छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के ग्रामीण इलाकों में सैंड फिल्टर से 357 जल स्रोतों को रिचार्ज कर उनकी जल गुणवत्ता को बेहतर बनाने का कदम उठाया गया है।
फोटो : फेसबुक
छत्तीसगढ़ : धमतरी में सैंड फिल्टर से 357 जल स्रोतों की जल गुणवत्ता सुधार रहे ग्रामीण
वर्षा जल संचय (Rainwater Harvesting) को भूजल और जलस्रोतों के पुनर्भरण (Recharge) का सबसे प्रभावी और कारगर उपाय माना गया है। पर, बारिश के पानी को जलस्रोतों तक पहुंचाने में अगर सावधानी न बरती जाए, उसे साफ किए बिना ही झीलों, तालाबों, कुओं, या नलकूपों में डाल दिया जाए तो यह जल प्रदूषण का कारण बन सकता है। इसलिए वर्षा जल को सही तरीके से छान कर ही जलस्रोतों में डाला जाना चाहिए। इसकी एक बेहतरीन मिसाल आदिवासी बहुल छत्तीसगढ़ राज्य में देखने को मिली है।
छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में सस्ती और कारगर सैंड फिल्टर तकनीक के इस्तेमाल से वर्षा जल को साफ कर जल संरक्षण और भू-जल संवर्धन यानी ग्राउंड वाटर रिचार्ज को मजबूती देने के लिए एक बड़ा कदम उठाया गया है। यह काम मनरेगा की जगह लागू की गई वीबी-जी रामजी योजना के तहत किया जा रहा है। इस पहल के अंतर्गत जिले के आदिवासी बहुल इलाकों में बारिश के पानी से जलस्रोतों और भूजल को रिचार्ज करने के लिए 357 जल स्रोतों पर सैंड फिल्टर बनाए जा रहे हैं।
इस पहल का उद्देश्य केवल बारिश के पानी को जल स्रोतों तक पहुंचाना नहीं है, बल्कि उसके साथ आने वाली मिट्टी, गाद और कचरे को रोककर अपेक्षाकृत स्वच्छ पानी को जल स्रोतों में पहुंचाना भी है। इस तरह वर्षा जल का बेहतर इस्तेमाल, जल स्रोतों की स्वच्छता और भू-जल पुनर्भरण तीनों को एक साथ बढ़ावा देने की कोशिश की जा रही है।
1.86 करोड़ रुपये में सुधरेगी 357 जल स्रोतों की हालत
करीब 1.86 करोड़ रुपये की लागत से होने वाले इस कार्य से वर्षा जल का बेहतर प्रबंधन, जल स्रोतों की स्वच्छता और भू-जल पुनर्भरण को बढ़ावा मिलेगा। शासन की ओर से स्वीकृत इस राशि से जिले के चार विकासखंडों के दर्जनों गांवों को लाभ मिलेगा। चारों ब्लॉक में इस योजना के तहत सैंड फिल्टर की स्थापना वाले जल स्रोतों का विवरण इस प्रकार है:
धमतरी – 78
कुरूद – 124
मगरलोड – 48
नगरी – 107
इस तरह कुल 357 जल स्रोतों को इस पहल से जोड़ा जा रहा है। जल स्रोतों के पास सैंड फिल्टर की स्थापना से बारिश का पानी प्राकृतिक ढंग से छनकर इन स्रोतों तक पहुंचेगा। सैंड फिल्टर वर्षा जल के साथ आने वाली मिट्टी, गाद, प्लास्टिक और अन्य कचरे को रोकने में मदद करेंगे, जिससे अपेक्षाकृत साफ पानी जल स्रोतों में पहुंच सकेगा।
इससे जल स्रोतों में गंदगी का प्रवेश कम होगा और साफ पानी के संग्रह के साथ जल की गुणवत्ता में सुधार आने की संभावना है। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में जहां स्थानीय जल स्रोत पेयजल और अन्य घरेलू जरूरतों के महत्वपूर्ण साधन हैं, वहां ऐसी संरचनाएं जल की स्वच्छता बनाए रखने में उपयोगी हो सकती हैं।
कैसे काम करती है सैंड फिल्टर तकनीक
सैंड फिल्टर की कार्यप्रणाली प्राकृतिक बालू या बलुई मिट्टी के जरिये पानी को छान कर साफ करने की होती है। वर्षा का पानी जब सैंड फिल्टर में पहुंचता है तो उसे पत्थर (बोल्डर) और बजरी व रेत की छानने वाली परतों से होकर नीचे जाने का रास्ता मिलता है। धीरे-धीरे इन परतों से गुजरने के दौरान मिट्टी, पानी में मौजूद गाद और दूसरे ठोस कण रुक जाते हैं। धीमी सैंड फिल्ट्रेशन में केवल भौतिक छनन ही नहीं होता, बल्कि रेत की ऊपरी सतह पर समय के साथ बनने वाली जैविक परत भी पानी में मौजूद कुछ सूक्ष्मजीवों और जैविक पदार्थों को हटाने में भूमिका निभाती है।
