शैवाल से तेल बनाने से पेट्रोल व डीजल जैसे जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता घटाई जा सकती है, जो पर्यावरण के लिए लाभकारी होगा।
स्रोत : विकी कॉमंस
शैवाल से बना सस्ता बायो-फ्यूल खत्म कर करेगा डीजल-पेट्रोल पर निर्भरता
मध्य-पूर्व में चल रहे ईरान-इजराइल-अमेरिका युद्ध ने दुनिया भर में डीजल-पेट्रोल, गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों का संकट खड़ा कर दिया है। मध्य-पूर्व में जारी भू-राजनीतिक तनाव और युद्धों ने एक बार फिर दुनिया को यह याद दिलाया है कि ऊर्जा के लिए तेल-गैस जैसे सीमित संसाधनों पर अत्यधिक निर्भरता कितनी खतरनाक हो सकती है। कच्चे तेल की आपूर्ति में बाधा आते ही वैश्विक बाजार में कीमतों का उतार-चढ़ाव शुरू हो जाता है और इसका असर सीधे आम लोगों की जेब और देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इसी पृष्ठभूमि में जैव-आधारित और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की खोज तेज हुई है। इसी दिशा में ऑस्ट्रेलिया के सिडनी स्थित स्टार्टअप एल्जेनी Algenu ने शैवाल से ईंधन बनाने की ऐसी तकनीक विकसित करने का दावा किया है, जो भविष्य में डीजल-पेट्रोल पर निर्भरता को काफी हद तक कम कर सकती है।
इस विषय पर प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार कंपनी का लक्ष्य बड़े पैमाने पर सस्ते और तेज उत्पादन के जरिए जैव ईंधन को व्यावसायिक रूप से प्रतिस्पर्धी बनाना है। यदि यह प्रयास सफल होता है, तो ऊर्जा सुरक्षा के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन से निपटने में भी महत्वपूर्ण योगदान मिल सकता है, क्योंकि मानव जनित इस संकट का समाधान प्रकृति के पास पहले से मौजूद है। वह भी भरपूर मात्रा में, ज़रूरत है केवल इसे व्यावहारिक स्तर पर लाने की। अच्छी खबर यह है कि एल्जेनी ने व्यासायिक स्तर पर शैवाल से ईंधन बनाने का तरीका विकसित कर लिया है। उसने बड़े पैमाने पर और सस्ती लागत में शैवाल उगाने के लिए हेलिकल फोटोबायोरिएक्टर और एक एआई-संचालित स्ट्रेन ऑप्टिमाइजेशन सिस्टम तैयार किया है।
कंपनी के इस इनोवेशन से आने वाले दिनों में ऊर्जा के लिए जीवाश्म ईंधन पर निर्भता को कम या खत्म किया जा सकेगा। खास बात यह है कि अभी तक जीवाश्म ईंधन के रूप में तैयार किए जाने वाले एथेनॉल, बायो डीजल व बायो सीएनजी जैसे विकल्प गन्ने और मक्के जैसी पानी की ज़्यादा खपत वाली फसलों से तैयार किए जाते हैं। इनकी खेती में परिश्रम और समय भी ज़्यादा लगता है। पर, शैवाल से ईंधन तैयार करना काफ़ी आसान है। इसमें ज़्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती है और यह कुछ ही हफ्तों के समय में तैयार भी हो जाता है।
एल्जेनी के संस्थापक निक हेज़ेल नन्हें शैवालों के ज़रिये तेल का उत्पादन करने के अपने प्रोजेक्ट को तेजी से आगे बढ़ाना चाहते हैं, ताकि एक स्वच्छ अर्थव्यवस्था यानी क्लीन इकोनॉमी का निर्माण किया जा सके। सिडनी स्थित उनकी स्टार्टअप कंपनी ने औद्योगिक पैमाने पर सस्ते में शैवाल उगाने के लिए हेलिकल फोटोबायोरिएक्टर और एआई-संचालित स्ट्रेन ऑप्टिमाइजेशन का सेटअप तैयार कर लिया है। उनका कहना है कि इससे जैव ईंधन की आपूर्ति होगी और अंततः इससे गीगाटन स्तर पर कार्बन उत्सर्जन को कम किया जा सकेगा।
हर साल बन रहा 121 अरब लीटर एथेनॉल और 50 अरब लीटर बायो-डीजल
दुनिया में हर साल करीब 121 अरब लीटर एथेनॉल और 50 अरब लीटर बायो-डीजल का उत्पादन होता है, जबकि रिन्यूएबल डीजल (HDRD) सबसे तेज़ी से बढ़ने वाला बायोफ्यूल सेगमेंट बन चुका है, जिसका उत्पादन 2024 में लगभग 20 अरब लीटर तक पहुंच गया। इसका स्पष्ट मतलब है कि बायोफ्यूल अब सिर्फ प्रयोगात्मक ऊर्जा स्रोत नहीं रहा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में तेजी से अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रहा है और जीवाश्म ईंधनों का विकल्प बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
ऑस्ट्रेलिया की स्टार्टअप एल्जेनी ने शैवाल से ईंधन तेल बनाने की तकनीक विकसित करने का दावा किया है, जो भविष्य में डीजल-पेट्रोल पर निर्भरता को काफी हद तक कम कर सकती है।
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बायो ईंधन बनाने के लिए शैवाल क्यों हैं बेहतर?
शैवाल (Algae) पृथ्वी के सबसे प्राचीन जीवों में से एक हैं और समुद्रों, झीलों, तालाबों तथा नम स्थानों पर आसानी से उग जाते हैं। वैज्ञानिक रिसर्च के अनुसार इनमें तेल और कार्बोहाइड्रेट की मात्रा अधिक होती है, जिसे प्रोसेस कर बायो-डीजल, एथेनॉल या अन्य प्रकार के जैव ईंधन में बदला जा सकता है।
अन्य जैव ईंधनों की तुलना में शैवाल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन्हें उगाने के लिए उपजाऊ कृषि भूमि या भारी सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती। ये खारे पानी या अपशिष्ट जल में भी उग सकते हैं, जिससे खाद्यान्न सुरक्षा पर कोई दबाव नहीं पड़ता। यही कारण है कि ऊर्जा विशेषज्ञ इसे “थर्ड-जेनरेशन बायोफ्यूल” यानी तीसरी पीढ़ी का जैव ईंधन मानते हैं।
कई अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि शैवाल पारंपरिक फसलों की तुलना में प्रति हेक्टेयर कई गुना अधिक बायोमास और तेल उत्पादन कर सकते हैं। इससे जैव ईंधन उद्योग की उत्पादन क्षमता में बड़ा उछाल संभव है।
हेलिकल फोटोबायोरिएक्टर: सस्ते उत्पादन की कुंजी
साइंस डायरेक्ट में प्रकाशित एक वैज्ञानिक अध्ययन के मुताबिक Algenu की सबसे बड़ी तकनीकी उपलब्धि उसका “हेलिकल फोटोबायोरिएक्टर” सिस्टम माना जा रहा है। यह एक ऐसा बंद ढांचा होता है, जिसमें सूर्य के प्रकाश, कार्बन डाइऑक्साइड और पोषक तत्वों के नियंत्रित उपयोग से शैवाल की तेज वृद्धि कराई जाती है।
कंपनी का दावा है कि इस तकनीक के जरिए पारंपरिक खुले तालाबों की तुलना में उत्पादन कई गुना बढ़ाया जा सकता है और प्रदूषण या जैविक संक्रमण का खतरा भी कम हो जाता है। साथ ही, इस सिस्टम को औद्योगिक स्तर पर स्केल-अप करना भी आसान है। इसलिए इस तरह के रिएक्टर शहरी क्षेत्रों या औद्योगिक परिसरों में भी लगाए जा सकते हैं, जिससे स्थानीय स्तर पर ईंधन उत्पादन संभव हो सकेगा और लंबी दूरी तक परिवहन की जरूरत कम होगी।
एआई-संचालित स्ट्रेन ऑप्टिमाइजेशन से बढ़ेगी उत्पादकता
शैवाल की हजारों प्रजातियां होती हैं और हर प्रजाति की तेल उत्पादन क्षमता अलग-अलग होती है। इसलिए सही स्ट्रेन का चयन जैव ईंधन उद्योग की सफलता के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। कंपनी ने इस चुनौती को हल करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित “स्ट्रेन ऑप्टिमाइजेशन” सिस्टम विकसित किया है। इसके जरिए अलग-अलग पर्यावरणीय परिस्थितियों में शैवाल के व्यवहार का विश्लेषण कर सर्वाधिक उत्पादक प्रजातियों का चयन किया जाता है। साइंस जर्नल नेचर में प्रकाशित एक रिसर्च पेपर के मुताबिक एआई और बायोटेक्नोलॉजी का यह संयोजन जैव ईंधन उद्योग में क्रांति ला सकता है। इससे न केवल उत्पादन लागत घटेगी बल्कि गुणवत्ता और स्थिरता भी बढ़ेगी।
कुछ खास किस्म के शैवालों में ऐसे तत्व पाए जाते हैं, जिनकी प्रोसेसिंग करके ऐथेनॉल जैसा बायो फ्यूल बनाया जा सकता है, जो पेट्रोल-डीजल के विकल्प के तौर पर काम कर सकता है।
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पारंपरिक बायोफ्यूल की सीमाएं और शैवाल का लाभ
अब तक ज्यादातर जैव ईंधन गन्ने, मकई, सोयाबीन, पाम या नेपियर घास और जेट्रोफा जैसी फसलों से बनाए जाते रहे हैं। इनकी खेती में भारी मात्रा में पानी, उर्वरक और भूमि की आवश्यकता होती है। कई बार इससे खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित होता है और जंगलों की कटाई भी बढ़ती है।
इसके विपरीत, शैवाल कम समय में तेजी से बढ़ते हैं और उनकी कटाई-प्रसंस्करण प्रक्रिया भी अपेक्षाकृत आसान होती है। कुछ प्रजातियां केवल 2-3 सप्ताह में तैयार हो जाती हैं। इससे उत्पादन चक्र छोटा हो जाता है और निवेश की वापसी जल्दी संभव होती है।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के IEA की रिपोर्ट अनुसार, यदि उन्नत जैव ईंधनों का बड़े पैमाने पर उपयोग शुरू हो जाए, तो परिवहन क्षेत्र से होने वाले कार्बन उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक सड़क परिवहन में जैव ईंधन का 35% का दूसरा सबसे बड़ा हिस्सा है। इसमें ब्राजील, इंडोनेशिया, भारत और मलेशिया में कड़े नियमों और बढ़ती ईंधन मांग के कारण उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। तरल जैव ईंधन, बायोगैस और नवीकरणीय हाइड्रोजन और हाइड्रोजन-आधारित ईंधन के बढ़ते उपयोग के साथ, परिवहन में नवीकरणीय ऊर्जा की खपत 2030 तक 50% बढ़ने की उम्मीद है। इस वृद्धि में 45% का सबसे बड़ा हिस्सा इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए उपयोग की जाने वाली नवीकरणीय बिजली से आएगा। यह विशेष रूप से चीन, भारत और यूरोप में देखने को मिलेगा।
गीगाटन स्तर पर कार्बन उत्सर्जन घटाने की संभावना
जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए वैश्विक स्तर पर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में भारी कटौती की जरूरत है। ऊर्जा उत्पादन और परिवहन इस उत्सर्जन के सबसे बड़े स्रोतों में शामिल हैं। साइंस जर्नल फ्रंटीयर्स की रिपोर्ट के मुताबिक सतत और कार्बन-तटस्थ ऊर्जा स्रोतों की बढ़ती वैश्विक मांग के साथ, सूक्ष्म शैवाल अपनी उच्च लिपिड सामग्री, तीव्र विकास दर और अपशिष्ट जल तथा कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) पर पनपने की क्षमता के कारण अगली पीढ़ी के जैव ईंधन के एक आशाजनक स्रोत के रूप में उभरे हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि शैवाल आधारित ईंधन का उपयोग करने से दोहरा लाभ मिल सकता है। एक ओर यह जीवाश्म ईंधनों के विकल्प के रूप में काम करेगा, वहीं दूसरी ओर शैवाल अपनी वृद्धि के दौरान बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित भी करते हैं। कुछ वैज्ञानिक इसे “कार्बन-न्यूट्रल” या “कार्बन-नेगेटिव” तकनीक के रूप में भी देखते हैं, बशर्ते उत्पादन प्रक्रिया में अक्षय ऊर्जा का उपयोग किया जाए।
ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक बचत का नया मॉडल
यदि शैवाल से ईंधन उत्पादन व्यावसायिक रूप से सफल होता है, तो इससे ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों को बड़ी राहत मिल सकती है। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव से अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला दबाव भी कम होगा। विश्व बैंक की एक एनर्जी रिपोर्ट के अनुसार स्थानीय स्तर पर जैव ईंधन उत्पादन से रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और ग्रामीण-औद्योगिक क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी। साथ ही, परिवहन लागत घटने से अंतिम उपभोक्ताओं को सस्ता ईंधन उपलब्ध हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दशकों में ऊर्जा बाजार “डिसेंट्रलाइज्ड मॉडल” की ओर बढ़ सकता है, जहां हर क्षेत्र अपनी जरूरत का कुछ हिस्सा स्थानीय स्रोतों से पूरा करेगा।
शैवाल से बड़े पैमाने पर बायो फ्यूल का उत्पादन होने पर हमें सड़कों पर जैव ईंधन से चलते वाहनों को देखने का नज़ारा आमतौर पर देखने को मिल सकता है।
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कई बड़ी चुनौतियां अब भी बाकी
हालांकि शैवाल आधारित ईंधन को लेकर उम्मीदें काफी हैं, लेकिन इसके सामने कई तकनीकी और आर्थिक चुनौतियां भी हैं। बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए निवेश, बुनियादी ढांचा और नीति समर्थन की जरूरत होगी। इसके अलावा, शैवाल से तेल निकालने और उसे ईंधन में बदलने की प्रक्रिया को और अधिक ऊर्जा-कुशल बनाना होगा। यदि उत्पादन लागत ज्यादा रही, तो यह जीवाश्म ईंधनों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएगा। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी IEA की Net Zero by 2050 रिपोर्ट के मुताबिक जैव ईंधन अकेले ऊर्जा संकट का समाधान नहीं हैं। सौर, पवन और हाइड्रोजन जैसी अन्य स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों के साथ मिलकर ही संतुलित ऊर्जा भविष्य संभव होगा। यह रिपोर्ट 2050 तक वैश्विक ऊर्जा-संबंधी कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को शुद्ध शून्य तक लाने और वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लिए ऊर्जा के इस्तेमाल के बारे में जानकारी देती है।
भारत जैसे देशों के लिए क्यों हैं बेहतर संभावनाएं
शैवाल से बना ईंधन केवल एक तकनीकी नवाचार नहीं, बल्कि ऊर्जा व्यवस्था में संभावित बदलाव का संकेत है। यदि उत्पादन लागत घटाने और बड़े पैमाने पर आपूर्ति सुनिश्चित करने में सफलता मिलती है, तो यह परिवहन, उद्योग और बिजली उत्पादन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
भारत जैसे देशों में जहां ऊर्जा मांग तेजी से बढ़ रही है और तेल आयात पर भारी खर्च होता है, वहां शैवाल आधारित ईंधन एक रणनीतिक विकल्प बन सकता है। देश में लंबी तटीय रेखा, झीलों-तालाबों और अपशिष्ट जल स्रोतों की उपलब्धता इस तकनीक के लिए अनुकूल परिस्थितियां पैदा करती है। यदि अनुसंधान संस्थान और उद्योग मिलकर काम करें, तो भारत भी इस क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व हासिल कर सकता है। इससे जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने के साथ-साथ ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में भी बड़ा कदम उठाया जा सकेगा।
वैश्विक स्तर पर बढ़ती जलवायु चिंताओं और ऊर्जा संकट के बीच यह तकनीक उम्मीद की नई किरण बनकर उभर रही है। आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या शैवाल वास्तव में डीजल-पेट्रोल जैसे जीवाश्म ईंधनों की जगह ले पाते हैं या दुनिया की कुल ऊर्जा की खपत में एक महत्वपूर्ण हिस्सेदारी हासिल कर पाते हैं।
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