वनवासियों की व्यथा

सरकार की ‘उजाड़’ की नीति को इस क्षेत्र के लिये पिछले साठ सालों में किये गए विकास के आईने में समझना ज्यादा आसान होगा। यहाँ इस क्षेत्र की आर्थिक एवं सामाजिक बुनावट के बारे में बात करना ठीक होगा। यह किसी भी समाज के विकास के रिपोर्ट कार्ड की तरह होगा।

कुछ महीने पूर्व बाघों की गिनती करवाई गई। गिनती करवाने के पीछे की चिन्ता यह थी कि ‘बाघों’ की कई प्रजातियाँ लुप्त हो रही हैं। बाघों या किसी भी ऐसे जानवर, जिनकी ‘आहार शृंखला’ में एक बड़ी भूमिका हो, उनका नष्ट हो जाना मनुष्य के लिये एक वाजिब चिन्ता की बात तो है ही। ऐसा कहा जाता रहा है कि बाघ शान्तिप्रिय होते हैं। वे अपने आस-पास के वातावरण में किसी का दखल नहीं चाहते हैं। उनके मध्य प्रजनन दर में वृद्धि भी इसी सिद्धान्त के सहारे सम्भव होती है।

पर्यावरण की सुरक्षा या वन्य-जीवन के लिये काम कर रही कुछ एजेंसियों का यह मानना है कि जंगल के आस-पास या जंगल में रह रही आबादी इसके लिये सीधे तौर पर जिम्मेदार है। उनका मानना यह भी है कि जंगल या आस-पास की आबादी के कारण धीरे-धीरे जंगल सिमटते जा रहे हैं। ऐसे तर्कों को मानने में सरकार को कोई दिक्कत कभी भी नहीं आती है।

पर्यावरणविद या शोध-संस्थाओं के ऐसे तर्क जन-विरोधी सरकार के लिये ढाल का काम करते हैं। ऐसा बहुत प्रायोजित तरीके से होता आ रहा है। आयोडीन नमक को लागू करने में सरकार की जबरदस्ती इसका प्रमाण है।

भू-मंडलीकरण के इस दौर में गरीबी, बेरोजगारी और भुखमरी तेज रफ्तार से बढ़ती जा रही है। दूसरी तरफ सरकार अपने कुछ शहरों को पेरिस, लंदन और न्यूयॉर्क बना डालना चाहती है। इन हालात में गरीब, भूखे और नंगे सत्ता के निशाने पर होते हैं, क्योंकि पेरिस और लंदन की चकाचौंध में गरीब और मजदूर मुँह चिढ़ाते हुए प्रतीत होते हैं। दरअसल सत्ता किस तरह अपना फासीवादी चरित्र उजागर कर रही है, इस पर ध्यान दिया जाना जरूरी होगा। केन्द्र से लेकर राज्य में सत्ता पर काबिज किसी भी दल की सरकार भारत के कुछ हिस्से या कुछ लोगों के जीवन में किसी भी कीमत पर उजाला भर देना चाहती है। वह बड़ी आबादी के हित में नहीं सोच पा रही है। जाहिर सी बात है, ऐसा करने के लिये एक बड़े हिस्से की उपेक्षा करनी ही होगी। सत्ता की यह मंशा बिजली, पानी से लेकर हर जगह प्रकट होती है। तात्पर्य यह है कि सत्ता का केन्द्र देश या राज्य के केन्द्रों में सिमटा हुआ है। हमारे देश में रिजर्व, सेंचुरी, अभयारण्य, कॉरीडोर धड़ल्ले से एक मुहिम के तहत तैयार किये जा रहे हैं और साथ ही इन इलाकों में रहने वाले लोगों को ऐसे विकास का दुश्मन साबित कर उजाड़ने की सघन प्रक्रिया भी साथ-साथ जारी है। सरकार की ऐसी जन-विरोधी कार्रवाइयों को आप भारत के किसी भी जंगल या उसमें तैयार किये गए रिजर्व या सेंचुरी के सन्दर्भ में देख सकते हैं। ‘सरिस्का टाइगर रिजर्व’ पिछले दिनों चर्चा में रहा है, इसलिये इस पर बात किया जाना ज्यादा जरूरी होगा।