इस प्रक्रिया के बाद अपेक्षाकृत साफ पानी ही नीचे की ओर पहुंचता है, जिसे जल स्रोत या भू-जल पुनर्भरण के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। यानी फिल्टर का मूल काम बारिश के पानी को सीधे गंदगी और तलछट के साथ जल स्रोत में जाने से रोकना और पानी को छनकर आगे जाने देना है। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि सैंड फिल्टर रासायनिक प्रदूषण को दूर करने वाला पूर्ण जलशोधन संयंत्र नहीं है। इसलिए सैंड फिल्टर से पानी की सफाई के बावजूद उसकी गुणवत्ता और स्थानीय प्रदूषण के आधार पर अतिरिक्त उपचार की जरूरत हो सकती है।
2019 में जारी रिपोर्ट के अनुसार धमतरी जिले के कुछ इलाकों के ग्राउंड वाटर में फ्लोराइड की मात्रा 1.5 mg/l से अधिक पायी गई थी। वहीं नाइट्रेट की मात्रा 45 mg/l से और आयरन की मात्रा 1mg/l से अधिक थी। अभी भी कुछ इलाक़ों में इन तत्वों के पाए जाने की समस्या बनी हुई है। सैंड फिल्टरेशन इन तत्वों को पानी से हटाने में बहुत ज़्यादा कारगर नहीं है, इसलिए किसानों को समय-समय पर पानी के सैम्पल की जांच करानी चाहिए।
सैंड फिल्टर गुरुत्वाकर्षण के सहारे बिना किसी मोटर या बिजली के काम करते हुए पानी को प्राकृतिक ढंग से साफ करता है।
फोटो : फेसबुक
जल स्वच्छता का एक सस्ता और कारगर समाधान
सैंड फिल्ट्रेशन की सबसे बड़ी खासियत इसकी सरलता और सस्ती लागत है। इसमें पानी को छानने के लिए महंगे और जटिल उपकरणों की जगह रेत, बजरी, पाइप और चारकोल, कोयला जैसी स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। सैंड फिल्टर गुरुत्वाकर्षण के सहारे भी काम कर सकते हैं, इसलिए इसमें पानी की पंपिंग के लिए बिजली की जरूरत नहीं होती है। भारत के केंद्रीय भूजल बोर्ड ने भी धीमे सैंड फिल्टर को छोटे शहरों और गांवों के लिए उपयुक्त बताया है, जहां स्थानीय श्रम और सामग्री से इनका निर्माण किया जा सकता है।
यही वजह है कि ग्रामीण जल प्रबंधन में ऐसी तकनीक आर्थिक रूप से व्यावहारिक हो सकती है। एक बार संरचना तैयार होने के बाद इसका संचालन अपेक्षाकृत सरल रहता है और जरूरत के अनुसार फिल्टर की ऊपरी परत की सफाई या रखरखाव किया जा सकता है। हालांकि, इसकी लागत और प्रभावशीलता फिल्टर के डिजाइन, जल की मात्रा, जल स्रोत की स्थिति और स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करेगी। धमतरी में 357 जल स्रोतों पर इस तकनीक का इस्तेमाल इसी स्थानीय और अपेक्षाकृत सरल जल प्रबंधन मॉडल को बड़े पैमाने पर अपनाने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।
भू-जल स्तर बढ़ाने में मिलेगी मदद
सैंड फिल्टर के माध्यम से बारिश के पानी को सीधे बह जाने से रोककर उसे जमीन में समाहित होने का अवसर मिलेगा। वर्षा जल के इस तरह जमीन में पहुंचने से भू-जल पुनर्भरण को बढ़ावा मिल सकता है। इसका महत्व उन ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक है जहां वर्षा पर आधारित जल स्रोतों और भूजल पर लोगों की निर्भरता रहती है।
बारिश के पानी का स्थानीय स्तर पर संरक्षण होने से जल स्रोतों में पानी की उपलब्धता बनाए रखने में भी मदद मिल सकती है। लंबे समय में इससे भू-जल स्तर को बेहतर करने और गर्मी के महीनों में पेयजल संकट की आशंका कम करने में सहायता मिल सकती है। इस लिहाज से सैंड फिल्टर केवल जल को छानने की संरचना नहीं, बल्कि वर्षा जल के स्थानीय प्रबंधन और भू-जल संवर्धन का एक साधन भी बन सकते हैं।
