी को केवल सिंचाई का सवाल मानना पर्याप्त नहीं है। इसका संबंध भूजल, ऊर्जा और फसल के चुनाव से भी है। बाजार में फसल की कीमत और सिंचाई के लिए पानी व ऊर्जा की उपलब्धता भी तय करती है कि किसान पानी का इस्तेमाल किस तरह करेंगे।

CEEW इस तरह की स्थिति में समेकित जल संसाधन प्रबंधन (Integrated Water Resources Management) को महत्वपूर्ण मानता है। इसका मतलब है कि पानी के अलग-अलग स्रोतों और इस्तेमाल को अलग-अलग देखने के बजाय उन्हें एक साथ समझा जाए। खेती, भूजल, सतही जल, ऊर्जा और पर्यावरण के बीच के संबंधों को ध्यान में रखकर फैसले लिए जाएं।

इसका मतलब यह नहीं है कि नए जल स्रोतों या बड़ी जल परियोजनाओं की जरूरत नहीं है। जरूरत है, लेकिन हर जगह एक ही समाधान काम नहीं करेगा। किसी इलाके में पानी की कमी का कारण भूजल का ज्यादा दोहन हो सकता है, तो किसी दूसरे इलाके में समस्या बारिश के पानी को रोक न पाना हो सकती है। इसलिए पहले यह समझना जरूरी है कि किस इलाके में पानी की समस्या क्या है और उसका कारण क्या है।

यही सोच जलवायु-लचीले जल प्रबंधन को सिर्फ पानी जुटाने की नीति से अलग करती है। इसमें पानी की उपलब्धता बढ़ाने के साथ उसकी मांग, इस्तेमाल और संरक्षण पर भी ध्यान दिया जाता है।

बाढ़ और सूखे को अलग-अलग समस्या मानना पर्याप्त नहीं

जलवायु-लचीले जल प्रबंधन में बाढ़ और सूखे के जोखिम को पहले से समझना जरूरी है। अगर किसी इलाके में भारी बारिश का खतरा बढ़ रहा है, तो सिर्फ बाढ़ आने के बाद राहत देना काफी नहीं होगा। पहले से यह देखना होगा कि शहर की नालियां, झीलें, जलाशय और नदी के बाढ़ क्षेत्र इतना पानी संभाल सकते हैं या नहीं। कई जल जोखिम किसी एक शहर या जिले तक सीमित नहीं होते। नदी बेसिन के स्तर पर पानी, जमीन, खेती, शहर और बाढ़ के जोखिम को साथ देखना भी जरूरी है।

UN-Water के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण बाढ़ और दूसरे जल-संबंधी खतरे ज्यादा बार और ज्यादा गंभीर हो सकते हैं। इसलिए जल और स्वच्छता की सेवाओं को भी ऐसे खतरों के लिए तैयार करना होगा।

सूखे की स्थिति में भी सिर्फ टैंकर भेजना या किसी दूसरे स्रोत से पानी पहुंचाना स्थायी समाधान नहीं है। इसके लिए पहले से देखना होगा कि स्थानीय जल स्रोतों की स्थिति कैसी है, भूजल कितना भर रहा है और पानी की मांग कितनी है। बाढ़ के समय पानी को जल्दी बाहर निकालना और सूखे के समय पानी पहुंचाना ही पूरी जल व्यवस्था नहीं है। दोनों स्थितियों की तैयारी पहले से करनी होगी।

बारिश के पानी को रोकना इसका एक हिस्सा हो सकता है। तालाब, झील और आर्द्रभूमियां अतिरिक्त पानी को संभालने में मदद कर सकती हैं। बारिश के पानी को जमीन में पहुंचाने से सूखे के समय भूजल पर दबाव भी कम किया जा सकता है। UN-Water भी वर्षाजल संचयन, प्राकृतिक जल तंत्रों की सुरक्षा और बेहतर जल भंडारण को जलवायु के असर से निपटने के उपयोगी उपायों में गिनता है।

इसलिए जलवायु-लचीले जल प्रबंधन का मतलब बाढ़ से बचाव और सूखे से राहत को दो अलग काम मानना नहीं है। दोनों के पीछे पानी का एक ही चक्र काम करता है। योजना भी उसी पूरे चक्र को ध्यान में रखकर बनानी होगी।

शहरों में पानी को एक पूरे तंत्र की तरह देखना होगा

शहरों में जल प्रबंधन को अक्सर दो कामों तक सीमित कर दिया जाता है। पहला घरों तक पानी पहुंचाना और दूसरा बारिश का पानी निकालना। लेकिन बदलती जलवायु में इन दोनों कामों को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता।

