महाराष्ट्र में क्यों है जल संकट? किन-किन समस्याओं से जूझ रहे किसान?

महाराष्ट्र में जल संकट क्यों बढ़ रहा है, इसका कृषि और जनजीवन पर क्या प्रभाव पड़ रहा है और पानी की कमी के प्रमुख कारण क्या है।
महाराष्ट्र में क्यों है जल संकट? किन-किन समस्याओं से जूझ रहे किसान?

फोटो - सयाली पराते 

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वर्ष 2026 में कम वर्षा होने के कारण महाराष्ट्र सूखे की गंभीर स्थिति से जूझ रहा है। 26 सितंबर 2026 को महाराष्ट्र सरकार ने राज्य की 358 तहसीलों में से 265 तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित किया, जो राज्य का लगभग 74 प्रतिशत हिस्सा है। 

सूखे के कारण किसानों की फसलें प्रभावित हुईं और कई क्षेत्रों में पानी और पशुओं के चारे की कमी की समस्या सामने आई है। सरकार ने प्रभावित क्षेत्रों में किसानों के कृषि ऋणों के पुनर्गठन, भूमि राजस्व में छूट, कृषि पंपों के बिजली बिलों में रियायत, जरूरत के अनुसार पानी के टैंकरों की व्यवस्था तथा फसल नुकसान का सर्वेक्षण कराने जैसे उपायों की घोषणा की है। 

सूखे की इस स्थिति से निपटने के लिए जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन और किसानों को समय पर सहायता प्रदान करना अत्यंत आवश्यक है। सहायता प्रदान करने से पहले यह जानना भी जरूरी है कि आखिर किसान किस प्रकार की समस्या से जूझ रहे हैं।

महाराष्ट्र के किसानों की समस्याओं को किसानों ने अपने अनुभव के आधार पर सांझा किया है, जिसे निम्न प्रकार रखा गया है -

  1. पानी की कमी और सिंचाई से जुड़ी समस्याएं

  2. फसलों और कृषि उत्पादन से जुड़ी समस्याएं

  3. खेती की लागत और आमदनी से जुड़ी समस्याएं

  4. पशुपालन और चारे से जुड़ी समस्याएं

  5. मजदूरी, रोजगार और पलायन की समस्याएं

पानी की कमी और सिंचाई से जुड़ी समस्याएं

  • आलम यह है कि मुख्य फसलों के अलावा सब्जी आदि तक की बुवाई नहीं हो पा रही है।

  • भूजल स्तर गिरने से कुओं और बोरवेल में पानी कम हो गया है, खेती के साथ-साथ पीने के पानी की कमी है।

  • पानी निकालने के लिए अधिक गहराई तक बोरवेल करना पड़ रहा है और पंप लंबे समय तक चलाना पड़ रहा है।

  • कुछ गांवों में पीने और घरेलू इस्तेमाल के लिए टैंकरों पर निर्भर होना पड़ रहा है।

  • तालाबों, छोटे बांधों और सिंचाई परियोजनाओं में पानी कम होने से खेती प्रभावित हो रही है। किसानों और उनके परिवारों को पानी लाने में अतिरिक्त श्रमकरना पड़ रहा है

  • प्रदेश के कुछ जिलों से पानी को लेकर विवाद की खबरें आयी हैं।

फसलों और कृषि उत्पादन से जुड़ी समस्याएं

  • बारिश में कमी होने के कारण कई तहसीलों में बुवाई समय पर नहीं हो पायी है।

  • मिट्टी में पर्याप्त नमी न होने से बीज ठीक से अंकुरित नहीं हो पा रहे हैं।

  • लंबे समय तक बारिश न होने से खड़ी फसल मुरझा रही है।

  • नमी की कमी से फूल झड़ सकते हैं और फलियों तथा दानों का विकास प्रभावित हो सकता है।