कृषि और पर्यावरण को भी लाभ
स्वच्छ और अधिक टिकाऊ जल स्रोतों का लाभ केवल घरेलू जरूरतों तक सीमित नहीं रहेगा। ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता बेहतर होने से कृषि, पशुपालन और मत्स्य पालन जैसी गतिविधियों को अप्रत्यक्ष लाभ मिल सकता है। जल स्रोतों में पर्याप्त पानी रहने से ग्रामीण आजीविका से जुड़ी गतिविधियों को भी सहारा मिल सकता है।
जल स्रोतों का संरक्षण स्थानीय पारिस्थितिकी के लिए भी महत्वपूर्ण है। तालाबों, कुओं और अन्य जल स्रोतों में पानी की उपलब्धता पशु-पक्षियों के लिए भी उपयोगी होती है। ऐसे जल स्रोत स्थानीय जैव विविधता को सहारा देने के साथ आसपास के पर्यावरणीय संतुलन में भी भूमिका निभाते हैं। इसलिए वर्षा जल का संरक्षण और जल स्रोतों की गुणवत्ता में सुधार ग्रामीण जल प्रबंधन के साथ पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है।
जनभागीदारी से बनेगा जल संरक्षण अभियान
केवल सैंड फिल्टर का निर्माण कर देने से इस पहल में सफलता नहीं मिल सकती । पानी के फिल्टरेशन के लिए इन संरचनाओं का नियमित रखरखाव और जल स्रोतों के आसपास स्वच्छता बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। इस पहल के तहत निर्माण कार्य ग्राम पंचायतों के माध्यम से किए जाएंगे। जिला प्रशासन ने ग्रामीणों, जनप्रतिनिधियों और जल समितियों से सैंड फिल्टर के नियमित रखरखाव तथा जल स्रोतों की स्वच्छता सुनिश्चित करने की अपील की है।
ग्रामीण समुदाय की भागीदारी से यह पहल लंबे समय तक प्रभावी रह सकती है। यदि स्थानीय लोग जल स्रोतों में कचरा डालने से बचें, फिल्टर की सफाई और रखरखाव पर ध्यान दें तथा वर्षा जल को संरक्षित करने में सहयोग करें तो छोटी और कम लागत वाली संरचनाओं का प्रभाव काफी व्यापक हो सकता है। इस तरह जल संरक्षण को केवल सरकारी निर्माण कार्य के बजाय सामुदायिक अभियान का रूप दिया जा सकता है।
स्वच्छ जल के एसडीजी-6 लक्ष्य को मिलेगी मजबूती
धमतरी जिला प्रशासन की यह पहल जल संरक्षण और जल स्वच्छता को एक साथ आगे बढ़ाने का उदाहरण है। आम तौर पर वर्षा जल संचयन का जोर पानी को रोकने और भू-जल रिचार्ज करने पर रहता है, जबकि यहां जल स्रोतों तक पहुंचने वाले वर्षा जल को छानने और उसकी गुणवत्ता बेहतर रखने पर भी ध्यान दिया जा रहा है।
इस दृष्टि से सैंड फिल्टर आधारित यह पहल स्वच्छ जल, वर्षा जल प्रबंधन, भू-जल पुनर्भरण और ग्रामीण जनभागीदारी को एक ही मॉडल में जोड़ती है। यह संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों में शामिल एसडीजी-6 (Sustainable Development Goal 6) लक्ष्य को स्थानीय स्तर पर मजबूत करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। क्योंकि लोगों को यानी स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना इसका एक प्रमुख अंग है।
धमतरी के आदिवासी बहुल ग्रामीण क्षेत्रों में 357 जल स्रोतों को इस पहल से जोड़ना यह दिखाता है कि जल संकट से निपटने के लिए हमेशा बड़े और महंगे ढांचों की जरूरत नहीं होती। स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप कम लागत वाली तकनीक, वर्षा जल का बेहतर प्रबंधन और समुदाय की भागीदारी मिलकर जल सुरक्षा को मजबूत आधार दे सकती है।
तालाबों , पोखरों व झीलों जैसे पारंपरिक ल स्रोतों में गंदगी डाले जाने और सही रख-रखाव न होने से इनका पानी प्रदूषित हो जाता है। समय-समय पर इसे साफ किया जाना ज़रूरी है।
फोटो: विकिमीडिया कॉमन्स
क्या है संयुक्त राष्ट्र का एसडीजी-6 लक्ष्य ?