भारी बारिश का पानी अगर तुरंत नालियों के जरिए बाहर निकाल दिया जाए, तो जलभराव कुछ समय के लिए कम हो सकता है। लेकिन बारिश के कुछ पानी को झीलों, तालाबों और हरित क्षेत्रों में रोका जा सकता है। कुछ पानी जमीन में भी पहुंचाया जा सकता है। इससे बाढ़ का दबाव घट सकता है और भूजल को भी फायदा मिल सकता है।  इस नजरिए में बारिश का पानी सिर्फ निकालने वाली चीज नहीं है। वह शहर के लिए एक संभावित जल स्रोत भी है।

राष्ट्रीय शहरी कार्य संस्थान (NIUA) की जल-संवेदनशील शहरी नियोजन (Water Sensitive Urban Design) की पहल भी इसी सोच की सिफ़ारिश करती है। इसमें शहर की ऐसी योजना बनाने पर जोर है, जो बारिश और उपलब्ध जल स्रोतों को समस्या मानकर सिर्फ बाहर निकालने के बजाय उनका बेहतर इस्तेमाल करे।

जल-संवेदनशील शहरी नियोजन में बारिश, भूजल, झीलों, नदियों और सीवेज को शहर के एक ही जल तंत्र का हिस्सा मानकर योजना बनाई जाती है। इसका मतलब है कि शहर में पानी को केवल पाइप से आने वाली सेवा न माना जाए। बारिश का पानी, भूजल, नदियां, झीलें और सीवेज भी इसी जल तंत्र का हिस्सा हैं।

इसमें शहर की झीलों, तालाबों और आर्द्रभूमियों को खाली जमीन नहीं माना जाता। ये बारिश का पानी संभालने, भूजल रिचार्ज में मदद करने और बाढ़ का असर कम करने में भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए किसी शहर को जलवायु के लिए तैयार करने का मतलब सिर्फ बड़े नाले या ज्यादा पाइपलाइन बनाना नहीं है। शहर की प्राकृतिक जल व्यवस्था को बचाना भी उतना ही जरूरी है।

इससे समुदाय की भूमिका का सवाल भी सामने आता है। किसी झील, तालाब या जलधारा को बचाने का फैसला केवल इंजीनियरिंग का फैसला नहीं है। उससे जुड़े लोगों को भी यह तय करने में भागीदार होना चाहिए कि उस जल स्रोत का इस्तेमाल और संरक्षण कैसे होगा।

 फिर इसमें समुदाय कहां आता है?

India International Water Week की थीम में समुदाय की भूमिका को भी जगह दी गई है। IIWW के सात उप-विषयों में एक है जल सुरक्षा के लिए तकनीक और समुदाय (Technology and Community for Water Security)। इसमें तकनीक के साथ समुदाय की भूमिका को भी जल सुरक्षा का जरूरी हिस्सा माना गया है।

इसी तरह एक उप-विषय समावेशी और समान जल शासन (Inclusive and Equitable Water Governance) पर है। इसमें यह सवाल सामने आता है कि पानी से जुड़े फैसलों में अलग-अलग लोगों और समुदायों की भागीदारी कैसे सुनिश्चित की जाए।

इससे एक बात साफ होती है। जलवायु-लचीला जल प्रबंधन सिर्फ इंजीनियरिंग का सवाल नहीं है। तकनीक जरूरी है, लेकिन पानी का इस्तेमाल करने वाले लोगों की भागीदारी भी जरूरी है। स्थानीय अनुभव और ज्ञान कई फैसलों को बेहतर बना सकते हैं। सवाल यह भी है कि समुदाय को केवल पानी की योजनाओं का लाभार्थी माना जाए या उसे फैसले लेने की प्रक्रिया में भी भागीदार बनाया जाए।

UN-Water की जलवायु और पानी पर नीति संबंधी रिपोर्ट भी जलवायु के दौर में बेहतर जल प्रबंधन के लिए मजबूत संस्थाओं, बेहतर आंकड़ों और स्थानीय भागीदारी की जरूरत पर जोर देती है। जलवायु परिवर्तन का असर सभी लोगों पर एक जैसा नहीं पड़ता। इसलिए जल प्रबंधन की योजनाओं में उन समुदायों की जरूरतों को भी शामिल करना होगा, जो पानी से जुड़े जोखिमों के प्रति ज्यादा संवेदनशील हैं। 

