यह सर्वविदित है कि जिस प्रकार से मनुष्य को अपनी शारीरिक आवश्यकता के हेतु जल की आवश्यकता पड़ती है वैसे ही पौधों को भी अपनी जरूरतें पूरी करने के लिये जल की आवश्यकता पड़ती है। पौधों के लिये कई प्रकार के खनिज तत्व एवं रासायनिक यौगिक मृदा में मौजूद रहते हैं। लेकिन पौधे उन्हें ठीक तरह से ग्रहण नहीं कर सकते हैं मृदा में उपस्थित जल इन तत्वों को घोल कर जड़ों के माध्यम से पौधों की पत्तियों तक पहुँचाता है। पूर्वी उत्तरप्रदेश में किसान प्रायः धान-गेहूँ फसल चक्र को अपनाते है लेकिन नहर के अंतिम छोर पर सिंचाई जल की कम उपलब्धता के कारण कृषकों को पारंपरिक फसलोत्पादन से समुचित लाभ नहीं मिल पाता है। इस क्षेत्र की शारदा सहायक नहरी कमांड की चाँदपुर रजबहा एवं उसकी छ अल्पिकाओं के अधीन कुल 4551 कृषि क्षेत्र फल/ हेक्टेयर आता है जिसका मात्र 27.7 प्रतिशत क्षेत्रफल ही इस उपलब्ध जल से सिंचित हो पाता है जिसका अधिकांश भाग अल्पिकाओं के शीर्ष एवं मध्यम छोर तक ही सीमित होता है तथा अंतिम छोर पर सिंचाई जल की बहुत कमी रहती है। अत: नहर के अंतिम छोर पर कम सिंचाई जल है। उपलब्ध होने की स्थिति में जल की उपलब्धता के अनुसार उचित फसल योजना तैयार करनी चाहिये तथा सीमित जल का अधिक से अधिक फसल द्वारा उपयोग संभव करवाना ही तमाम कृषि पद्धतियों का मूलभूत उद्देश्य होना चाहिये ताकि कृषि से अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सके।
अतः इस गंभीर स्थिति में नहर के अंतिम छोर पर जहाँ सिंचाई जल कम उपलब्ध रहता है वहाँ कम जल की आवश्यकता वाली दलहनी फसल अरहर के साथ उड़द / धान (अगेती प्रजाति की सहफसली खेती उपलब्ध जल (नहर और वर्षा जल के सही उपयोग यानि प्रति जल बूंद अधिक फसल उत्पादन (More crop per drop ) के सिद्धान्त पर करना उपयुक्त हो सकता है। इसी प्रमुख उद्देश्य को ध्यान में रखकर चाँदपुर रजबहा की अल्पिकाओं के अंतिम छोर पर किसानों की सहभागिता से उनके खेतों पर लगातार चार वर्षों तक इस तकनीक का अध्ययन पारंपरिक कृषि पद्धति के सापेक्ष किया गया। इन अनुसंधान परीक्षणों के परिणाम काफी उत्साहजनक प्राप्त हुये हैं।
कम जल मॉंग वाली दलहनी फसल अरहर के साथ उड़द / धान (अगेती प्रजाति की सहफसली खेती को दो अलग अलग फसल पद्धतियों के साथ किया जा सकता है। इस प्रकार से खेती करने पर किसान अपने खेत से अधिक फसल उत्पादन प्राप्त कर सकते है।
आमतौर पर यही देखा गया है कि किसी नहर के तीन छोरों (मुख्य, मध्यम एवं अंतिम) में से इसके अंतिम छोर पर किसानों हेतु कृषि के लिए जल की उपलब्धता कम ही प्राप्त हो पाती है क्योंकि नहर में छोड़े गए जल का अधिकांश उपयोग मुख्य एवं मध्यम छोर पर कृषि करने वाले किसान कर लेते हैं। अत: इस स्थिति का सामना करने के लिए वहाँ के किसानों हेतु नहर के अंतिम छोर पर कृषि के लिए सिंचाई जल की कम उपलब्धता की स्थिति पैदा हो जाती है इसलिए, वहाँ पर अरहर के साथ उड़द / धान की उन्नत खेती करने का सुझाव दिया गया। इस सफल प्रयास को किसानों की सहभागिता के माध्यम से पूरा किया गया। किसानों के खेत पर अरहर एवं धान तथा धान/उड़द फसलों की सहफसली खेती के किये गये अनुसंधान परीक्षणों के परिणाम तालिका 7 में प्रस्तुत किये गये हैं।
ऊपर दी गई तालिका 7 से यह स्पष्ट हो जाता है कि अरहर की एकल खेती करने के बजाय यदि इसकी उड़द धान जैसी फसलों के साथ सहफसली खेती की जाए तो किसानों को अधिक कृषि आय प्राप्त होती है जो आज के समय की आवश्यकता है।
ऊँची क्यारियों पर अरहर की दो पंक्तियों एवं उड़द की तीन पंक्तियों के साथ सहफसली खेती करने पर अरहर धान की सहफसली खेती की अपेक्षा ₹ 9402 प्रति हेक्टेयर, मेड़ों पर अरहर की एकल खेती की अपेक्षा ₹ 19814 प्रति हेक्टेयर एवं समतल भूमि पर अरहर की एकल खेती (पारंपरिक कृषि पद्धति की अपेक्षा ₹38318 प्रति हेक्टेयर का अतिरिक्त शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ।
किसानों की सहभागिता के साथ उनके खेतों पर किये गये अनुसंधान प्रयोगों के आधार पर नहर के अंतिम छोर पर कम जल की उपलब्धता की स्थिति के तहत अरहर के साथ उड़द / अगेती धान की सहफसली खेती पारंपरिक अरहर की खेती की तुलना में क्रमश: 91.4 % एवं 69% अधिक लाभप्रद पायी गयी है। अतः किसानों को नहर के अंतिम छोर पर सिंचाई जल की कम उपलब्धता की स्थिति में अरहर के साथ उड़द एवं धान की सहफसली खेती करने का सुझाव दिया जाता है।
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