संयुक्त राष्ट्र का सतत विकास लक्ष्य यानी एसडीजी-6 2030 एजेंडा के 17 वैश्विक सतत विकास लक्ष्यों में से एक है। इसका आधिकारिक उद्देश्य है “सभी के लिए पानी और स्वच्छता की उपलब्धता तथा उनका सतत प्रबंधन सुनिश्चित करना।” इसमें केवल हर व्यक्ति तक सुरक्षित पेयजल पहुंचाना ही शामिल नहीं है, बल्कि स्वच्छता और स्वच्छता संबंधी सुविधाओं, जल की गुणवत्ता, जल के कुशल उपयोग, भूजल और अन्य जल संसाधनों के टिकाऊ प्रबंधन तथा जल से जुड़े पारिस्थितिकी तंत्रों के संरक्षण पर भी जोर दिया गया है।
एसडीजी-6 के तहत 2030 तक सुरक्षित और किफायती पेयजल की सार्वभौमिक पहुंच, पर्याप्त स्वच्छता और हाइजीन, जल प्रदूषण में कमी, जल के उपयोग की दक्षता बढ़ाना और जल संकट से निपटना जैसे लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं। इसके साथ ही नदियों, झीलों, आर्द्रभूमियों, जलभृतों और अन्य जल-संबंधी पारिस्थितिकी तंत्रों के संरक्षण तथा जल प्रबंधन में स्थानीय समुदायों की भागीदारी को भी लक्ष्य का हिस्सा बनाया गया है।
धमतरी में सैंड फिल्टर के जरिए वर्षा जल का बेहतर प्रबंधन, जल स्रोतों की गुणवत्ता सुधारने और भू-जल पुनर्भरण को बढ़ावा देने की कोशिश एसडीजी-6 के इन्हीं उद्देश्यों से जुड़ती है। खास तौर पर जल की गुणवत्ता सुधारना, वर्षा जल का संरक्षण, जल संसाधनों का टिकाऊ प्रबंधन और स्थानीय समुदाय की भागीदारी एसडीजी-6 के लक्ष्यों के अनुरूप हैं।
प्रगति के बावजूद भारत में एसडीजी-6 चुनौतीपूर्ण
संयुक्त राष्ट्र की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार 2024 में दुनिया की 74% आबादी को सुरक्षित रूप से प्रबंधित पेयजल उपलब्ध था, जबकि 58% आबादी को सुरक्षित रूप से प्रबंधित स्वच्छता सेवाएं और 80% को बुनियादी हाइजीन सुविधाएं उपलब्ध थीं। इसके बावजूद 2024 में करीब 2.1 अरब लोग सुरक्षित रूप से प्रबंधित पेयजल से और 3.4 अरब लोग सुरक्षित स्वच्छता सेवाओं से वंचित थे। यह बताता है कि 2030 के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए दुनिया को जल और स्वच्छता के क्षेत्र में अभी काफी तेज गति से काम करना होगा।
भारत ने स्वच्छ जल और स्वच्छता के क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों में उल्लेखनीय प्रगति की है। नीति आयोग के एसडीजी इंडिया इंडेक्स 2023-24 में एसडीजी-6 के तहत भारत का स्कोर 89 रहा, जो 2018 में 63 था। रिपोर्ट के अनुसार 99.29% ग्रामीण परिवारों के पेयजल स्रोत में सुधार हुआ है और भूजल के अतिदोहन वाले ब्लॉकों, मंडलों और तालुकों की हिस्सेदारी भी 2017 के 17.24% से घटकर 2022 में 11.23% रह गई। इन महत्वपूर्ण आंकड़ों को एक नज़र में इस प्रकार देखा जा सकता है-
इन उपलब्धियों के बावजूद भारत के सामने जल सुरक्षा की कई बड़ी चुनौतियां हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों में पानी की उपलब्धता और गुणवत्ता में असमानता बनी हुई है। भूजल पर भारी निर्भरता, कुछ क्षेत्रों में भूजल का लगातार दोहन, जल स्रोतों का प्रदूषण, वर्षा के असमान वितरण और जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती बाढ़ और सूखे की घटनाएं जल सुरक्षा को प्रभावित कर रही हैं। संयुक्त राष्ट्र भी भारत के संदर्भ में अनियमित मानसून, बाढ़ और सूखे को जल संकट बढ़ाने वाले कारकों में गिनाता है।
एसडीजी-6 की चुनौती इसलिए केवल हर घर तक नल या सुरक्षित पेयजल पहुंचाने तक सीमित नहीं है। पानी के स्रोतों को लंबे समय तक सुरक्षित रखना, भूजल का पुनर्भरण बढ़ाना, प्रदूषण रोकना, वर्षा जल का स्थानीय स्तर पर संरक्षण करना और उपलब्ध पानी का टिकाऊ इस्तेमाल सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है। इसी नजरिए से धमतरी में सैंड फिल्टर के जरिए वर्षा जल को संरक्षित करने और जल स्रोतों के पुनर्भरण के प्रयास को देखा जा सकता है। ऐसी स्थानीय पहलें एसडीजी-6 को केवल वैश्विक लक्ष्य न रखकर गांव और समुदाय के स्तर पर लागू करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें

