रामगाड़ नदी का प्रमुख उद्गम मुक्तेश्वर महादेव की चोटी के ठीक नीचे ‘शिव जटा संगम से होता है। इसकी एक धारा वन पंचायत बूढीबमा के जंगल पिसयापानी के प्राकर्तिक श्रोत से जो नर्मदेश्वर महादेव मंदिर कशियालेख के पास है, से निकलकर तमाम जल धाराओं को शामिल कर नेगरा संगम में ‘रामगाड़’ से मिलती है। एक ही नदी उसके गाँव के लोगों के द्वारा स्थानीय बोली में अलग नाम से पुकारी और पहचानी जाती है। सदानीरा रामगाड़ नदी वास्तव में संकट में है।
शिव जटा मुक्तेश्वर महादेव मंदिर की चोटी के नीचे धारी में स्थित एक मंदिर है , जहाँ पर “जटा धारा सहित” दो और नदी धाराएँ मिलती हैं। यह स्थान बहुत पौराणिक , सांस्कृतिक महत्त्व रखता है। वन पंचायत दाड़िमा के अन्दर एक प्राचीन शिवालय और छोटा सा नदी संगम है , उसके नीचे लगभग 1 किलोमीटर पर एक और छोटा सा संगम है। इस तरह रामगाड़ नदी का उदगम शुरू हो जाता है , जिसमे पूर्व से जटाधारा और उसकी अन्य धाराएं जिसमे पूर्व से जटाधारा और उसकी अन्य धाराएं दक्षिण से बूढीबमा , सुनकिया होते हुए , पूर्व और पश्चिम की अनेक छोटी धाराओं को समाहित करते हुए नडगटा संगम बन जाता है। हम निम्न लोगो शिवजटा से विधिवत पूजा करने के बाद जटा धारा से सुनकिया नवीन की ओर चले , जहाँ पर जनमैत्री से जुड़े मदन डंगवाल ने यात्रियों का स्वागत किया। भोजन के बाद बैठक की गयी , जिसमे कुछ महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए।
यात्रीगण जो इसमें शामिल हुए, बची सिंह बिष्ट, महेश गलिया, महेश चन्द्र, हरि नयाल, कमलेश लोधीपाल, हेमंत कुमार सिंह बोरा, राजेंद्र प्रसाद जोशी, महेंद्र सिंह, सुभाष पंगरिया आदि।
जहां संपर्क अभियान चला। जल धाराएं शिव जटा दाड़िम गढ़गॉव , भ्योड़ा , कोकिलवना तल्ला , सूपी वन पंचायतें दाड़िम , सुनकिया , कोकिलवना , बूढी बना और उसकी वन पंचायत, सबसे समृद्ध वन पंचायत - दाड़िमा, कोकिलवना , सुनकिया , बूढी बना, घराट - 2 सुनकिया गाड़।
जहां नदी की समस्या देखीं गईं, सबसे अधिक अतिक्रमण - शिव जटा से नंगटा तक, नदी खनन क्षेत्र - बोल्डर सुनकिया गाड़, रेता, बोल्डर - गढ़गॉव , भ्योड़ा , कोकिलावना, सूपी के सेलवानी क्षेत्र में प्लास्टिक कचरा - शिव जटा और कोकिलवना , तल्ला सूपी।
उद्गम क्षेत्र में पक्षी क्षेत्र जो पाया गया - दाड़िम और सुनकिया , कोकिलावना के जंगल में, वन्य जीव - सभी वन पंचायतों में सूअर , बन्दर बाघ क्षेत्र
उद्गम क्षेत्र में मुख्य जोखिम (वनाग्नि क्षेत्र) - दाड़िम का ऊपरी क्षेत्र , कोकिलावना का खोदा क्षेत्र चीड़ से आच्छादित है।
सुनकिया नवीन में चर्चा का मुख्य विषय था कि स्थानीय नाले (जल वाहिका नदी ) पर एक मॉडल (ढाण ) जल बंधन। जलकोष निर्माण मुख्य नदी पर पुराने घराटों के लिए जल संग्रह क्षेत्रों में बंधन पर विचार।
स्थिति यह है कि नदी जीवन - सभी जलधाराएं अक्टूबर की बरसात से ही कुछ जीवित हुई हैं , जिनमे अब गर्मियों में पानी पूरी तरह सूख जाता है। जिसके कारण इन नदी धाराओं में जलीय जीवन पूरी तरह समाप्त हो चुका है।
सेलवानी से कोठगाड़ तक के बीच सड़क नदी में उतारी गयी है , जिसमें लगातार नदी तट पर अवैध खनन किया जा रहा है , कोठगाड़ के पास रिवाड़ नदी जब सेलवानी या रामगाड़ में मिलती है , वो यहाँ से काफी दूर तक नदी कोठगाड़ ही कहलाती है। यहाँ पर तीन पुराने घराट थे जो कि पानी की कमी की वजह से अब समाप्त हो चुके हैं। एक घराट का निशान मात्र शेष है। इसके आगे नदी किनारे रामगाड़ की ओर बढ़ने पर बाएं तरफ फिर एक घराट और पम्पिंग योजना मिलती है। दाहिने ओर सुरक्षित बाँज और खरसू का नया जंगल मिलता है। आगे लोद गांव का माप जमीन में बनाया गया है। विभिन्न चौड़ी पत्ती जातियों का साझा जंगल और दाहिने ओर चीड़ प्रजाति का जंगल मिलता है।
नदी में कुछ पानी है , किनारे कुछ जलस्रोत बारिश के बाद अच्छी स्थिति में हैं। नदी से पानी लेने के लिए लगातार पम्पिंग और लिफ्ट योजनाएं दिखती हैं। नदी पर रेता, बोल्डर खनन के निशान मिलते हैं , दोनों ओर गल्ला और नथुवाखान के गावों द्वारा बचाये जंगल मिलते हैं।
नथुवाखान के जंगल में काफल धारी तक, और फिर लोश्ज्ञानी मक़ामा , तल्ला रामगढ तक लगातार लगातार चीड़ मिलता है जबकि इधर गल्ला का जंगल बाँज और चीड़ तथा मैकामा। बाँज डाली के ठीक सामने पाटा का घना बाँज का जंगल भी दिखता है। गल्ला के नीचे नथुवाखान से एक जलधारा रामगाड़ में मिलती है। बाँजडाली के ठीक सामने पाटा गाड़ का रामगाड़ से संगम होकर आगे रामगढ़ बनकर नदी बहने लगती है। बाँजडाली के पास का घराट चलता हुआ, जीवित है। आगे तल्ला रामगढ़ नारायण स्वामी आश्रम के हनुमान मंदिर तक नदी के तट के पास कुछ न कुछ निर्माण कार्य होते दिखते है। पूरी नदी में जलीय जीवन समाप्त हो चुका है। रामगढ में हमारे पास स्थानीय अभिरक्षा इकाई के दो लोग मिलने आते हैं। वे यात्रा के उद्देश्य और उसमे शामिल लोगों के पूरी जानकारी लेना शुरू करते हैं। यह अजीब है परन्तु , कोई बात तो ज़रूर है। हेमंत बोरा जी सबके जलपान की व्यवस्था करते हैं| राजेंद्र जोशी जी , सुभाष पंगरिया और हेमंत जी तल्ला रामगढ़ से वापस हो जाते हैं. हम काफलधारी तक वाहन लेकर , फिर घरों को वापसी करते हैं।
आज सुरेश बिष्ट टांडा तक हमारे साथ आये लेकिन लाल सिंह और बसंत लाल पूरे रास्ते भर साथ रहे। बची सिंह बिष्ट , महेश गालिया, सुरेश सिंह बिष्ट, महेश चंद्र , राजेंद्र जोशी , शुभाष पंगरिया , हेमंत बोरा , लाल सिंह , महेंद्र सिंह , बसंत लाल , डिकर सिंह तल्ला रामगढ़ में यात्रा का समापन किया गया।
ग्राम सभा सूपी , कोकिलवना , लोद , गल्ला , सतबूंगा , नथुवाखान और महिला संघठन से जुड़े लोग सूचना के बाद भी अति व्यस्तता के कारण यात्रा में शामिल नहीं हुए। समस्या यह है कि नदी पर रेता, बोल्डर , पत्थर का खनन लगातार जारी है। नदी में जलीय जीवन समाप्त हो चुका है। स्थानीय जंगलों में सधलता बढ़ रही है है जबकि चीड़ का विस्तार भी काफी हो रहा है। नदी को लेकर लोगों को इस्तेमाल की समझ तो है लेकिन बचाने को लेकर कोई जागृति नहीं हैः। पंछी मैदानों को जा चुके हैं , तितलियाँ भी नहीं हैं। पूरा नदी तट खामोश और स्थपंदन रहित है।
आज रामगाड़ अध्ययन यात्रा का तीसरा दिन है। सात यात्री साथ चलने के लिए तैयार हुए ; डिकर सिंह लोधियाल जी कहते हैं देखो लड़कियों / महिलाओं को इन गाड़ गधेरों की यात्रा करवाना सही नहीं होगा , हम अपने शमशानों और बीहड़ जैसी डरावनी जगहों से गुजर रहे हैं। वो डरेंगी तो बाद में हमारा ही नाम आएगा। हमने तय किया है कि हम अंतिम दिन समापन पर महिलाओं का साथ लेंगे। सभी लोग काफलदारी से एक जीप लेकर तल्ला रामगढ़ पहुँच गए। जलपान के बाद ठीक खोजा गधेरा रामगाड़ संगम से नदी की ओर प्रस्थान करते हैं।
18 -19 अक्टूबर 2021 की तबाही के निशान अभी भी दिखते हैं। रामगाड़ ने अपना रौद्र रूप लेकर पुल , सड़क , मकान और खेत , बगीचे सब रौंद डाले थे , कई घर जो नदी के किनारे बने थे , वे अभी खंडहर हैं और जिन्होंने नदी पर अतिक्रमण किया था , उनके अहंकार को भी नदी नालों में चूर कर डाला था। इस अतिवृष्टि ने क्षेत्र में रामगाड़ के उदगम से संगम तक 25 से अधिक लोगों के प्राण ले लिए थे। अनुभवी लोग कहते हैं आपदा के बाद नदी का स्वरुप और व्यवहार दोनों बदल चुके हैं। लोग अपने खेतों को ठीक कर रहे हैं , रामगढ़ तक नदी से रेता , बोल्डर उठाने का काम चल रहा है। झूतिया के ओर बढ़ने पर नदी अपना मुख्य मार्ग छोड़कर गांव की ओर बढ़ चुकी है| उसके मुख्य मार्गों में मलबे के ढेर लगे हैं। ऐसा लगता है जैसे लोग नदी से डर गए हैं और अब उससे दूर हो जाना चाहते हैं।
गांव की महिलाओं और बुजुर्गों से बात करने पर वे बताते हैं कि रामगाड़ एक खूबसूरत नदी थी , जिसके किनारे बगीचे थे और आलू की खेती होती थी। चारों ओर बाँज का घना जंगल था। दूध पर्याप्त था चोटी में चीड़ के कुछ पेड़ थे, लगातार चीड़ का फैलाव बढ़ा , अत्यधिक निर्माण हुए और नदी की सहायक धाराओं में मानवीय अतिक्रमण होने से नदी बरसाती नाले में बदल गयी है , घराट , पम्पिंग योजनाएं , पुल और कई सहायक धाराएं नष्ट हो चुकी हैं। मुख्य नदी पर सरकार प्रदत्त निर्माण कार्यो से भी नदी का प्रवाह अपने मूल स्थान से हट चुका है। नीचे कुछ बाँज है ऊपर चोटी तक चीड़ का विस्तार हो चुका है , जिससे प्रतिवर्ष गर्मियों और जाड़ों के मौसम में आग लगती है। सैकड़ों वृक्ष, वनस्पतियाँ, वन्य जीव प्रजातियां , घासें आदि समाप्त हो चुकी हैं।
रामगाड़ नदी में मुख्य जल संग्रह धाराओं में बहुत अतिक्रमण हुआ है। शिवजटा , सुनकिया, बूढीबमा, सूपी, पल्ला, खपराड़ , मल्ला रामगढ़, उमगाढ़ क्षेत्र के अतिक्रमण से उमागढ़ के जलधाराएं झूतिया में मौत का तांडव कर चुकी हैं। कई घरों के दीवारें हिली हैं।
“रामगाड़ नदी में झूतिया तक जलीय जीवों का नामो निशान नहीं बचा है। नदी का अपना परितंत्र नष्ट हो चुका है न, यह बरसाती नाले में बदल कर अपना सदाजीवी स्वरुप खो चुकी है। हमारा आज का निष्कर्ष है कि तमाम बिल्डिंग , सड़कें , सरकारी विकास कार्यों में नदी और उसकी सहायक जल धाराओं के प्राकर्तिक यात्रा पथ व् प्रवाह की अनदेखी की गयी है , जिसके कारण नदी अपने रौद्र रूप में विनाशक बन जाती है , नदी नाले जलस्रोत सूखते जा रहे हैं और नदी सदाजीवी स्वरुप खो रही है। मानवीय अतिक्रमण और नदी जीवन के साथ क्रूरता ने नदी को प्राणहीन , स्पंदनहीन घातक नाले में बदल दिया हैं।
