भारत की झीलें केवल जलस्रोत नहीं हैं, बल्कि वे देश की पारिस्थितिकी, संस्कृति, आजीविका और जल सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स
भारत की प्रमुख झीलें: राज्यवार सूची, प्रकार और महत्वपूर्ण तथ्य
भारत की झीलें केवल जलस्रोत नहीं हैं, बल्कि वे देश की पारिस्थितिकी, संस्कृति, आजीविका और जल सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। हिमालय की ऊंचाइयों से लेकर तटीय क्षेत्रों तक फैली ये झीलें अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों में बनी हैं। कुछ झीलें प्राकृतिक हैं, जबकि कइयों का निर्माण ऐतिहासिक जल प्रबंधन प्रणालियों के तहत हुआ।
भारत में पेयजल, सिंचाई, मछली पालन, पर्यटन, जैव विविधता संरक्षण और भूजल पुनर्भरण में झीलों की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। कई झीलें प्रवासी पक्षियों के लिए आश्रय स्थल हैं तो कुछ को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संरक्षित आर्द्रभूमि यानी रामसर साइट का दर्जा भी प्राप्त है।
भारत में वर्तमान में 99 रामसर साइट हैं, जिनमें बड़ी संख्या झीलों और आर्द्रभूमियों की है। देश की कई ऐतिहासिक नगर बसावटें झील आधारित जल प्रणालियों के आसपास विकसित हुईं। भोपाल, उदयपुर, श्रीनगर और हैदराबाद जैसे शहर लंबे समय तक झील आधारित जल प्रबंधन के उदाहरण माने जाते रहे हैं।
क्या होता है झील और तालाब में अंतर
पर्यावरण विशेषज्ञ मानते हैं कि झीलें बाढ़ नियंत्रण, भूजल पुनर्भरण और स्थानीय जलवायु संतुलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यही कारण है कि हाल के वर्षों में झील संरक्षण को जलवायु अनुकूलन और शहरी नियोजन के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में देखा जाने लगा है।
झील और तालाब दोनों स्थिर जल इकाइयां हैं, लेकिन इनके आकार, गहराई, उत्पत्ति, पारिस्थितिकी और उपयोग में महत्वपूर्ण अंतर होता है। सामान्यतः झीलें आकार में बड़ी और अपेक्षाकृत गहरी होती हैं। इनमें पानी लंबे समय तक बना रहता है, जिसके कारण इनकी अपनी अलग पारिस्थितिकी विकसित हो जाती है। अधिकांश बड़ी झीलें हिमनदी, टेक्टोनिक गतिविधि, नदी अवरोध या समुद्री लैगून जैसी प्राकृतिक प्रक्रियाओं से बनती हैं।
झीलों में जल अधिक गहरा और स्थिर होने के कारण अलग-अलग गहराइयों पर तापमान, ऑक्सीजन और जैव विविधता की परतें विकसित हो जाती हैं। यही वजह है कि बड़ी झीलें प्रवासी पक्षियों, मछलियों और जलीय वनस्पतियों के जटिल पारिस्थितिक तंत्र को सहारा देती हैं। कई झीलें क्षेत्रीय जलवायु, भूजल और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी प्रभाव डालती हैं।
इसके विपरीत तालाब आमतौर पर छोटे और उथले जलस्रोत होते हैं। भारत में अधिकांश तालाब मानव निर्मित रहे हैं और इन्हें वर्षा जल संचयन, सिंचाई, पशुपालन और स्थानीय जल जरूरतों के लिए बनाया जाता रहा है। चूंकि तालाब अपेक्षाकृत उथले होते हैं, इसलिए सूर्य का प्रकाश उनकी सतह तक पहुंच जाता है। नतीजतन, तालाबों में शैवाल, घास और स्थानीय जलीय वनस्पतियां ज़्यादा दिखाई देती हैं। भारत के ग्रामीण इलाक़ों में तालाब लंबे समय तक भूजल पुनर्भरण और सामुदायिक जल प्रबंधन की रीढ़ माने जाते रहे हैं।
