

महाराष्ट्र में इस साल कम बारिश के कारण लातूर समेत कई जिलों में गंभीर जल सकंट की स्थिति देखने को मिल रही है।
स्रोत : विकी कॉमंस
उत्तर भारत के कई राज्यों में जहां भारी बारिश के कारण बाढ़ का सामना करना पड़ा है, वहीं दक्षिण भारत के राज्यों में कम वर्षा के कारण कई जगह सूखे के हालात देखने को मिल रहे हैं। कुछ ऐसी ही स्थिति महाराष्ट्र में दिखाई दे रही है। लातूर में जल संकट गहराने और भूजल स्तर में 4.58 मीटर गिरावट के बाद प्रशासन ने जिले को एक साल के लिए जल संकट क्षेत्र घोषित करते हुए बोरवेल, गहरे कुओं की खुदाई और भूजल की व्यावसायिक बिक्री पर पाबंदियां लगा दी है। इसके साथ ही ग्रामीण इलाकों में पानी की किल्लत से निपटने के लिए 173 गांवों और बस्तियों में 256 कुओं और बोरवेल का अधिग्रहण किया गया है। जिला प्रशासन ने यह कदम इसलिए उठाया है, ताकि इलाके के लोगों को बिना किसी रुकावट के पीने के पानी की आपूर्ति की जा सके।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक पानी की किल्लत की चिंताओं के बीच जिला प्रशासन ने कुल 10 तहसीलों में कुओं को अपने नियंत्रण में लिया है। इसमें सबसे ज्यादा औसा तहसील में 51, अहमदपुर में 41 और निलंगा में 45 कुएं शामिल हैं। प्रशासन के इस कदम का मकसद ग्रामीण बस्तियों और गांवों में जरूरत पड़ने पर प्राइवेट पानी के स्रोतों का इस्तेमाल करके पीने का पानी उपलब्ध कराना है। एक्वायर किए गए कुओं और बोरवेल के पानी का इस्तेमाल आसपास के इलाकों में लोगों को टैंकरों के जरिये पानी सप्लाई करने के लिए किया जा जाएगा।
लातूर प्रशासन ने जिले को एक साल के लिए 'जल संकट क्षेत्र' घोषित करते हुए महाराष्ट्र भूजल (विकास और प्रबंधन) अधिनियम, 200' के तहत नए बोरवेल खोदने और भूजल निकालने पर पाबंदी लगा दी है। प्रशासन के मुताबिक इस मानसून में बारिश की कमी के कारण जिले में भूजल स्तर लगभग 4.58 मीटर नीचे गिर गया है। इसे देखते हुए जिला कलेक्टर और जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने भूजल के इस्तेमाल को नियंत्रित करने और आने वाले महीनों में पीने के पानी की संभावित किल्लत को रोकने के लिए यह आदेश जारी किया है।
इस आदेश के तहत कृषि या औद्योगिक उद्देश्यों के लिए 60 मीटर से अधिक गहरे कुएं या बोरवेल खोदने पर रोक लगा दी गई है। सार्वजनिक पेयजल स्रोतों के 500 मीटर के दायरे में नए बोरवेल खोदना भी प्रतिबंधित है। इन नियमों का उल्लंघन करके अगर कोई बोरवेल खोदा जाता है, तो उसे प्रशासन द्वारा सील या जब्त कर दिया जाएगा। साथ ही इस आदेश के तहत प्रशासन की अनुमति के बिना टैंकरों के जरिए भूजल की बिक्री और व्यावसायिक परिवहन पर भी रोक लगा दी गई है। आदेश का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ 'महाराष्ट्र भूजल (विकास और प्रबंधन) अधिनियम' के तहत कार्रवाई की जा सकती है, जिसमें जुर्माना और जेल की सजा हो सकती है।
लातूर जिले में सूखे से निपटने के लिए प्रशासन ने एक विशेष नियंत्रण कक्ष यानी वॉर रूम बनाया है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, जिले की सभी 10 तहसीलों को सूखा प्रभावित घोषित किए जाने के बाद इस व्यवस्था के जरिए राहत कार्यों की रोजाना निगरानी की जा रही है। इसका उद्देश्य केवल पेयजल की उपलब्धता पर नजर रखना नहीं, बल्कि सूखे से जुड़ी विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए अलग-अलग विभागों के बीच समन्वय स्थापित करना भी है। इस व्यवस्था के तहत पेयजल आपूर्ति, टैंकरों की जरूरत, चारे की उपलब्धता, फसल नुकसान, बिजली आपूर्ति, रोजगार और भूजल पुनर्भरण जैसे विषयों की निगरानी की जा रही है।
