सरकार नदियों में अंतर्देशीय जलमार्ग विकसित कर देश के भीतर जल परिवहन को बढ़ावा देने की योजना पर तेजी से काम कर रही है।

सरकार नदियों में अंतर्देशीय जलमार्ग विकसित कर देश के भीतर जल परिवहन को बढ़ावा देने की योजना पर तेजी से काम कर रही है।

स्रोत : विकी कॉमंस

अंतर्देशीय जल मार्गों से आएगी नई लॉजिस्टिक क्रांति,देखिए देश के इनलैंड वाटर वेज की सूची

सस्ती ढुलाई, प्रदूषण में कमी, ऊर्जा की बचत के साथ ही क्षेत्रीय विकास और रोजगार की नई संभावनाओं के खुल सकते हैं द्वार। भविष्‍य की राह में चुनौतियां भी कम नहीं।
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भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और इसके साथ-साथ माल ढुलाई की मांग भी लगातार बढ़ रही है। लेकिन लंबे समय तक देश में माल परिवहन मुख्य रूप से सड़क और रेल पर निर्भर रहा। इससे न केवल लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ी, बल्कि डीजल आधारित ट्रकों के कारण प्रदूषण भी बढ़ता गया। अब सरकार नदियों और नहरों को माल ढुलाई के लिए विकसित कर अंतर्देशीय जल परिवहन यानी इनलैंड वाटर ट्रांसपोर्ट (IWT) को एक नए विकल्प के रूप में सामने ला रही है।

हाल के वर्षों में गंगा, ब्रह्मपुत्र और कई अन्य राष्ट्रीय जलमार्गों पर कार्गो ढुलाई बढ़ी है। केंद्रीय बजट 2026-27 में भी इस क्षेत्र को मजबूत करने के लिए कई अहम घोषणाएं की गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर नदियों का उपयोग व्यवस्थित रूप से बढ़ाया गया तो यह भारत की लॉजिस्टिक्स लागत कम करने, ऊर्जा बचाने और कार्बन उत्सर्जन घटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

भारत में इनलैंड जलमार्गों की वर्तमान स्थिति

भारत के पास लगभग 14,500 किलोमीटर लंबा नौगम्य जलमार्ग नेटवर्क है, जिसमें नदियां, नहरें, बैकवॉटर और झीलें शामिल हैं। वर्ष 2016 के राष्ट्रीय जलमार्ग अधिनियम के तहत देश में 111 राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किए गए हैं। इनमें से गंगा-भागीरथी-हुगली प्रणाली (राष्ट्रीय जलमार्ग-1), ब्रह्मपुत्र (राष्ट्रीय जलमार्ग-2) और केरल का पश्चिमी तटीय नहर तंत्र (राष्ट्रीय जलमार्ग-3) प्रमुख हैं।

फिर भी भारत में माल ढुलाई में जलमार्गों की हिस्सेदारी अभी बहुत कम है। अनुमान है कि देश के कुल माल परिवहन में लगभग 70% हिस्सा सड़क, 18% रेल और केवल करीब 6% जलमार्गों का है

यह आंकड़ा बताता है कि भारत में जलमार्गों की क्षमता अभी पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हुई है। यही कारण है कि केंद्र सरकार अब इसे परिवहन प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने की दिशा में काम कर रही है।

भारत के 5 प्रमुख जलमार्ग

भारत में कई राष्ट्रीय जलमार्ग विकसित किए जा रहे हैं, लेकिन कुछ जलमार्ग माल परिवहन और आर्थिक गतिविधियों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

NW-1 : गंगा-भागीरथी-हुगली जलमार्ग

National Waterway‑1 भारत का सबसे लंबा और सबसे महत्वपूर्ण जलमार्ग है, जो Varanasi से Haldia तक लगभग 1,390 किलोमीटर तक फैला है। यह जलमार्ग उत्तर भारत के कृषि और औद्योगिक क्षेत्रों को पूर्वी समुद्री बंदरगाहों से जोड़ता है। कोयला, खाद, सीमेंट और कंटेनर कार्गो के परिवहन के लिए इसका उपयोग तेजी से बढ़ रहा है।

