पौधों की वृद्धि एवं विकास के लिए सामान्यतः 17 पोषक तत्वों की आवश्यकता पड़ती है जिनकी आपूर्ति मृदा में मुख्यतः इन तत्वों से युक्त उर्वरकों को डालकर की जाती है। परंतु परीक्षणों से यह सिद्ध हो चुका है कि सिर्फ रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग करने से फसलों की उन्नतशील प्रजातियों के फसलोत्पादन में उत्तरोत्तर वृद्धि संभव नहीं है। इसका मुख्य कारण है मृदा उर्वरता में गिरावट के साथ-साथ इसके भौतिक, जैविक एवं रासायनिक गुणों में ह्रास होना। हरी खाद कार्बनिक पदार्थ का अच्छा स्रोत है जो मृदा के इन गुणों को सुधारने के लिए उत्तरदायी है।रासायनिक उर्वरकों की बढ़ती हुई कीमतों के कारण मध्यम वर्गीय किसान इनकी संतुलित मात्रा का प्रयोग भी नहीं कर पाते हैं। अतः अब यह जरूरी हो गया है कि हम किसी ऐसी कार्बनिक खाद का प्रयोग करें जिससे कि मृदा के गुणों में सुधार हो, फसलोत्पादन भी अधिक बढ़े तथा कृषकों को आसानी से सुलभ भी हो जाए। इसका एक महत्वपूर्ण उपाय है - हरी खाद का प्रयोग।
पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्वों में नाइट्रोजन का प्रमुख स्थान है क्योंकि यह-
1. पौधों के हरितकवक, अमीनो अम्ल, विटामिंस, न्यूक्लिक अम्ल, प्रोटीन, एमाइड, एल्कालाइड तथा प्रोटोप्लाज्म के संश्लेषण में सक्रिय भाग लेता है।
2. एडिनोसिन ट्राईफास्फेट (जो कि एक श्वसन ऊर्जा वाहक है) का एक अवयव है।
3. सभी जीवित कोशिकाओं की वृद्धि एवं विकास को बढ़ाता है।
4. चारे एवं पत्तियों वाली सब्जियों के गुणों को सुधारता है।
जिस खेत में हरी खाद की फसल बोई गई हो उसी खेत में पलटना
इस विधि में हरी खाद की फसल को उसी खेत में उगाया जाता है जिसमें हरी खाद देनी होती है। खेत में खड़ी फसल को उचित अवस्था पर उसी खेत में जोत दिया जाता है। सनई, ढैंचा, लोबिया, मूंग, ग्वार आदि फसलें इस विधि के लिए उपयुक्त होती हैं। यह विधि मुख्यतः उत्तरी भारत में अपनाई जाती है।
हरी पत्तियों की खाद
इस विधि में जंगलों के पास पेड़-पौधों, मेड़ों व बेकार पड़ी जमीनों पर उगे पेड़-पौधों या झाड़ियों की हरी पत्तियों तथा मुलायम शाखाओं को इकट्ठा करके किसी अन्य खेत (जिसमें कि हरी खाद को डालना होता है) में जाकर मिट्टी में मिला दिया जाता है। इसके लिए करंज सिस्बेनिया, स्पेशिओसा, ग्लिरिसिडिया माकुलाटा आदि पौधे मुख्य रूप से उपयोग में लाए जाते हैं। इस विधि का उपयोग साधारणतया पूर्वी तथा मध्य भारत में किया जाता है।
तालिका- 1 हरी खाद द्वारा नाइट्रोजन की मात्रा
| ||||
फसल | उगाने का मौसम | हरे पदार्थ का औसत उत्पादन (टन/हे.) | हरे भाग के आधार पर नाइट्रोजन की प्रतिशतता | मृदा में मिलाई गई नाइट्रोजन की मात्रा किग्रा/हे. |
ढ़ैंचा | खरीफ | 14.4 | 0.42 | 77.10 |
सनई | खरीफ | 15.2 | 0.43 | 84.0 |
मूंग | खरीफ | 5.7 | 0.53 | 38.6 |
लोबिया | खरीफ | 10.8 | 0.49 | 56.3 |
ग्वार | खरीफ | 14.4 | 0.34 | 62.3 |
सैंजी | रबी | 20.6 | 0.51 | 134.0 |
खेसारी | रबी | 8.8 | 0.54 | 61.4 |
बरसीन | रबी | 11.1 | 0.34 | 60.7 |
तालिका- 2 :
हरी खाद के उपयोग से विभिन्न फसलों की उपज में प्रतिशत बढ़ोतरी
| |||
फसल | राज्य/प्रांत | हरी खाद की फसल | उपज में प्रतिशत बढ़ोत्तरी |
धान | तमिलनाडु | सनई | 24 |
पश्चिम बंगाल | सनई | 20 | |
ढ़ैंचा | 21 | ||
ओडिसा | ढ़ैंचा | 24 | |
उत्तर प्रदेश | ढ़ैंचा | 51 | |
बिहार | ढ़ैंचा | 60 | |
सनई | 63 | ||
आन्ध्र प्रदेश | सनई | 114 | |
ढ़ैंचा | 80 | ||
जम्मू एवं कश्मीर | मसूर | 54 | |
गेहूं | पंजाब | भांग | 35 |
उत्तर प्रदेश | लोबिया | 21 | |
सनई | 45 | ||
ढ़ैंचा | 16 | ||
बिहार | सनई | 106 | |
मध्य प्रदेश | सनई | 13 | |
दिल्ली | सनई | 35 | |
गन्ना | उत्तर प्रदेश | सनई | 30 |
असम | सनई | 09 | |
कपास | गुजरात | ढ़ैंचा | 21 |
महाराष्ट्र | ढ़ैंचा | 12 | |
तमिलनाडु | सनई | 21 |