भारत में गर्मी अब एक कंपाउंड क्लाइमेट रिस्क का रूप ले रही है।
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भारत में गर्मी का बदलता स्वरूप: तापमान से आगे बढ़ता हीटवेव का जोखिम
भारत में गर्मी की चर्चा अक्सर इस सवाल से शुरू होती है कि किस शहर में तापमान 40 या 45 डिग्री तक पहुंच गया। लेकिन जलवायु वैज्ञानिक बताते हैं कि वास्तविक गर्मी का अनुभव केवल तापमान से तय नहीं होता। पराबैंगनी (UV) विकिरण, आर्द्रता, हवा की स्थिति और पानी की उपलब्धता जैसे कारक भी मिलकर यह तय करते हैं कि गर्मी शरीर और पर्यावरण पर कितना प्रभाव डालती है।
हाल के वर्षों में यह स्पष्ट होता जा रहा है कि भारत में गर्मी अब एक कंपाउंड क्लाइमेट रिस्क का रूप ले रही है। यानी ऐसी स्थिति, जब कई जलवायु कारक एक साथ मिलकर जोखिम को बढ़ा देते हैं।
तापमान से आगे: गर्मी का बदलता विज्ञान
बल्कि हाल के वर्षों में जलवायु और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े अध्ययन यह बताते हैं कि गर्मी का वास्तविक जोखिम तापमान, आर्द्रता और सूर्य के विकिरण जैसे कई कारकों के संयुक्त प्रभाव से तय होता है। यही कारण है कि मौसम विज्ञान और स्वास्थ्य शोध में हीट इंडेक्स और वेट-बल्ब तापमान जैसे संकेतकों का महत्व बढ़ा है।
हीट इंडेक्स (Heat Index) उस तापमान को दर्शाता है जो मानव शरीर को वास्तव में महसूस होता है। यह वायु तापमान और आर्द्रता के संयुक्त प्रभाव से बनता है।
शोध में यह भी स्पष्ट किया गया है कि जब हवा में नमी अधिक होती है तो पसीने का वाष्पीकरण धीमा हो जाता है, जिससे शरीर के लिए खुद को ठंडा रखना कठिन हो जाता है। इसलिए कई बार वास्तविक तापमान कम होने के बावजूद शरीर को गर्मी अधिक महसूस हो सकती है।
मौसम विज्ञान और स्वास्थ्य शोध में हीट इंडेक्स और वेट-बल्ब तापमान जैसे संकेतकों का महत्व बढ़ा है।
इसी से जुड़ा एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक संकेतक वेट-बल्ब तापमान (Wet-bulb temperature) है। यह उस स्थिति को दर्शाता है जिसमें तापमान और आर्द्रता मिलकर यह तय करते हैं कि मानव शरीर पसीने के माध्यम से कितना प्रभावी ढंग से ठंडा हो सकता है। सरल शब्दों में, यह गर्मी-नमी के संयुक्त प्रभाव से होने वाले हीट-स्ट्रेस का माप है।
वहीं, जलवायु अध्ययनों के अनुसार अगर वेट-बल्ब तापमान लगभग 35°C तक पहुंच जाए, तो मानव शरीर के लिए लंबे समय तक उस वातावरण में रहना बेहद खतरनाक हो सकता है। ऐसी स्थिति में पसीने का वाष्पीकरण प्रभावी नहीं रह जाता और शरीर की अपनी आंतरिक तापमान-नियंत्रण प्रणाली बिगड़ने लगती है। नतीजतन, शरीर में तेजी से डिहाइड्रेशन, अंगों पर दबाव और हीट-स्ट्रोक का खतरा भी बढ़ सकता है।
नेचर कम्यूनिकेशन में हाल ही में प्रकाशित ए फ़िजियोलॉजिकल एप्रोच फॉर असेसिंग ह्यूमन सर्वाइवेबिलिटी एंड लिवबिलिटी टू हीट इन ए चेंजिंग क्लाइमेट नामक अध्ययन में इस बात का संकेत है कि विशेषकर बुजुर्गों, बीमार लोगों या भारी शारीरिक श्रम करने वालों के लिए वास्तविक जोखिम इससे भी कम स्तरों पर शुरू हो सकता है। इसलिए वैज्ञानिक अब केवल तापमान नहीं बल्कि गर्मी और आर्द्रता के संयुक्त प्रभाव को अधिक गंभीरता से देखने लगे हैं।