NW-2 : ब्रह्मपुत्र जलमार्ग

National Waterway‑2 : यह आंतरिक जलमार्ग ब्रह्मपुत्र नदी पर स्थित है और लगभग 891 किलोमीटर लंबा है। यह जलमार्ग Dhubri से Sadiya तक फैला है। पूर्वोत्तर भारत के लिए यह एक महत्वपूर्ण लॉजिस्टिक्स कॉरिडोर बन रहा है, जहां से चाय, पेट्रोलियम उत्पाद और निर्माण सामग्री की ढुलाई होती है।

NW-3 : पश्चिमी तटीय नहर

National Waterway‑3 Kerala के बैकवॉटर और नहर प्रणाली पर आधारित है। यह कोल्लम से कोच्चि तक फैला जलमार्ग है और मुख्य रूप से सीमेंट, उर्वरक और निर्माण सामग्री के परिवहन में उपयोग होता है। पर्यटन और यात्री परिवहन में भी इसका बड़ा योगदान है।

NW-4 : गोदावरी-कृष्णा जलमार्ग

National Waterway‑4 (Godavari-Krishna Waterway) : जैसा कि नाम से ही स्‍पष्‍ट है, यह अंतर्देशीय जल मार्ग दक्षिण भारत की दो सबसे प्रमुख नदियों कृष्‍णा और गोदावरी को आपस में जोड़ता है। यह जलमार्ग आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के कई औद्योगिक और कृषि क्षेत्रों को जोड़ता है। भविष्य में यहां बड़े पैमाने पर कार्गो ढुलाई की संभावना देखी जा रही है।

NW-5 : ब्राह्मणी-महानदी जलमार्ग

National Waterway‑5: इसे ब्राह्मणी नदी (Brahmani River) और महानदी (Mahanadi River) पर विकसित किया जा रहा है। यह जलमार्ग ओडिशा के खनिज समृद्ध क्षेत्रों को Paradip और Dhamra जैसे महत्‍वपूर्ण बंदरगाहों से जोड़ने के लिए महत्वपूर्ण साबित होगा। इससे कोयला और लौह अयस्क के परिवहन की लागत कम होने की उम्मीद है।

एक दशक में 8 गुना बढ़ा कार्गो
भारत में इनलैंड जलमार्गों पर माल ढुलाई पिछले दशक में तेजी से बढ़ी है। वर्ष 2013-14 में राष्ट्रीय जलमार्गों पर कुल कार्गो परिवहन लगभग 1.81 करोड़ टन था, जो 2024-25 में बढ़कर 14.55 करोड़ टन तक पहुंच गया। यानी लगभग दस वर्षों में यह आंकड़ा करीबआठ गुनाबढ़ गया। यह वृद्धि बताती है कि नदियों के माध्यम से परिवहन को लेकर सरकारी निवेश और नीतियों का असर दिखने लगा है।
<div class="paragraphs"><p>गंगा, ब्रह्मपुत्र, सिंधु, कृष्‍णा, कावेरी, महानदी जैसी देश की बड़ी नदियां अंतर्देशीय जल परिवहन को बढ़ावा देने की व्‍यापक क्षमता रखती हैं।&nbsp;</p></div>

गंगा, ब्रह्मपुत्र, सिंधु, कृष्‍णा, कावेरी, महानदी जैसी देश की बड़ी नदियां अंतर्देशीय जल परिवहन को बढ़ावा देने की व्‍यापक क्षमता रखती हैं। 

स्रोत : विकी कॉमंस

लॉजिस्टिक्स नेटवर्क में नई संभावनाएं

भारत की अर्थव्यवस्था में लॉजिस्टिक्स लागत एक बड़ी चुनौती है। विशेषज्ञों के अनुसार अगर जलमार्गों का उपयोग बढ़ाया जाए तो देश की लॉजिस्टिक्स लागत GDP के लगभग 14% से घटकर 9% तक आ सकती है। इससे हर साल अरबों डॉलर की बचत संभव है।