हालांकि कई क्षेत्रों में आम बोलचाल में “झील”, “ताल” और “तालाब” जैसे शब्द एक-दूसरे के लिए भी इस्तेमाल होते हैं।
जलवायु परिवर्तन और शहरीकरण का असर इन दोनों जलस्रोतों पर अलग-अलग रूपों में दिखाई देता है। जहां झीलें प्रदूषण, पर्यटन दबाव और अतिक्रमण से प्रभावित हो रही हैं, वहीं तालाबों का सबसे बड़ा संकट उनका धीरे-धीरे खत्म होना और निर्माण गतिविधियों में बदल जाना है।
भारत में झीलों की भूमिका और महत्ता
भारत की झीलें केवल प्राकृतिक सौंदर्य का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि वे देश की जल और पर्यावरणीय सुरक्षा से सीधे जुड़ी हुई हैं। भारत के कई शहर ऐतिहासिक रूप से झील आधारित जल प्रणालियों पर विकसित हुए हैं। भोपाल की अपर लेक, हैदराबाद की उस्मान सागर और हिमायत सागर झीलें, तथा बेंगलुरु की पारंपरिक झील शृंखलाएं लंबे समय तक शहरी पेयजल आपूर्ति का महत्वपूर्ण आधार रही हैं। जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में ये सिंचाई, मत्स्य पालन और स्थानीय अर्थव्यवस्था का आधार बनती हैं।
कई झीलें प्रवासी पक्षियों और दुर्लभ जलीय जीवों के लिए महत्वपूर्ण आवास हैं। चिलिका, लोकटक और वेम्बनाड जैसी झीलें लाखों लोगों की आजीविका से जुड़ी हैं। वहीं डल झील, नैनी झील और पिछोला जैसी झीलें पर्यटन और स्थानीय संस्कृति की पहचान बन चुकी हैं।
पर्यावरण विशेषज्ञ मानते हैं कि झीलें बाढ़ नियंत्रण, भूजल पुनर्भरण और स्थानीय जलवायु संतुलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यही कारण है कि हाल के वर्षों में झील संरक्षण को जलवायु अनुकूलन और शहरी नियोजन के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में देखा जाने लगा है।
भारत में झीलों के प्रकार
हिमनदीय झीलें: हिमालय में ग्लेशियरों के पिघलने से बनी झीलें। इसके मुख्य उदाहरण त्सो मोरीरी (लद्दाख), चंद्रताल (हिमाचल प्रदेश), गुरुडोंगमार झील (सिक्किम) और रूपकुंड (उत्तराखंड) हैं।
खारे पानी की झीलें: आमतौर पर समुद्री संपर्क, अत्यधिक वाष्पीकरण या बंद जल निकासी तंत्र (closed drainage basin) के कारण बनती हैं। सांभर झील (राजस्थान), चिलिका झील (ओडिशा), पुलिकट झील (तमिलनाडु-आंध्र प्रदेश) और त्सो कार (लद्दाख) इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
मीठे पानी की झीलें: ऐसी झीलें जिनमें लवणता कम होती है और जिनका पानी पेयजल, सिंचाई तथा जलीय जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। ये झीलें वर्षा, नदियों और हिमनदों से जल प्राप्त करती हैं। भारत की प्रमुख मीठे पानी की झीलों में वुलर झील (जम्मू-कश्मीर), लोकटक झील (मणिपुर), वेम्बनाड झील (केरल) और नैनी झील (उत्तराखंड) का नाम आता है।
ज्वालामुखीय झीलें: ये ज्वालामुखीय गतिविधियों, क्रेटर धंसने या उल्कापिंडीय प्रभाव से बने गड्ढों में जल भरने से बनने वाली झीलें होती हैं। भारत में इस प्रकार की झीलों की संख्या बहुत कम है।