  • अगर फसल की गुणवत्ता अच्छी नहीं रही, तो बाज़ार में बिकने में समस्या आएगी।

  • खरीफ के बाद मिट्टी में नमी और जलाशयों में पानी कम रहने से रबी फसलों की बुवाई का रकबा घट सकता है।

खेती की लागत और आमदनी से जुड़ी समस्याएं

  • महाराष्ट्र में खाद, कीटनाशक, मजदूरी और सिंचाई पर खर्च करने के बाद भी पर्याप्त उपज नहीं मिलेगी।

  • कम उत्पादन के कारण किसान परिवार की कुल कृषि आय घट सकती है

  • ऐसी आशंका जताई जा रही है कि सूखाग्रस्त क्षेत्रों में किसान बीज, खाद, उपकरण या सिंचाई पर जरूरी खर्च कम कर सकते हैं, जिससे अगली फसल भी प्रभावित हो सकती है।

पशुपालन और चारे से जुड़ी समस्याएं

  • खेतों और चरागाहों में घास तथा दूसरी चारा फसलों का उत्पादन घटने से चारे की कमी है।

  • तमाम किसानों के लिए मवेशियों को पर्याप्त स्वच्छ पानी उपलब्ध कराना कठिन हो रहा है।

  • पानी और पोषण की कमी से दुधारू पशुओं की उत्पादकता घट सकती है।

  • लंबे समय तक खराब पोषण और पानी की कमी से पशु कमजोर पड़ सकते हैं।

  • किसान को बाहर से चारा खरीदना पड़ सकता है।

मजदूरी, रोजगार और पलायन की समस्याएं

  • सूखे के कारण खेती से जुड़े परिवहन, व्यापार और छोटे व्यवसायों की आय भी प्रभावित हो सकती है।

  • किसान और कृषि मजदूर काम की तलाश में दूसरे जिलों या शहरों की ओर जा सकते हैं।

  • पलायन और आर्थिक तंगी के कारण बच्चों की शिक्षा में व्यवधान आ सकता है।

  • पुरुषों के बाहर काम करने जाने पर महिलाओं को खेती, पशुपालन और घरेलू जिम्मेदारियां अधिक संभालनी पड़ सकती हैं।

<div class="paragraphs"><p>हेमलता बन्दे&nbsp;</p></div>

हेमलता बन्दे 

फोटो - सयाली पराते 

मौसंबी, कपास की फसलें भी खतरे में  

धान की फसल पूरी तरह पानी पर निर्भर करती है। अगर उसके अलावा संतरे, मौसंबी, आदि की बात करें तो भी तस्वीर अमूमन वही है। नरखेड तहसील के नारसिंगी गांव निवासी हेमलता बन्दे बताती है की इस वक़्त किसान की हालत बहुत ख़राब है। उनके खेत में मौसंबी और कपास की फसल है। वे बताती है इस समय पानी की इतनी कमी है कि मौसंबी और संतरे के पौध बच पाएंगे या नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं है।   

हमने एक-एक पौधे को बच्चे जैसा पला है, लेकिन इस बार उम्मीद नहीं है की पेड़ बच भी पाएंगे या नही। उनके अनुसार 10  एकड़ के खेत के पेड़ सुखने के कगार पर है। वे कहती है की सरकार हमे 5 हजार रुपये दिखा रही है। इस तरह की बात करना, किसानो के साथ पूरी तरह मजाक करना है।

यह केवल हेमलता की बात नहीं है, इस तरह कई किसान है जो इस वक़्त सूखे की मार से पूरी तरह परेशान हुए है। किसानों की हालत अभी इतनी ख़राब है की वे आगे की फसल के बारे में सोच भी नहीं सकते है, इस साल बारिश कम होने के कारन नुकसान हुआ है, पिचले साल बारिश ज्यादा होने के कारन नुकसान हुआ था, हेमलता कहती हैं।