जलमार्गों का सबसे बड़ा फायदा यह है कि वे सड़क और रेल नेटवर्क पर दबाव कम कर सकते हैं। कई औद्योगिक क्षेत्रों से बंदरगाहों तक भारी माल भेजने के लिए नदियां एक प्राकृतिक कॉरिडोर की तरह काम कर सकती हैं। उदाहरण के तौर पर ओडिशा में प्रस्तावित राष्ट्रीय जलमार्ग-5 खनिज समृद्ध क्षेत्रों को पारादीप और धामरा जैसे बंदरगाहों से जोड़ने की योजना है। इससे कोयला और खनिजों की ढुलाई अधिक सस्ती और तेज हो सकती है। अगर ऐसे कॉरिडोर विकसित होते हैं तो उद्योगों के लिए परिवहन आसान होगा और निर्यात प्रतिस्पर्धा भी बढ़ेगी।

बजट 2026-27 में जलमार्गों को बड़ा प्रोत्साहन

हाल के केंद्रीय बजट में सरकार ने स्पष्ट संकेत दिया कि भविष्य की लॉजिस्टिक्स रणनीति में जलमार्गों की बड़ी भूमिका होगी। वित्त मंत्री ने घोषणा की कि इनलैंड और तटीय जलमार्गों के विकास तथा कंटेनर निर्माण के लिए लगभग 10,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया जाएगा। इसके साथ ही अगले कुछ वर्षों में 20 नए राष्ट्रीय जलमार्गों को परिचालन में लाने की योजना भी सामने रखी गई है।

सरकार का लक्ष्य है कि 2047 तक माल ढुलाई में जलमार्गों और तटीय शिपिंग की हिस्सेदारी 6% से बढ़ाकर लगभग 12% की जाए। इसके अलावा पूर्वोत्तर क्षेत्र में जलमार्ग विकास के लिए अलग रोडमैप तैयार किया जा रहा है और कई परियोजनाओं में हजारों करोड़ रुपये निवेश की योजना है।

नीतिगत रूप से यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत लंबे समय से अपनी लॉजिस्टिक्स लागत कम करने की कोशिश कर रहा है। वर्तमान में भारत में लॉजिस्टिक्स लागत GDP का लगभग 13-14 प्रतिशत मानी जाती है, जो कई विकसित देशों से अधिक है।

गंगा पर सबसे बड़ी जल परिवहन योजना

भारत में इनलैंड जलमार्गों को विकसित करने की सबसे बड़ी पहल Jal Marg Vikas Project है। यह परियोजना मुख्य रूप से Ganga River पर स्थित राष्ट्रीय जलमार्ग-1 को विकसित करने के लिए शुरू की गई है। इसका उद्देश्य वाराणसी से हल्दिया तक लगभग 1,390 किलोमीटर लंबे जलमार्ग को आधुनिक नौवहन के लिए तैयार करना है।

इस परियोजना के तहत नदी में न्यूनतम नौवहन गहराई बनाए रखने के लिए ड्रेजिंग, आधुनिक मल्टी-मोडल टर्मिनल, नेविगेशन सिस्टम और नदी सूचना प्रणाली विकसित की जा रही है। वाराणसी, साहिबगंज और हल्दिया में बड़े मल्टी-मोडल टर्मिनल बनाए गए हैं, जिससे सड़क, रेल और जलमार्ग के बीच माल का आसानी से आदान-प्रदान हो सके। विशेषज्ञों के अनुसार यह परियोजना गंगा घाटी के औद्योगिक और कृषि क्षेत्रों को बंदरगाहों से जोड़ने में अहम भूमिका निभा सकती है। इसके माध्यम से उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के उद्योगों को सस्ता और पर्यावरण-अनुकूल परिवहन विकल्प मिल रहा है।

