भारत में कहां-कहां भूजल में है आर्सेनिक का खतरा? देखें 221 जिलों की सूची

भारत में कहां-कहां भूजल में है आर्सेनिक का खतरा? देखें 221 जिलों की सूची

भारत के 25 राज्यों के 221 जिलों के भूजल में आर्सेनिक की मौजूदगी दर्ज की गई है। जानिए किन इलाकों में खतरा अधिक है, इसका स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ता है और सुरक्षित पेयजल के लिए क्या सावधानियां अपनानी चाहिए।
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जीवन जीने के लिए पानी अत्यंत आवश्यक है और पानी जीवन का आधार है, लेकिन जब यही पानी जहरीले तत्वों से दूषित हो जाए तो यह गंभीर स्वास्थ्य संकट बन जाता है। आर्सेनिक ऐसा ही एक प्राकृतिक विषैला तत्व है, जो भारत सहित दुनिया के कई देशों में भूजल में पाया जाता है। लंबे समय तक आर्सेनिक युक्त पानी पीने से त्वचा रोग, कैंसर, हृदय रोग और तंत्रिका तंत्र से जुड़ी कई गंभीर बीमारियां हो सकती है।

भारत सरकार और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) समय-समय पर आर्सेनिक प्रदूषण को लेकर चेतावनी जारी करते रहे है। देश के कई राज्यों में भूजल में आर्सेनिक की मात्रा सुरक्षित सीमा से अधिक पाई गई है, जिसके कारण लाखों लोग प्रभावित होने की आशंका है। 

आर्सेनिक क्या होता है?

आर्सेनिक एक प्राकृतिक रासायनिक तत्व है, जिसका रासायनिक संकेत As तथा परमाणु क्रमांक 33 है। यह पृथ्वी की चट्टानों, मिट्टी और खनिजों में प्राकृतिक रूप से मौजूद रहता है। जब चट्टानों का धीरे-धीरे अपक्षय होता है, तब आर्सेनिक भूजल में घुल सकता है। यही कारण है कि कई क्षेत्रों के ट्यूबवेल और हैंडपंप के पानी में इसकी मात्रा अधिक मिलती है। 

आर्सेनिक का बनना और पानी में पहुंचना 

आर्सेनिक स्वयं नहीं बनता बल्कि प्राकृतिक और मानवजनित कारणों से पानी में पहुंचता है। जिसके दो निम्न कारण है - 

  • प्राकृतिक कारण - चट्टानों और खनिजों का अपक्षय, ज्वालामुखीय अवसाद, भूगर्भीय रासायनिक प्रक्रियाएं, नदी के मैदानी क्षेत्रों में जमा तलछट भारत के गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदानों में भूजल में आर्सेनिक की अधिकता का मुख्य कारण प्राकृतिक भूगर्भीय प्रक्रियाएं मानी जाती है।

  • मानवजनित कारण - औद्योगिक अपशिष्ट, खनन गतिविधियां, आर्सेनिक युक्त कीटनाशकों का उपयोग, रासायनिक उर्वरक, कोयले का दहन, औद्योगिक कचरे का अनुचित निपटान आदि है। इन गतिविधियों से भी मिट्टी और भूजल में आर्सेनिक की मात्रा बढ़ सकती है। 

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आर्सेनिक पानी में क्यों घुल जाता है?

भूजल चट्टानों की विभिन्न परतों से होकर गुजरता है। यदि इन परतों में आर्सेनिक युक्त खनिज मौजूद हों तो रासायनिक क्रियाओं के कारण आर्सेनिक पानी में घुल जाता है। भूजल का अत्यधिक दोहन भी भू-रासायनिक संतुलन बदल सकता है, जिससे कुछ क्षेत्रों में आर्सेनिक घुलने की संभावना बढ़ जाती है।

आर्सेनिक की सुरक्षित सीमा में स्वीकार्य सीमा (Acceptable Limit) 0.01 मिलीग्राम/लीटर तथा वैकल्पिक स्रोत न होने पर (Permissible Limit) 0.05 मिलीग्राम/लीटर है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) भी 0.01 मिलीग्राम प्रति लीटर को सुरक्षित मानक मानता है। यह मुख्य रूप से  दूषित पानी पीने से, दूषित पानी से बना भोजन खाने से, कुछ मामलों में दूषित फसलों के माध्यम से,हालांकि सबसे बड़ा स्रोत पीने का पानी ही माना जाता है। 

क्या मानवीय गतिविधियों से फैलता है आर्सेनिक?

आर्सेनिक एक प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला रासायनिक तत्व है, जो चट्टानों और खनिजों के अपक्षय के दौरान मिट्टी और भूजल में पहुंच जाता है। वर्षा, बहाव और रिसाव जैसी प्राकृतिक प्रक्रियाएं इसे जल स्रोतों तक ले जाती है।

हालांकि केवल प्राकृतिक कारण ही इसके लिए जिम्मेदार नहीं है। कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्रों से निकलने वाला धुआं, वनों में लगने वाली आग, ज्वालामुखीय गतिविधियां तथा औद्योगिक प्रदूषण भी वातावरण में आर्सेनिक की मात्रा बढ़ाते है। इसके बाद यह विभिन्न माध्यमों से मिट्टी और भूजल में मिल जाता है। विशेष रूप से सल्फाइड खनिजों और ज्वालामुखीय चट्टानों से बने अवसादी क्षेत्रों के भूजल में इसकी सांद्रता सामान्य से अधिक पाई जाती है।

लंबे समय तक आर्सेनिक युक्त पानी पीने से क्या होता है?

