अनिता देवी अपना हाथ उठाकर हल्की मुस्कान देती हैं। उनकी हथेली पर गहरा कट है। जब उनसे दस्ताने या किसी सुरक्षात्मक साधन के बारे में पूछा जाता है, तो वह हँसते हुए कहती हैं, “पहली बार सुन रहे हैं हम लोग इस बारे में।”
शरत चंद्र प्रसाद
सुबह करीब आठ बजे, अनिता देवी बची हुई रोटी और थोड़ी भुनी आलू की सब्ज़ी कपड़े में बाँधकर बगल में दबाती हैं और पोखर की ओर चल पड़ती हैं। उनके कदमों में कोई हड़बड़ी नहीं दिखती। बरसों से इनकी एक ही दिनचर्या है - घुटनों तक पानी, कमर झुकी हुई, मुड़े हुए घुटने, और दिन भर पानी के अंदर से मखाना के पौधों को खींच-खींच कर निकालना और सतह पर जमी घास-फूस को हटाना… धीरे-धीरे घंटे बीतते जाते हैं और कमर का दर्द बढ़ता जाता है। दर्द से निजात पाने के लिए रात को दाल में सहजन की पत्तियां, ताकि अगले दिन फिर से काम पर लग सकें।
तालाबों से मखाना निकालना यानि जिम में 10 से 15 किलो वज़न उठाने जैसा होता है, चिलचिलाती धूप में यह काम कितना कठिन होता है, इस बात का अंदाज़ा कोई और नहीं लगा सकता। इसी कठिन दिनचर्या को समझने के लिए चलते हैं पुथलाहा।
पुथलाहा, पटना से लगभग 180 किलोमीटर दूर, दरभंगा ज़िले का एक गाँव है। कटिहार, पूर्णिया और मधुबनी के साथ मिलकर यह इलाका देश का सबसे बड़ा मखाना उत्पादन क्षेत्र बनाता है। आज देश में बिकने वाला करीब 90 प्रतिशत मखाना यहीं से आता है, जिसे अब वैश्विक स्तर पर सुपरफूड के रूप में भी पहचाना जा रहा है। लेकिन इसे पानी से निकालने का असल काम अनिता जैसी महिलाएं ही करती हैं।
पुथलाहा गाँव के एक मखाना पोखर। यही पोखर यहाँ कई परिवारों की रोज़ी-रोटी का आधार हैं।
मखाना की खेती कैसे होती है?
मखाना की खेती एक लंबा चक्र अपनाती है। अप्रैल में बीज डाले जाते हैं और कुछ महीनों बाद कटाई शुरू होकर सर्दियों तक चलती है। इस बीच का समय इंतज़ार और देखभाल का होता है, पोखरों से घास-फूस हटाना, पानी का स्तर बनाए रखना और सतह के नीचे पनप रहे बीजों पर निगरानी रखना।
इस बार अनिता ने बाहर काम पर जाने के बजाय गाँव में ही रहकर काम करने का फैसला किया है, क्योंकि उनकी बेटी की परीक्षाएं नज़दीक हैं। खेती-किसानी वाले घरों में काम अक्सर परिवार की ज़रूरतों के हिसाब से तय होता है।
मजदूरी उत्पादन पर निर्भर करती है। एक किलो मखाना निकालने पर 100 से 150 रुपये तक मिलते हैं। अच्छे महीने में अनिता 10 से 15 हज़ार रुपये तक कमा लेती हैं, लेकिन इसका बड़ा हिस्सा पुराने कर्ज़ चुकाने में चला जाता है।
मखाना की फसल का सबसे कठिन चरण जब पानी में उतरते हैं मजदूर
जैसा कि हमने ऊपर बताया कि यह चरण अगस्त से अक्टूबर के बीच हाता है। इसके चरण के अंदर भी दो चरण हाेते हैं। पहले चरण में में मछुआरे व मजदूर पोखर में गोता लगाकर ज़्यादातर बीज निकालते हैं। करीब एक हफ्ते बाद दूसरा चरण आता है जब महिलाएं पोखरों में उतरती हैं और बचा हुआ मखाना बीज इकट्ठा करती हैं। यही दूसरा चरण कुल उत्पादन का लगभग आधा हिस्सा देता है।
मखाना की खेती शुरू होने से पहले मछुआरे कीचड़ भरे पानी में उतरकर मोटी घास-फूस को हाथ से निकालते हैं। यह काम धीमा और बेहद थकाऊ होता है।