इसके साथ ही पराबैंगनी इंडेक्स (UV index) भी गर्मी के जोखिम को समझने में एक महत्वपूर्ण संकेतक बनकर उभरा है। यह सूर्य से आने वाले पराबैंगनी विकिरण की तीव्रता को मापता है। उच्च UV स्तर त्वचा और आंखों के लिए जोखिम पैदा कर सकता है और लंबे समय तक धूप में रहने पर शरीर पर पड़ने वाले गर्मी के प्रभाव को भी अधिक तीव्र बना सकता है।
इसलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशानिर्देश के अनुसार कई देशों में मौसम पूर्वानुमान के साथ UV Index भी जारी किया जाता है, ताकि लोग सूर्य के संपर्क से जुड़े जोखिम को समझकर अपनी दैनिक गतिविधियों और सुरक्षा उपायों को उसी अनुसार तय कर सकें।
पराबैंगनी इंडेक्स (UV index) भी गर्मी के जोखिम को समझने में एक महत्वपूर्ण संकेतक बनकर उभरा है। यह सूर्य से आने वाले पराबैंगनी विकिरण की तीव्रता को मापता है।
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भारत में गर्मी एक जैसी नहीं: क्षेत्र के अनुसार बदलता हीटवेव का स्वरूप
भारत में गर्मी हर जगह एक जैसी नहीं होती। कहीं यह सूखी और तेज़ लू के रूप में महसूस होती है, तो कहीं आर्द्र और चिपचिपी गर्मी के रूप में। कई क्षेत्रों में तेज़ धूप और अधिक पराबैंगनी विकिरण गर्मी के प्रभाव को बढ़ाते हैं, जबकि बड़े शहरों में अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव तापमान को बढ़ा देता है।
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार हाल के वर्षों में भारत के कई हिस्सों में हीटवेव की आवृत्ति और अवधि बढ़ती दिखाई दे रही है। साल 2024 में राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में लंबे समय तक हीटवेव जैसी स्थितियाँ दर्ज की गईं।
IMD के महानिदेशक डॉक्टर मृत्युंजय मोहपात्रा का कहना है कि, के अनुसार 2024 में भारत का औसत अधिकतम तापमान लगभग 31.25°C रहा, जो सामान्य से करीब 0.20°C अधिक है। वहीं औसत न्यूनतम तापमान 20.24°C दर्ज किया गया, जो सामान्य से लगभग 0.90°C ज्यादा है। यानी दिन के तापमान में सीमित वृद्धि हुई है, लेकिन रात का तापमान अपेक्षाकृत अधिक बढ़ रहा है।
जलवायु वैज्ञानिकों के अनुसार किसी क्षेत्र में गर्मी का अनुभव केवल तापमान से तय नहीं होता। आर्द्रता, हवा की दिशा और गति, बादल, समुद्र की निकटता और शहरीकरण जैसे कारक मिलकर तय करते हैं कि हीटवेव कितनी तीव्र महसूस होगी। इसी कारण भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में गर्मी का स्वरूप भी अलग दिखाई देता है।
2024 में भारत का औसत अधिकतम तापमान लगभग 31.25°C रहा, जो सामान्य से करीब 0.20°C अधिक है। वहीं औसत न्यूनतम तापमान 20.24°C दर्ज किया गया, जो सामान्य से लगभग 0.90°C ज्यादा है।
डॉक्टर मृत्युंजय मोहपात्रा, महानिदेशक, भारतीय मौसम विभाग
उत्तर भारत: सूखी और तीव्र हीटवेव
राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गर्मी अक्सर सूखी और तीव्र लू के रूप में सामने आती है। इसके मुख्य कारण है:
थार मरुस्थल का प्रभाव: थार मरुस्थल से आने वाली गर्म और शुष्क हवाएं तापमान बढ़ाती हैं।
