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इस तरह की रिमोट से संचालित सबमरीन के जरिये की जाती है समुद्र की गहराइयों में तेल और गैस की खोज।

फोटो : विकी कॉमंस

"समुद्र मंथन" से पूरी होंगी भारत की ऊर्जा जरूरतें, ईंधन आत्‍मनिर्भता की ओर बड़ा कदम

समुद्र की गहराइयों में छिपे तेल-गैस की खोज के लिए सरकार ने दी 84084 करोड़ के महत्‍वाकांक्षी प्रोजेक्‍ट को मंजूरी, जानिए क्‍या है सरकार की समुद्र मंथन योजना
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तेल और गैस के आयात को घटा कर ईंधन के मामले में भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए  केंद्र सरकार ने देश के पहले ऑफशोर ऑयल एंड गैस एक्सप्लोरेशन मिशन को दी मंजूरी। 2030-31 तक इसपर 84084 करोड़ रुपए खर्च होंगे। यह भारत का अबतक का सबसे बड़ा समुद्र में तेल व गैस की खोज का मिशन है। इससे देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत किया जाएगा।

केंद्रीय पेट्रोलियम एवं गैस मंत्रायल की इस योजना के तहत समुद्र की सतह पर आधुनिक सिस्मिक सर्वे, 60 डीप वाटर एक्‍सप्‍लोरेशन वेल्‍स की ड्रिलिंग, ऑफशोर इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर की स्‍थापना और ऑयल एंड गैस मैन्‍यूफेक्‍चरिंग एंड सर्विसेज जोन्‍स विकसित किए जाएंगे। इसके लिए सरकार कुओं की ड्रिलिंग लागत का 50 फीसदी खर्च या अधिकतम 675 करोड़ रुपये प्रति कुएं तक की आर्थिक सहायता देगी। इसका मतलब यह है कि ड्रिलिंग केवल ONGC, OIL जैसी सरकारी कंपनियां ही नहीं करेंगी। बल्कि, सरकारी मानकों के आधार पर निजी क्षेत्र की पात्र कंपनियां भी सरकार से अन्वेषण ब्लॉक लेकर डीपवाटर या अल्ट्रा-डीपवाटर में कुएं खोद सकेंगी। सरकार उसकी ड्रिलिंग लागत का 50% या अधिकतम 675 करोड़ रुपये प्रति कुआं (जो भी कम हो) वित्तीय सहायता के रूप में देगी।

इस योजना का लक्ष्‍य भारत का घरेलू तेल व गैस उत्‍पादन 62 MMTOE (Million Metric Tonnes of Oil Equivalent) यानी दस लाख मीट्रिक टन तेल समतुल्य से बढ़ा कर 80 MMTOE तक पहुंचाना और हर साल कच्‍चे तेल के आयात बिल में लगभग एक लाख करोड़ रुपये की कमी लाना है, जिससे तेल व गैस के आयात पर निर्भरता को कम किया जा सके।

जरूरत का 89% कच्चा तेल आता है विदेश से
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का उपभोक्ता और तीसरा सबसे बड़ा आयातक है। इसके बावजूद देश अपनी जरूरत का लगभग 89 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। देश में प्रतिदिन करीब 50 लाख बैरल कच्चे तेल की खपत होती है, जबकि उत्पादन महज 6-7 लाख बैरल प्रतिदिन ही है।मेक इन इंडिया

समुद्र की गहराइयों में तेल-गैस की तलाश

भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का करीब 89% और प्राकृतिक गैस की जरूरत का करीब 50% विदेश से आयात करता है। इस कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और पश्चिम एशिया जैसे क्षेत्रों में भू-राजनीतिक तनाव का सीधा असर भारत के आयात बिल और महंगाई पर पड़ता है। इसलिए घरेलू तेल एवं गैस उत्पादन बढ़ाना केवल आर्थिक जरूरत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा का भी महत्वपूर्ण प्रश्न बन गया है। इसी चुनौती से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने 84,084 करोड़ रुपये की लागत वाली 'समुद्र मंथन' नेशनल ऑफशोर एक्सप्लोरेशन स्कीम को मंजूरी दी है। इसका उद्देश्य समुद्र की गहराइयों में अब तक छिपे हुए तेल और गैस भंडारों को वैज्ञानिक तरीके से खोज कर उसका दोहन करके भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में अधिक आत्मनिर्भर बनाना है। योजना का काम 2030-31 तक पूरा करने का लक्ष्‍य है। 

क्या है योजना का पूरा ढांचा?

