

जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण ग्रीन लैंड के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इससे हिमालय में हैंगिंग ग्लेशियर्स की संख्या बढ़ती जा रही है
फोटो : विकी कॉमंस
हाल ही में नेपाल में ग्लेशियर झील के फटने से आई भयंकर बाढ़ से मची तबाही ने सारी दुनिया के पर्यावरण विशेषज्ञों को झकझोर कर रख दिया। नेपाल के उत्तरी सीमावर्ती जिले रसुवा में आई इस फ्लैश फ्लड की वजह दरअसल एक हैंगिंग ग्लेशियर (Hanging glacier) के टूटने से उसके नीचे बनी ग्लेशियर झील का फट जाना बताया गया। इसे ग्लेशियर झील के अचानक फटने से जुड़ी बाढ़ यानी Glacial Lake Outburst Flood (GLOF) कहा जाता है।
कुछ ही मिनटों में आए इस ‘जलप्रलय' ने लोगों को संभलने का मौका तक नहीं दिया। इस घटना ने हिमालय पर्वत माला में मौजूद सैकड़ों लटकते हुए ग्लेशियर्स यानी Hanging glacier के बढ़ते खतरे के प्रति लोगों को आगाह कर दिया है। नेपाल की बाढ़ ने बता दिया है कि ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण ग्लेशियरों के पिघलने की बढ़ती रफ्तार ने इन हैंगिंग ग्लेशियर्स को एक 'वाटर बम' जैसा बना दिया है, जो कभी भी फट कर अचानक ही फ्लैश फ्लड (Flash flood) या मड फ्लड (Mud flood) और उससे होने वाले भारी भूस्खलन के रूप में भारी तबाही मचा सकते हैं।
हैंगिंग ग्लेशियर या लटकते हिमनद ऐसे बर्फ के द्रव्यमान (Ice Masses) होते हैं, जो खड़ी पर्वतीय ढलानों या चट्टानों (Steep Mountain Slopes or Cliffs) पर स्थित होते हैं और प्रायः मुख्य हिमनद प्रणाली से अलग होते हैं। अपनी अस्थिर स्थिति के कारण ये अचानक टूट सकते हैं तथा बड़े हिमस्खलन (Large Ice Avalanches) को जन्म दे सकते हैं।
सामान्य ग्लेशियर के विपरीत, हैंगिंग ग्लेशियर अक्सर ऐसी ढलानों पर टिके होते हैं, जहां बर्फ को नीचे की ओर सहारा देने वाली सतह सीमित होती है। इनके किनारों पर दरारें पड़ना, बर्फ का आगे की ओर निकला हुआ हिस्सा बनना और बर्फ के आधार का चट्टान से अलग होना संभावित अस्थिरता के संकेत हैं। जब बर्फ का कोई बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे गिरता है, तो वह रास्ते में मौजूद बर्फ, चट्टानों और मलबे को भी अपने साथ बहा सकता है। इससे बर्फीला हिमस्खलन (Ice avalanche) पैदा होता है, जो नीचे की घाटियों में अचानक तबाही मचा सकता है।
हैंगिंग ग्लेशियर के खतरे को समझने के लिए उसके आकार के साथ उसकी स्थिति और आसपास की भौगोलिक बनावट भी महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए, मध्य हिमालय की अलकनंदा नदी घाटी पर अप्रैल 2026 में प्रकाशित एक अध्ययन में हैंगिंग ग्लेशियरों की पहचान और उनके नीचे स्थित संवेदनशील क्षेत्रों का आकलन किया गया। यह हिमालय में ऐसे ग्लेशियरों के व्यवस्थित अध्ययन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। हालांकि, किसी ग्लेशियर का हैंगिंग होना अपने आप में उसके तत्काल टूटने का संकेत नहीं है। उसकी दरारों, गति और संरचनात्मक स्थिरता का लगातार अध्ययन करना जरूरी है।
हैंगिंग ग्लेशियर मूलत: साधारण ग्लेशियर ही होते हैं, जो अपनी खास लटकी हुई स्थिति के कारण खतरनाक या जोखिम भरे हो जाते हैं। इनका निर्माण हिमनदों की खास ज्यामितीय आकृति और बढ़ती अस्थिरता (Geometric and Dynamic Instability) के कारण होता है। जलवायु परिवर्तन (Climate change) के कारण दुनिया भर में हो रही तापवृद्धि (Global warming) हिमनदों की संरचना को बदल देती है और पिघलने की गति को बढ़ा देती है, जिससे खड़ी ढलानों पर स्थित ये ग्लेशियर अस्थिर होकर हैंगिंग ग्लेशियर बन जाते हैं।