रीता देवी घंटों झुककर पानी के भीतर बीज ढूँढ़ती हैं। पीठ में दर्द, त्वचा में जलन—फिर भी काम जारी रहता है।
घंटों तक पानी में झुकी रहती हैं महिलाएं
यह काम लगातार दोहराव और मेहनत से भरा है। महिलाएं घंटों पानी में झुकी रहती हैं, कीचड़ में हाथ डालकर बीज टटोलती हैं। लंबे समय तक भीगी त्वचा पर दाने निकलना और फंगल संक्रमण आम बात है। जब रीता से सुरक्षात्मक साधनों के बारे में पूछा गया, तो वह हँसते हुए कहती हैं, “हमने तो कभी देखा ही नहीं यहाँ ऐसा कुछ।”
मखाना के बढ़ते बाज़ार का असर मजदूरी पर नहीं दिखता। मांग बढ़ी है, लेकिन कमाई लगभग वही है। सीजन में रीता सुबह से दोपहर तक और फिर दोपहर बाद शाम तक काम करती हैं। “हमारे लिए कोई नीति नहीं है,” वह कहती हैं। “चोट लग जाए तो घर पर ही कुछ लगा लेते हैं और फिर काम पर लौट आते हैं।”
काम के बाद महिलाएं एक जगह बैठकर मखाना इकट्ठा करती हैं और फिर मजदूरी बराबर बाँट लेती हैं।
मखाना उत्पादन में महिलाओं की भूमिका बेहद अहम है, खासकर प्रोसेसिंग और घर-आधारित कामों में। अध्ययन बताते हैं कि 66 प्रतिशत से अधिक महिलाएं कटाई के बाद के कामों में लगी हैं और कुल श्रम समय का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ प्रोसेसिंग में ही महिलाओं का होता है। कुल मिलाकर श्रम योगदान में पुरुषों का हिस्सा करीब 50 प्रतिशत, महिलाओं का 40 प्रतिशत और बच्चों का 10 प्रतिशत है, जो इस उद्योग में महिलाओं की महत्वपूर्ण भागीदारी को दिखाता है।
पीढ़ियों से मछुआरा समुदाय की महिलाएं भूनने, फोड़ने, छँटाई और प्रोसेसिंग जैसे कामों में दक्ष हो चुकी हैं, जिनसे मखाना की गुणवत्ता और बाज़ार मूल्य तय होता है। जहाँ पुरुष पोखर आधारित खेती और बीज निकालने में आगे रहते हैं, वहीं महिलाएं अब खेत के कामों—जैसे निराई, बुवाई और कीट नियंत्रण—में भी मदद करती हैं। इसके बावजूद, उनका अधिकांश श्रम अनौपचारिक, कम आंका गया और अक्सर अनदेखा रह जाता है।
घुटनों और पीठ में दर्द से जूझती महिलाएं
दरभंगा के एक निजी अस्पताल में डॉक्टर अभिषेक कुमार बताते हैं कि मखाना मजदूरों में त्वचा संबंधी संक्रमण आम है। लंबे समय तक झुककर काम करने से घुटनों और पीठ में दर्द होता है। भूनाई के दौरान लकड़ी के धुएँ से साँस लेने में भी परेशानी होती है।
वह कहते हैं, “ये बीमारियाँ तुरंत जानलेवा नहीं होतीं, लेकिन सालों में असर जमा होता जाता है।”
अधिकतर लोग घरेलू इलाज पर निर्भर रहते हैं जैसे सरसों का तेल और सामान्य दवाइयां। पौष्टिक भोजन हर किसी की पहुँच में नहीं है। चोट का इलाज होता है और काम फिर शुरू हो जाता है।
अनिता फिर अपनी हथेली दिखाती हैं, जिस पर गहरा घाव है। वह मुस्कराकर कहती हैं, “इस बारे में पहली बार सुन रहे हैं हम लोग।”
मखाना की खेती में मजदूरों की कितनी कमाई
बिहार की अर्थव्यवस्था अब भी काफी हद तक खेती पर निर्भर है। औद्योगिक विकास धीमा रहा है। ऐसे में मखाना कई परिवारों को कुछ महीनों की राहत देता है, लेकिन स्थिरता नहीं।
