भारतीय ग्रामीण जीवनशैली में नौतपा को कभी भी केवल भीषण गर्मी के दिनों के रूप में नहीं देखा गया। इसे धरती को आने वाली बारिश के लिए तैयार करने वाली तपन के रूप में समझा गया।
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क्या है नौतपा का लोक विज्ञान? ये महज़ पंचांग की तारीखें नहीं, मौसम का हाल बताते हैं नक्षत्र
एक समय था जब लोग मई के आख़िरी दिनों का इंतज़ार करके कहते थे कि अब नौतपा शुरू होने वाला है या अब नौतपा लगेगा। गर्मी के दिन काटना तब भी मुश्किल ही था लेकिन बावजूद इसके गर्मी का अपना एक तय स्वभाव था, एक लय थी। दोपहरें धीरे-धीरे तपती थीं, कुओं का जल-स्तर कम हो जाता, आम के पेड़ों के नीचे सुस्ती भरी छायाएं पसरी होतीं और लोग समझ जाते थे कि बारिश आने से पहले धरती अपनी अंतिम तपिश से गुजर रही है।
बुंदेलखंड के गांवों में नौतपा शुरू होते ही दोपहर का गांव लगभग थम जाता था। कुएं से पानी भरने का काम सुबह-शाम ही किया जाता, बच्चे आम के पेड़ों के नीचे सुस्ताते और बुजुर्ग आसमान देखकर कहते, “अब धरती बारिश को पुकार रही है।”
लेकिन गर्मी की वह पुरानी पहचान अब धुंधली पड़ चुकी है। मार्च में ही लू के थपेड़े चलने लगते हैं, अप्रैल आते-आते कई शहरों का तापमान 45 डिग्री तक पहुंच जाता है। नतीजतन धरती समय से पहले ही थकी हुई महसूस होने लगती है। कभी जो तपन मानसून की तैयारी मानी जाती थी, वह अब जलवायु परिवर्तन के दौर में एक असंतुलित और बेचैन मौसम का रूप ले चुकी है।
भारतीय ग्रामीण जीवनशैली में नौतपा को कभी भी केवल भीषण गर्मी के दिनों के रूप में नहीं देखा गया। इसे धरती को आने वाली बारिश के लिए तैयार करने वाली तपन के रूप में समझा गया। जैसे मिट्टी बीज के लिए तैयार होती है, ठीक उसी तरह प्रकृति भी मानसून के स्वागत से पहले एक कठिन दौर से गुजरती है।
यह केवल नौ दिनों की तपिश नहीं, बल्कि पानी और मौसम के रिश्ते को समझने का एक पुराना लोक-संकेत भी है। इन अनुभवों और मान्यताओं के बीच नौतपा को समझने की एक स्पष्ट लोक-परिभाषा भी रही है।
भारतीय ग्रामीण जीवनशैली में नौतपा को कभी भी केवल भीषण गर्मी के दिनों के रूप में नहीं देखा गया। इसे धरती को आने वाली बारिश के लिए तैयार करने वाली तपन के रूप में समझा गया। जैसे मिट्टी बीज के लिए तैयार होती है, ठीक उसी तरह प्रकृति भी मानसून के स्वागत से पहले एक कठिन दौर से गुजरती है।
रोहिणी का प्रवेश: जब पंचांग बनता है मौसम की भाषा
जब सूर्य रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करता है, तब से अगले नौ दिनों को नौतपा कहा जाता है। यह समय आमतौर पर मई के अंतिम सप्ताह (25 मई से 2 जून) में आता है। लोक मान्यता है कि इन दिनों जितनी अच्छी गर्मी पड़ेगी, बारिश भी उतनी ही संतुलित होगी। गांवों में आज भी जेठ तपे, सावन बरसे जैसी पंक्तियां दोहराई जाती हैं।
दरअसल यह कहावत सिर्फ़ आस्था नहीं, बल्कि पीढ़ियों के मौसम अनुभव का निचोड़ है। किसानों ने सदियों तक मौसम, मिट्टी और पानी के व्यवहार को देखकर ऐसे निष्कर्ष बनाए। उन्हें पता था कि तेज़ गर्मी का संबंध आगे आने वाले मानसून से जुड़ा है।
इन सब अनुभवों के बीच नौतपा केवल एक पंचांग की घटना नहीं, बल्कि मौसम को समझने की एक लोक-भाषा भी था।
लोक मान्यता है कि नौतपा के दिनों में जितनी अच्छी गर्मी पड़ेगी, बारिश भी उतनी ही संतुलित होगी। गांवों में आज भी जेठ तपे, सावन बरसे जैसी पंक्तियां दोहराई जाती हैं।
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हवा की दिशा और चींटियों की हलचल के अनुभव का विज्ञान
गांवों में मौसम का अंदाज़ा हवा की दिशा, मिट्टी की गंध, पेड़ों के व्यवहार और पक्षियों की आवाजाही देखकर लगाया जाता था। कहीं चींटियों का बिलों से बाहर निकलना बारिश का संकेत माना गया, तो कहीं शाम की उमस और तेज़ चलती पछुआ हवा को बदलते मौसम की आहट।
किसानों के लिए नौतपा केवल गर्मी का नहीं, बल्कि तैयारी का मौसम भी होता था। इन्हीं दिनों में बैलों के जुए ठीक किए जाते, खेतों की मेड़ें संभाली जातीं और लोग आसमान की चमक देखकर अनुमान लगाते कि इस बार सावन कैसा रहेगा।
यही वजह थी कि जेठ तपे सावन बरसे जैसी कहावतें केवल लोक आस्था नहीं, बल्कि मौसम को लंबे अनुभव से पढ़ने की एक सामूहिक स्मृति थीं।
जल-स्मृति: तपती धरती और बादलों का भूगोल
नौतपा का सबसे गहरा संबंध पानी से ही है। शुरुआत से ही लोक जीवन की समझ में यह बात केंद्र में रही है कि धरती जितनी तपेगी, समुद्र और जलस्रोतों से उतना अधिक वाष्पीकरण होगा। यही जलवाष्प बाद में बादलों में बदलकर बारिश लाती है। इस भौगोलिक प्रक्रिया को हमारे समाज ने अपने लोकज्ञान में बहुत पहले से जगह दे दी थी, इसीलिए नौतपा को सिर्फ सहने की चीज़ नहीं, बल्कि प्रकृति के चक्र को समझने की अवधि माना गया।
हम सबके पुरखे बहुत ज्ञानी थे, काल, परिस्थिति की समझ तात्कालिक विज्ञान से भी अधिक गहरी थी। वे गाते थे- "जेठ जतना तपी, सावन ओतने झरी।" प्रकृति के इस रौद्र रूप में भी कल की बारिश की उम्मीद और जीवन का उत्साह, उमंग ढूँढ लेना, हर चुनौती में खुद को संयमित रखना, जूझना ही हमारी लोक संस्कृति की असली ताकत है।
मालिनी अवस्थी, प्रसिद्ध लोक गायिका एवं लोक संस्कृति विशेषज्ञ
गर्मी बढ़ते ही घरों में मिट्टी के घड़े निकाले जाते, छाछ, बेल का शरबत, आम-पना, सत्तू और जौ के शरबत का दौर चलने लगता।
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लू से बचने का पारंपरिक घरेलू विज्ञान
यही समझ हमारे खान-पान और दिनचर्या में भी दिखती है। गर्मी बढ़ते ही घरों में मिट्टी के घड़े निकाले जाते, छाछ, बेल का शरबत, आम-पना, सत्तू और जौ के शरबत का दौर चलने लगता।
मालवा और निमाड़ के इलाकों में कच्चे आम का पना गर्मी से राहत का पारंपरिक पेय रहा है, तो बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में सत्तू गर्मियों के भोजन और पानी दोनों का सहारा बनता है।
प्रसार भारती में कार्यरत पटना मूल निवासी पंकज आनंद (50 वर्षीय) बताते हैं कि अब तो मौसम कब गर्म हो जाए कुछ पता नहीं, एक समय था नौतपा के दौरान ही सबसे ज्यादा गर्मी पड़ती थी। तब घर में सत्तू का सेवन एका एक बढ़ जाता था। इस दौरान सभी के लिए सत्तू खाना अनिवार्य होता था। साथ में आम का पनाह लू से बचाने की अचूक दवा के रूप में लिया जाता था।
70 वर्षीय ऊषा वर्मा, जिनका बचपन कानपुर और आगरा में बीता, बताती हैं कि करीब 5-6 दशक पूर्व जब गर्मी के मौसम में आने-जाने की सारी प्लानिंग नौतपा के हिसाब से की जाती थी। मई के आखिरी सप्ताह में सब घर पर ही रहना पसंद करते थे। तब घरों का निर्माण वेंटिलेशन को ध्यान में रख कर किया जाता था और नौतपा आने पर रोशन दान व खिड़कियों में खस की झाड़ लगाकर उस पर पानी डाल दिया जाता था। वो झाड़ कूलर का काम करती थी।
पहले घरों को बनाते समय वेंटीलेशन का ध्यान रखा जाता था और नौतपा आने पर रोशन दान व खिड़कियों में खस की झाड़ लगाकर उस पर पानी डाल दिया जाता था। वो झाड़ कूलर का काम करती थी।
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राजस्थान में पंचांग देख कर पानी का इस्तेमाल
पंचांग के हिसाब से जिस दिन से नौतपा शुरू होता उसी दिन से राजस्थान के कई हिस्सों में टांकों और बावड़ियों के पानी को बहुत सावधानी से इस्तेमाल करने की परंपरा रही है। वहीं बुंदेलखंड के गांवों में तालाबों और कुओं के प्रति सामुदायिक जिम्मेदारी की भावना इस मौसम में और गहरी दिखाई देती थी।
कई जगहों पर प्याज साथ रखने या कच्चे आम का सेवन करने जैसी परंपराएं भी प्रचलित थीं। माना जाता था कि ये चीजें शरीर को ठंडक देती हैं और लू से बचाती हैं।
अब तो मौसम कब गर्म हो जाए कुछ पता नहीं, एक समय था नौतपा के दौरान ही सबसे ज्यादा गर्मी पड़ती थी। तब घर में सत्तू का सेवन एका एक बढ़ जाता था। इस दौरान सभी के लिए सत्तू खाना अनिवार्य होता था। साथ में आम का पनाह लू से बचाने की अचूक दवा के रूप में लिया जाता था।
पंकज आनंद, प्रसार भारती
खेतों की तपन और कुओं की पहरेदारी
गांवों में नौतपा शुरू होते ही पानी को लेकर सावधानियां भी बढ़ जाती थीं। कुओं से पानी निकालने में संयम रखा जाता, तालाबों की सफाई की जाती और घरों में मिट्टी के घड़ों का उपयोग बढ़ जाता।
कई जगहों पर लोग दोपहर में पशुओं को तालाब तक ले जाने का समय भी बदल देते थे ताकि पानी जल्दी खत्म न हो। राजस्थान, बुंदेलखंड और मध्य भारत के कई हिस्सों में नौतपा के दौरान जलस्रोतों की पूजा की परंपरा भी रही है।
इसे केवल एक धार्मिक अनुष्ठान के रूप में नहीं, बल्कि पानी के प्रति सामुदायिक जिम्मेदारी की भावना के साथ साझी विरासत के रूप में देखा जाता था। यही कारण है कि गर्मी के दिनों में पानी बचाने के नियम समाज खुद तय करता था।
भारतीय जीवनशैली में पानी और उसके स्रोतों को संसाधन नहीं, बल्कि साझी विरासत के रूप में देखने की परंपरा रही है। यही कारण है कि इन्हें बचाने के नियम भी समाज खुद तय करता था।
खेती-किसानी के लिहाज़ से भी नौतपा की अवधि को महत्वपूर्ण माना जाता है। यह वह समय होता है जब किसान मानसून से पहले खेतों की तैयारी करते हैं। तेज़ धूप खेतों की ऊपरी सतह को सुखाती है, जिससे कई प्रकार के कीट और फफूंद कम होते हैं।
ग्रामीण समाज में ऐसा विश्वास भी रहा है कि अगर नौतपा के दौरान बार-बार बारिश हो जाए, तो मानसून के दिनों में बारिश की आवृति और अवधि दोनों कमजोर पड़ सकते हैं। यह धारणा मौसम के लंबे अनुभवों से ही बनी थी।
गर्मी बढ़ते ही घरों में मिट्टी के घड़े निकाले जाते, छाछ, बेल का शरबत, आम-पना, सत्तू और जौ के शरबत का दौर चलने लगता।
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करीब 5-6 दशक पूर्व जब गर्मी के मौसम में आने-जाने की सारी प्लानिंग नौतपा के हिसाब से की जाती थी। मई के आखिरी सप्ताह में सब घर पर ही रहना पसंद करते थे। तब घरों का निर्माण वेंटिलेशन को ध्यान में रख कर किया जाता था और नौतपा आने पर रोशन दान व खिड़कियों में खस की झाड़ लगाकर उस पर पानी डाल दिया जाता था। वो झाड़ कूलर का काम करती थी।
उमा वर्मा
जब धुंधली पड़ने लगी पुरानी पहचान
अब नौतपा पहले जैसा नहीं रहा। कहीं तापमान असामान्य रूप से बढ़ रहा है, तो कहीं मई में ही आंधी और बारिश का सिलसिला शुरू हो जाता है। जलवायु परिवर्तन ने गर्मी और बारिश दोनों के पारंपरिक चक्र को प्रभावित किया है। इसका असर पानी पर भी साफ़ दिखाई देता है। एक तरफ़ भीषण गर्मी से जलस्रोत तेजी से सूखते हैं, दूसरी ओर अनियमित बारिश भूजल पुनर्भरण की प्रक्रिया को प्रभावित करती है।
ऐसे समय में नौतपा को केवल “हीटवेव” की खबरों तक सीमित करके नहीं समझा जा सकता। यह हमें याद दिलाता है कि पानी और तापमान का रिश्ता कितना गहरा है।
भारतीय लोक जीवन में ऋतुओं का अर्थ केवल मौसम तक सीमित नहीं होता, बल्कि वे जीवन का हिस्सा होती हैं। नौतपा भी ऐसी ही एक स्मृति है, जो बताती है कि तपती हुई धरती के भीतर भी पानी की कहानी छिपी होती है।
शायद इसी वजह से गांवों में आज भी जब लू चलती है और आसमान सफेद चमक से भर जाता है, तब लोग बेचैनी के साथ-साथ एक उम्मीद भी महसूस करते हैं। बदलते मौसम में हम केवल बारिश नहीं, मौसम को समझने की अपनी पुरानी बुद्धि भी खोते जा रहे हैं।
नौतपा हमें याद दिलाता है कि मौसम केवल तापमान नहीं होता, वह स्मृति भी होता है जो पीढ़ियों ने पानी और धरती के साथ जीकर बनाई थी।
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