सरकार की ‘उजाड़’ की नीति को इस क्षेत्र के लिये पिछले साठ सालों में किये गए विकास के आईने में समझना ज्यादा आसान होगा। यहाँ इस क्षेत्र की आर्थिक एवं सामाजिक बुनावट के बारे में बात करना ठीक होगा। यह किसी भी समाज के विकास के रिपोर्ट कार्ड की तरह होगा। यहाँ 11 गाँवों में एक सर्वेक्षण किया गया। यह सर्वेक्षण ‘इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली’ के 19 मई, 2007 के अंक में प्रकाशित हुआ था। इसके अनुसार यहाँ के एक परिवार की औसत वार्षिक आमदनी लगभग 48,175 रुपए है। इसमें से 18 हजार रुपए प्रतिवर्ष कृषि चारे और व्यावसायिक चारे पर खर्च हो जाते हैं। अतः हमें एक परिवार की सालाना औसत आमदनी लगभग 30 हजार रुपए ही मान लेनी चाहिए। प्रतिवर्ष एक परिवार के स्वास्थ्य पर लगभग 8,500 रुपए खर्च हो जाते हैं। शेष 23 हजार रुपए (यानी हर महीने प्रतिव्यक्ति 350 रुपए की आमदनी) में एक परिवार पूरे साल खाना, कपड़ा और दूसरी जरूरतें कैसे पूरी करता होगा, यह एक चिन्ता का विषय है। जिन गाँवों में सर्वेक्षण किया गया, उनमें से एक गाँव का नाम ‘उमरी’ था।

यह गाँव मुख्य सड़क से तीन किलोमीटर की दूरी पर है। गाँव से सबसे नजदीक लगने वाला बाजार 25 किलोमीटर की दूरी पर है। डाकघर की दूरी भी 25 किलोमीटर है। शिक्षा का आलम यह है कि इन 11 गाँवों में सबसे अच्छी स्थिति ‘भागानी’ गाँव की है। मैट्रिक उत्तीर्ण करने वाले छात्रों का प्रतिशत मात्र 5.56 है। इन आँकड़ों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि भारत का विकास-चक्र शहर या कुछ खास इलाकों में ही चल पाया है। इन गाँवों के लोगों के जीविकोपार्जन का मुख्य आधार पशुपालन है। 72.33 प्रतिशत घरों की रोटी दूध से जुड़े व्यवसाय से चलती है। इन जानवरों के लिये जंगल के शुरुआती या ‘बफर जोन’ में 1-3 किलोमीटर तक ही घुसने की आपसी समझ के आधार पर अनुमति मिल पाई है। इसके आगे वन अधिकारी टैक्स वसूलने लगते हैं। लकड़ी बेचने का धंधा ये नहीं के बराबर करते हैं। इनकी चिकित्सा-पद्धति जंगल की औषधि पर आधारित न होकर अंग्रेजी चिकित्सा-पद्धति पर आधारित है। ये अगर अपनी आत्मरक्षा में जंगली जानवरों पर वार करते हैं तो इन्हें अपराधी करार दिया जाता है। इन पर मुकदमा चलाया जाता है। सजाएँ मुकर्रर की जाती हैं। ऐसा भारत के तमाम जंगलों और नदियों के किनारे चल रहा है। व्यवस्था, इनकी तलछटी में बसने वाले को यह बोध कराना चाहती है कि प्राकृतिक संसाधनों पर भी उनका ही कब्जा होता है, जो सत्ता से नजदीकी बना पाते हैं या फिर सत्ता में शामिल होते हैं।

 

जल, जंगल और जमीन - उलट-पुलट पर्यावरण

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम

अध्याय

 

पुस्तक परिचय - जल, जंगल और जमीन - उलट-पुलट पर्यावरण

1

चाहत मुनाफा उगाने की

2

बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के आगे झुकती सरकार

3

खेती को उद्योग बनने से बचाएँ

4

लबालब पानी वाले देश में विचार का सूखा

5

उदारीकरण में उदारता किसके लिये

6

डूबता टिहरी, तैरते सवाल

7

मीठी नदी का कोप

8

कहाँ जाएँ किसान

9

पुनर्वास की हो राष्ट्रीय नीति

10

उड़ीसा में अधिकार माँगते आदिवासी

11

बाढ़ की उल्टी गंगा

12

पुनर्वास के नाम पर एक नई आस

13

पर्यावरण आंदोलन की हकीकत

14

वनवासियों की व्यथा

15

बाढ़ का शहरीकरण

16

बोतलबन्द पानी और निजीकरण

17

तभी मिलेगा नदियों में साफ पानी

18

बड़े शहरों में घेंघा के बढ़ते खतरे

19

केन-बेतवा से जुड़े प्रश्न

20

बार-बार छले जाते हैं आदिवासी

21

हजारों करोड़ बहा दिये, गंगा फिर भी मैली

22

उजड़ने की कीमत पर विकास

23

वन अधिनियम के उड़ते परखचे

24

अस्तित्व के लिये लड़ रहे हैं आदिवासी

25

निशाने पर जनजातियाँ

26

किसान अब क्या करें

27

संकट के बाँध

28

लूटने के नए बहाने

29

बाढ़, सुखाड़ और आबादी

30

पानी सहेजने की कहानी

31

यज्ञ नहीं, यत्न से मिलेगा पानी

32

संसाधनों का असंतुलित दोहन: सोच का अकाल

33

पानी की पुरानी परंपरा ही दिलाएगी राहत

34

स्थानीय विरोध झेलते विशेष आर्थिक क्षेत्र

35

बड़े बाँध निर्माताओं से कुछ सवाल

36

बाढ़ को विकराल हमने बनाया

 


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