इस प्रक्रिया को समझने के लिए ग्लेशियर की आकृति, चट्टानी आधार और बर्फ के बहाव के बीच संबंध देखना जरूरी है। किसी ढलान पर बर्फ जमा होने और उसके नीचे की ओर खिसकने की दर में बदलाव होने से बर्फ में तनाव बढ़ सकता है। दरारें गहरी होने पर बर्फ का कोई हिस्सा अपने आधार से अलग हो सकता है। इसके अलावा, बर्फ पिघलने से बना पानी दरारों में प्रवेश कर सकता है और चट्टान तथा बर्फ के संपर्क वाले हिस्सों की स्थिरता को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, हर मामले में पिघला हुआ पानी ही टूटने का कारण नहीं होता। चट्टानों की संरचना, ढलान का कोण, बर्फ की मोटाई और भूकंपीय गतिविधि भी भूमिका निभा सकती हैं।
इसका प्रत्यक्ष उदाहरण 7 फरवरी 2021 को उत्तराखंड के चमोली जिले में आई आपदा है। Science जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, रोंटी पीक की खड़ी उत्तरी ढलान से लगभग 2.7 करोड़ घन मीटर चट्टान और हिमनदीय बर्फ का हिस्सा ढह गया था। इस घटना में हैंगिंग ग्लेशियर के नीचे मौजूद चट्टानी आधार की विफलता अहम कारण थी। यानी, बर्फ का टूटना केवल तापमान बढ़ने की सीधी प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि बर्फ और चट्टान की संयुक्त अस्थिरता का परिणाम भी हो सकता है।
बढ़ते वैश्विक तापमान और वर्षण (Precipitation) यानी बारिश, बर्फबारी या ओलावृष्टि के रूप में वायुमंडल से पानी का धरती पर गिरने के स्वरूप में हो रहे बदलावों के कारण हिमालय के ग्लेशियरों की अस्थिरता (Glacier Instability) बढ़ती जा रही है। पहाड़ी इलाकों में तेजी से बढ़ रही गर्मी (तापमान वृद्धि) से बर्फ के विस्तार और संरचनात्मक मजबूती में बदलाव हो रहा है, जिससे ग्लेशियरों के टूटने की संभावना बढ़ रही है।
इस चिंता को ठोस आधार अप्रैल 2026 में साइंस जर्नल NPJ Natural Hazards में प्रकाशित मध्य हिमालय के एक अध्ययन से मिलता है। इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने उत्तराखंड की अलकनंदा नदी घाटी में 219 हैंगिंग ग्लेशियरों की पहचान की। इनका कुल क्षेत्रफल लगभग 71.7 वर्ग किलोमीटर और अनुमानित बर्फ का आयतन 2.39 घन किलोमीटर था। इनमें से करीब 0.74 घन किलोमीटर बर्फ को हैंगिंग आइस मास यानी अपेक्षाकृत अस्थिर लटकते बर्फीले हिस्से के रूप में आंका गया। इन ग्लेशियरों की सतह का औसत ढलान लगभग 33 डिग्री था। अध्ययन के अनुसार, बद्रीनाथ-माणा क्षेत्र में कुछ संभावित हिमस्खलन परिदृश्यों में मलबे के बहाव की ऊंचाई 50 मीटर से अधिक हो सकती है। यह मॉडल आधारित अनुमान है, किसी निश्चित घटना की भविष्यवाणी नहीं।
व्यापक क्षेत्रीय संदर्भ में, अंतरराष्ट्रीय एकीकृत पर्वतीय विकास केंद्र (ICIMOD) की मार्च 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, हिंदूकुश हिमालय के ग्लेशियरों ने 1990 से 2020 के बीच अपने कुल क्षेत्रफल का लगभग 12 प्रतिशत और अनुमानित बर्फ भंडार का 9 प्रतिशत खो दिया। 1975 के बाद कुछ क्षेत्रों में बर्फ की मोटाई में 27 मीटर तक की कमी दर्ज की गई। ये आंकड़े सभी ग्लेशियरों से संबंधित हैं, केवल हैंगिंग ग्लेशियरों से नहीं।
हैंगिंग ग्लेशियर टूटने पर खतरा केवल बर्फ गिरने तक सीमित नहीं रहता। बर्फ और चट्टानों का मलबा नदी में गिरकर अस्थायी अवरोध बना सकता है, जिसका टूटना अचानक बाढ़ का कारण बन सकता है। नीचे स्थित जलविद्युत परियोजनाओं, सड़कों, पुलों और बस्तियों के लिए यह जोखिम अधिक गंभीर है। इसलिए वैज्ञानिकों के अनुसार, ग्लेशियरों की सतह पर बन रही दरारों, उनकी गति और भूकंपीय संकेतों की निगरानी के साथ जोखिम वाले क्षेत्रों में निर्माण की योजना बनाना भी जरूरी है।
जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय की सैकड़ों ग्लेशियर झीलों के फटने का खतरा पैदा हो गया है।
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26 अगस्त 2026 को नेपाल में आई भयानक बाढ़ के बाद सिक्किम में भी खतरनाक ग्लेशियरों की जानकारियां सामने आई हैं। Inventory and GLOF hazard assessment of glacial lakes in the Sikkim Himalayas शीर्षक से प्रकाशित रिपोर्ट में जोखिम वाले ग्लेशियर्स और ग्लेशियर झीलों के बारे में जानकारी दी गई है। अध्ययन में कुल मिलाकर 40 ग्लेशियर को खतरनाक के तौर पर पहचाना गया है और 16 तो ऐसी हैं, जो फटीं तो तबाही निश्चित है। इन ग्लेशियरों में हो रहे बदलावों की निगरानी के लिए रिमोट सेंसिंग और सैटेलाइट इमेजनरी का इस्तेमाल किया जा रहा है। जिन 40 ज्यादा खतरनाक (हाई-हजार्ड) झीलों की पहचान की गई है, उनमें से 16 बहुत ज्यादा खतरनाक यानी हाइएस्ट रिस्क, 2 अधिक खतरनाक यानी हाई रिस्क और 9 को सामान्य या कम खतरनाक मॉडरेट से लो रिस्क की श्रेणी में रखा गया है, जबकि बाकी 13 की श्रेणी नहीं तय की गई है। इन ग्लेशियर्स के कारण ग्लेशियर झीलों के अचानक फटने (GLOF) के जोखिम को देखते हुए सिक्किम सरकार देश के पहले रिस्क प्रोटोकॉल पर काम कर रही है। इस प्रोटोकॉल का मकसद GLOF का अनुमान लगाने के लिए वैज्ञानिक प्रोटोकॉल तैयार करना है, जिससे इसके जोखिमों को कम से कम किया जा सके। सिक्किम 2023 अक्टूबर में ऐसी तबाही झेल चुका है, जब अचानक आई बाढ़ से मंगन, गंगटोक, पाकयोंग और नामची जिलों में कम से कम 60 लोगों की मौत हो गई थी और इलाके में भारी नुकसान हुआ था। इस घटना में चुंगथांग बांध भी नष्ट हो गया, जो बड़े हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट का महत्वपूर्ण हिस्सा था।
हाल ही में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने मध्य हिमालय में हैंगिंग ग्लेशियर से होने वाले खतरों पर स्वतः संज्ञान लिया है। इसे लेकर NGT ने केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB), नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा और दूसरे संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। इन एजेंसियों को नोटिस जारी करने वाली एनजीटी की प्रिंसिपल बेंच, जिसमें अध्यक्ष जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव और एक्सपर्ट मेंबर डॉ. अफरोज अहमद शामिल थे। बेंच ने 'Study flags overlooked danger posed by hanging glaciers on mountain slopes in Central Himalaya' शीर्षक से प्रकाशित एक रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए यह नोटिस जारी किए।
यह खबर सेंट्रल हिमालय में पहाड़ी ढलानों पर हैंगिंग ग्लेशियर से होने वाले खतरे से जुड़ी है। रिपोर्ट में IISc बेंगलुरु, IIT भुवनेश्वर और DRDO जैसे संस्थानों के वैज्ञानिक अध्ययनों के हवाले से चेतावनी दी गई है कि खड़ी पहाड़ी ढलानों पर मौजूद अस्थिर हैंगिंग ग्लेशियर खतरनाक हिमस्खलन या भूस्खलन और उसके बाद नीचे की तरफ आपदाओं का कारण बन सकते हैं। इसमें कहा गया है कि उत्तराखंड के अलकनंदा बेसिन में अस्थिर हैंगिंग ग्लेशियर एवलांच और नीचे की तरफ आपदाओं को बढ़ावा दे सकते हैं। स्टडी में ग्लेशियर के पीछे हटने, भूकंप की संवेदनशीलता और बद्रीनाथ, माना और हनुमान चट्टी जैसे कमजोर ऊंचाई वाले इलाकों में इंसानी बस्तियों और आधारभूत संरचनाओं के तेजी से बढ़ने से बढ़ते खतरों पर रोशनी डाली गई है।
हैंगिंग ग्लेशियर के टूटने से विशाल बर्फीले हिमस्खलन उत्पन्न हो सकते हैं। सिमुलेशन से संकेत मिलता है कि उत्तराखंड के बद्रीनाथ-माणा क्षेत्र में हिमस्खलन का प्रवाह 50 मीटर से अधिक ऊंचाई तक पहुंच सकता है, जिससे बस्तियों और बुनियादी ढांचे को संभावित क्षति हो सकती है।