किसी गांव में तालाब को फिर से जीवित करना हो, किसी शहर की झील और बाढ़ क्षेत्र को बचाना हो या किसी इलाके में भूजल का इस्तेमाल तय करना हो, इन फैसलों में स्थानीय लोगों की भूमिका जरूरी है। उन्हें सिर्फ लाभार्थी नहीं, बल्कि जल प्रबंधन का भागीदार माना जाना चाहिए।

भागीदारी का मतलब सिर्फ स्थानीय ज्ञान लेना नहीं है। इसका मतलब यह भी है कि पानी के बंटवारे और उससे जुड़े फैसलों में लोगों की आवाज और जवाबदेही के लिए जगह हो।

<div class="paragraphs"><p>भूजल का आंकलन जितना ज़रूरी है उतना ही महत्वपूर्ण है यह जानना कि पानी का प्रबंधन कौन करता है, फैसले कैसे लिए जाते हैं और उनमें किन लोगों की आवाज शामिल होती है।</p></div>

भूजल का आंकलन जितना ज़रूरी है उतना ही महत्वपूर्ण है यह जानना कि पानी का प्रबंधन कौन करता है, फैसले कैसे लिए जाते हैं और उनमें किन लोगों की आवाज शामिल होती है।

फ़ोटो: विकिमीडिया कॉमन्स

पानी का हिसाब रखना भी जरूरी है

जलवायु-लचीले जल प्रबंधन में पानी का हिसाब रखना भी जरूरी है। इसे जल बजट (Water Budgeting) कहा जाता है। जल बजट में यह देखा जाता है कि किसी इलाके में कितना पानी उपलब्ध है। उसमें से कितना पानी खेती, घरों और दूसरे कामों में इस्तेमाल हो रहा है। और भविष्य के लिए कितना पानी बच रहा है।

यह हिसाब सिर्फ सरकारी आंकड़ों से नहीं बनता। इसमें स्थानीय लोगों का अनुभव भी महत्वपूर्ण हो सकता है। वे बता सकते हैं कि कौन-से कुएं सूख रहे हैं, कहां पानी का स्तर बदल रहा है और किस मौसम में पानी की कमी ज्यादा होती है। जल बजट केवल पानी की उपलब्धता गिनने का तरीका नहीं है। यह तय करने में भी मदद कर सकता है कि उपलब्ध पानी का इस्तेमाल किस तरह किया जाए।

NITI Aayog और Indo-German Water Security and Climate Adaptation in Rural India (WASCA) की रिपोर्ट में 18 आकांक्षी ब्लॉकों (Aspirational Blocks) में जल बजट तैयार करने के अनुभव दर्ज किए गए हैं।

रिपोर्ट के अनुसार जल बजट से यह समझने में मदद मिलती है कि पानी कितना उपलब्ध है और उसकी मांग कितनी है। इससे उन इलाकों की पहचान भी की जा सकती है जहां पानी का दबाव ज्यादा है। 

यही जानकारी आगे के फैसलों में काम आ सकती है। अगर किसी इलाके में पानी की उपलब्धता सीमित है, तो वहां फसल, सिंचाई और नए जल स्रोतों की योजना उसी हिसाब से बनानी होगी। इसलिए जल बजट जलवायु-लचीले जल प्रबंधन को जमीन पर लागू करने का एक तरीका बन सकता है। 

अगर किसी इलाके में यह पता ही न हो कि कितना पानी उपलब्ध है और कितना इस्तेमाल हो रहा है, तो बदलती जलवायु के बीच सही योजना बनाना मुश्किल होगा। किसी इलाके में कितना पानी उपलब्ध है और कितना इस्तेमाल हो रहा है, इसकी जानकारी के बिना बदलती जलवायु में सही योजना बनाना मुश्किल है।

सात उप-विषय, पानी के सात बड़े सवाल

IIWW के सात उप-विषयों को साथ देखें तो पानी से जुड़े कई बड़े सवाल सामने आते हैं। ये सवाल एक-दूसरे से भी जुड़े हैं।

  1. जल शासन: पानी से जुड़े फैसले कौन लेता है? क्या इनमें अलग-अलग लोगों और समुदायों की भागीदारी है? IIWW का पहला उप-विषय समावेशी और समान जल शासन (Inclusive and Equitable Water Governance) इसी सवाल पर केंद्रित है।

  2. सहयोग: खेती, शहर, उद्योग और ऊर्जा सभी को पानी चाहिए। लेकिन उनकी जरूरतें अलग हैं। इनके बीच बेहतर तालमेल कैसे बने? IIWW का दूसरा उप-विषय जल संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल के लिए सहयोग पर जोर देता है। इसमें उपचारित पानी के दोबारा इस्तेमाल और अलग-अलग क्षेत्रों के बीच साझेदारी जैसे मुद्दे शामिल हैं।