'समुद्र मंथन' केवल कुएं खोदने की परियोजना नहीं है, बल्कि ऑफशोर तेल एवं गैस खोज की पूरी मूल्य श्रृंखला (वैल्यू चेन) को मजबूत करने वाला राष्ट्रीय कार्यक्रम है। इसके तहत पहले चरण में देश के अपतटीय क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर आधुनिक 2D, 3D और आवश्यकता अनुसार उन्नत सिस्मिक सर्वे किए जाएंगे ताकि समुद्र के नीचे मौजूद संभावित हाइड्रोकार्बन संरचनाओं की सटीक पहचान हो सके। इसके बाद गहरे और अति-गहरे समुद्री क्षेत्रों में लगभग 60 खोजी कुओं की ड्रिलिंग की जाएगी। सरकार का मानना है कि जोखिम कम होने पर निजी और वैश्विक ऊर्जा कंपनियों की भागीदारी भी बढ़ेगी।

योजना में केवल खोज तक सीमित रहने के बजाय साझा ऑफशोर उत्पादन एवं निकासी (Common Production and Evacuation) अवसंरचना विकसित करने का भी प्रावधान है। इसके अलावा एकीकृत ऑयल एंड गैस मैन्युफैक्चरिंग एंड सर्विसेज जोन स्थापित किए जाएंगे, जहां ड्रिलिंग उपकरण, समुद्री इंजीनियरिंग, मरम्मत, लॉजिस्टिक्स और अन्य सेवाओं का घरेलू इको सिस्‍टम विकसित होगा। इससे 'मेक इन इंडिया' और आत्मनिर्भर भारत अभियान को भी गति मिलने की उम्मीद है।

समुद्र मंथन योजना की महत्‍वपूर्ण बातें

निवेश के जोखिम को कैसे घटाएगी सरकार ?

गहरे समुद्र में तेल एवं गैस की खोज दुनिया के सबसे महंगे और जोखिमपूर्ण कार्यों में मानी जाती है। एक डीपवाटर खोजी कुएं पर एक हजार करोड़ रुपये या उससे अधिक का खर्च आ सकता है, फिर भी सफलता की कोई गारंटी नहीं होती। यही कारण है कि कई निजी कंपनियां इस क्षेत्र में निवेश से बचती रही हैं।

इस समस्या को देखते हुए सरकार ने योजना के तहत विशेष प्रोत्साहन पैकेज तैयार किया है। डीपवाटर और अल्ट्रा-डीपवाटर क्षेत्रों में खोजी कुओं की ड्रिलिंग पर सरकार लागत का 50 प्रतिशत या अधिकतम 675 करोड़ रुपये प्रति कुएं में से जो भी कम हो, तक की वित्तीय सहायता देगी। इसका उद्देश्य शुरुआती जोखिम कम करना और घरेलू तथा वैश्विक कंपनियों को भारत के अपतटीय क्षेत्रों में निवेश के लिए आकर्षित करना है।

किन क्षेत्रों पर रहेगा विशेष फोकस?

भारत के पास लगभग 75 लाख वर्ग किलोमीटर का समुद्री क्षेत्र है, लेकिन इसका बड़ा हिस्सा अब भी पर्याप्त रूप से खोजा नहीं गया है। विशेषकर कृष्णा-गोदावरी, महानदी, कावेरी, अंडमान, कच्छ और पश्चिमी अपतटीय क्षेत्रों के कई गहरे समुद्री ब्लॉकों में उल्लेखनीय संभावनाएं मानी जाती हैं। पिछले कुछ वर्षों में ओपन एकरेज लाइसेंसिंग प्रोग्राम (OALP) के माध्यम से कई ब्लॉकों की नीलामी की गई है, लेकिन उच्च लागत और जोखिम के कारण अपेक्षित निवेश नहीं मिल पाया। 'समुद्र मंथन' इसी कमी को दूर करने का प्रयास है, जिससे इन क्षेत्रों में खोज गतिविधियां तेज हो सकें।

