बाढ़ में स्कूल बंद हो जाए तो कैसे जारी रहे बच्चों की पढ़ाई? आपदा योजनाओं में शिक्षा की कितनी तैयारी

भारत में बाढ़ और बच्चों की शिक्षा पर हुए कुछ अध्ययन बताते हैं कि यह नुकसान स्कूल खुलने के साथ खत्म नहीं हो जाता।

भारत में बाढ़ और बच्चों की शिक्षा पर हुए कुछ अध्ययन बताते हैं कि यह नुकसान स्कूल खुलने के साथ खत्म नहीं हो जाता।

फोटो: वर्षा देशपांडे | CC BY-SA 4.0

Published on: 
8 min read

बाढ़ आने पर सबसे पहले लोगों की जान बचाने पर ध्यान जाता है। उन्हें सुरक्षित जगह पहुंचाना, खाना, पानी और स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना जरूरी होता है। लेकिन बाढ़ का एक असर ऐसा भी है जो पानी उतरने के बाद लंबे समय तक बना रह सकता है। यह है बच्चों की पढ़ाई का नुकसान।

बाढ़ में स्कूल की इमारत डूब सकती है या उसे नुकसान पहुंच सकता है। स्कूल तक जाने वाली सड़क कट सकती है। बच्चों की किताबें और पढ़ाई की दूसरी चीजें खराब हो सकती हैं। परिवार को घर छोड़कर दूसरी जगह जाना पड़ सकता है। कई बार राहत कार्यों के लिए स्कूल की इमारतों का इस्तेमाल भी किया जाता है।

बाढ़ के समय केवल स्कूल की इमारत और सड़क जैसी सुविधाएं ही मायने नहीं रखतीं। शिक्षक और अभिभावकों के बीच संपर्क, बच्चों की सुरक्षा और समुदाय का सहयोग भी जरूरी है।

ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि स्कूल कितने दिन बंद रहा। सवाल यह भी है कि इस दौरान बच्चे की पढ़ाई कैसे जारी रही। और जब स्कूल खुला तो वह पढ़ाई में कितना पीछे रह गया।

भारत में बाढ़ और बच्चों की शिक्षा पर हुए कुछ अध्ययन बताते हैं कि यह नुकसान स्कूल खुलने के साथ खत्म नहीं हो जाता।

Also Read
तीन महीने बाढ़, नौ महीने असर : बिहार में कोसी तटबंधों के बीच उजड़ता-बसता शरणार्थी जीवन
<div class="paragraphs"><p>भारत में बाढ़ और बच्चों की शिक्षा पर हुए कुछ अध्ययन बताते हैं कि यह नुकसान स्कूल खुलने के साथ खत्म नहीं हो जाता। </p></div>

बाढ़ का असर केवल स्कूल बंद होने तक नहीं

2024 में रसेल सेज फाउंडेशन के जर्नल में प्रकाशित ग्रामीण भारत में बाढ़ और बच्चों की शिक्षा अध्ययन में बाढ़ और बच्चों की पढ़ाई के बीच संबंध को समझने की कोशिश की गई।

इसके लिए शोधकर्ताओं ने इंडिया ह्यूमन डेवलपमेंट सर्वे (आईएचडीएस) के आंकड़ों का इस्तेमाल किया। यह सर्वे नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) और यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड ने मिलकर किया है। इसका पहला दौर 2004-05 और दूसरा 2011-12 में हुआ था।

इस सर्वे में परिवार की आय, रोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़ी जानकारी जुटाई गई। बच्चों के पढ़ने, लिखने और गणित की क्षमता को भी देखा गया।

अध्ययन में 8 से 11 साल के ग्रामीण बच्चों को शामिल किया गया। इनमें करीब एक-तिहाई बच्चे ऐसे गांवों में रहते थे जो 2006 से 2011 के बीच बाढ़ की चपेट में आए थे।