111 नदियों और नहरों को राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया गया
भारत में 2016 में राष्ट्रीय जलमार्ग अधिनियम लागू होने के बाद देश में 111 नदियों और नहरों को राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया गया, पहले यह संख्या केवल 5 थी। बुनियादी ढांचे के विकास के साथ कई जलमार्गों पर संचालन शुरू हुआ है और अब करीब 29 राष्ट्रीय जलमार्गों पर नियमित कार्गो परिवहन होने लगा है। यह विस्तार दर्शाता है कि भारत जलमार्गों को एक महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में स्थापित कर रहा है।
<div class="paragraphs"><p>करीब साढ़े सात हज़ार किलोमीटर लंबी तटरेखा वाले भारत देश के लिए सुरक्षा की दृष्टि से भी अपने आंतरिक जलमार्गों का विकास करना ज़रूरी है।&nbsp;</p></div>

करीब साढ़े सात हज़ार किलोमीटर लंबी तटरेखा वाले भारत देश के लिए सुरक्षा की दृष्टि से भी अपने आंतरिक जलमार्गों का विकास करना ज़रूरी है। 

स्रोत : विकी कॉमंस

जलमार्ग क्यों हैं सस्ते : इनलैंड वाटर ट्रांसपोर्ट की सबसे बड़ी ताकत इसकी कम लागत है। विश्व बैंक और सरकारी अध्ययनों के अनुसार, एक टन माल को एक किलोमीटर ले जाने की लागत जलमार्ग से लगभग 1.2 रुपये, रेल से 1.4 रुपये और सड़क से करीब 2.28 रुपये पड़ती है। कुछ अन्य अध्ययनों में भी पाया गया है कि जलमार्ग से ढुलाई की लागत सड़क के मुकाबले लगभग 60% तक कम हो सकती है। इसके पीछे कई कारण हैं। जहाज या बार्ज एक साथ बहुत बड़ी मात्रा में माल ले जा सकते हैं, जिससे प्रति टन लागत कम हो जाती है। उदाहरण के तौर पर एक हॉर्सपावर ऊर्जा सड़क पर लगभग 150 किलोग्राम माल को आगे बढ़ाती है, जबकि रेल पर 500 किलोग्राम और जलमार्ग में लगभग 4000 किलोग्राम माल को आगे बढ़ा सकती है। यही कारण है कि कोयला, लौह अयस्क, सीमेंट, खाद, खाद्यान्न और कंटेनर जैसे भारी माल के लिए जलमार्ग बेहद उपयोगी माने जाते हैं। अगर भारत में बड़े पैमाने पर कार्गो नदियों के जरिए जाने लगे तो उद्योगों की परिवहन लागत काफी कम हो सकती है।
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ईंधन दक्षता और ऊर्जा बचत

इनलैंड जलमार्ग न केवल सस्ते हैं बल्कि ऊर्जा के लिहाज से भी बेहद कुशल माने जाते हैं। आंकड़ों के अनुसार एक लीटर ईंधन सड़क पर लगभग 24 टन-किलोमीटर माल, रेल पर 85 टन-किलोमीटर और जलमार्ग में लगभग 105 टन-किलोमीटर माल ले जा सकता है। इसका मतलब है कि समान दूरी पर समान माल ढोने के लिए जलमार्गों में ईंधन की खपत काफी कम होती है। इससे न केवल लागत घटती है बल्कि आयातित ईंधन पर निर्भरता भी कम हो सकती है।

भारत जैसे देश के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां तेल आयात पर बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च होती है। अगर भारी माल ढुलाई का एक हिस्सा नदियों पर स्थानांतरित हो जाए तो देश के ऊर्जा बिल में भी कमी आ सकती है।

जलमार्गों के पर्यावरणीय लाभ

जलमार्गों का एक बड़ा फायदा पर्यावरण से जुड़ा है। परिवहन क्षेत्र भारत में कार्बन उत्सर्जन का प्रमुख स्रोत बन चुका है। एक अध्ययन के अनुसार 2020 में भारत के परिवहन क्षेत्र से लगभग 368 मिलियन टन CO₂ उत्सर्जन हुआ, जिसमें अधिकांश हिस्सा सड़क परिवहन का था।

जलमार्गों का उपयोग बढ़ाने से इस उत्सर्जन को कम किया जा सकता है। जहाजों या बार्ज से माल ढुलाई में ईंधन की खपत कम होती है, इसलिए कार्बन उत्सर्जन भी कम होता है। कई अध्ययनों में यह भी बताया गया है कि जलमार्गों में ऊर्जा खपत सड़क परिवहन की तुलना में लगभग 17% तक ही होती है