फोटो - सयाली पराते 

किसान शंकर शिरोडिये निवासी मायवाड़ी, कहते है की इस वर्ष पानी की बहुत बड़ी समस्या है, हर साल हम गेहू की बुवाई करते थे, लेकिन इस वर्ष पानी की कमी होने के कारण हमने चना की फ़सल बोई है।

पानी इतना कम है की चना भी अच्छे से हो पायेगा या नहीं, इसकी कोई उम्मीद नहीं है। लेकिन किसान है तो कुछ तो बुवाई करनी ही थी, इसलिए चना लगाया है, चने की फसल को गेहू की फसल से कम पानी की आवश्यकता होती है। इसलिए उम्मीद लगाकर ये चने की फसल बोई है।

राज्य में जल संकट की स्थिति

महाराष्ट्र लंबे समय से देश के सबसे सूखा-प्रभावित राज्यों में रहा है। इसकी संरचनात्मक कमजोरी साफ है। महाराष्ट्र वाटर रिसोर्स रेगुलेटरी अथॉरिटी के अनुसार राज्य के लगभग 225 लाख हेक्टेयर कृषि क्षेत्र में से करीब 40 प्रतिशत सूखा-प्रवण श्रेणी में आता है। बारिश का वितरण बेहद असमान है। कुछ हिस्सों में 400 मिमी से भी कम बारिश होती है, जबकि पश्चिमी घाट के पास 6000 मिमी तक। लेकिन यह पूरी बारिश लगभग चार महीनों के भीतर सिमट जाती है।

एक अध्ययन के मुताबिक़, राज्य देश के कुल सूखा-प्रवण क्षेत्र का लगभग आधा हिस्सा कवर करता है। ऐतिहासिक रूप से यहां हर 5 से 6 साल में वर्षा की कमी और हर 8 से 9 साल में गंभीर सूखा देखने को मिलता है।

हाल के वर्षों में यह संकट और स्पष्ट हुआ है। 2023 के मानसून के बाद सरकार ने आधिकारिक रूप से सूखा घोषित किया। 2023 मानसून के बाद और गंभीर हो गई, जिसके चलते सरकार को प्रभावित क्षेत्रों का दायरा बढ़ाना पड़ा। 16 फरवरी को राज्य सरकार ने 224 अतिरिक्त राजस्व सर्किलों को सूखा-ग्रस्त घोषित किया, क्योंकि इन इलाकों में औसत से 75 प्रतिशत से भी कम वर्षा दर्ज हुई थी। राज्य के कुल 2,292 राजस्व सर्किलों में से 1,532 सर्किल सूखे की श्रेणी में आ गए। आसान भाषा में कहे तो राज्य का लगभग 66 प्रतिशत हिस्सा सूखाग्रस्त हो गया।

जलाशयों की स्थिति भी इसी संकट को दिखाती है। नागपुर और अमरावती डिवीजन में 2023 और 2024 के बीच जल भंडारण लगातार घटता गया और 2025 की गर्मियों में भी स्थिति में बहुत सुधार नहीं हुआ। कई बांधों में पानी का स्तर 30 प्रतिशत से नीचे चला गया और कुछ में यह 10 प्रतिशत से भी कम रहा।

जमीनी स्तर पर पानी की कमी को टैंकरों से पूरा किया गया। अप्रैल 2024 तक 2700 से अधिक टैंकर 2000 से ज्यादा गांवों और 5000 से ज्यादा बस्तियों में पानी पहुंचा रहे थे। इसके बावजूद कई जगहों पर लोगों, खासकर महिलाओं, को रोज 2 से 3 किलोमीटर चलकर पानी लाना पड़ा।

2025 में स्थिति ने एक अलग रूप लिया। मराठवाड़ा में औसत से अधिक बारिश हुई, लेकिन यह कम समय में तेज बारिश के रूप में आई। इससे फसलों को फायदा कम और नुकसान ज्यादा हुआ। करीब 68 लाख हेक्टेयर फसल प्रभावित हुई और कई जिलों में मिट्टी का कटाव और जमीन की गुणवत्ता में गिरावट देखी गई। इसे स्थानीय स्तर पर ‘ओला सूखा’ (wet draught) कहा गया।