  3. तकनीक और समुदाय: सेंसर, उपग्रह और AI जैसे साधन पानी की निगरानी और प्रबंधन में मदद कर सकते हैं। लेकिन तकनीक अकेले पर्याप्त नहीं है। इसे स्थानीय ज्ञान और समुदाय की भागीदारी से जोड़ना भी जरूरी है।

  4. जलवायु जोखिम: बाढ़, सूखे और पानी की कमी के खतरे बदल रहे हैं। इसलिए इन खतरों का पहले से आकलन करना जरूरी है। इसके लिए बेहतर आंकड़े, पूर्व चेतावनी और ऐसी जल व्यवस्था चाहिए जो इन जोखिमों का सामना कर सके।

  5. वित्त: पानी की पाइपलाइन, सीवेज व्यवस्था और दूसरी जल अवसंरचनाओं के लिए बड़े निवेश की जरूरत होती है। IIWW में नए वित्तीय मॉडल के साथ यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि इन व्यवस्थाओं के रखरखाव और लंबे समय तक संचालन के लिए स्थिर वित्त कैसे मिले।

  6. टिकाऊ जल प्रबंधन: आज की जरूरत पूरी हो, लेकिन इसके लिए भविष्य का पानी खत्म न हो। इसके लिए पानी बचाना, उसका दोबारा इस्तेमाल करना, भूजल का बेहतर प्रबंधन और पानी की गुणवत्ता बनाए रखना जरूरी है।

  7. लोग और प्रकृति: पानी सिर्फ इंसानों की जरूरत नहीं है। नदियां, झीलें, भूजल और दूसरे पारिस्थितिकी तंत्र भी पानी पर निर्भर हैं। IIWW का सातवां उप-विषय इसी रिश्ते पर केंद्रित है। इसमें जलभृतों का मानचित्रण (aquifer mapping), पर्यावरणीय प्रवाह (environmental flows) और पानी से जुड़े मानव स्वास्थ्य के सवाल शामिल हैं।

इन सात सवालों को साथ देखें तो साफ होता है कि Climate Resilient Water Management सिर्फ तकनीक या नई परियोजनाओं का नाम नहीं है। यह पानी को देखने और उसका प्रबंधन करने का तरीका बदलने की बात है।

इसमें नए जल स्रोत खोजने के साथ उपलब्ध पानी को बचाना, जलवायु जोखिमों के लिए पहले से तैयारी करना और भूजल, नदियों, झीलों तथा बारिश के पानी को एक ही जल तंत्र का हिस्सा मानना शामिल है।

सम्मेलन के बाद किन सवालों पर नजर रहेगी?

  1. क्या जलवायु जोखिम को जल योजनाओं में शामिल किया जाएगा?

  2. क्या भूजल के लिए रिचार्ज  के साथ दोहन पर भी बात होगी?

  3. क्या शहर बारिश के पानी को केवल drainage problem मानेंगे या resource भी?

  4. क्या समुदाय जल प्रबंधन के फैसलों में वास्तविक भागीदार बनेंगे?

  5. क्या नदी, झील और आर्द्रभूमि को जल सुरक्षा का हिस्सा माना जाएगा?

इन सवालों के जवाब सिर्फ सम्मेलन के मंच पर नहीं, बल्कि उसके बाद बनने वाली नीतियों और योजनाओं में दिखने चाहिए।

ऐसे सम्मेलनों की असली उपयोगिता इस बात से तय होगी कि चर्चा कितनी जल्दी नीति और जमीन के काम में बदलती है। भारत के लिए सवाल केवल इतना नहीं है कि पानी के नए स्रोत कहां मिलेंगे। 

सवाल यह भी है कि उपलब्ध पानी को कैसे बचाया जाए, उसका इस्तेमाल कैसे बदला जाए और जलवायु के बढ़ते जोखिमों के बीच लोगों और प्रकृति दोनों के लिए पानी कैसे सुरक्षित रखा जाए। यही Climate Resilient Water Management की सबसे बड़ी कसौटी होगी।

Also Read
विश्व जल दिवस 22 मार्च का महत्व, इतिहास, जल संरक्षण के उपाय और 2026 की थीम
<div class="paragraphs"><p>मैसूर में कृष्णराज सागर बांध के पास निकलती कावेरी नदी की धारा&nbsp;</p></div>

लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें

India Water Portal - Hindi
hindi.indiawaterportal.org