भारत में ऊर्जा मांग तेजी से बढ़ी, पीछे छूटा उत्पादन 

भारत आज दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता और तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का आयातक देश है। देश की तेज आर्थिक वृद्धि, शहरीकरण, औद्योगिकीकरण और परिवहन क्षेत्र के विस्तार ने पेट्रोलियम उत्पादों तथा प्राकृतिक गैस की मांग में लगातार बढ़ोतरी की है। इसके विपरीत घरेलू उत्पादन पिछले एक दशक में लगभग स्थिर बना हुआ है। आसान और उथले (Shallow Water) क्षेत्रों में मौजूद अधिकांश तेल एवं गैस भंडार पहले ही खोजे जा चुके हैं। अब नए भंडार मुख्य रूप से गहरे समुद्री क्षेत्रों, कठिन भूगर्भीय संरचनाओं तथा सीमांत (Marginal) क्षेत्रों में मिलने की संभावना है, जहां खोज और उत्पादन की लागत कई गुना अधिक होती है।

यही वजह है कि भारत को अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदना पड़ता है। हर वर्ष लाखों करोड़ रुपये का विदेशी मुद्रा भंडार केवल ऊर्जा आयात पर खर्च होता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ने या पश्चिम एशिया में किसी तरह का भू-राजनीतिक संकट पैदा होने पर इसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था, महंगाई, चालू खाते के घाटे और रुपये की विनिमय दर पर पड़ता है। ऐसे में 'समुद्र मंथन' केवल एक खोज परियोजना नहीं, बल्कि देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की दीर्घकालिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

भारत में तेल-गैस सेक्‍टर का लेखा-जोखा

कौन करता है देश में सबसे ज्यादा तेल,गैस का उत्पादन?

भारत में तेल एवं गैस उत्पादन का सबसे बड़ा हिस्सा सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के पास है। इनमें ONGC की हिस्सेदारी सबसे अधिक है। इसके बाद Oil India Limited (OIL) का स्थान आता है। निजी क्षेत्र में Cairn Oil & Gas (Vedanta Group) और Reliance Industries-BP जैसे संयुक्त उपक्रम भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

हालांकि पिछले कुछ वर्षों में निजी निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए हाइड्रोकार्बन एक्सप्लोरेशन एंड लाइसेंसिंग पॉलिसी (HELP), ओपन एकरेज लाइसेंसिंग प्रोग्राम (OALP) और आसान राजस्व साझेदारी व्यवस्था जैसी कई नीतियां लागू की गईं, लेकिन गहरे समुद्री क्षेत्रों में अत्यधिक जोखिम और निवेश लागत के कारण अपेक्षित परिणाम नहीं मिल सके। सरकार को उम्मीद है कि 'समुद्र मंथन' के तहत मिलने वाली वित्तीय सहायता इस स्थिति को बदल सकती है।

तेल-गैस उत्पादन में प्रमुख कंपनियों की हिस्सेदारी

(तेल एवं गैस के संयुक्त घरेलू उत्पादन में अनुमानित हिस्सेदारी; विभिन्न सरकारी एवं उद्योगों के आंकड़ों पर आधारित)

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किन क्षेत्रों में सबसे अधिक होती है तेल-गैस की खपत?

भारत में पेट्रोलियम उत्पादों की सबसे अधिक खपत परिवहन क्षेत्र में होती है। सड़क परिवहन के तेजी से विस्तार, निजी वाहनों की संख्या में वृद्धि और माल ढुलाई की बढ़ती जरूरत ने डीजल और पेट्रोल की मांग को लगातार ऊपर पहुंचाया है। इसके बाद पेट्रोकेमिकल उद्योग, उर्वरक, रसोई गैस, विमानन, बिजली उत्पादन और विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों का स्थान आता है।

प्राकृतिक गैस की मांग भी तेजी से बढ़ रही है। सरकार वर्ष 2030 तक देश के ऊर्जा मिश्रण (Energy Mix) में प्राकृतिक गैस की हिस्सेदारी लगभग 15 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य रखती है। इसके लिए सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क, पाइपलाइन नेटवर्क और एलएनजी टर्मिनलों का तेजी से विस्तार किया जा रहा है। ऐसे में यदि घरेलू गैस उत्पादन नहीं बढ़ा, तो आयातित एलएनजी पर निर्भरता और बढ़ सकती है।