फोटो - सयाली पराते 

सूखे के प्रमुख कारण

महाराष्ट्र का सूखा केवल कम बारिश का परिणाम नहीं है। इसके पीछे भौगोलिक, संरचनात्मक और नीतिगत कारण एक साथ काम करते हैं।

सबसे पहला कारण भूगोल है। आईआईटी गांधीनगर के 2016 के एक अध्ययन के मुताबिक मराठवाड़ा पश्चिमी घाट के वर्षा-छाया क्षेत्र में आता है। इसका मतलब यह है कि अरब सागर से आने वाली नमी इस क्षेत्र तक पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुंचती। यहाँ औसतन 600 से 800 मिमी बारिश होती है, जो राज्य के पश्चिमी हिस्सों की तुलना में काफी कम है।

दूसरा कारण मिट्टी और भूगर्भीय संरचना है। वेल लैब्स की जलतारा रिपोर्ट के अनुसार, इस क्षेत्र की काली कपास मिट्टी की हाइड्रोलिक कंडक्टिविटी कम होती है, जिससे पानी आसानी से जमीन में नहीं समा पाता। इसके कारण मानसून के दौरान पानी सतह पर जमा रहता है, लेकिन नीचे तक नहीं पहुंचता। इसके नीचे मौजूद बेसाल्ट चट्टानों की जल भंडारण क्षमता भी सीमित होती है, जिससे भूजल तेजी से खत्म हो जाता है।

तीसरा और सबसे बड़ा मानव-निर्मित कारण गन्ने की खेती है। गन्ना राज्य के कुल फसल क्षेत्र का केवल 4 प्रतिशत हिस्सा घेरता है, लेकिन सिंचाई के पानी का लगभग 60 प्रतिशत उपयोग करता है। यह फसल उन क्षेत्रों में भी उगाई जाती है जहाँ पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं है। इस पर सरकारी समर्थन और चीनी मिलों की राजनीति ने इस असंतुलन को और बढ़ाया है।

चौथा कारण सिंचाई का कम कवरेज है। भारतीय कृषि अनुसंधान केंद्र (ICAR) के अनुसार, महाराष्ट्र में केवल लगभग 16–17 प्रतिशत कृषि क्षेत्र ही सिंचित है, जो राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। विदर्भ और मराठवाड़ा जैसे क्षेत्रों में सिंचाई का विकास सीमित है, जबकि पश्चिमी महाराष्ट्र में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है।

पांचवां कारण भूजल का अत्यधिक दोहन है। अध्ययनों के अनुसार महाराष्ट्र में सिंचाई के लिए भूजल पर निर्भरता बढ़ने के साथ इसके दोहन में लगातार वृद्धि हुई है, जिससे जल स्तर में गिरावट दर्ज की गई है।

इसके अलावा एक और कारण जलवायु परिवर्तन है। काउन्सिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (CEEW) की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 50 वर्षों में चरम मौसम घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ी है। बाढ़ की घटनाओं में दो गुना तक वृद्धि दर्ज की गई है। जबकि कई क्षेत्रों में सूखा और बाढ़ के पैटर्न में बदलाव देखा गया है। यहां पारंपरिक सूखा-प्रवण इलाके बाढ़-प्रवण और इसके उलट होते दिख रहे हैं। मराठवाड़ा की हालिया बाढ़ इसका उदाहरण है।

फोटो - सयाली पराते 

प्रयास क्यों विफल रहे ?