कम आर्द्रता और साफ आसमान: बादल कम होने से सूर्य का विकिरण सीधे जमीन तक पहुंचता है।
अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव: बड़े शहरों में कंक्रीट और कम हरियाली के कारण तापमान बढ़ जाता है। दिल्ली और जयपुर इसके उदाहरण हैं।
दक्षिण भारत: आर्द्र गर्मी
दक्षिण भारत के तटीय राज्यों जैसे केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु में गर्मी अक्सर उच्च आर्द्रता के साथ महसूस होती है। इसके मुख्य कारण हैं:
समुद्र की निकटता: समुद्र से आने वाली नम हवाएं वातावरण में नमी बढ़ाती हैं।
उच्च हीट इंडेक्स: अधिक नमी के कारण पसीना जल्दी नहीं सूखता, जिससे गर्मी अधिक महसूस होती है।
सौर विकिरण और UV: साफ आसमान वाले दिनों में UV स्तर अधिक दर्ज हो सकता है।
दिन ही नहीं रातें भी हो रहीं पहले से ज्यादा गर्म
ऊर्जा, पर्यावरण एवं पानी पर परिषद (CEEW) द्वारा मई 2025 में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले 40 वर्षों (1981-2022) में भारत में अत्यधिक गर्मी की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं। इसके परिणामस्वरूप 2013, 2016, 2019, 2022 और 2024 में उल्लेखनीय हीटवेव देखने को मिलीं। हालांकि, पिछले एक दशक में बहुत गर्म रातों की संख्या बहुत गर्म दिनों की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ रही है।
पिछले दशक में लगभग 70 फ़ीसद जिलों में हर गर्मी के मौसम (मार्च से जून) में औसतन पांच अतिरिक्त बहुत गर्म रातें दर्ज की गईं। इसके विपरीत, केवल लगभग 28 फ़ीसद जिलों में पाँच या उससे अधिक अतिरिक्त बहुत गर्म दिन देखे गए।
रिपोर्ट के अनुसार पिछले दशक में मुंबई में हर गर्मी के मौसम में 15 अतिरिक्त बहुत गर्म रातें दर्ज की गईं, जबकि बेंगलुरु में 11, भोपाल और जयपुर में 7-7, दिल्ली में 6, और चेन्नई में 4 अतिरिक्त बहुत गर्म रातें दर्ज हुईं।
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेशों में हर गर्मी के मौसम में बहुत गर्म दिनों और बहुत गर्म रातों की संख्या में 15 से अधिक दिनों और रातों की वृद्धि दर्ज की गई है।
आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा, पंजाब, छत्तीसगढ़, बिहार और उत्तर प्रदेश के कई जिले अत्यधिक गर्मी के प्रति अत्यधिक संवेदनशील माने जा रहे हैं।
भविष्य की चुनौती
भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में गर्मी के स्वरूप में यह अंतर केवल तापमान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव जल संसाधनों और पानी की उपलब्धता पर भी पड़ता है।
तापमान बढ़ने से वाष्पीकरण बढ़ता है: वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार तापमान बढ़ने पर नदियों, झीलों और जलाशयों से पानी का वाष्पीकरण (evaporation) तेज़ हो जाता है, जिससे जल स्तर तेजी से घट सकता है और पानी की उपलब्धता प्रभावित होती है।
जल चक्र अधिक अस्थिर हो सकता है: IPCC की रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण एशिया में बढ़ता तापमान जल चक्र (water cycle) को अधिक अस्थिर बना सकता है, जिससे कहीं अत्यधिक बारिश और कहीं पानी की कमी जैसी स्थितियां पैदा हो सकती हैं।