अध्ययन में बाढ़ वाले गांवों के बच्चों की पढ़ाई में दूसरे गांवों के बच्चों के मुकाबले नुकसान के संकेत मिले। गरीब और खेती पर निर्भर परिवारों के बच्चों के लिए मुश्किलें अधिक थीं। लड़कियों की पढ़ाई पर भी अधिक असर के संकेत मिले।

हालांकि शोधकर्ता यह नहीं कहते कि बच्चों की पढ़ाई में आई हर कमी का कारण केवल बाढ़ थी। लेकिन अध्ययन से इतना जरूर पता चलता है कि बाढ़ पहले से मुश्किल हालात में रह रहे बच्चों की परेशानी बढ़ा सकती है।

हाल के एक दूसरे अध्ययन से यह भी पता चलता है कि बाढ़ के समय केवल स्कूल की इमारत और सड़क जैसी सुविधाएं ही मायने नहीं रखतीं। शिक्षक और अभिभावकों के बीच संपर्क, बच्चों की सुरक्षा और समुदाय का सहयोग भी जरूरी है। 

इस अध्ययन और इसके निष्कर्षों के बारे में विस्तार से इंडिया वाटर पोर्टल के लेख व्हेन फ्लड्स वॉश अवे लर्निंग: व्हाई इंडियाज़ डिजास्टर प्लानिंग मस्ट प्रोटेक्ट चिल्ड्रेन में पढ़ा जा सकता है।

स्कूल कुछ दिन नहीं, कई महीने भी बंद रह सकते हैं

ग्रामीण भारत में बाढ़ और बच्चों की शिक्षा नामक अध्ययन में पहले के एक शोध का हवाला दिया गया है। इसके अनुसार उत्तर प्रदेश और बिहार के बहुत अधिक बाढ़ प्रभावित जिलों में स्कूल 15 दिन से छह महीने तक बंद पाए गए थे। इन मामलों में स्कूल करीब तीन महीने तक बंद रहे। तीन महीने बच्चे की पढ़ाई के लिए छोटा समय नहीं है।

बाढ़ में रास्ते बंद होने से बच्चा स्कूल नहीं पहुंच पाता। किताबें खराब हो सकती हैं। परिवार की आमदनी पर असर पड़ सकता है। घर छोड़ना पड़े तो बच्चा किसी दूसरे गांव या राहत शिविर में पहुंच सकता है।

इसलिए स्कूल का दरवाजा दोबारा खुल जाना ही पढ़ाई की पूरी बहाली नहीं है। यह देखना भी जरूरी है कि कितने बच्चे वापस आए। यह भी कि किस बच्चे की कितनी पढ़ाई छूटी और उसे कितनी मदद चाहिए।

असर कई साल बाद भी दिखाई दे सकता है

बिहार की 2008 की कोसी बाढ़ पर हुआ एक अध्ययन इस चिंता को और बढ़ाता है।

2025 में जर्नल ऑफ एनवायरनमेंटल मैनेजमेंट में प्रकाशित कम उम्र में मौसम से जुड़ी आपदाओं का बच्चों की पढ़ाई पर असर नामक अध्ययन में कोसी बाढ़ के असर को देखा गया।

अध्ययन में पाया गया कि बाढ़ के समय चार से पांच साल की उम्र के बच्चों के पढ़ने और गणित के नतीजे पांच से छह साल बाद भी कमजोर दिखाई दिए। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों में इसका असर अधिक था।

यानी बाढ़ में पढ़ाई का नुकसान सिर्फ उतने दिनों का नहीं होता, जितने दिन बच्चा स्कूल नहीं जा पाया। कम उम्र में आई बड़ी आपदा आगे की पढ़ाई पर भी असर डाल सकती है।

2024 की बिहार बाढ़ में करीब 20 लाख बच्चे प्रभावित

इस समस्या का हाल का उदाहरण भी बिहार में मिलता है।

यूनिसेफ की 2024 बिहार बाढ़ मानवीय स्थिति रिपोर्ट के अनुसार 2024 की बाढ़ से करीब 20 लाख बच्चों के प्रभावित होने का अनुमान था। कई परिवारों को घर छोड़ना पड़ा। वे तटबंधों, राहत शिविरों या सड़कों के किनारे सुरक्षित जगहों पर रह रहे थे।

