सोनभद्र: सोन नदी में रेत खनन से खतरे में डॉल्फिन, कछुए और मगरमच्छ

सोनभद्र: सोन नदी में रेत खनन से खतरे में डॉल्फिन, कछुए और मगरमच्छ

सोनभद्र की सोन नदी में बढ़ते रेत खनन से डॉल्फिन, कछुआ और मगरमच्छ जैसे महत्वपूर्ण जलीय जीव प्रभावित हो रहे हैं। पढ़िए पूरी रिपोर्ट।
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  • सोनभद्र विंध्‍य क्षेत्र का वह इलाका है जहां कछुओं की 7, मगरमच्छ की 2 और पानी पर निर्भर चिड़ि‍यों की 82 प्रजातियां यहां पायी जाती हैं। 

  • नदी पर बने बांध के कारण इन जलीय जीवों का घर धीरे-धीरे नष्‍ट हो रहा है। पूरा ईकोसिस्टम बिगड़ रहा है। 

  •  उत्तर प्रदेश और बिहार में सोन नदी के मिडि‍ल और लोअर स्‍ट्रेच में बेलगाम रेत खनन की वजह जलीय जीवों का प्रजनन क्षेत्र नष्‍ट हो रहा है। 


यूपी के सोनभद्र ज‍िले में नद‍ियों का अस्‍त‍ित्‍व खतरे में आ चुका है। देश का पावर कैपिटल कहे जाने वाले सोनभद्र-सिंगरौली में जहां औद्योगिक अपशिष्टों की वजह से वायु, मृदा और जल प्रदूषण खतरनाक स्तर तक जा पहुंचा है, वहीं ज‍िले की लाइफलाइन कही जाने वाली सोन, रेणुका समेत कई नदियों का जीवन समाप्त होता जा रहा है। नदियों में जमा होती कोयले की राख और अवैध खनन की वजह से मगरमच्छ, गंगा डॉल्फ‍िन और कछुओं समेत कई वन्यजीवों के घर नष्‍ट हो रहे हैं। इनका जीवन खतरे में है। 

जगह-जगह रेत खनन और अपशिष्‍ट के चलते नदियों के बांधे जाने से स्थिति और खराब हो गई है। इस मसले को लेकर कई बार आवाज उठी। अदालत में भी मामला पहुंचा लेकिन नदियों के बदलते स्वरूप और बिगड़ते जलीय पर्यावरण पर रोक नहीं लग पाई। 

<div class="paragraphs"><p>सोन नदी में रेत खनन&nbsp;</p></div>

सोन नदी में रेत खनन 

फोटो - बृजेंद्र दुबे

दरअसल सोनभद्र से होकर बहने वाली सोन नदी आज अपने ऐतिहासिक स्वरूप और अस्तित्व के सबसे बड़े संकट का सामना कर रही है। अनियंत्रित रेत खनन की गतिविधियों तथा विश्वव्यापी जलवायु परिवर्तन के चलते नदी की चौड़ाई घट गई है, जैव विविधता चरमरा गई है। 

सोन नदी का इतिहास भारतीय उपमहाद्वीप में मानव सभ्यता जितना ही पुराना है। यह नदी धार्मिक और ऐतिहासिक ग्रंथों में सोनभद्र शिला और हिरण्यवाह के रूप में प्रतिष्ठित है, जिसका नामकरण संभवतः इसके तट पर पाई जाने वाली चमकीली, पीली सोने की तरह पाई जाने वाली रेत के कारण हुआ। सोन नदी मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले में अमरकंटक पहाड़ी के पास सोनकुंड से निकलती है, जो नर्मदा नदी के उद्गम स्थल के पूर्व में स्थित है। सोन नदी छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, झारखंड और बिहार राज्यों से होकर बहती है, और पटना के समीप गंगा नदी में समाहित हो जाती है। भूवैज्ञानिक रूप से, इसकी निचली घाटी को नर्मदा-सोन भ्रंश घाटी का एक महत्वपूर्ण विस्तार माना जाता है।

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सिंचाई पर असर, मछलियां भी घटीं

सोनभद्र क्षेत्र की कृषि अर्थव्यवस्था तथा मछली पकड़ने पर निर्भर आजीविका पूरी तरह से खतरे में पड़ गई है। सोन नदी किनारे बसे स्थानीय निवासियों के अनुभव इस बात की पुष्टि करते हैं कि अतीत में सोन नदी अपने विशाल आकार और जल की प्रचुरता के लिए प्रसिद्ध थी। सोनभद्र के चोपन में स्थित सोन नदी के किनारे स्थित गाँवो के किसान रामबली सिंह (बदला हुआ नाम) बताते हैं कि पहले सोन नदी की चौड़ाई 5 किलोमीटर तक फैली होती थी और यह एक समृद्ध जलीय आवास थी, जहाँ डॉल्फिन, कछुआ , मगरमच्छ जैसे महत्वपूर्ण और  स्थानीय मछलियों की प्रजातियाँ बहुतायत में पाई जाती थीं। लेकिन आज, सोन नदी के जल विज्ञान और स्वरूप में विनाशकारी बदलाव आए हैं, जिसके लिए मुख्य रुप से मानवजनित गतिविधियाँ जिम्मेदार है। 