इसके अलावा नदियों के जरिए माल भेजने से सड़कों पर भारी ट्रकों की संख्या कम हो सकती है, जिससे शहरी प्रदूषण, ट्रैफिक जाम और सड़क दुर्घटनाओं में भी कमी आ सकती है।

सरकार अब “ग्रीन वेसल” और हाइड्रोजन या इलेक्ट्रिक तकनीक वाले जहाजों पर भी काम कर रही है। उदाहरण के तौर पर वाराणसी में भारत का पहला हाइड्रोजन फ्यूल सेल आधारित इनलैंड जहाज विकसित किया गया है, जो लगभग शून्य उत्सर्जन के साथ चल सकता है।

<div class="paragraphs"><p>देश के समुद्र तटीय इलाकों में नदियों में आंतरिक जलमार्गों को विकसित करने से आयात-निर्यात को भी बढ़ावा मिल सकता है, क्‍योंकि इससे उत्‍तरी राज्‍यों का माल भी निर्यात के लिए सीधे बंदरगाहों तक पहुंच सकता है।</p></div>

देश के समुद्र तटीय इलाकों में नदियों में आंतरिक जलमार्गों को विकसित करने से आयात-निर्यात को भी बढ़ावा मिल सकता है, क्‍योंकि इससे उत्‍तरी राज्‍यों का माल भी निर्यात के लिए सीधे बंदरगाहों तक पहुंच सकता है।

स्रोत : विकी कॉमंस

क्षेत्रीय विकास और रोजगार के अवसर

इनलैंड जलमार्गों का एक सामाजिक-आर्थिक पहलू भी है। नदी किनारे बसे कई क्षेत्रों में सड़क और रेल संपर्क सीमित है। ऐसे इलाकों में जल परिवहन स्थानीय अर्थव्यवस्था को नया जीवन दे सकता है।

नदियों पर टर्मिनल, जेट्टी, गोदाम और लॉजिस्टिक्स हब बनने से स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं। इसके अलावा मछली पालन, पर्यटन और छोटे व्यापार भी बढ़ सकते हैं।

केरल, असम और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में पहले से ही नदी आधारित परिवहन का उपयोग हो रहा है। सरकार की योजना है कि इन मॉडलों को अन्य राज्यों में भी बढ़ाया जाए।

भविष्य की राह : चुनौतियां भी कम नहीं

हालांकि इनलैंड जलमार्गों की संभावनाएं बड़ी हैं, लेकिन इसके सामने कई चुनौतियां भी हैं। सबसे बड़ी चुनौती नदियों की गहराई और नौवहन क्षमता बनाए रखना है। कई नदियों में जल स्तर मौसमी होता है, जिससे बड़े जहाजों का संचालन मुश्किल हो जाता है।

इसके अलावा ड्रेजिंग, टर्मिनल निर्माण और नेविगेशन सिस्टम जैसे बुनियादी ढांचे में भारी निवेश की जरूरत होती है। कुछ पर्यावरणविदों का यह भी मानना है कि अत्यधिक ड्रेजिंग या नदी तटों के विकास से पारिस्थितिकी तंत्र पर असर पड़ सकता है। इसी वजह से विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि जलमार्ग विकास के साथ-साथ नदी पारिस्थितिकी की सुरक्षा पर भी बराबर ध्यान देना जरूरी है।

भारत में इनलैंड वाटर ट्रांसपोर्ट अभी शुरुआती दौर में है, लेकिन इसकी संभावनाएं काफी बड़ी हैं। अगर सरकार की योजनाएं सफल होती हैं तो आने वाले वर्षों में नदियां केवल सिंचाई या धार्मिक गतिविधियों तक सीमित नहीं रहेंगी, बल्कि देश की आर्थिक धमनियों की तरह काम करेंगी। कम लागत, ऊर्जा दक्षता और कम उत्सर्जन जैसे फायदे इसे भविष्य के परिवहन का महत्वपूर्ण माध्यम बना सकते हैं।

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