महाराष्ट्र में सूखे से निपटने के लिए कई योजनाएं लागू की गईं, लेकिन वे अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकीं।

सबसे प्रमुख उदाहरण जलयुक्त शिवार अभियान है। इस योजना को 2014 में शुरू किया गया था और इसका लक्ष्य राज्य को सूखा-मुक्त बनाना था। लगभग ₹9,630 करोड़ खर्च करने के बावजूद इस योजना के तहत बना जल भंडारण इतना कम था कि वह केवल 487 लोगों को एक साल तक पानी उपलब्ध करा सकता था। कई जगहों पर भूजल स्तर में कोई सुधार नहीं हुआ और कई गांवों को गलत तरीके से "जल-तटस्थ" घोषित कर दिया गया।

इस विफलता का एक बड़ा कारण योजना का डिजाइन था। जल संरक्षण के काम वैज्ञानिक तरीके से नहीं किए गए। कैचमेंट से लेकर नीचे के हिस्सों तक पानी रोकने की समग्र रणनीति नहीं अपनाई गई।

नीतिगत स्तर पर भी गंभीर समस्याएं रही हैं। पानी का वितरण असमान रहा है। सिंचाई का पानी उन क्षेत्रों और फसलों को ज्यादा मिला जहाँ राजनीतिक प्रभाव अधिक है, जबकि जरूरत वाले क्षेत्रों को कम मिला। गन्ने जैसी फसलों को लगातार बढ़ावा दिया गया, भले ही वे पानी की उपलब्धता के अनुकूल न हों।

भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही भी एक कारण रहे हैं। कई योजनाओं में अनियमितताएं पाई गईं और कुछ मामलों में आवंटित धन का पूरा उपयोग भी नहीं हुआ।

सबसे बड़ी समस्या यह रही कि सरकारों ने दीर्घकालिक समाधान की बजाय राहत पर ज्यादा ध्यान दिया। टैंकर, मुआवजा और आपात सहायता दी गई, लेकिन जल प्रबंधन की बुनियादी समस्याओं को ठीक करने पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।

जलवायु परिवर्तन ने इन कमजोरियों को और उजागर किया है। जब बारिश का पैटर्न अनिश्चित होता है, तो एक मजबूत जल प्रबंधन प्रणाली की जरूरत और बढ़ जाती है। लेकिन मौजूदा ढांचा इस चुनौती को संभालने में सक्षम नहीं है।

दरअसल, महाराष्ट्र का सूखा केवल प्राकृतिक आपदा नहीं है। यह एक संरचनात्मक संकट है जिसमें भूगोल, खेती के पैटर्न, जल प्रबंधन और नीतिगत फैसले सभी शामिल हैं। जब तक इन सभी स्तरों पर बदलाव नहीं किया जाता, तब तक सूखा हर कुछ वर्षों में लौटता रहेगा, चाहे बारिश सामान्य ही क्यों न हो।

2016 में भी आया था जल संकट  

महाराष्ट्र देश के उन राज्यों में रहा है जहां सूखा बार-बार गंभीर संकट बनकर उभरता है। 2016 इसका चरम था। उस साल लातूर में नल बंद थे, नदियां सूख चुकी थीं और भूजल लगभग खत्म हो गया था। हालात इतने बिगड़े कि सरकार को पहली बार ‘जलदूत एक्सप्रेस’ के ज़रिए पानी ट्रेन से मंगवाना पड़ा।

2016 में लातूर का जल संकट इतना गंभीर था कि पानी जरूरत नहीं, आपात स्थिति बन गया था। अप्रैल 2016 में मिराज से करीब 350 किमी दूर से ट्रेन के जरिए पानी लाना पड़ा।

आज विरोधाभास साफ है। महाराष्ट्र देश की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, लेकिन इसके बड़े हिस्सों में लोग आज भी पानी के लिए जूझ रहे हैं। यह संकट सिर्फ कम बारिश का नतीजा नहीं है; खराब जल प्रबंधन और चरम मौसमी घटनाएं दोनों ही इसके अतिरिक्त कारण हैं। दुर्भाग्यपूर्ण बात ये है कि महाराष्ट्र में सूखा अपवाद नहीं है। ऐसे में सवाल ये है कि यह लगातार लौटने वाली समस्या क्यों बन चुका है?

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