चांदपुर जलाशय से भूजल रिचार्ज का दावा, जमीन के नीचे कितना पहुंचेगा पानी?

चांदपुर जलाशय से भूजल रिचार्ज का दावा, जमीन के नीचे कितना पहुंचेगा पानी?

फ़ोटो: विकिमीडिया कॉमन्स 

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  • फरीदाबाद के नंगला माजरा-चांदपुर में यमुना के बाढ़ क्षेत्र में 15.29 एकड़ में रिचार्ज सुविधा विकसित की जा रही है। 

  • इस परियोजना का मकसद बाढ़ के अतिरिक्त पानी को रोककर भूजल भंडार को रिचार्ज करना और रैनीवेल से जलापूर्ति करना है।

  • जलाशय और 22 रैनीवेल से 30-40 करोड़ लीटर भूजल रिचार्ज की संभावना

फरीदाबाद की पेयजल व्यवस्था का एक अहम हिस्सा यमुना के बाढ़ क्षेत्र के भूजल पर निर्भर है। नदी किनारे लगे रैनीवेल से भूजल निकालकर शहर तक पहुंचाया जाता है। केंद्र सरकार के अनुसार, 2031 की अनुमानित जल जरूरत को देखते हुए शहर के लिए अतिरिक्त और टिकाऊ भूजल स्रोत विकसित  करने की जरूरत है।

इसी पृष्ठभूमि में फरीदाबाद महानगर विकास प्राधिकरण (FMDA) नंगला माजरा-चांदपुर में जलाशय और रिचार्ज सुविधा विकसित कर रहा है। हरियाणा सरकार के ई-टेंडर में 15.29 एकड़ जमीन पर प्रस्तावित काम को यमुना के बाढ़ क्षेत्र में मौजूदा जल स्रोतों की स्थिरता के लिए recharging facilities/water body के रूप में दर्ज किया गया है। शुरुआती टेंडर की अनुमानित लागत 3.57 करोड़ रुपये थी और काम की अवधि 180 दिन रखी गई थी। बाद में यह टेंडर रद्द कर दिया गया।

इस योजना का मूल विचार सीधा है। मानसून में यमुना और बारिश से मिलने वाले अतिरिक्त पानी को रोका जाए और उसे धीरे-धीरे जमीन में रिसने देकर आसपास के एक्विफर (जलभृत) को रिचार्ज किया जाए।

मानसून का अतिरिक्त पानी, भूजल के लिए सहारा

यमुना का सक्रिय बाढ़ क्षेत्र भूजल रिचार्ज के लिहाज से बहुत ज़्यादा महत्व रखता है। नदी में पानी बढ़ने पर उसका कुछ हिस्सा बाढ़ क्षेत्र की जलोढ़ परतों में रिसता है। यही भूजल बाद में रैनीवेल जैसे स्रोतों के जरिये शहर की पानी की ज़रूरतों का हिस्सा बनता है।

लेकिन शहरी विस्तार और जमीन के इस्तेमाल में बदलाव के साथ प्राकृतिक रिचार्ज की प्रक्रिया पर दबाव बढ़ने लगता है। दूसरी ओर, गर्मियों में पानी की मांग बढ़ने पर भूजल आधारित स्रोतों पर निर्भरता भी बढ़ जाती है। 

चांदपुर की परियोजना इसी अंतर को कम करने की कोशिश है। इसमें मानसून के दौरान मिलने वाले अतिरिक्त पानी को जलाशय में रोककर धीरे-धीरे जमीन में पहुंचाने की योजना है।

मीडिया रिपोर्ट में बताया गया है कि अगस्त 2026 में निरीक्षण के दौरान FMDA अधिकारियों के अनुसार जलाशय पूरी तरह भरने पर 30-40 करोड़ लीटर पानी भूजल में पहुंच सकता है। इसके साथ पांच रैनीवेल बनाए जा रहे हैं, जिनकी कुल क्षमता 50 MLD होगी।

फरीदाबाद की पेयजल व्यवस्था कितनी निर्भर है यमुना बाढ़ क्षेत्र पर?

