गिचक नाकाना, उत्तर-पूर्व भारत की ज़मीन के नीचे के पानी में रहने वाली एक अनोखी मछली।

गिचक नाकाना, उत्तर-पूर्व भारत की ज़मीन के नीचे के पानी में रहने वाली एक अनोखी मछली।

चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स के माध्यम से आर. ब्रिट्ज़, डब्ल्यू.के. मराक, के. वेलेंटीना, वाई. लोकेश्वर, आर. राघवन, ए.के. पिनियन और एम्प; एल रूबर से साभार

गिचक नाकाना - न नदी, न झील...एक्विफर में रहती है भारत की यह अनोखी मछली

सूरज की रोशनी से दूर, ज़मीन के नीचे बसी है एक अनोखी दुनिया, जिसे हम एक्विफर यानि जलभृत कहते हैं। असम में मिली लाल 'गिटचक नकाना' मछली ने यह साबित कर दिया कि एक्विफर केवल जल-भंडार नहीं हैं, बल्कि जीता-जागता संसार हैं।
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  • पूरे विश्‍व में 305 प्रजातियां ऐसी मछलियों की हैं, जो गुफाओं और ज़मीन के नीचे के पानी यानी भूजल में रहती हैं।

  • उत्तर-पूर्व क्षेत्र में पायी गई ‘गिटचक नकाना’ भारत की पहली ग्राउंड वाटर फिश है 

  • यह मछली नेत्रहीन होती है, जिसने खुद को तरह से अंधेरे में जीवित रहने के अनुरूप ढाल लिया है।

जब हम मछलियों की बात करते हैं तो हमारे ज़हन में समुद्र की लहरों के बीच गोते लगाती बड़ी मछलियां, नदी के तट पर घूमती छोटी मछलियां या फिर झील व तालाबों में पायी जाने वाली वो मछलियां आती हैं, जिन्‍हें हम बाज़ारों में बिकते हुए अक्सर देखते हैं। क्या आपके कभी ऐसी मछली के बारे में सुना है जो नदी, तालाब, समुद्र, झील आदि में नहीं बल्कि ज़मीन के नीचे स्थित एक्विफर यानी जलभृत में रहती हैं? असम में एक ऐसी मछली पायी गई है जो जमीन के नीचे रहती है। और यह भारत की पहली ग्राउंड वाटर फिश है - नाम है गिटचक नकाना। 

इन भूमिगत जलधाराओं में ऐसे जीव रहते हैं जिन्होंने हज़ारों-लाखों साल में खुद को पूरी तरह से अंधेरे में जीवित रहने के अनुरूप ढाल लिया है। उनकी मौजूदगी से हमें यह समझने का अवसर मिलता है कि भूजल केवल निकालकर इस्तेमाल कर लेने वाला संसाधन भर नहीं है। यह एक जीता-जागता पारिस्थितिकी तंत्र है। यह न केवल मानव समाज के जीवन और आजीविका का आधार है बल्कि अनेक प्रकार के जीवों को आश्रय देता है।  

असम में हुई इस महत्वपूर्ण खोज ने भूजल की इस छिपी हुई दुनिया की ओर वैज्ञानिकों और आम लोगों का ध्यान आकर्षित किया है। नेचर साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित एक ओपन एक्सेस शोध पत्र में राल्फ ब्रिट्ज और उनके सहयोगी वैज्ञानिकों ने पूर्वोत्तर भारत की पहली ज्ञात भूजल-निवासी मछली की पहचान की है। गिचक नकाना (Gitchak nakana) नाम की यह छोटी और दृष्टिहीन मछली जमीन के नीचे मौजूद एक्विफर्स में रहने वाली एक दुर्लभ प्रजाति है।

यह खोज भारत में भूमिगत जैव विविधता के बारे में हमारी समझ को और व्यापक बनाती है। साथ ही, यह भूजल पारिस्थितिकी तंत्रों के संरक्षण की तत्काल आवश्यकता की ओर भी ध्यान दिलाती है। अत्यधिक भूजल दोहन, प्रदूषण और बढ़ते शहरी विस्तार के कारण इस नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र पर ख़तरे के बादल लगातार मंडरा रहे हैं।

भूजल केवल संसाधन नहीं है

भारत सिंचाई और पीने के पानी के लिए बहुत हद तक भूजल पर निर्भर है। लेकिन जरूरत से ज्यादा दोहन के कारण देश भर के एक्विफर में तेजी से गिरावट आ रही है। बहुत कम लोगों को इसकी जानकारी है कि भूजल सिर्फ मानव उपयोग के लिए पानी उपलब्ध नहीं कराता, बल्कि यह अनेक प्रकार के जीवों का भी घर है। दरअसल, जलभृत दुनिया के सबसे बड़े मीठे पानी के आवासों में शामिल हैं। यहां रहने वाले जीवों ने ख़ुद को ज़मीन के नीचे रहने के लिए विशेष रूप से अनुकूलित कर लिया है।

धरती पर मौजूद मीठे पानी का 95 प्रतिशत से अधिक हिस्सा भूजल के रूप में जमीन के नीचे जमा है। इस लिहाज से एक्विफर दुनिया के सबसे बड़े मीठे पानी के आवास हैं। हालांकि, इन एक्विफर में रहने वाले जीव मीठे पानी की कुल जैव विविधता का केवल एक छोटा हिस्सा हैं। लेकिन वे भूजल पारिस्थितिकी तंत्रों की सेहत और पारिस्थितिकीय स्थिति को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। चूंकि इन भूमिगत आवासों तक पहुंचना बेहद कठिन है, इसलिए यहां पाई जाने वाली जैव विविधता को लेकर हमारे पास सीमित जानकारी है।

मछलियां भूजल में बसे संसार की सबसे महत्वपूर्ण निवासी हैं 

मछलियां भूमिगत जल पारिस्थितिकी तंत्र की महत्वपूर्ण निवासी हैं। ये अक्सर 30 मीटर से कम गहराई वाली गुफाओं, जलभृतों और उनसे जुड़े कुओं में पाई जाती हैं। हालांकि, 600 मीटर तक की गहराई में भी कुछ प्रजातियां पाई गईं हैं। इनके आवासों में भूमिगत कुंड, जलधाराएं, कार्सट (चूना-पत्थर से बनी भू-आकृतियां) एवं चट्टानों और मिट्टी के कणों के बीच मौजूद सूक्ष्म जल-स्थान भी शामिल हैं।

साल 2023 के नवम्बर तक वैज्ञानिकों ने निम्नलिखित जानकारियां एकत्रित की हैं:

  • 305 प्रजातियां ऐसी मछलियों की हैं, जो गुफाओं और ज़मीन के नीचे के पानी यानी भूजल में रहती हैं।

  • 123 प्रजातियां ऐसी हैं, जो ज़मीन के नीचे कंकड़-पत्थर और रेत के कणों (तलछट) के बीच बसे पानी में जीवन बिताती हैं।

  • 55 प्रजातियां ऐसी हैं जिनकी आंखें और शरीर का रंग (पिगमेंटेशन) तो बहुत कमज़ोर हो चुके हैं। लेकिन उनकी बाकी इंद्रियां (सूंघने या महसूस करने की शक्ति) बहुत तेज़ हैं। दिलचस्प बात यह है कि ये मछलियां ज़मीन के नीचे के वातावरण में नहीं, बल्कि बाहर ही रहती हैं।

  • 15 प्रजातियां ऐसे उभयचरों (पानी और ज़मीन दोनों पर रहने वाले जीव, जैसे मेंढक या सालामैंडर) की हैं, जो गुफाओं के भीतर रहते हैं।

दुनिया भर में अब तक भूमिगत जल में रहने वाली मछलियों की कुल 428 प्रजातियां दर्ज की जा चुकी हैं। यह संख्या बताती है कि धरती की सतह के नीचे जीवन की दुनिया कितनी विशाल और विविधतापूर्ण है, और इसका कितना बड़ा हिस्सा अब भी हमारी जानकारी से परे है। भूमिगत मछलियों में कुछ ऐसी विशिष्ट विशेषताएं विकसित हो जाती हैं, जो उन्हें सतह पर रहने वाली मछलियों से अलग पहचान देती हैं। इनमें प्रमुख हैं:

  • दृष्टि या नज़र का न होना: अंधेरे में दृष्टि की कोई उपयोगिता न होने के कारण इनमें से कई प्रजातियां या तो पूरी तरह से दृष्टिहीन हैं या इनकी आंखें छोटी हैं।

  • रंगहीन शरीर (डीपिगमेंटेशन): इन मछलियों के शरीर में अमूमन कोई रंग नहीं होता। इस वजह से ये बिल्कुल पीली, सफ़ेद या आर-पार दिखने वाली (पारदर्शी) जैसी नज़र आती हैं।

  • तेज़ इंद्रियां (सेंसरी ऑर्गन): आंखों से न देख पाने के कारण ये मछलियां छूने, सूंघने और अपने शरीर के किनारों पर मौजूद एक खास संवेदी तंत्र (लेटरल लाइन सिस्टम) पर निर्भर रहती हैं। इसी की मदद से ये पानी में होने वाली हलचल को भांपती हैं और अपना रास्ता ढूंढती हैं।

  • धीमी पाचन क्रिया (स्लो मेटाबॉलिज्म): ज़मीन के नीचे खाना बहुत कम मिलता है। इसलिए ये मछलियाँ अपने शरीर की ऊर्जा बचाकर रखती हैं, ताकि कम खाने में भी इनका काम चल सके।

हालांकि अपनी इन क्षमताओं की कमी को ये मछलियां अपनी दूसरी खूबियों से पूरा करती हैं। इनके शरीर के दूसरे हिस्से और इंद्रियां ज़रूरत के मुताबिक काफी तेज़ हो जाते हैं, जैसे:

  • सूंघने की ज़बरदस्त क्षमता: इनके सूंघने की शक्ति बहुत तेज़ होती है। इससे ये पानी में घुली गंध से ही अंदाज़ा लगा लेती हैं कि आस-पास खाना है, कोई साथी है या फिर कोई खतरा।

  • पानी की हलचल को भांपना: ये मछलियां पानी के बहाव और उसमें होने वाले हल्के से कंपन को भी तुरंत महसूस कर लेती हैं। एक तरह से ये छूकर ही अपने आस-पास के माहौल को ‘देख' और समझ लेती हैं।

  • लंबे पंख और मूंछें: इनके पंख काफी लंबे होते हैं और मुंह के पास मूंछें (बार्बेल्स) जैसी निकली होती हैं। ये मूंछें टटोलने वाली छड़ी की तरह काम करती हैं, जिनकी मदद से ये ज़मीन के नीचे के संकरे रास्तों में भी बिना टकराए आगे बढ़ती रहती हैं।

ज़मीन के नीचे की अनोखी मछलियों के मामले में भारत दुनिया के शीर्ष देशों में गिना जाता है और इसका चौथा नंबर है। यहां अब तक ऐसी 21 प्रजातियों की पहचान हो चुकी है।

भारत और दुनिया में ज़मीन के नीचे का जीवन

ज़मीन के नीचे के पानी में रहने वाली ये मछलियां बहुत ही दुर्लभ होती हैं। ये दुनिया भर में सिर्फ चुनिंदा और खास जगहों पर ही पाई जाती हैं।

चीन और ब्राज़ील में भी मिलती हैं एक्विफर में पायी जाने वाली मछलियां 

ज़मीन के नीचे रहने वाली मछलियां दुनिया के सबसे दुर्लभ जीवों में से एक हैं। आज हम मछलियों की जिन 37,500 प्रजातियों के बारे में जानते हैं, उनमें से महज़ एक फीसदी ही ऐसी हैं जो ज़मीन के नीचे के अंधेरे में रहने के काबिल बन पाई हैं।

दुनिया भर में अब तक ऐसी 330 से ज़्यादा प्रजातियों का पता चला है। हैरान करने वाली बात यह है कि इनमें से करीब 70 फीसदी मछलियां सिर्फ पांच देशों में ही मिलती हैं। इनमें भी चीन और ब्राज़ील ऐसे दो देश हैं, जहां ज़मीन के नीचे मिलने वाली दुनिया की आधी मछलियां पाई जाती हैं। ज़मीन के नीचे की अनोखी मछलियों के मामले में भारत दुनिया के शीर्ष देशों में गिना जाता है और इसका चौथा नंबर है।