वॉर रूम की एक महत्वपूर्ण भूमिका पशुओं के लिए चारे की उपलब्धता का आकलन करना और जरूरत पड़ने पर चारा डिपो या चारा शिविरों की व्यवस्था पर विचार करना भी है। इसके साथ ही, सार्वजनिक जल स्रोतों से अवैध रूप से पानी निकालने, अनधिकृत कनेक्शन और पानी की बर्बादी को रोकने के उपायों की समीक्षा भी की जा रही है। सूखे की स्थिति में प्रशासन के सामने चुनौती यह होती है कि सीमित संसाधनों का इस्तेमाल जरूरत के अनुसार हो और किसी गांव तक पानी पहुंचाने में अनावश्यक देरी न हो। रोजाना की निगरानी से उन इलाकों की पहचान करने में मदद मिल सकती है, जहां तत्काल वैकल्पिक स्रोत या अतिरिक्त आपूर्ति की जरूरत है। हालांकि, इस व्यवस्था की वास्तविक सफलता इस बात से तय होगी कि निगरानी में सामने आई समस्याओं पर कितनी तेजी से कार्रवाई होती है और जरूरतमंद परिवारों तक राहत कितनी प्रभावी ढंग से पहुंचती है।
लातूर में जल संकट की गंभीरता के पीछे इस साल मानसून के दौरान पर्याप्त बारिश नहीं होना एक प्रमुख कारण है। जिला प्रशासन की रिपोर्ट के अनुसार, बारिश की कमी के चलते जिले का भूजल स्तर करीब 4.58 मीटर नीचे गिर गया है। इसका असर उन इलाकों में ज्यादा गंभीर हो सकता है, जहां ग्रामीण पेयजल के लिए कुओं और बोरवेल पर निर्भर हैं। भूजल स्तर गिरने से पहले से इस्तेमाल किए जा रहे जल स्रोतों से पानी निकालना मुश्किल हो जाता है और कुछ स्रोत सूख भी सकते हैं। ऐसे में केवल नए बोरवेल खोदना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है, क्योंकि भूजल का पुनर्भरण पर्याप्त न होने पर नए स्रोत भी जल्द जवाब दे सकते हैं।
महाराष्ट्र के भूजल सर्वेक्षण एवं विकास तंत्र (GSDA) के अनुसार, लातूर जिले की भौगोलिक संरचना भी भूजल की उपलब्धता को प्रभावित करती है। जिले के लगभग 30 प्रतिशत क्षेत्र में अधिक कटी-फटी पठारी और पहाड़ी भू-आकृति है, जहां बारिश का पानी तेजी से बह जाता है और भूजल की उपलब्धता कम रहती है। करीब 40 प्रतिशत क्षेत्र पठारी है, जहां भूजल का पुनर्भरण मध्यम स्तर का है। शेष लगभग 30 प्रतिशत नदी घाटियों और अपेक्षाकृत समतल क्षेत्रों में आता है, जहां भूजल की उपलब्धता बेहतर बताई गई है। इससे स्पष्ट होता है कि जिले के सभी गांवों में जल संकट की स्थिति एक जैसी नहीं है। स्थानीय भू-आकृति और भूजल पुनर्भरण की क्षमता को ध्यान में रखकर ही दीर्घकालीन समाधान तैयार करने होंगे।
लातूर जिले के कई ग्रामीण इलाकों में गंभीर जल संकट ने लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को मुश्किल बना दिया है। हालात ऐसे हैं कि लोगों को पीने और घरेलू जरूरतों के लिए पानी जुटाने के वास्ते दिन-रात कई घंटे कतारों में खड़ा रहना पड़ रहा है। चाकूर तहसील के वड़वाल नागनाथ गांव में पानी की किल्लत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लंबा इंतजार करने के बाद भी प्रत्येक व्यक्ति को महज पांच घड़े पानी ही मिल पा रहा है। इतनी सीमित मात्रा में पानी मिलने से ग्रामीणों के सामने अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी करने का संकट खड़ा हो गया है। पीने के लिए पानी बचाएं या खाना बनाने, नहाने, कपड़े धोने और साफ-सफाई जैसी दूसरी जरूरतों के लिए उसका इस्तेमाल करें, यह परिवारों के सामने रोज का सवाल बन गया है।