फरीदाबाद में यमुना के बाढ़ क्षेत्र के रैनीवेल लंबे समय से शहर की पानी की ज़रूरतों का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। केंद्र सरकार के अनुसार, शहर की जल जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा यमुना बाढ़ क्षेत्र में स्थित रैनीवेल से आता है। इसी वजह से 2024 में CGWB और FMDA के बीच हुए समझौते का एक प्रमुख उद्देश्य बाढ़ क्षेत्र में उपलब्ध भूजल की क्षमता और गुणवत्ता का आकलन करना था।

किसी भूजल रिचार्ज परियोजना की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि जलाशय में कितना पानी जमा हुआ।

फरीदाबाद की भविष्य की जलापूर्ति बढ़ाने के लिए नए रैनीवेल विकसित करने की योजना भी है। हरियाणा विधानसभा के एक आधिकारिक दस्तावेज में 22 रैनीवेल का उल्लेख है। यानी शहर की जल रणनीति में भूजल निकालने के साथ उसके पुनर्भरण पर भी जोर दिया जा रहा है। इसी संदर्भ में चांदपुर परियोजना महत्वपूर्ण हो जाती है।

फरीदाबाद की जलापूर्ति और चांदपुर परियोजना

  • 15.29 एकड़:  चांदपुर में प्रस्तावित रिचार्ज सुविधा/जलाशय का क्षेत्रफल

  • 30-40 करोड़ लीटर: जलाशय के पूरी तरह भरने पर अधिकारियों द्वारा बताया गया संभावित रिचार्ज

  • 22 रैनीवेल: फरीदाबाद में रैनीवेल की संख्या, आधिकारिक दस्तावेज में दर्ज

  • 50 एमएलडी: चांदपुर परियोजना से पांच रैनीवेल के जरिये अतिरिक्त जलापूर्ति का दावा

  • 3 लाख घन मीटर: परियोजना में प्रस्तावित/बताई गई मिट्टी की खुदाई

  • 3.57 करोड़ रुपये: मार्च 2026 के पहले टेंडर का अनुमानित मूल्य

  • 2025: CGWB का फरीदाबाद के सक्रिय यमुना बाढ़ क्षेत्र पर विशेष अध्ययन

30-40 करोड़ लीटर: बड़ा आंकड़ा, लेकिन कितना प्रभावी?

सुनने में 30-40 करोड़ लीटर यानी 300-400 मिलियन लीटर पानी बहुत ज़्यादा लगता है। लेकिन किसी भूजल रिचार्ज परियोजना की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होती कि जलाशय में कितना पानी जमा हुआ। जलाशय में जमा पानी और जमीन के भीतर पहुंचने वाला पानी एक ही चीज नहीं हैं।

कितना पानी जमीन के भीतर जाएगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि वहां की जमीन और मिट्टी कैसी है, पानी को सोखने की उसकी क्षमता कितनी है, नीचे मौजूद भूजल भंडार तक पानी पहुंचने का रास्ता कितना खुला है, जलाशय में पानी कितने समय तक ठहरता है और उस समय भूजल का स्तर क्या है। इसलिए जलाशय में जमा पानी की मात्रा से ज्यादा महत्वपूर्ण यह जानना है कि उसमें से कितना पानी जमीन के भीतर पहुंचकर भूजल स्तर में वास्तविक और टिकाऊ बदलाव लाता है।

इसलिए परियोजना का वास्तविक असर जानने के लिए कम से कम चार चीजों की निगरानी जरूरी होगी:

  • जलाशय में आने वाले पानी की मात्रा

  • जमीन के भीतर जाने वाले पानी की वास्तविक मात्रा

  • आसपास के भूजल स्तर में बदलाव

  • रैनीवेल के डिस्चार्ज और पानी की गुणवत्ता में बदलाव

अगर जलाशय भरता है लेकिन आसपास के भूजल स्तर या रैनीवेल की उत्पादकता में अपेक्षित सुधार नहीं आता, तो केवल जलाशय की क्षमता को परियोजना की सफलता नहीं माना जा सकता।

30-40 करोड़ लीटर के अनुमान का आधार क्या है?