गाँव के अधिकतर पुरुष यहाँ नहीं हैं। वे दिल्ली, पंजाब और हरियाणा में काम करते हैं और साल में एक बार, अक्सर छठ पूजा या त्योहारों पर, घर लौटते हैं। इस बीच महिलाएं ही घर संभालती हैं- बच्चों की देखभाल, पशुपालन और खेत का काम।
मखाने की एक छोटी मात्रा निकालने के लिए भी बारीक और कठिन प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है
यही है पलायन की दूसरी तस्वीर। बिहार लंबे समय से अपने श्रमिकों को दूसरे राज्यों में भेजता रहा है, क्योंकि यहाँ पर्याप्त रोजगार नहीं है। मखाना स्थानीय काम देता है, लेकिन यह मौसमी, कम मजदूरी वाला और सीमित है। यहाँ प्रोसेसिंग की सुविधाएँ लगभग नहीं के बराबर हैं, इसलिए कच्चा माल बाहर चला जाता है और असली मुनाफा, पैकेजिंग और रोजगार कहीं और पैदा होता है।
रीता साफ कहती हैं, “अगर मुझे दस हजार महीने की नौकरी मिल जाए, तो मैं मखाना का काम कभी नहीं करूँगी। लेकिन हमारे पास विकल्प नहीं है।”
अनिता देवी अपने परिवार के साथ एक छोटे से घर में रहती हैं। मखाना की कमाई से ही घर का खर्च, बच्चों की पढ़ाई और रोज़मर्रा की ज़रूरतें पूरी होती हैं।
विडंबना साफ दिखती है। मखाना उत्पादन में मिथिला आगे है, लेकिन कच्चा माल बाहर चला जाता है। स्थानीय प्रोसेसिंग इकाइयों के अभाव में मूल्यवर्धन और बड़ा मुनाफा दूसरे राज्यों को मिलता है। किसान, मजदूर और बिचौलिये इस पूरी श्रृंखला का हिस्सा हैं, लेकिन क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को सीमित लाभ ही मिल पाता है।
छोटे किसान रामसुंदर राय बताते हैं कि मखाना निकालने और भिगोने में मजदूरी 500-600 रुपये तक पहुँच जाती है। छँटाई और भूनाई के बाद भी खरीदार अक्सर गुणवत्ता का हवाला देकर कुछ हिस्सा खारिज कर देते हैं।
वह कहते हैं, “हम लोग भी कम ही कमा पाते हैं। सरकार अगर एक समान मजदूरी तय कर दे, तो हम भी उसका पालन करेंगे। हम भी किसी तरह गुज़ारा कर रहे हैं।” उनका पूरा परिवार इस काम में लगा है - बहन और बेटी सुखाने और भूनने में मदद करती हैं। यह पारिवारिक काम है, लेकिन मुनाफा बहुत सीमित है।
तेज धूप में भी महिलाएं पानी के भीतर काम करती रहती हैं।
पुथलाहा में दूसरे चरण की कटाई के दौरान पोखर लगभग पूरी तरह महिलाओं के जिम्मे होते हैं। वे काम करते-करते गाना गाती हैं, आपस में बातें करती हैं और खाना साझा करती हैं। दोपहर का भोजन सादा होता है- रोटी, थोड़ी सब्ज़ी, कभी-कभी अचार।
दस घंटे साथ बिताने से एक अलग तरह की लय बनती है- बीच-बीच में हँसी-मज़ाक, बातचीत, कभी-कभी काम के बीच में हल्का नाच-गाना भी। यह कोई रोमांच नहीं, बल्कि दिन को काटने का एक तरीका है।
अनिता अपने हाथ का छोटा सा घाव दिखाते हुए कहती हैं, “इतनी मेहनत के बाद यही मिलता है।” फिर बिना किसी कड़वाहट के जोड़ती हैं, “हम सरकारी बाबू नहीं हैं, ना ही हम तनख्वाह पर हैं। बहुत समस्या है, कहाँ-कहाँ बताएँ?”
उन्हें मिथिला पेंटिंग भी आती है, और सिक्की घास से बुनाई भी। ये हुनर इस क्षेत्र की पहचान हैं, लेकिन बाज़ार, कर्ज़ और निवेश तक पहुँच सीमित है। वह कहती हैं, “जमीन ही नहीं है हमारे पास, तो कर्ज़ कैसे मिलेगा?”