विश्व स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति लंबे समय तक आर्सेनिक युक्त पानी का सेवन करता है, तो उसे आर्सेनिकोसिस नामक बीमारी हो सकती है। यह बीमारी धीरे-धीरे शरीर को प्रभावित करती है और त्वचा, फेफड़े, मूत्राशय तथा गुर्दे के कैंसर का जोखिम बढ़ा देती है।

इसके अलावा त्वचा का रंग बदलना, हथेलियों और पैरों के तलवों पर कठोर चकत्ते, रक्त वाहिकाओं की क्षति और पैरों में रक्त संचार संबंधी समस्याएं भी देखने को मिलती है। र्सेनिक युक्त पानी का लंबे समय तक सेवन मधुमेह, उच्च रक्तचाप तथा प्रजनन संबंधी विकारों से भी जुड़ा हो सकता है।

आर्सेनिक की अत्यधिक मात्रा वाला पानी एक साथ पी लिया जाए तो यह तीव्र विषाक्तता का कारण बन सकता है। इससे उल्टी, दस्त, हृदय एवं तंत्रिका तंत्र की गड़बड़ी और गंभीर मामलों में मृत्यु तक हो सकती है। ऐसे मरीजों में अस्थि मज्जा पर असर, यकृत का बढ़ना, नसों की क्षति और मस्तिष्क संबंधी समस्याएं भी देखी गई है।

WHO ने समय-समय पर घटाई सुरक्षित सीमा

विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO ने वर्ष 1958 से ही पेयजल में आर्सेनिक की मौजूदगी को स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा माना है। जहां आर्सेनिक प्रदूषण को पूरी तरह नियंत्रित करना संभव नहीं है, वहां जल उपचार प्रक्रियाओं का सही ढंग से संचालन और नियमित निगरानी बेहद जरूरी होती है। कोएगुलेशन जैसी पारंपरिक जल शोधन तकनीकों की मदद से पानी में आर्सेनिक की सांद्रता को घटाकर लगभग 10 माइक्रोग्राम प्रति लीटर (10 µg/L) तक लाया जा सकता है, जिससे पेयजल अधिक सुरक्षित बनाया जा सके। 

कही 50 माइक्रोग्राम प्रति लीटर से कम सांद्रता वाले पानी के लंबे समय तक सेवन से भी त्वचा रोग और फेफड़े एवं मूत्राशय के कैंसर का खतरा बढ़ने के संकेत मिले है।

भारत के कौन-कौन से राज्यों के किन जिलों में आर्सेनिक युक्त पानी पाया गया?

भारत में भूजल में आर्सेनिक पाये जाने की समस्या पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, असम, मणिपुर और छत्तीसगढ़ में दर्ज की गई है। इन राज्यों के कई जिलों में भूजल में आर्सेनिक की मात्रा निर्धारित मानकों से अधिक पाई गई है, जिसके कारण लाखों लोगों की पेयजल सुरक्षा चिंता का  विषय बनी हुई है।

केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) के 2022 के रिपोर्ट के अनुसार भारत में भूजल में आर्सेनिक प्रदूषण 25 राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों के 221 जिलों के कुछ हिस्सों में पाया गया है, जहां आर्सेनिक की मात्रा भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) की निर्धारित सीमा 0.01 मि.ग्रा./लीटर से अधिक दर्ज की गई है।

ग्रामीण पेयजल स्रोतों की निगरानी के तहत 1 अप्रैल 2022 तक देश में 800 आर्सेनिक-प्रभावित बस्तियां चिन्हित थीं, जो 7 दिसंबर 2022 तक घटकर 761 रह गईं। इनमें से 559 बस्तियों में अंतरिम राहत के रूप में कम्युनिटी वाटर प्यूरिफिकेशन प्लांट (CWPP) स्थापित किए गए है। सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में पंजाब, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल शामिल है।

पंजाब का भूजल आर्सेनिक और फ्लोराइड से दूषित होने की वजह से इस राज्य में लंबे समय से पेयजल एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। वहीं बिहार में भूजल में आर्सेनिक और मैंगनीज़ संदूषण एक राजनीतिक मुद्दा बन गया है, जिसका हल अब तक नहीं मिला।

लम्बे समय के समाधान के लिए जल जीवन मिशन के अंतर्गत गुणवत्ता-प्रभावित बस्तियों को प्राथमिकता देते हुए सुरक्षित नल जल उपलब्ध कराया जा रहा है। साथ ही राष्ट्रीय एक्वीफर मैपिंग कार्यक्रम (NAQUIM) के तहत अब तक 513 आर्सेनिक मुक्त गहरे एक्वीफर कुओं का निर्माण किया गया है, जिनमें 40 बिहार, 188 पश्चिम बंगाल और 285 उत्तर प्रदेश में स्थापित किए गए है। 