लोनार झील (महाराष्ट्र) भारत की सबसे प्रमुख ज्वालामुखीय झील है। इसका निर्माण हजारों वर्ष पहले उल्कापिंड गिरने से हुआ माना जाता है। इस झील का पानी खारा और क्षारीय दोनों प्रकृति का है।
भारत की कुछ प्रमुख ‘सबसे बड़ी’ झीलें
चिलिका झील: सबसे बड़ी खारे पानी की लैगून। लेकिन हाल के वर्षों में प्रदूषण, गाद के जमाव जैसी समस्याओं के चलते इसका पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ता जा रहा है।
सांभर झील: भारत की सबसे बड़ी ऐसी खारे पानी की झील जो समुद्र से नहीं जुड़ी है। यहां हर साल हज़ारों की संख्या में फ्लेमिंगो सहित तमाम प्रवासी पक्षी आते हैं।
वुलर झील: सबसे बड़ी मीठे पानी की झील। अतिक्रमण के कारण वुलर झील का बड़ा हिस्सा तैरती वनस्पतियों, खेतों के टुकड़ों और दशकों पहले लगाए गए विलो के पेड़ों के नीचे दब गया है।
गुरुडोंगमार झील: सबसे ऊंचाई पर स्थित प्रमुख झीलों में शामिल।
लोनार झील: सबसे प्रसिद्ध उल्कापिंडीय झील।
राज्यवार प्रमुख झीलें
नीचे दी गई सूची में भारत की विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की प्रमुख झीलों का संक्षिप्त विवरण दिया गया है।
भारत की झीलों के सामने बढ़ती चुनौतियां
वर्तमान में भारत की झीलों के सामने कई प्रकार की चुनौतियां हैं। उन्हें अतिक्रमण, सीवेज प्रदूषण, प्लास्टिक कचरा, अनियंत्रित और अतार्किक पर्यटन, भूजल दोहन, जलवायु परिवर्तन और तेज़ी से हो रहे शहरी विस्तार का शिकार होना पड़ रहा है। जयपुर की चंदलाई झील का कुछ ऐसा ही हाल है। औद्योगिक अपशिष्ट के कारण चंदलाई झील अब तक रामसर साइट नहीं घोषित हो पायी।
बेंगलुरु, हैदराबाद, भोपाल और श्रीनगर जैसे शहरों में झीलें कभी शहरी जल प्रबंधन का आधार थीं, लेकिन अनियोजित शहरीकरण, निर्माण गतिविधियों और सीवेज प्रदूषण ने कई झीलों की पारिस्थितिकी को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। चेन्नई की वेलाचेरी झील इसका एक बड़ा उदाहरण है।
शहर के कचरे को झीलों में झोंक देने का काम केवल मैदानी इलाकों में ही नहीं बल्कि सौंदर्य का प्रतीक माने जाने वाले पहाड़ों पर भी हो रहा है। जम्मू-कश्मीर की अंचर झील जो कभी गिलसर और खुशाल सर जैसी आर्द्रभूमियों से जुड़ी थी, आज अचन लैंडफिल के कारण गंदेपानी का स्रोत बन चुकी है।
झीलों और तालाबों के खत्म होने से जलभराव और बाढ़ की घटनाएं बढ़ी हैं। हिमालयी झीलों पर ग्लेशियर पिघलने का असर दिख रहा है, जबकि तटीय लैगून समुद्री बदलावों से प्रभावित हो रही हैं।
झील संरक्षण को केवल “सुंदरता बढ़ाने” की परियोजनाओं तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इसके लिए जलग्रहण क्षेत्र संरक्षण, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और वैज्ञानिक जल प्रबंधन जरूरी है।
भारत की झीलें केवल भौगोलिक संरचनाएं नहीं हैं, बल्कि वे देश की जल संस्कृति, पारिस्थितिकी और सामुदायिक जीवन की जीवित धरोहर हैं। बदलती जलवायु और तेज़ शहरीकरण के दौर में इन जलस्रोतों का संरक्षण भविष्य की जल सुरक्षा से सीधे जुड़ा प्रश्न बन चुका है।
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