पानी भरने के लिए लगने वाला समय भी ग्रामीणों की दिनचर्या को प्रभावित कर रहा है। परिवारों के सदस्यों को पानी जुटाने के लिए अपने दूसरे काम छोड़ने पड़ रहे हैं। जिन घरों में महिलाएं और बच्चे पानी भरने की जिम्मेदारी संभालते हैं, वहां इसका असर उनकी पढ़ाई, घरेलू कामकाज और आराम के समय पर भी पड़ सकता है। पांच घड़ों में पूरे परिवार की जरूरतें पूरी करना आसान नहीं है, खासकर तब जब पानी की अगली आपूर्ति कब होगी, इसे लेकर अनिश्चितता बनी रहे। ऐसे में ग्रामीणों को उपलब्ध पानी का बेहद सावधानी से इस्तेमाल करना पड़ रहा है। यह संकट केवल पानी की कमी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने लोगों के समय, श्रम और घरेलू जीवन पर भी दबाव बढ़ा दिया है। वड़वाल नागनाथ जैसे गांवों की स्थिति बताती है कि गर्मी और कम होती जल उपलब्धता के बीच ग्रामीण परिवारों के लिए सुरक्षित पेयजल तक नियमित पहुंच सुनिश्चित करना कितनी बड़ी चुनौती बन जाता है।
लातूर में पानी की कमी का असर खेती-किसानी पर भी पड़ रहा है। अक्टूबर 2026 में जिला प्रशासन की समीक्षा बैठक के बाद आई एक रिपोर्ट के मुताबिक मानसून में कम बारिश के कारण खरीफ की फसलों को भारी नुकसान हुआ है। जिले की सिंचाई परियोजनाओं में भी जल भंडार कम होने की जानकारी सामने आई है। इसका असर आने वाले रबी सीजन की खेती पर पड़ सकता है। किसानों के सामने अब सवाल यह है कि उपलब्ध पानी से पहले घरेलू जरूरतें पूरी की जाएं, पशुओं के लिए पानी और चारे का इंतजाम किया जाए या सिंचाई के लिए पानी बचाया जाए। लंबे समय तक बारिश की कमी रहने पर खेती की लागत बढ़ने और फसल उत्पादन घटने का जोखिम भी बढ़ जाता है।
जिला प्रशासन ने फसल नुकसान का आकलन जल्द पूरा करने और फसल कटाई के प्रयोगों में तेजी लाने के निर्देश दिए हैं, ताकि प्रभावित किसानों को हुए नुकसान का सही रिकॉर्ड तैयार किया जा सके। सूखे की स्थिति में यह आकलन इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि राहत और मुआवजे से जुड़े फैसलों के लिए फसल क्षति का प्रमाणिक विवरण जरूरी होता है। इसके अलावा, अगली फसल के लिए पानी की उपलब्धता का आकलन करके बुवाई और सिंचाई की योजना बनाना भी अहम है। खासकर ऐसी फसलों के चयन पर ध्यान देने की जरूरत है, जिनमें अपेक्षाकृत कम पानी की जरूरत पड़ती है। हालांकि, फसल बदलने या सिंचाई घटाने जैसे फैसले स्थानीय मिट्टी, बाजार और किसानों की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखकर ही किए जाने चाहिए।
पानी की उपलब्धता घटने के कारण 11 हजार की आबादी वाले इस गांव में ग्रामीणों को सीमित मात्रा में ही पानी मिल पा रहा है। पानी की कमी का असर अब पशुओं पर भी पड़ रहा है। इस कारण पशुपालकों को काफी दिक्कतों का समना करना पड़ रहा है, क्योंकि उनके मवेशियों के पीने के लिए पानी का इंतज़ाम नहीं हो पा रहा है। इसी दिक्कत की वजह से कई किसान पानी की व्यवस्था नहीं होने के कारण अपने मवेशियों को औने-पौने दामों में बेचने को मजबूर हो रहे हैं।
कई परिवारों के लिए यह एक मुश्किल भरा फैसला है, क्योंकि उनके मवेशी ही परिवार की आजीविका का एकमात्र साधन हैं। दूध बेचकर मिलने वाले पैसों से ही उनका घर चलता है और खेती-किसानी से जुड़े कामों में भी मदद मिलती है। लेकिन, जब उन्हें पालने के लिए जरूरी पानी उपलब्ध न होने के कारण यही पशु अब परिवारों के लिए एक बोझ से बन गए हैं। ऐसे में कम कीमत पर मवेशी बेचने का फैसला किसानों के लिए केवल आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि उनकी आजीविका और भविष्य की कमाई से जुड़ा सवाल भी है।