FMDA अधिकारियों ने बताया है कि जलाशय के हर बार पूरी तरह भरने पर करीब 30-40 करोड़ लीटर पानी भूजल में पहुंच सकता है। हालांकि, उपलब्ध सार्वजनिक ई-टेंडर और CGWB के ऑनलाइन दस्तावेजों में इस चांदपुर-विशेष अनुमान के पीछे की विस्तृत भूजल-विज्ञान संबंधी गणना, पानी के जमीन में समाने की दर, जलाशय की वास्तविक पानी रखने की क्षमता और एक साल में इसके कितनी बार भरने की संभावना स्पष्ट नहीं है।

CGWB की 2025 की व्यापक अध्ययन रिपोर्ट यमुना के बाढ़ क्षेत्र में भूजल की उपलब्धता, उसकी गुणवत्ता और कृत्रिम तरीके से भूजल बढ़ाने की संभावनाओं पर केंद्रित है। लेकिन ऑनलाइन उपलब्ध जानकारी से यह पुष्टि नहीं होती कि 30-40 करोड़ लीटर का आंकड़ा इसी अध्ययन के आधार पर तय किया गया है।

CGWB ने फरीदाबाद के सक्रिय यमुना बाढ़ क्षेत्र पर 2025 में विस्तृत अध्ययन किया गया और उसके आधार पर प्रबंधन रणनीतियां तैयार कीं। लेकिन उपलब्ध जानकारी के आधार पर 30-40 करोड़ लीटर के दावे को फिलहाल अधिकारियों का परियोजना अनुमान ही माना जा सकता है।

परियोजना के बाद वास्तविक रिचार्ज कैसे मापा जाएगा?

किसी जलाशय को भूजल रिचार्ज परियोजना कहने के लिए केवल उसमें पानी जमा होना पर्याप्त नहीं है। यह पता लगाना भी जरूरी है कि जमा पानी में से कितना वास्तव में जमीन के भीतर भूजल भंडार तक पहुंच रहा है।

CGWB और केंद्र सरकार के उपलब्ध दस्तावेज के अनुसार, फरीदाबाद के यमुना बाढ़ क्षेत्र के अध्ययन में भूजल की उपलब्धता और गुणवत्ता का आकलन करने के साथ कृत्रिम तरीके से भूजल बढ़ाने और उसके बेहतर प्रबंधन की रणनीतियां तैयार करना शामिल था।

यमुना का सक्रिय बाढ़ क्षेत्र भूजल रिचार्ज के लिहाज से बहुत ज़्यादा महत्व रखता है। नदी में पानी बढ़ने पर उसका कुछ हिस्सा बाढ़ क्षेत्र की जलोढ़ परतों में रिसता है। यही भूजल बाद में रैनीवेल जैसे स्रोतों के जरिये शहर की पानी की ज़रूरतों का हिस्सा बनता है।

हालांकि, सार्वजनिक दस्तावेजों में अभी यह स्पष्ट नहीं है कि चांदपुर जलाशय से होने वाले भूजल रिचार्ज को किस तरह मापा जाएगा। भूजल स्तर और पानी की गुणवत्ता की निगरानी, निगरानी कुओं की संख्या और जलाशय में आए तथा जमीन में समाए पानी के आकलन की विस्तृत व्यवस्था का स्पष्ट विवरण उपलब्ध नहीं है।

यही जानकारी परियोजना के प्रभाव का आकलन करने के लिए जरूरी होगी। जलाशय में आने वाले पानी, भूजल स्तर और रैनीवेल से निकाले जाने वाले पानी को एक साथ मापने से परियोजना के कारण हुए बदलाव को समझने में मदद मिलेगी। इससे यह आकलन करने में मदद मिलेगी कि जलाशय के पानी से भूजल में कितना बदलाव आया और कितना पानी वास्तव में जमीन के भीतर पहुंचा।

क्या CGWB की 2025 रिपोर्ट में चांदपुर जैसी संरचनाओं के लिए स्पष्ट सिफारिश है?

CGWB की 2025 रिपोर्ट का आधिकारिक शीर्षक है “Study for Augmentation of Water Supply to Faridabad City, Haryana through Sustainable Ground Water Development in Active Yamuna Floodplain.” रिपोर्ट का उद्देश्य सक्रिय यमुना बाढ़ क्षेत्र में टिकाऊ भूजल विकास के जरिये फरीदाबाद की जलापूर्ति बढ़ाने से जुड़ा है।

दिसंबर 2025 में केंद्र सरकार ने बताया कि इस अध्ययन के बाद “detailed management strategies” तैयार की गईं। फिर इसे 27 मई 2025 को रिपोर्ट FMDA के CEO को लागू करने के लिए दिया गया। सरकार ने यह भी बताया कि भूजल संबंधी चिंताओं को देखते हुए CGWB और FMDA के बीच समझौते को अगले दो वर्षों के लिए बढ़ाया गया है, ताकि आगे विस्तृत जांच और प्रबंधकीय रणनीतियों को बेहतर और ज़्यादा असरदार बनाया जा सके।

लेकिन उपलब्ध सार्वजनिक सारांश में चांदपुर के 15.29 एकड़ जलाशय के लिए अलग से 30-40 करोड़ लीटर का रिचार्ज संभावना या इस विशेष संरचना की निगरानी व्यवस्था का ज़िक्र नहीं है।

सिर्फ एक जलाशय से नहीं बदलेगी तस्वीर

फरीदाबाद का जल संकट केवल कम भूजल रिचार्ज का परिणाम नहीं है। शहर की बढ़ती जल मांग, भूजल पर निर्भरता, जमीन के इस्तेमाल में बदलाव और प्राकृतिक रिचार्ज क्षेत्रों पर दबाव जैसे कई कारक एक साथ काम करते हैं।

केंद्र सरकार ने 2023 में फरीदाबाद को उन शहरों में गिना था जहां भूजल निकासी वार्षिक पुनर्भरण से काफी अधिक थी। उस सरकारी जवाब में फरीदाबाद के लिए भूजल दोहन की स्थिति 269% दर्ज की गई थी। उसी जवाब में यह भी कहा गया था कि फरीदाबाद भविष्य में भी मुख्य रूप से भूजल स्रोतों पर निर्भर रहने वाले शहरों में शामिल था और ऐसे ज़्यादा दबाव वाले एक्विफर के लिए वैकल्पिक जल स्रोतों की जरूरत है।

यह आंकड़ा चांदपुर परियोजना का महत्व समझाता है। अगर शहर भूजल पर निर्भर रहता है तो केवल नए रैनीवेल बनाना पर्याप्त नहीं होगा, उनके पीछे मौजूद भूजल भंडार का पुनर्भरण भी जरूरी होगा।

इसलिए बड़े जलाशयों के साथ गांवों के तालाब, वर्षा जल संचयन, प्राकृतिक रिचार्ज क्षेत्रों और यमुना के बाढ़ क्षेत्र की सुरक्षा को एक ही जल-प्रबंधन रणनीति का हिस्सा बनाना होगा।

बाढ़ का पानी: संसाधन भी, जोखिम भी

चांदपुर परियोजना का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि इसमें बाढ़ के अतिरिक्त पानी को केवल खतरे के रूप में नहीं देखा जा रहा। उसे रोककर भूजल रिचार्ज के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश की जा रही है।

लेकिन बाढ़ क्षेत्र में किसी भी निर्माण को लेकर सावधानी जरूरी है। यमुना का बाढ़ क्षेत्र नदी के प्राकृतिक फैलाव और जल-भूजल संबंध का हिस्सा है। इसलिए किसी कृत्रिम जलाशय की योजना बनाते समय यह देखना जरूरी है कि वह बाढ़ के प्राकृतिक रास्तों, नदी के फैलाव और स्थानीय जल निकासी में बेवजह की बाधा न डाले।

केंद्र सरकार
ने 2023 में फरीदाबाद को उन शहरों में गिना था जहां भूजल निकासी वार्षिक पुनर्भरण से काफी अधिक थी।

राष्ट्रीय जल मिशन भी समेकित जल संसाधन प्रबंधन और नदी घाटी स्तर पर योजना बनाने पर जोर देता है। इसलिए बाढ़ के पानी को रोकना तभी उपयोगी होगा जब इससे बाढ़ क्षेत्र की प्राकृतिक भूमिका कमजोर न हो। बाढ़ के पानी को रोकना और बाढ़ क्षेत्र को सुरक्षित रखना, दोनों एक ही बात नहीं हैं।

रिचार्ज बढ़े, लेकिन भूजल प्रदूषित न हो

भूजल रिचार्ज की परियोजना में पानी की मात्रा जितनी महत्वपूर्ण है, पानी की गुणवत्ता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। बाढ़ का पानी अपने साथ गाद और अलग-अलग स्रोतों से आए प्रदूषक ला सकता है। इसलिए ऐसे पानी को भूजल में पहुंचाने से पहले और बाद में उसकी गुणवत्ता की निगरानी जरूरी है।

फरीदाबाद के मामले में यह और महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यमुना बाढ़ क्षेत्र का भूजल शहर की पेयजल व्यवस्था से जुड़ा है।

यहां भी CGWB-FMDA अध्ययन का दायरा महत्वपूर्ण है। सरकार ने 2024 में कहा था कि अध्ययन में बाढ़ क्षेत्र के भूजल की उपलब्धता और गुणवत्ता दोनों का आकलन किया जाना है। इसलिए चांदपुर परियोजना में यह देखना जरूरी होगा कि कितना पानी आया, उसकी गुणवत्ता कैसी थी, कितना पानी जमीन में गया और इसके बाद भूजल स्तर व गुणवत्ता में क्या बदलाव आया। इन आंकड़ों को सार्वजनिक करना परियोजना के असर और पारदर्शिता, दोनों के लिए जरूरी होगा।

क्या इसे दूसरे शहरों में दोहराया जा सकता है?

देश के कई शहर नदियों के किनारे बसे हैं। मानसून में उन्हें बाढ़ या जलभराव का सामना करना पड़ता है, जबकि गर्मियों में भूजल की कमी से जूझना पड़ता है। ऐसे में उपयुक्त जगहों पर अतिरिक्त पानी रोककर भूजल रिचार्ज बढ़ाना एक विकल्प हो सकता है।

लेकिन इसे हर जगह एक जैसा मॉडल नहीं बनाया जा सकता। नदी के बाढ़ क्षेत्र में ऐसी परियोजना से पहले स्थानीय भूजल परत, नदी के प्रवाह, बाढ़ के फैलाव, पानी की गुणवत्ता और प्राकृतिक रिचार्ज की प्रक्रिया को समझना जरूरी है। चांदपुर का अनुभव यह समझने में मदद कर सकता है कि बाढ़, नदी, भूजल और शहर की जल मांग को एक ही जल-प्रणाली मानकर योजना बनाना कितना जरूरी है।

असली सवाल: जमीन के नीचे कितना पानी पहुंचा?

चांदपुर की परियोजना फरीदाबाद के लिए एक उपयोगी प्रयोग हो सकती है। लेकिन इसकी सफलता का फैसला जलाशय बनने या उसके भरने से नहीं होगा। सफलता तब मानी जाएगी जब परियोजना के आंकड़े यह दिखाएं कि:

  • कितनी मात्रा में बाढ़ और वर्षा का पानी जलाशय में आया;

  • उसमें से कितना पानी वास्तव में एक्विफर में पहुंचा;

  • आसपास के भूजल स्तर में कितना और कितने समय तक सुधार हुआ;

  • रैनीवेल के डिस्चार्ज में कितना बदलाव आया;

  • और रिचार्ज के बाद भूजल की गुणवत्ता सुरक्षित रही या नहीं।

फिलहाल सार्वजनिक स्रोतों से इतना स्पष्ट है कि CGWB ने फरीदाबाद के सक्रिय यमुना बाढ़ क्षेत्र पर विस्तृत अध्ययन कर प्रबंधन रणनीतियां तैयार की हैं। लेकिन चांदपुर के 30-40 करोड़ लीटर के अनुमान की गणना, निगरानी कुओं की संख्या और वास्तविक रिचार्ज मापने की स्पष्ट व्यवस्था सार्वजनिक दस्तावेजों में सामने नहीं आती।

यही वे आंकड़े हैं जिन्हें परियोजना के आगे बढ़ने के साथ सार्वजनिक किया जाना चाहिए। फरीदाबाद के लिए चांदपुर जलाशय इसलिए उम्मीद की एक पहल है, लेकिन इसे शहर के जल संकट का अकेला समाधान मानना जल्दबाजी होगी।

शहर की दीर्घकालीन जल-सुरक्षा इस बात पर निर्भर करेगी कि फरीदाबाद यमुना, उसके बाढ़ क्षेत्र, भूजल, रैनीवेल, वर्षा जल और बढ़ती शहरी जल मांग को एक ही जल-प्रणाली के हिस्से के रूप में कितना बेहतर ढंग से प्रबंधित कर पाता है।

चांदपुर में असली परीक्षा जलाशय में पानी भरने की नहीं, बल्कि उस पानी को सुरक्षित, मापने योग्य और टिकाऊ तरीके से जमीन के भीतर पहुंचाने की होगी।

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