रिपोर्ट के अनुसार यूनिसेफ और सहयोगी संस्थाओं ने पांच बाल-अनुकूल केंद्र बनाए। इन केंद्रों तक करीब 400 बच्चे पहुंच रहे थे। यहां बच्चों की देखभाल और सुरक्षा के साथ उनके लिए अलग-अलग गतिविधियां भी कराई जा रही थीं। रिपोर्ट में स्कूलों की सफाई और पढ़ाई दोबारा शुरू करने की तैयारी का भी जिक्र है।

इसी बाढ़ में बिहार के बेलागोंठ गांव का प्राथमिक स्कूल बह गया था। यूनिसेफ के अनुसार एक छोटे सामुदायिक भवन में बाल-अनुकूल केंद्र शुरू किया गया। यहां 82 बच्चे आने लगे। बच्चों के लिए पढ़ने-लिखने और गणित के साथ खेल, चित्रकारी और दूसरी गतिविधियां भी शुरू हुईं।

यूनिसेफ की 2024
बिहार बाढ़ मानवीय स्थिति रिपोर्ट के अनुसार 2024 की बाढ़ से करीब 20 लाख बच्चों के प्रभावित होने का अनुमान था।

यह स्कूल का स्थायी विकल्प नहीं है। लेकिन यह एक रास्ता जरूर दिखाता है। अगर स्कूल की इमारत इस्तेमाल करने लायक न रहे तो पंचायत भवन, सामुदायिक केंद्र या दूसरी सुरक्षित जगह पर कुछ समय के लिए पढ़ाई जारी रखी जा सकती है।

भारत में स्कूलों की आपदा तैयारी के लिए क्या व्यवस्था है?

भारत में स्कूलों को आपदाओं के लिए तैयार रखने के दिशानिर्देश पहले से मौजूद हैं।

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) के राष्ट्रीय स्कूल सुरक्षा नीति दिशानिर्देश में बच्चों और शिक्षकों की सुरक्षा पर जोर दिया गया है। आपदा के बाद पढ़ाई जल्द दोबारा शुरू करने की बात भी इसमें शामिल है।

इन दिशानिर्देशों के अनुसार स्कूलों को अपने इलाके के खतरों को ध्यान में रखकर स्कूल आपदा प्रबंधन योजना बनानी चाहिए। यानी बाढ़ वाले इलाके के स्कूल की तैयारी वहां के जोखिम के हिसाब से होनी चाहिए।

शिक्षा मंत्रालय के स्कूल सुरक्षा और संरक्षा दिशानिर्देश, 2021 भी प्राकृतिक आपदाओं के समय स्कूल और बच्चों की सुरक्षा पर जोर देते हैं।

लेकिन बार-बार बाढ़ झेलने वाले इलाकों में एक सवाल इससे आगे जाता है कि अगर स्कूल बंद हो जाए तो बच्चे की पढ़ाई कैसे जारी रहेगी?

बाढ़ आने से पहले क्या तय किया जा सकता है?

इस सवाल का जवाब बाढ़ आने के बाद तलाशना जरूरी नहीं है। जिन जिलों में लगभग हर साल बाढ़ का खतरा रहता है, वहां मानसून से पहले इसकी तैयारी की जा सकती है।

स्कूल पहले से पता कर सकते हैं कि बाढ़ के समय किन बस्तियों से आने वाले बच्चों का रास्ता बंद हो सकता है। कौन-से बच्चे दूर के गांवों से आते हैं। किन परिवारों के पास मोबाइल या इंटरनेट नहीं है। जरूरत पड़ने पर आसपास की कौन-सी सुरक्षित जगह बच्चों की पढ़ाई के लिए इस्तेमाल की जा सकती है।

स्कूल बंद होने पर बच्चों और अभिभावकों से संपर्क कैसे होगा, यह भी पहले से तय किया जा सकता है। किताबें और पढ़ाई की दूसरी सामग्री बच्चों तक कैसे पहुंचेगी, इसकी भी व्यवस्था हो सकती है।