खेती के कामों में पानी की मांग में वृद्धि: अधिक गर्मी के कारण मिट्टी की नमी तेजी से कम होती है, जिससे फसलों के लिए सिंचाई की आवश्यकता बढ़ जाती है।
शहरों में पानी की मांग तेज़ी से बढ़ती है: गर्मियों के दौरान शहरी क्षेत्रों में पीने और घरेलू उपयोग के पानी की मांग बढ़ जाती है, जबकि कई जलाशयों का जलस्तर कम हो सकता है।
कुछ क्षेत्रों में जलाशयों का स्तर घटने के उदाहरण: केंद्रीय जल आयोग की जल भंडारण रिपोर्ट बताते हैं कि महाराष्ट्र, कर्नाटक और मध्य भारत के कई क्षेत्रों में लंबे गर्म और शुष्क मौसम के दौरान जलाशयों का जलस्तर कम होने की घटनाएं दर्ज की गई हैं।
आगे का रास्ता: संभावित उपाय
ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए विशेषज्ञ केवल जोखिम बताने के बजाय बेहतर योजना, अनुकूलन और संसाधन प्रबंधन पर ज़ोर देते हैं। विभिन्न अध्ययनों और नीतिगत रिपोर्ट में कुछ प्रमुख उपाय सुझाए गए हैं:
हीट-एक्शन प्लान को मजबूत करना: कई शहरों में हीटवेव से निपटने के लिए हीट एक्शन प्लान बनाए गए हैं, जिनमें पहले से चेतावनी, स्वास्थ्य सलाह और आपात व्यवस्थाएं शामिल होती हैं। इन योजनाओं को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार प्रभावी ढंग से लागू करना मददगार हो सकता है।
शहरों में हरित क्षेत्र बढ़ाना: पेड़, पार्क और हरित क्षेत्र बढ़ाने से स्थानीय तापमान कम करने और अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव को घटाने में मदद मिल सकती है।
पानी के संरक्षण पर ज़ोर: वर्षा जल संचयन, जलाशयों का बेहतर प्रबंधन और स्थानीय जल स्रोतों के संरक्षण जैसे उपाय गर्मी के दौरान पानी की उपलब्धता बनाए रखने में सहायक हो सकते हैं।
जल-सक्षम कृषि तकनीकें अपनाना: ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई जैसी तकनीकें कम पानी में खेती को अधिक टिकाऊ बनाने में मदद कर सकती हैं।
जलवायु-संवेदनशील योजना: शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों की योजना बनाते समय तापमान, जल संसाधन और जलवायु जोखिम को ध्यान में रखना भविष्य में बढ़ती गर्मी के प्रभाव को कम करने में मदद कर सकता है।
CEEW की रिपोर्ट में भविष्य के लिए चेतावनियां
मई 2025 की रिपोर्ट में CEEW ने भारत के परिप्रेक्ष्य में तीन प्रमुख चेतावनियां जारी कीं, जो इस प्रकार हैं:
2050 तक दुनिया का लगभग हर बच्चा यानी करीब 2.2 अरब बच्चे बार-बार आने वाली हीटवेव के संपर्क में होंगे।
गर्मी के तनाव (हीट स्ट्रेस) के कारण 2030 तक भारत में लगभग 3.5 करोड़ पूर्णकालिक नौकरियों के बराबर कार्य-घंटों का नुकसान हो सकता है।
अत्यधिक गर्मी और आर्द्रता के कारण काम के घंटों में कमी से 2030 तक भारत की लगभग 4.5 फ़ीसद जीडीपी जोखिम में पड़ सकती है।
कुल मिलाकर भारत में गर्मी को केवल तापमान के आंकड़ों से समझना अब पर्याप्त नहीं रह गया है। बदलते जलवायु पैटर्न में तापमान, नमी, सौर विकिरण और जल संसाधनों जैसे कई कारक मिलकर गर्मी के जोखिम को प्रभावित करते हैं। ऐसे में भविष्य की योजना बनाते समय मौसम, जल प्रबंधन और शहरी विकास को साथ लेकर सोचना ज़रूरी होगा।
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