यहां अब तक ऐसी 21 प्रजातियों की पहचान हो चुकी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि भारतीय उपमहाद्वीप में मिलने वाली इनमें से कई मछलियां इतिहास के उस बेहद पुराने दौर (गोंडवाना काल) से ताल्लुक रखती हैं जब महाद्वीप आपस में जुड़े हुए थे। यहां पाए जाने वाले ज़मीन के नीचे रहने वाले झींगे और बिलों में रहने वाले उभयचरों (मेंढक प्रजाति के जीवों) की कहानी भी कुछ ऐसी ही पुरानी है।

गुफाओं में ज़्यादा, ज़मीन के नीचे के पानी में बहुत कम

ज़मीन के नीचे मिलने वाली 300 से ज़्यादा मछलियों में से 10 फीसदी से भी कम प्रजातियां एक्विफर यानी ज़मीन के गहरे पानी में रहती हैं। इनमें से ज़्यादातर मछलियां गुफाओं के भीतर बने पानी के स्रोतों में ही पाई जाती हैं।

गहरे भूजल में रहने वाली मछलियां इतनी दुर्लभ हैं कि दुनिया भर के संग्रहालयों में इनके गिने-चुने नमूने ही मौजूद हैं। और ये जब भी मिली हैं, महज़ किसी इत्तेफाक या हादसे की वजह से ही इंसानों के हाथ लगी हैं।

केरल और पूर्वोत्तर राज्य : इन अनोखी मछलियों के मुख्य ठिकाने

भारतीय उपमहाद्वीप में ज़मीन के नीचे के पानी से अब तक मछलियों की 27 प्रजातियों की खोज की जा चुकी है। इनमें से सबसे ज़्यादा, यानी 14 प्रजातियां अकेले केरल में मिली हैं, जबकि 5 प्रजातियां पूर्वोत्तर भारत के पहाड़ी राज्य मेघालय में पाई गई हैं।

इन दोनों इलाकों में ज़मीन के नीचे का वातावरण भी एक-दूसरे से काफी अलग है। मिसाल के तौर पर, केरल में ये मछलियां ज़्यादातर लैटेराइट यानी लाल-भूरी पथरीली मिट्टी (मुरम) वाले जलस्रोतों में मिलती हैं। जबकि मेघालय में ये चूने की चट्टानों से बनी गहरी गुफाओं के भीतर पाई जाती हैं।

‘गिटचक नकाना' की खोज

अधिकांश भूमिगत मछलियां गुफाओं में पाई जाती हैं। जबकि गिचक नकाना एक्विफर में रहती है। इससे संकेत मिलता है कि भूमिगत पारिस्थितिकी तंत्र हमारी पहले की समझ से कहीं अधिक विविध और जटिल हो सकते हैं।

इस शोध के दौरान असम के एक गांव में, ज़मीन खोदकर बनाए गए एक खुले कुएं से ज़मीन के नीचे रहने वाली इस अनोखी मछली का पता चला। यह गांव असम के पश्चिम में ब्रह्मपुत्र घाटी के पास, शिलांग पठार की तलहटी में बसा हुआ है, जहां उसी एक कुएं से अलग-अलग तीन मौकों पर इस मछली को ढूंढ़ा गया। 

वैसे तो शिलांग पठार की गुफाओं में ऐसी कई मछलियां मिलती हैं जो पूरी तरह अंधी होती हैं और जिनके शरीर का कोई रंग नहीं होता। लेकिन, उत्तर-पूर्व भारत में भूजल के भीतर रहने वाली यह अपनी तरह की पहली मछली खोजी गई है।

इस मछली के शरीर का अपना कोई रंग नहीं होता और इसका पारदर्शी शरीर खून की तरह बिल्कुल लाल नज़र आता है। ज़मीन के नीचे रहने वाली दूसरी मछलियों की तरह इसके पास भी आंखें नहीं हैं। केवल सिर के दोनों तरफ आंखों की जगह एक छोटा सा काला धब्बा दिखाई देता है। 

इस मछली को 'गिटचक नकाना' नाम दिया गया है। इसका यह नाम गारो जनजाति की भाषा के शब्द 'गिटचक' से लिया गया है, जिसका मतलब होता है 'लाल'। यह नाम पानी की तलहटी में रहने वाली इस खूबसूरत लाल मछली (लोच) के चटख रंग को देखकर रखा गया है।

इसी तरह इसके नाम का दूसरा हिस्सा 'नकाना', गारो भाषा के दो शब्दों 'ना-तोक' यानी मछली और 'काना' यानी अंधी को मिलाकर बना है। यह शब्द इसके आंख न होने को दर्शाता है। यह मछली आकार में महज़ 20 मिलीमीटर (यानी 2 सेंटीमीटर) लंबी है। इसे दुनिया की सबसे नन्हीं मछलियों की गिनती में रखा जाता है। 

इसकी एक दूसरी बेहद अनोखी बात यह है कि इसके सिर पर खोपड़ी की हड्डी (स्कल रूफ) बिल्कुल नहीं होती। इसका दिमाग ऊपर से सिर्फ त्वचा की एक पतली परत से ढका होता है। ऐसी मछलियों में यह बहुत ही दुर्लभ बात है, क्योंकि आमतौर पर खोपड़ी वाले हिस्से को दिमाग की हिफाज़त के लिए बेहद ज़रूरी माना जाता है।

जहां आम मछलियां एक बार में सैकड़ों या हज़ारों अंडे देती हैं, वहीं गिटचक बहुत कम, लेकिन बड़े आकार के अंडे देती है। इन बड़े अंडों से निकलने वाले बच्चे भी आकार में काफी बड़े होते हैं। कम खाना मिलने वाले इस अंधेरे वातावरण में खुद को बचाए रखने के लिए यह प्रकृति का एक अनोखा तालमेल है। 

बड़े अंडों से निकलने के कारण इन बच्चों का आकार शुरुआत से ही इतना होता है कि इन्हें अलग से किसी बारीक चारे की ज़रूरत नहीं पड़ती। ये पैदा होते ही वही सब खाने लगते हैं जो बड़ी मछलियां खाती हैं।

फिलहाल यह अनोखी मछली असम के सिर्फ एक ही कुएं में मिली है। जबकि वैज्ञानिकों ने आस-पास के कई दूसरे कुओं में भी इसकी खोज की है। यह पूरा इलाका ब्रह्मपुत्र की एक सहायक नदी की तलहटी से बहकर आई मिट्टी (जलोढ़ मिट्टी) से बना है। 

भौगोलिक रूप से इस तरह के इलाकों में लगातार बदलाव होते रहते हैं। इसलिए माना जा रहा है कि आने वाले लंबे समय तक इस मछली का यह आशियाना शायद ऐसा ही सुरक्षित न रहे।

यह खोज क्यों महत्वपूर्ण है? 

वैज्ञानिक दृष्टि से यह खोज बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पूर्वोत्तर भारत में भूजल में रहने वाली पहली ज्ञात मछली का प्रमाण मिला है। इसके साथ ही, भारत में भूमिगत जैव विविधता के वितरण और विस्तार को लेकर हमारी समझ भी पहले से अधिक समृद्ध हुई है।

इस खोज का एक दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अधिकांश भूमिगत मछलियां गुफाओं में पाई जाती हैं। जबकि गिचक नकाना एक्विफर में रहती है। इससे संकेत मिलता है कि भूमिगत पारिस्थितिकी तंत्र हमारी पहले की समझ से कहीं अधिक विविध और जटिल हो सकते हैं।

गिचक नकाना केवल एक नई प्रजाति नहीं है। यह उस छिपी हुई जीवन-शक्ति का प्रतीक है, जो धरती के नीचे मौजूद है। साथ ही, यह हमें याद दिलाती है कि एक्विफर केवल पानी के भंडार नहीं हैं, बल्कि जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र हैं, जिनका संरक्षण उतना ही जरूरी है जितना उनके पानी का।

इसके अलावा, इस मछली में भूमिगत जीवन के अनुरूप विकसित हुए कई विशेष गुण दिखाई देते हैं, जैसे दृष्टि का लोप, शरीर में रंगद्रव्य (पिगमेंट) का अभाव, संवेदन तंत्र का अधिक विकसित होना तथा शरीर के आकार में कमी और विशेषीकरण। 

इन विशेषताओं से वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिल सकती है कि समय के साथ जीव अपने परिवेश के अनुसार कैसे बदलते हैं। दूसरे शब्दों में, यह मछली विकासवाद की उन प्रक्रियाओं को समझने का एक जीवंत उदाहरण है, जिनमें कुछ गुण धीरे-धीरे समाप्त हो जाते हैं, जबकि कुछ नए या अधिक विकसित हो जाते हैं।

इस अध्ययन से भूजल संरक्षण की तत्काल आवश्यकता की ओर भी हमारा ध्यान जाता है। अत्यधिक दोहन, प्रदूषण और बढ़ते शहरी विस्तार के कारण ये नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र लगातार दबाव में हैं। 

गिचक नकाना जैसी मछलियों की मौजूदगी इस बात का प्रमाण है कि भूजल केवल पानी का भंडार नहीं, बल्कि एक जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र है। इसलिए इसे महज एक संसाधन के रूप में नहीं, बल्कि जीवन को सहारा देने वाली प्राकृतिक व्यवस्था के रूप में देखा जाना चाहिए।

भूमिगत जल में रहने वाली मछलियां आमतौर पर बहुत सीमित क्षेत्रों में पाई जाती हैं। यही वजह है कि उनके आवासों में थोड़ी-सी भी गड़बड़ी या क्षति उन्हें विलुप्त होने के खतरे में डाल सकती है। ऐसी प्रजातियां भूजल तंत्र की स्थिति को समझने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उनकी मौजूदगी यह संकेत दे सकती है कि भूजल स्रोत आपस में कितने जुड़े हुए हैं और उनका पारिस्थितिकी तंत्र कितना स्वस्थ है।

लंबे समय में गिचक नकाना जैसी प्रजातियों को आश्रय देने वाले एक्विफर का संरक्षण शहरों की जल सुरक्षा को मजबूत करने में भी मदद कर सकता है। यह खोज भूजल संरक्षण के मुद्दे को आम लोगों और नीति-निर्माताओं तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने का एक सशक्त माध्यम भी बन सकती है।

गिचक नकाना केवल एक नई प्रजाति नहीं है। यह उस छिपी हुई जीवन-शक्ति का प्रतीक है, जो धरती के नीचे मौजूद है। साथ ही, यह हमें याद दिलाती है कि एक्विफर केवल पानी के भंडार नहीं हैं, बल्कि जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र हैं, जिनका संरक्षण उतना ही जरूरी है जितना उनके पानी का।

एक ऐसी मछली जिसने भूजल को देखने का नजरिया बदल दिया

गिचक नकाना की खोज हमारे पैरों के नीचे मौजूद उस छिपी हुई दुनिया की दुर्लभ झलक दिखाती है, जिसके बारे में हम बहुत कम जानते हैं। यह खोज हमें याद दिलाती है कि एक्विफर केवल जमीन के नीचे मौजूद पानी के भंडार नहीं हैं। वे ऐसे जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र हैं जो उन जीवों को सहारा देते हैं, जिन्होंने बेहद कठिन परिस्थितियों में भी जीवन के अनुकूल खुद को ढाल लिया है।

आज जब भारत भूजल के घटते स्तर, प्रदूषण और बढ़ती जल मांग जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब यह छोटी-सी दृष्टिहीन मछली एक बड़ा संदेश देती है। जल सुरक्षा का भविष्य केवल इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम कितना भूजल निकालते हैं। यह भविष्य इस पर भी निर्भर करता है कि हम उन भूजल स्रोतों को स्वस्थ और लचीला बनाए रखने वाले पारिस्थितिकी तंत्रों की कितनी अच्छी तरह रक्षा करते हैं।

गिचक नकाना सिर्फ एक नई प्रजाति नहीं है। यह हमारे कुओं, खेतों और शहरों के नीचे छिपे जीवन का प्रतीक है। साथ ही, यह हमें याद दिलाती है कि भूजल का संरक्षण केवल पानी बचाने का सवाल नहीं है। यह उस पूरी दुनिया को बचाने का प्रयास है, जिसे हमने अभी समझना शुरू ही किया है।

इस लेख का अनुवाद डॉ कुमारी रोहिणी ने किया है।

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