हर जगह ऑनलाइन पढ़ाई इसका हल नहीं है। जहां इंटरनेट कमजोर है या परिवार के पास स्मार्टफोन नहीं है, वहां दूसरी व्यवस्था करनी होगी। छोटी सामुदायिक कक्षाएं लगाई जा सकती हैं। बच्चों तक अभ्यास के पन्ने और दूसरी पढ़ाई की सामग्री पहुंचाई जा सकती है। शिक्षक छोटे समूहों में बच्चों से संपर्क कर सकते हैं।

मकसद स्कूल का कोई दूसरा स्थायी विकल्प बनाना नहीं है। कोशिश इतनी होनी चाहिए कि कुछ हफ्तों की बाढ़ बच्चे और उसकी पढ़ाई के बीच लंबी दूरी न बना दे। स्कूल खुल गया, लेकिन क्या सभी बच्चे लौट आए? बाढ़ का पानी उतरने और स्कूल खुलने के बाद एक दूसरा सवाल सामने आता है।

क्या सभी बच्चे वापस स्कूल आ गए?

किसी परिवार का घर बह गया हो सकता है। कोई परिवार रोजगार के लिए दूसरी जगह चला गया होगा। किसी बच्चे की किताबें खराब हो गई होंगी। कुछ बच्चों की पढ़ाई दूसरों से ज्यादा छूटी होगी।

इसलिए स्कूल खुलने के बाद केवल हाजिरी देखना पर्याप्त नहीं है। यह पता लगाना भी जरूरी है कि कौन बच्चा पढ़ाई में कितना पीछे रह गया है और उसे किस तरह की मदद चाहिए।

जिन बच्चों की पढ़ाई ज्यादा छूटी है, उनके लिए कुछ समय अतिरिक्त कक्षाएं रखी जा सकती हैं। उन्हें किताबें और दूसरी जरूरी सामग्री फिर से दी जा सकती है। घर छोड़कर दूसरी जगह गए बच्चों और दिव्यांग बच्चों तक पहुंचने के लिए अलग व्यवस्था की जरूरत पड़ सकती है।

आपदा से हुए नुकसान का हिसाब लगाते समय भी बच्चों की पढ़ाई को जगह दी जा सकती है। कितनी सड़कें टूटीं, कितने घरों को नुकसान हुआ और कितने स्कूल खराब हुए, यह दर्ज किया जाता है। इसके साथ यह भी देखा जा सकता है कि बच्चों की कितने दिन की पढ़ाई छूटी और कितने बच्चे स्कूल वापस नहीं लौटे।

यह जानकारी अगली बाढ़ से पहले बेहतर तैयारी में मदद कर सकती है।

बिहार का ‘सुरक्षित शनिवार’ क्या बताता है?

आपदा की तैयारी केवल प्रशासन और स्कूल प्रबंधन का काम नहीं है। बच्चों को भी इसके लिए तैयार किया जा सकता है।

यूनिसेफ इंडिया के अनुसार बिहार के सुरक्षित शनिवार’ कार्यक्रम के जरिए 84 लाख से अधिक बच्चों तक आपदा से बचाव और तैयारी की जानकारी पहुंचाई गई है। केरल में जलवायु परिवर्तन और आपदा प्रबंधन को पढ़ाई से जोड़ा गया है। गुजरात में भी स्कूल सुरक्षा से जुड़ा पाठ्यक्रम शुरू किया गया है।

आपदा से हुए नुकसान का हिसाब लगाते समय भी बच्चों की पढ़ाई को जगह दी जा सकती है। कितनी सड़कें टूटीं, कितने घरों को नुकसान हुआ और कितने स्कूल खराब हुए, यह दर्ज किया जाता है।

इससे पता चलता है कि बच्चे केवल आपदा से प्रभावित होने वाला समूह नहीं हैं। उन्हें आपदा के लिए तैयार भी किया जा सकता है।