कम उम्र में शादी और लड़कियों का स्कूल छोड़ना अब भी बड़ी समस्या है। कई परिवारों के लिए पढ़ाई ही एकमात्र रास्ता दिखती है। अनिता अपने बच्चों के बारे में कहती हैं, “अगर ये लोग पढ़-लिख जाएँ, तो वही हमारी उम्मीद है।”
कुछ जगहों पर पति-पत्नी साथ काम करते हैं। ऐसे परिवारों की आमदनी पूरी तरह मखाना की खेती और पारिवारिक श्रम पर टिकी होती है।
पोखर के किनारे शाम
शाम ढलते ही महिलाएं पानी से बाहर निकलने लगती हैं। कुछ घर जाकर खाना बनाएँगी, बच्चों की पढ़ाई देखेंगे या मवेशियों की देखभाल करेंगी। कुछ थोड़ी देर बैठकर आराम करती हैं। सीजन के अंत तक कुछ लोग इतना कमा लेते हैं कि कर्ज़ का थोड़ा हिस्सा चुका सकें या बच्चों की फीस भर सकें। वहीं कुछ अगले साल लौटने का फैसला नहीं करतीं- घुटनों का दर्द, संक्रमण और थकान एक सीमा पार कर जाती है।
एक-एक मखाना निकालने में महिलाओं का परिश्रम, घर में सूखी रोटी, बच्चों का पढ़ाई से वंचित होना, कमर का दर्द, घुटनो का दर्द, सब कुछ मिथिला के इन पोखरों में यह सब दर्ज हो रहा है। और कल, सूरज पूरी तरह निकलने से पहले, महिलाएं फिर से पानी में उतर जाएंगी।
मखाना एक फसल मात्र नहीं, यह एक संस्कृति की पहचान है
बिहार के बाहर के लोगों के लिए यह समझना जरूरी है कि मखाना यहाँ सिर्फ फसल नहीं है, बल्कि गीतों, रीति-रिवाजों और खाने-पीने की परंपराओं से जुड़ा हुआ है। यह क्षेत्रीय संस्कृति की पहचान है।
लेकिन केवल पहचान इनके बच्चों के स्कूल की फीस नहीं भर सकती, अस्पताल का खर्च नहीं उठा सकती और न ही इस क्षेत्र से पलायन को रोक सकती है।
मखाना की अर्थव्यवस्था संभावनाओं और सीमाओं, दोनों को सामने लाती है। एक ओर यह फसल मिथिला को वैश्विक पहचान देती है, दूसरी ओर स्थानीय स्तर पर प्रोसेसिंग में इनोवेशन यानि नवाचार और संस्थागत समर्थन की कमी इसके विकास को बाधित करती है।
जरूरत है पोखर प्रबंधन को बेहतर बनाने की, आधुनिक उपकरण की ताकि जो दर्द, जो परेशानी मजदूर भोगते हैं उन्हें उससे निजात मिल सके। और तो और स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता जैसे प्रयासों पर बातचीत भी जरूरी है। छोटे बदलाव भी शारीरिक मेहनत कम कर सकते हैं। सुरक्षा किट संक्रमण रोक सकते हैं। पोषण कार्यक्रम से श्रमिकों की सेहत बेहतर हो सकती है।
अगली बार जब आप मखाना का पैकेट खोलें!
अगली बार जब भी आप मखाना खाने के लिए उसका पैकट खोलें तो एक बार इस लेख को जरूर याद कीजिएगा। यह सोचिएगा कि आपके हाथ में जो मखाना है वो एक ऐसे राज्य में आया है जहां आमदनी के विकल्प सीमित हैं। इस मखाने को पैदा करने से लेकर पैकेट में बंद करने तक कितने लोगों का परिश्रम शामिल है और उस परिश्रम के बदले उन्हें कितना मेहनताना मिला।
यह सोचना इसलिए जरूरी है क्योंकि जब तक मखाना पैकेट में भरकर देश-विदेश के शहरों तक पहुँचता है, तब तक उसमें कीचड़, झुकी हुई कमर और पानी में बिताए गए घंटों की कोई छाप पूरी तरह मिट चुकी होती है। यह छाप पैकेटों पर भले ही न दिखे लेकिन मिथिला के इन पोखरों में यह सब दर्ज रहता है। क्योंकि यहां के लोगों, खास कर महिलाओं को हमेशा उम्मीद रहती है कि कल फिर सूरज उगने से पहले वो पानी में उतरेंगी और अपने परिवार के लिए कुछ कमा कर लाएंगी।
महत्वपूर्ण जानकारी - मखाना की फसल का पूरा चक्र
मखाना की खेती का फसल चक्र एक दो महीने का नहीं बल्कि पूरे साल चलता है। जनवरी में जब ठंड अपने चरम पर होती है, तब फसल की तैयारी शुरू की जाती है और अंतिम उत्पाद यानि फाइनल प्रॉडक्ट दिसंबर तक जाकर तैयार होता है।
मखाना के फसल चक्र को आसान भाषा में आप इस प्रकार समझ सकते हैं-
1. जनवरी – फरवरी : तालाब की तैयारी
इसमें तालाब की सफाई की जाती है। तालाब के तल में जमी कीचड़ को समतल किया जाता है। इस दौरान पानी की गहराई 1 से 2 मीटर होती है। कीचड़ निकालने का काम, खरपतवार यानि जलकुंभी आदि हटाने का कठिन काम इस दौरान किया जाता है।
2. फरवरी – मार्च : बीज बुवाई
सफाई के बाद मखाना के बीच बीज सीधे पानी में डाले जाते हैं। बीज नीचे जाकर मिट्टी में बैठ जाते हैं और धीरे-धीरे अंकुरित होने लगते हैं।
3. अप्रैल – जून : पौधों का विकास पानी के तल पर पड़े अंकुरित बीज पौधे का रूप लेते हैं और करीब एक महीने में बड़े-बड़े गोल पत्ते पानी की सतह पर फैलते दिखाई देते हैं। तपती धूप के मौसम में ये पौधे तेजी से बढ़ते हैं इसलिए इनकी नियमित निगरानी करनी होती है। 4. जुलाई – अगस्त : फूल और फल बनना बारिश के मौसम में पौधों में फूल आते हैं और पानी के अंदर फल बनने लगते हैं। धीरे-धीरे बीज विकसित होते हैं। फूल से बीज बनने में करीब दो महीने का समय लगता है।
5. अगस्त – अक्टूबर : बीज संग्रह अगस्त आते-आते बारिश भी अच्छी हो चुकी होती है, तालाब में पानी का स्तर भी बढ़ चुका होता है और तब मजदूरों को इस चक्र का सबसे कठिन कार्य करना होता है। ये मजदूर पानी में उतरकर बीज निकालते हैं। सीधे बीज नहीं निकाले जा सकते हैं, पहले फल की खोज की जाती है और फिर उनमें से बीज अलग किए जाते हैं। यह सबसे मेहनत वाला चरण होता है। (सूखाने के बाद मखाना को आग पर भुना जाता है, फिर सावधानी से फोड़ा जाता है और आकार के हिसाब से छाँटा जाता है। बड़े दाने ज्यादा दाम पर बिकते हैं।)
सूखाने के बाद मखाना को आग पर भुना जाता है, फिर सावधानी से फोड़ा जाता है और आकार के हिसाब से छाँटा जाता है। बड़े दाने ज्यादा दाम पर बिकते हैं।
6. अक्टूबर – दिसंबर : प्रोसेसिंग
इस दौरान मखाना के बीज सुखाए जाते हैं। कई बार अक्टूबर माह में बारिश की वजह से मौसम नम हो जाता है, तब बीज सूखने में और अधिक समय लगता है। सूखने के बाद बीज को भट्टी में भूनना जाता है तभी इसमें से सफेद मखाना फूटता है।
इस दौरान कुछ मखाने ठीक तरह से फूट नहीं पाते हैं तो कुछ आधे फूलते हैं तो कुछ बहुत अच्छी तरह से फूल कर बड़े हो जाते हैं। इस दौरान मखाना के साइज के आधार पर उन्हें अलग किया जाता है और उनके दाम तय किए जाते हैं। अंत में बोरियों में भर कर बाज़ार भेज दिए जाते हैं।
स्थानीय बाजार में दुकानदार सफेद चमकदार मखाना बेचता है, जिसे ग्राहक एक हेल्दी स्नैक के रूप में देखते हैं
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