किस सेक्‍टर में तेल-गैस की कितनी खपत

सफलता की राह आसान नहीं

'समुद्र मंथन' जितना महत्वाकांक्षी है, उसकी चुनौतियां भी उतनी ही बड़ी हैं। गहरे समुद्र में ड्रिलिंग तकनीकी रूप से अत्यंत जटिल और महंगी प्रक्रिया है। समुद्र की हजारों मीटर गहराई में अत्यधिक दबाव, कम तापमान, तेज समुद्री धाराएं और कठिन भूगर्भीय परिस्थितियां काम को जोखिमपूर्ण बना देती हैं। कई बार एक खोजी कुएं पर सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी व्यावसायिक रूप से उपयोगी तेल या गैस नहीं मिलती।

दूसरी चुनौती अत्याधुनिक तकनीक की उपलब्धता है। अल्ट्रा-डीपवाटर ड्रिलिंग, उच्च क्षमता वाले ड्रिलशिप, समुद्र तल पर उत्पादन प्रणाली (Subsea Production System), फ्लोटिंग प्रोडक्शन प्लेटफॉर्म और उन्नत सिस्मिक इमेजिंग जैसी तकनीकों में भारत अभी भी काफी हद तक विदेशी कंपनियों पर निर्भर है। इन तकनीकों का स्वदेशीकरण समय और बड़े निवेश की मांग करता है।

पर्यावरणीय दृष्टि से भी यह परियोजना बेहद संवेदनशील है। समुद्री जैव विविधता, प्रवाल भित्तियों, मत्स्य संसाधनों और तटीय पारिस्थितिकी पर संभावित प्रभावों का वैज्ञानिक आकलन आवश्यक होगा। किसी भी प्रकार का तेल रिसाव (Oil Spill) समुद्री पर्यावरण और तटीय अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों, कठोर पर्यावरणीय निगरानी और आपदा प्रतिक्रिया तंत्र को समानांतर रूप से मजबूत करना इस योजना की सफलता की अनिवार्य शर्त होगी।

समुद्री संसाधनों के दोहन में पीछे
भारत के पास लगभग 20 लाख वर्ग किलोमीटर का ऑफशोर सेडिमेंटरी बेसिन क्षेत्र और 7,500 किलोमीटर लंबी तटरेखा के बावजूद भारत के विशाल समुद्री क्षेत्र के बड़े हिस्‍से में अब भी पूरी तरह संसाधनों को एक्‍सप्‍लोर नहीं किया गया है।

'समुद्र मंथन' से क्‍या-क्या बदल सकता है?

यदि योजना अपने निर्धारित लक्ष्यों के अनुरूप आगे बढ़ती है, तो आने वाले वर्षों में भारत के ऊर्जा क्षेत्र में कई बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। प्रमुख संभावनाएं इस प्रकार हैं -

  • घरेलू तेल-गैस उत्पादन में उछाल - सरकार का लक्ष्य 2030-31 तक उत्पादन को 62 MMTOE से बढ़ाकर 80 MMTOE तक पहुंचाना है। इससे देश की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा घरेलू स्रोतों से पूरा किया जा सकेगा।

  • कच्चे तेल के आयात बिल में कमी - उत्पादन बढ़ने से हर वर्ष लगभग एक लाख करोड़ रुपये तक के आयात व्यय में कमी आने का अनुमान है। इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी और चालू खाते के घाटे पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

  • ऊर्जा सुरक्षा होगी मजबूत - पश्चिम एशिया या अन्य क्षेत्रों में युद्ध, प्रतिबंध या आपूर्ति बाधित होने जैसी परिस्थितियों का असर भारत पर अपेक्षाकृत कम पड़ेगा। ऊर्जा आपूर्ति अधिक सुरक्षित और स्थिर बन सकेगी।

  • डीपवाटर एक्‍सप्‍लोरेशन में आत्मनिर्भरता - योजना के तहत विकसित होने वाला तकनीकी आधार भविष्य में भारत को गहरे समुद्र में खोज और उत्पादन की अत्याधुनिक तकनीकों में अधिक सक्षम बनाएगा तथा विदेशी तकनीक पर निर्भरता धीरे-धीरे घटेगी।

  • भू-वैज्ञानिक जानकारी का होगा विस्तार - व्यापक सिस्मिक सर्वे और खोज कार्यों से भारत के समुद्री बेसिनों की भूगर्भीय संरचना के बारे में नई जानकारी मिलेगी, जिसका लाभ भविष्य की खोज परियोजनाओं को भी मिलेगा।

  • निजी एवं वैश्विक निवेश को मिलेगा बढ़ावा - ड्रिलिंग लागत में सरकारी सहायता मिलने से घरेलू और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा कंपनियों के लिए जोखिम कम होगा, जिससे नए निवेश और तकनीकी सहयोग की संभावनाएं बढ़ेंगी।

  • पूर्वी और पश्चिमी तट का औद्योगिक विकास - गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, ओडिशा और अंडमान-निकोबार जैसे समुद्री क्षेत्रों में ऊर्जा आधारित औद्योगिक गतिविधियां तेज हो सकती हैं।

  • प्राकृतिक गैस आधारित उद्योगों को मिलेगा बल - यदि नए गैस भंडार मिलते हैं, तो सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन, उर्वरक उद्योग, बिजली उत्पादन और स्वच्छ ईंधन के उपयोग को गति मिलेगी। इससे ऊर्जा मिश्रण में प्राकृतिक गैस की हिस्सेदारी बढ़ाने के लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिलेगी।

  • ब्लू इकॉनमी को मिलेगा नया आधार - यह मिशन केवल तेल और गैस तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि समुद्री संसाधनों के वैज्ञानिक उपयोग, समुद्री अवसंरचना और ब्लू इकॉनमी के विकास को भी नई दिशा दे सकता है।

  • 'मेक इन इंडिया' को मिलेगी नई रफ्तार - ऑयल एंड गैस मैन्युफैक्चरिंग एंड सर्विसेज जोन विकसित होने से ड्रिलिंग उपकरण, समुद्री इंजीनियरिंग, पाइपलाइन, सब-सी सिस्टम और अन्य उपकरणों के घरेलू निर्माण को बढ़ावा मिलेगा।

  • रोजगार और नए उद्योगों का विकास - समुद्री इंजीनियरिंग, जहाज निर्माण, लॉजिस्टिक्स, पोर्ट सेवाओं, उपकरण निर्माण, सर्वेक्षण, ड्रिलिंग और रखरखाव जैसे क्षेत्रों में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।

निष्कर्ष : ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर एक बड़ा कदम

'समुद्र मंथन' भारत के ऊर्जा क्षेत्र की अब तक की सबसे महत्वाकांक्षी अपतटीय (ऑफशोर) खोज अभियानों में से एक है। इसका उद्देश्य केवल नए तेल और गैस भंडार तलाशना नहीं, बल्कि देश को ऊर्जा के मामले में अधिक सुरक्षित, आत्मनिर्भर और वैश्विक अनिश्चितताओं से अपेक्षाकृत कम प्रभावित बनाना है। हालांकि गहरे समुद्र में खोज की तकनीकी जटिलताएं, भारी निवेश, पर्यावरणीय जोखिम और व्यावसायिक अनिश्चितताएं इस मिशन को चुनौतीपूर्ण बनाती हैं, फिर भी सरकार द्वारा जोखिम साझेदारी, आधुनिक तकनीक और अवसंरचना विकास पर दिया जा रहा जोर इसकी सफलता की संभावनाओं को मजबूत करता है। यदि योजना निर्धारित लक्ष्यों के अनुरूप आगे बढ़ती है और नए वाणिज्यिक भंडार मिलते हैं, तो आने वाले वर्षों में भारत न केवल अपना आयात बिल कम करने में सफल हो सकता है, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, औद्योगिक विकास और ब्लू इकॉनमी के क्षेत्र में भी एक नई छलांग लगाने की स्थिति में पहुंच सकता है। 'समुद्र मंथन' ऐसे समय में शुरू हुआ है, जब ऊर्जा आत्मनिर्भरता किसी भी उभरती हुई अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी रणनीतिक जरूरत बन चुकी है।

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