बाढ़ की चेतावनी मिलने पर क्या करना है? सुरक्षित जगह कहां है? स्कूल बंद हो तो शिक्षक से कैसे संपर्क करना है? पढ़ाई की सामग्री कहां मिलेगी? ऐसी बातें भी बच्चों को पहले से बताई जा सकती हैं।

बाढ़ वाले स्कूलों में पढ़ाई जारी रखने की योजना

बार-बार बाढ़ आने वाले जिलों में स्कूल की आपदा योजना में पढ़ाई जारी रखने की योजना भी जोड़ी जा सकती है।

इसके लिए कोई बहुत जटिल व्यवस्था जरूरी नहीं है। कुछ सवालों के जवाब पहले से तय किए जा सकते हैं:

  • स्कूल बंद होने पर बच्चों और अभिभावकों से संपर्क कैसे होगा?

  • जरूरत पड़ने पर अस्थायी कक्षा कहां लगेगी?

  • किताबें और दूसरी पढ़ाई की सामग्री बच्चों तक कैसे पहुंचेगी?

  • मोबाइल या इंटरनेट न होने पर बच्चा कैसे पढ़ेगा?

  • घर छोड़कर दूसरी जगह गए बच्चों तक कैसे पहुंचा जाएगा?

  • दिव्यांग बच्चों के लिए क्या व्यवस्था होगी?

  • स्कूल खुलने के बाद कैसे पता चलेगा कि किस बच्चे की कितनी पढ़ाई छूटी?

  • पीछे रह गए बच्चों को अतिरिक्त मदद कैसे मिलेगी?

यह जिम्मेदारी केवल शिक्षक या प्रधानाचार्य की नहीं हो सकती। शिक्षा विभाग, जिला प्रशासन, जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, पंचायत और स्थानीय समुदाय को भी इसमें शामिल होना होगा।

पानी उतरने के बाद भी खत्म नहीं होता असर

बाढ़ से निपटने का मतलब केवल लोगों को सुरक्षित जगह पहुंचाना और राहत सामग्री देना नहीं है। पानी उतरने के बाद घरों, सड़कों और दूसरी सुविधाओं की मरम्मत होती है। इसी समय बच्चों की पढ़ाई पर भी ध्यान देने की जरूरत है।

बच्चों के लिए बाढ़ का एक दूसरा दौर तब शुरू होता है जब उन्हें फिर से स्कूल और पढ़ाई की तरफ लौटना होता है।

भारत में स्कूल सुरक्षा के लिए दिशानिर्देश मौजूद हैं। बिहार जैसे राज्यों में बच्चों को आपदा के लिए तैयार करने के कार्यक्रम भी चल रहे हैं। बाढ़ के दौरान दूसरी सुरक्षित जगह पर बच्चों की पढ़ाई जारी रखने के उदाहरण भी सामने हैं। अब खासकर बार-बार बाढ़ झेलने वाले इलाकों में एक सवाल को स्कूल की आपदा तैयारी का जरूरी हिस्सा बनाने की जरूरत है।

अगर स्कूल एक सप्ताह, एक महीना या उससे अधिक समय तक नहीं खुला तो बच्चा उस दौरान कैसे पढ़ेगा?

इस सवाल का जवाब बाढ़ आने के बाद तलाशने के बजाय पहले से तैयार रखना बेहतर होगा। क्योंकि बाढ़ का पानी कुछ दिनों या हफ्तों में उतर सकता है। लेकिन उस दौरान छूटी पढ़ाई की भरपाई में कहीं अधिक समय लग सकता है।

Also Read
बाढ़ के महीनों बाद भी बुआई के लिए जूझ रहे किसान, तरनतारन के खेतों से ग्राउंड रिपोर्ट
<div class="paragraphs"><p>भारत में बाढ़ और बच्चों की शिक्षा पर हुए कुछ अध्ययन बताते हैं कि यह नुकसान स्कूल खुलने के साथ खत्म नहीं हो जाता। </p></div>

लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें

India Water Portal - Hindi
hindi.indiawaterportal.org