<div class="paragraphs"><p>सोन नदी में रेत खनन&nbsp;</p></div>

सोन नदी में रेत खनन 

फोटो - बृजेंद्र दुबे

स्थानीय किसानों और विशेषज्ञों का मानना है कि अवैध बालू खनन इस क्षेत्र के पर्यावरणीय पतन में एक प्रमुख भूमिका निभा रहा है। सोन में पाये जाने वाली पीली रेत के खनन के कारण नदी तल का अत्यधिक गहरा होना तटवर्ती क्षेत्रों में भूजल स्तर को अप्रत्याशित रूप से नीचे खींच रहा है।

सोन नदी समेत विंध्य क्षेत्र की अन्य नदियों में दिख रहे बदलाव 

'विंध्य ईकोलोजी एंड नेचुरल हिस्ट्री फाउंडेशन के संस्थापक देबादित्यो सिन्हा कहते हैं, “यदि विंध्य क्षेत्र की नदियों की स्थिति पर नजर डालें, तो पिछले 10–20 वर्षों में इनमें उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिले हैं। कभी ये नदियाँ स्वतंत्र रूप से बहने वाली (फ्री-फ्लोइंग) नदियाँ थीं, जिनकी धारा पर किसी प्रकार का बड़ा अवरोध नहीं था। लेकिन अब पूरे क्षेत्र में तेजी से बाँधों का निर्माण हो रहा है। पहले बड़े बाँधों का निर्माण मुख्य रूप से हिमालयी क्षेत्रों तक सीमित था, जबकि अब विंध्य क्षेत्र भी इस विकास की नई प्रयोगशाला बनता जा रहा है। सोन नदी पर कई बाँध पहले से मौजूद हैं और उसकी सहायक नदियों पर भी अनेक परियोजनाएँ प्रस्तावित या निर्माणाधीन हैं।” 

<div class="paragraphs"><p>देबादित्यो सिन्हा&nbsp;</p></div>

देबादित्यो सिन्हा 

फोटो - बृजेंद्र दुबे

देबादित्यो सिन्हा ने आगे बताया कि ये सहायक नदियाँ केवल जैव विविधता की दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं थीं, बल्कि स्थानीय समुदायों की आजीविका का भी प्रमुख आधार रही हैं। इसके साथ ही पंप्ड स्टोरेज पावर प्रोजेक्ट्स (PSP) एक नई और गंभीर चुनौती के रूप में उभर रहे हैं। इन परियोजनाओं में कृत्रिम जलाशयों के माध्यम से पानी को ऊंचाई पर संग्रहित किया जाता है और आवश्यकता पड़ने पर उसे नीचे छोड़कर बिजली उत्पन्न की जाती है।

उन्होंने कहा कि सोनभद्र, मिर्ज़ापुर और आसपास के इलाकों में इस तरह की कई बड़ी परियोजनाएँ प्रस्तावित हैं या उन पर काम शुरू हो चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन परियोजनाओं का सीधा प्रभाव नदियों की प्राकृतिक प्रवाह व्यवस्था, जल भंडारण क्षमता और पूरे नदी पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ेगा, जिससे क्षेत्र की पर्यावरणीय और सामाजिक संरचना दोनों प्रभावित हो सकती हैं।

खतरे में मगरमच्छ, डॉल्फ‍िन और कछुए 

विंध्‍य क्षेत्र में सोन नदी और गंगा नदी जहां से निकलती है वहां पर मगरमच्छों और कछुओं के प्रजनन स्थल हैं। यहां तक कई बार यहां डॉल्फिन भी दिखाई देती हैं। लेकिन रेत खनन के चलते इन क्षेत्रों में कछुओं व मगरमच्‍छों के प्रजनन स्थल टूट रहे हैं।   

मगरमच्छ आमतौर पर नदी, झील, तालाब, दलदली क्षेत्रों के किनारे अंडे देती है। मादा मगरमच्छ अंडे देने के लिए सुरक्षित और अपेक्षाकृत ऊँचे स्थान का चयन करती है ताकि अंडे पानी में डूब न जाएं। भारत में पाए जाने वाले मगर प्रायः दो तरह से घोंसला बनाते हैं - रेतीले तटों पर गड्ढा खोदकर अंडे देती हैं। कुछ स्थानों पर मिट्टी, पत्तियों और वनस्पतियों का टीला बनाकर उसमें अंडे रखती हैं। ये आमतौर पर 20 से 40 अंडे देती है और कई सप्ताह तक घोंसले के आसपास रहकर उनकी रक्षा करती हैं। अंडों के ऊष्मायन (इनक्यूबेशन) की अवधि लगभग 55 से 90 दिन होती है।