ऐसे हिमस्खलनों की विनाशकारी क्षमता इस बात पर निर्भर करती है कि कितनी मात्रा में बर्फ टूटकर गिरती है, ढलान कितनी खड़ी है और नीचे की ओर उसका रास्ता कैसा है। तेजी से नीचे आता बर्फ का द्रव्यमान अपने साथ चट्टानें और मलबा भी समेट सकता है। इससे हिमस्खलन का प्रभाव उसके शुरुआती स्थान से काफी दूर तक पहुंच सकता है। पर्वतीय क्षेत्रों में ऐसी घटनाओं का पूर्वानुमान लगाने के लिए ग्लेशियरों की दरारों, बर्फ की गति और ढलानों की स्थिरता की नियमित निगरानी जरूरी है।
हिमनदों का पतन GLOF जैसे द्वितीयक खतरों को उत्पन्न कर सकता है, जिसमें हिमनदीय झीलों से अचानक जल का मुक्त होना निचले क्षेत्रों में विनाशकारी बाढ़ का कारण बनता है।
यह खतरा खास तौर पर तब पैदा होता है, जब ग्लेशियर से टूटकर गिरने वाली बर्फ या चट्टानों का मलबा किसी झील में गिरकर बड़ी लहर पैदा कर दे। यह लहर झील के प्राकृतिक मलबे या मोरेन से बने कमजोर बांध को क्षतिग्रस्त कर सकती है। बांध टूटने पर पानी के साथ तलछट और चट्टानें भी तेजी से नीचे की ओर बहती हैं। हालांकि, हैंगिंग ग्लेशियर के टूटने से हर बार GLOF नहीं आता। इसके लिए झील की मौजूदगी, उसमें पानी की मात्रा, बांध की संरचना और बर्फ के गिरने से पैदा होने वाली लहर जैसे कारक महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए ग्लेशियरों के साथ-साथ उनके नीचे स्थित झीलों और प्राकृतिक बांधों की निगरानी भी आवश्यक है।
ढहते हुए हिमनद चट्टानों, बर्फ और तलछट को नीचे की ओर बहा सकते हैं। भारी मात्रा में मलबे के प्रवाह (Debris Flows), के कारण नदियों में अवरोध और अचानक बाढ़ यानी फ्लैश फ्लड और मड फ्लड जैसी कई आपदाएं एक के बाद एक आ सकती हैं।
इस तरह की घटनाओं में एक खतरा दूसरे खतरे को जन्म देता है। उदाहरण के लिए, बर्फ और चट्टानों का मलबा नदी के संकरे हिस्से में जमा होकर अस्थायी अवरोध बना सकता है। इसके पीछे पानी इकट्ठा होने लगता है और अवरोध अचानक टूटने पर नीचे की ओर बाढ़ आ सकती है। मलबे का प्रवाह नदी की तलहटी में गाद जमा कर सकता है, जिससे नदी की जलधारण क्षमता प्रभावित होती है। यदि यह मलबा पुलों, सड़कों या जलविद्युत परियोजनाओं के आसपास जमा हो जाए, तो नुकसान और बढ़ सकता है। ऐसे में आपदा का आकलन केवल ग्लेशियर के टूटने तक सीमित नहीं रखा जा सकता, बल्कि नदी घाटी में पानी और मलबे के संभावित रास्तों को भी समझना जरूरी है।
हैंगिंग ग्लेशियर के अचानक ढहने से आसपास की पर्वतीय घाटियों में स्थित बांध, जलविद्युत परियोजनाएं, सड़कें, पुल, बस्तियां और तीर्थ मार्ग हिमनद-जनित खतरों से होने वाली तबाही का शिकार हो सकते हैं।
जलविद्युत परियोजनाओं के लिए खतरा इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि इनके कई महत्वपूर्ण हिस्से नदी के किनारे या संकरी घाटियों में बने होते हैं। बर्फ, चट्टानों और मलबे का तेज प्रवाह परियोजना के जलग्रहण ढांचे, सुरंगों के प्रवेश द्वार, बिजलीघरों और पहुंच मार्गों को नुकसान पहुंचा सकता है। अचानक आई बाढ़ से बांध के संचालन और नीचे की ओर स्थित आबादी की सुरक्षा पर भी असर पड़ सकता है। उत्तराखंड की 2021 की चमोली आपदा ने दिखाया था कि ऊंचाई वाले पर्वतीय क्षेत्र में चट्टान और बर्फ का विशाल हिस्सा टूटने से नदी घाटी में दूर तक नुकसान हो सकता है। इसलिए संवेदनशील परियोजनाओं के लिए ग्लेशियरों और झीलों की निगरानी, समय रहते चेतावनी देने वाली प्रणालियां और आपदा की स्थिति में निकासी की स्पष्ट योजना महत्वपूर्ण है।
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