भारत में भूजल में आर्सेनिक संदूषण से आंशिक रूप से प्रभावित जिलों का राज्यवार विवरण (तालिका का स्रोत पीआईबी है) :

आर्सेनिक से बचाव के उपाय

WHO के अनुसार आर्सेनिक प्रदूषण से बचाव के लिए सबसे पहले प्रदूषित जल स्रोतों की पहचान करना आवश्यक है। जहां संभव हो, वहां कम प्रदूषित या सुरक्षित जल स्रोतों का उपयोग किया जाना चाहिए। आर्सेनिक युक्त पानी को उपयुक्त जल शोधन तकनीकों जैसे कोएगुलेशन और अन्य उपचार विधियों के माध्यम से शुद्ध कर उपयोग में लाया जा सकता है।

इसके साथ ही वर्षा जल संचयन और जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन जैसी तकनीकों को अपनाने से न केवल जल संकट कम किया जा सकता है, बल्कि लोगों को अपेक्षाकृत सुरक्षित और आर्सेनिक मुक्त पेयजल उपलब्ध कराने में भी मदद मिल सकती है।

इन उपायों में केवल जांचा हुआ सुरक्षित पानी पिएं। संदिग्ध हैंडपंप का पानी जांच के बिना उपयोग न करे। वर्षा जल संचयन अपनाएं। सामुदायिक जल शोधन प्रणाली का उपयोग करें। भूजल की नियमित जांच कराएं। सरकार द्वारा चिह्नित सुरक्षित जल स्रोतों का उपयोग करें। जल गुणवत्ता के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाने की जरूरता है।

जनजागरूकता सबसे प्रभावी तरीका

WHO के अनुसार आर्सेनिक प्रदूषण केवल वैज्ञानिक या तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य का गंभीर मुद्दा है। नियमित जल गुणवत्ता परीक्षण, सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता, आधुनिक जल शोधन तकनीकों का उपयोग तथा लोगों में जागरूकता बढ़ाकर इस खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में आर्सेनिक प्रदूषण लाखों लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है।

आर्सेनिक से होने वाली बीमारियां

लंबे समय तक आर्सेनिक युक्त पानी पीने पर निम्न समस्याएं हो सकती हैं - 

  • त्वचा संबंधी रोग - इसके अंतर्गत त्वचा पर काले धब्बे, हथेलियों और तलवों की त्वचा मोटी होना, त्वचा का रंग बदलना शामिल है।

  • कैंसर - इसमें  त्वचा कैंसर, फेफड़ों का कैंसर, मूत्राशय का कैंसर,किडनी कैंसर

  • अन्य स्वास्थ्य समस्याएं -  हृदय रोग, मधुमेह का बढ़ा जोखिम, उच्च रक्तचाप, तंत्रिका तंत्र की समस्या, प्रजनन संबंधी समस्याएं है। इन लक्षणों को सामूहिक रूप से आर्सेनिकोसिस कहा जाता है। 

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आर्सेनिक की पहचान कैसे करें?

आर्सेनिक का कोई रंग नहीं होता, कोई गंध नहीं होती, कोई स्वाद नहीं होता है। इसलिए इसे देखकर या चखकर पहचानना संभव नही है। पहचान के लिए प्रयोगशाला परीक्षण, जल गुणवत्ता परीक्षण, प्रमाणित आर्सेनिक टेस्ट किट आवश्यक है। 

सरकार द्वारा उठायें जा रहे कदम 

भारत सरकार के जल शक्ति मंत्रालय तथा केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) द्वारा निम्न कदम उठाए जा रहे है -

  • भूजल गुणवत्ता की नियमित निगरानी

  • प्रभावित क्षेत्रों की पहचान

  • जल जीवन मिशन के माध्यम से सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना

  • वैकल्पिक जल स्रोत विकसित करना

  • सामुदायिक जल शोधन संयंत्र स्थापित करना

  • वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देना, शामिल है। 

आर्सेनिक हटाने की तकनीकें

  • आयरन आधारित फिल्ट्रेशन

  • एडसॉर्प्शन तकनीक

  • रिवर्स ऑस्मोसिस (RO)

  • कोएगुलेशन एवं फिल्ट्रेशन

  • सामुदायिक आर्सेनिक रिमूवल प्लांट

CGWB के अनुसार, अल्पकालिक समाधान के रूप में जल शोधन तकनीकों का उपयोग तथा दीर्घकालिक समाधान के रूप में सुरक्षित गहरे जलभृत, सतही जल स्रोत और वर्षा जल संचयन प्रभावी उपाय है। 

आर्सेनिक प्रदूषण रंग, गंध और स्वाद रहित होता है, इसलिए केवल जल परीक्षण से ही इसकी पहचान संभव है। सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता, नियमित जल गुणवत्ता परीक्षण, वैज्ञानिक भूजल प्रबंधन और जनजागरूकता के माध्यम से इस समस्या के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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