विंध्‍य क्षेत्र के लोगों का मगरमच्छों के साथ अनोखा संबंध 

'विंध्य ईकोलोजी एंड नेचुरल हिस्ट्री फाउंडेशन के संस्थापक देबादित्यो सिन्हा ने अपने करियर का अधिकांश समय विंध्‍य क्षेत्र के जंगलों में बिताया है। वो बताते हैं कि मिर्जापुर-सोनभद्र में पाये जाने वाले मगरमच्छों का यहां के लोगों के साथ अनोखा संबंध है। यहां के लोगों में जानवरों के प्रति अलग ही प्रेम है। यहां की नदियों में मगरमच्छों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण हेबिटेट है। नदी के साथ-साथ मिर्जापुर-सोनभद्र के हर गॉंव में तालाबों में आपको मगरमच्छ मिल जाएंगे। 

देबादित्यो ने आगे कहा, “मैंने खुद देखा है यहां बच्चे तालाब के किनारे खेलते रहते हैं और वहीं पर मगरमच्छ आराम करते रहते हैं। लोग नदी में मछली पकड़ रहे हैं मगरमच्छ बैठे हैं। 

<div class="paragraphs"><p>सोन नदी&nbsp;</p></div>

सोन नदी 

फोटो - बृजेंद्र दुबे

कछुओं की प्रजातियां जो सोन नदी में पायी जाती हैं   

वाइल्‍ड लाइफ इंस्टिट्यूट की एक रिपोर्ट के अनुसार सोन नदी में कछुओं की 7 प्रजातियां पायी जाती हैं। मगरमच्छ की 2 और पानी पर निर्भर चिड़ि‍यों की 82 प्रजातियां यहां पायी जाती हैं। इनके अलावा मछलियों की 109 प्रजातियां भी सोन नदी के अलग-अलग हिस्सों में पायी जाती हैं। 

कछुओं की जो प्रजातियां सोन नदी में पायी जाती हैं उनके नाम हैं - 

  1. रेड क्राउंड रूफ्ड टर्टल - Red-crowned roofed turtle (Batagur kachuga)

  2. थ्री स्‍ट्रप्डि रूफ्ड टर्टल - three-striped roofed turtle (Batagur dhongoka)

  3. क्राउंड रिवर टर्टल - crowned river turtle (Hardella thurjii)

  4. इंडियन टेंट टर्टल - Indian tent turtle (Pangshura tentoria)

  5. इंडिया नैरो हेड सॉफ्टशेल टर्टल - Indian narrow-headed softshell turtle (Chitra indica)

  6. गंगा साफ्टशेल टर्टल - Ganges softshell turtle (Nilssonia gangetica)

  7. इंडियन फ्लैपशेल टर्टल - Indian flapshell turtle (Lissemys punctata)

खनन की वजह से प्रभावित हो रहा वन्यजीवों का हैबिटेट 

नमामी गंगे परियोजना के संयुक्त तत्‍वावधान में तैयार की गई वाइल्‍ड लाइफ इंस्टिट्यूट में सोन नदी के वातावरण में हो रहे परिवर्तन के तीन स्‍पष्‍ट कारण दर्शाए गए हैं-    

  1. अपर ज़ोन में घट्टन नाला, नरगधा नाला, टंकी नाला, गैबुध नाला और बैघा नाला से आने वाला सीवेज का पानी सोन नदी के ईकोसिस्‍टम को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। 

  2. बनसागर बांध और इंद्रापुरी बैराज से पानी को भारी मात्रा में बाहर निकाला जा रहा है इसकी वजह से नदी का प्राकृतिक डिस्‍चार्ज कम हो रहा है और जल स्तर कम हो रहा है। इन बांधों की वजह से मगरमच्छ व कछुओं के घरों में पानी की मात्रा कम हो रही है। और धीरे-धीरे वन्यजीवों के अनुकूल हैबिटेट वाली जगह सिकुड़ रही है।  

  3. उत्तर प्रदेश और बिहार में सोन नदी के मिडि‍ल और लोअर स्‍ट्रेच में बेलगाम रेत खनन की वजह जलीय जीवों का प्रजनन क्षेत्र नष्‍ट हो रहा है। 

कुल मिलाकर अगर इन जलीय जीवों को बचाना है तो नदी किनारे अवैध खनन को रोकना बेहद जरूरी है। इसके अलावा नदियों में सीवर का पानी और फैक्ट्रियों का अपशिष्‍ट मिलने से पहले वाटर ट्रीटमेंट प्‍लांट से होकर गुज़रना चाहिए। ऐसे प्‍लांट जो सक्रिय हों और पानी को नदी में मिलने से पहले साफ कर सकें। अगर इन मामलों में ऐक्शन में और देर की गई तो ये मगरमच्छ भी अन्‍य तमाम प्रजातियों की तरह विलुप्त हो जाएंगे।

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