यदि संकट लंबे समय तक बना रहता है, तो पशुओं की संख्या घटने से ग्रामीण परिवारों की आय पर भी असर पड़ सकता है। इस स्थिति में पशुपालकों को तत्काल राहत देने के लिए पशुओं के लिए पेयजल की उपलब्धता, पानी की वैकल्पिक व्यवस्था और जरूरतमंद परिवारों तक सहायता पहुंचाना महत्वपूर्ण हो जाता है। वड़वाल नागनाथ की स्थिति यह भी दिखाती है कि ग्रामीण जल संकट का समाधान केवल घरों तक पानी पहुंचाने से पूरा नहीं होगा। इसमें पशुधन और उससे जुड़ी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की जरूरतों को भी ध्यान में रखना होगा।
लातूर के मौजूदा जल संकट को मराठवाड़ा क्षेत्र की व्यापक जल समस्या के संदर्भ में भी देखा जा सकता है। मराठवाड़ा महाराष्ट्र का ऐसा क्षेत्र है, जहां कम और अनिश्चित बारिश के कारण जल उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बनी रहती है। लोकसभा में 6 फरवरी 2025 को दिए गए जल शक्ति मंत्रालय के जवाब के अनुसार, इस क्षेत्र में सालाना औसत बारिश लगभग 600 मिलीमीटर बताई गई है और बारिश में साल-दर-साल करीब 30 प्रतिशत तक परिवर्तनशीलता रहती है। इसी समस्या से निपटने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने क्षेत्र के 11 प्रमुख बांधों को पाइपलाइन के माध्यम से जोड़ने की योजना बनाई है, ताकि जरूरत के अनुसार एक बांध से दूसरे बांध तक पानी पहुंचाया जा सके। जवाब में जल जीवन मिशन के तहत मराठवाड़ा क्षेत्र में आठ जलापूर्ति ग्रिड योजनाओं को मंजूरी दिए जाने का भी उल्लेख है।
ऐसी योजनाएं उन इलाकों के लिए मददगार हो सकती हैं, जहां स्थानीय जल स्रोतों में पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं रहता। लेकिन किसी जल ग्रिड की सफलता केवल पाइपलाइन बिछाने पर निर्भर नहीं करती। इसके लिए बांधों में उपलब्ध वास्तविक जल भंडार, अलग-अलग क्षेत्रों की मांग, पंपिंग और बिजली की लागत, पाइपलाइन के रखरखाव तथा पानी के न्यायसंगत वितरण की व्यवस्था भी जरूरी है। लगातार कम बारिश होने पर जिन बांधों से पानी लिया जाना है, उनमें ही पर्याप्त भंडार न हो तो ग्रिड की क्षमता भी सीमित हो सकती है। इसलिए लातूर जैसे संकटग्रस्त जिलों में बाहरी स्रोतों से पानी पहुंचाने की योजनाओं के साथ स्थानीय जल स्रोतों का पुनर्भरण, वर्षा जल संचयन और उपलब्ध पानी का बेहतर प्रबंधन भी आवश्यक है।
लातूर में जल संकट से निपटने के लिए कुओं और बोरवेल से पानी निकालने पर पाबंदियां लगाने तथा टैंकरों से आपूर्ति करने जैसे तात्कालिक उपाय जरूरी हैं, लेकिन स्थायी समाधान के लिए भूजल का पुनर्भरण और जल संसाधनों का बेहतर प्रबंधन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जिले में बारिश की अनिश्चितता और भूजल स्तर में गिरावट को देखते हुए वर्षा जल संचयन, खेत तालाबों, चेक डैम और अन्य स्थानीय जल संरचनाओं के निर्माण तथा मौजूदा संरचनाओं के रखरखाव पर ध्यान देना होगा। इसके साथ ही, गांवों के जलग्रहण क्षेत्रों की पहचान करके ऐसी योजनाएं तैयार करनी होंगी, जिनसे बारिश का पानी बहकर बर्बाद होने के बजाय जमीन में समा सके और भूजल भंडार को दोबारा भरने में मदद मिले।
खेती में भी स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप कम पानी की जरूरत वाली फसलों और सूक्ष्म सिंचाई पद्धतियों को बढ़ावा देना उपयोगी हो सकता है। हालांकि, इन उपायों का चयन स्थानीय भूगर्भीय परिस्थितियों और पानी की उपलब्धता के आकलन के आधार पर होना चाहिए। सबसे जरूरी है कि जल संकट को केवल आपातकालीन राहत का विषय न मानकर दीर्घकालीन योजना के रूप में देखा जाए। जब तक बारिश के पानी को सहेजने, भूजल के दोहन को नियंत्रित करने और उपलब्ध जल संसाधनों के न्यायसंगत वितरण की समन्वित व्यवस्था नहीं बनेगी, तब तक हर सूखे के साथ लातूर के गांवों में पानी के लिए संघर्ष दोहराए जाने का खतरा बना रहेगा।
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