झूतिया के ही तोक पिछलटाना के पास से आज अंतिम दिवस की यात्रा प्रारम्भ की गयी, नदी में कई स्थानों पर जाने का मार्ग नहीं है। चीड़ बाहुल क्षेत्र है , हर वर्ष आग लगती है , पुराने बुजुर्ग बताते हैं कि पानी की मात्रा अब बहुत घट गयी है , पहले लगभग 50 वर्ष पूर्व पूरा बाँज का जंगल था , जंगलों में वन्यजीव थे और नदी में भी मछलियॉँ व् अन्य नदी जीव मौजूद थे> नदी किनारे के घराट अब प्रचलन में नहीं है , पम्पिंग योजनाएं , हाईड्राम भी अब बंद हो चुकी हैं। पिछलटाना से सुकुमा तक मानव आबादी है , फिर काफी दूर जाकर हली हरतपा की बस्तियाँ आती हैं| बीच में वनस्पतियों का स्वरुप बदल गया। चीड़ के साथ अब आँवला , बेल और गर्म घाटी की वनस्पतियाँ मिलने लगती हैं। अंतिम सिरे पर रामगाड़ जल विधुत परियोजना का पुराना स्टेशन मिलता हैं, जो रन ऑफ रिवर से विकेन्द्रित विद्युत उत्पादन का बहुत बढ़िया उदाहरण है।
शिप्रा और रामगाड़ के संगम में बैठकर यात्रा का समापन किया गया। इस दौरान यात्रा के अनुभव बांटे गए तथा नदी सरंक्षण के व्यापक उद्धेश्य को समझने का प्रयास भी किया गया। यह बैठक ठीक रामगाड़ और शिप्रा के तट पर नदी के पत्थरों में बैठकर की गयी। लगभग दो घंटे के विचार विमर्श के दौरान लोगों ने यात्रा की जरुरत, नदी की स्थिति , उसके मुख्य उद्गम स्थल पर, सहायक धाराओं की स्थिति , अतिक्रमण और भविष्य के कार्यों पर विचार किया गया।
समापन के अवसर पर सभी ने अपनी बात रखी। बची सिंह बिष्ट ने कहा अपनी नदी और उसके पानी से अपने समाज को जोड़ने की कोशिश है , नदी और उसकी जल धाराओं का संकट पूरी दुनिया के लिए नया खतरा है। भावी पीढ़ियों को स्वस्थ परिवेश और सम्पन्न इकोतंत्र देने की इच्छा है।
महेश गलिया ने बताया कि नदी की जलधाराओं में मानवीय हस्तक्षेप ने नदी जीवन को ही समाप्त कर दिया है। पानी बह रहा है, जीवन नहीं। यात्री महेश चंद्र ने कहा कि रामगाड़ नदी में चार दिनों से कोई जलीय जीव नहीं देखा , नदी का हक़, उसका रास्ता तक घेर लिया है, और उसके किनारे भी जीवनहीन बना दिए हैं। बहुत ही दुखद स्थिति है।
बसंत लाल - नदी को देखने की यह दृष्टि पहली बार मिली, अब जब ऐसे देखा तो दिक्कत की गहराई समाज में आई है।
महेंद्र सिंह मेहरा - यह नदी वाकई में संकट में है , आप सभी लोगों ने खुद विचार कर अपनी नदी के बारे में सोचना और लोगों के साथ नदी को पुनर्जीवित सदावाहिनी बनाने का विचार किया, यह अद्भुत है। मै फिर आऊंगा , यह मेरे शोध का विषय है, नदी पर पुराने घराट , पम्पिंग योजनाएं और नदी से जुडी वनस्पतियाँ , जीवन और लोग हमारा विषय है , हम लगातार साथ रहेंगे।
द्वाराहाट सुईखेत इंटर कॉलेज के शिक्षक और पानी बोओ , पानी उगाओ अभियान के प्रणेता मोहन कांडपाल जी ने कहा कि हमने इस यात्रा से सीख लिया कि कैसे समाज नदी से जुड़ता है। अभी तक हम छात्रों और महिलाओं को ही जोड़ रहे थे , रिक्किन नदी पर उसके जलागम पर पिछले 30 सालों के कार्यों के अनुभवों को जोड़ते हुए कांडपाल जी ने इस यात्रा की जरुरत को समझते हुए , इसके सफल संचालन के लिए बची सिंह बिष्ट और उनके साथियों को बधाई दी।
इस यात्रा से जुड़े राजेंद्र जोशी ने ग्राम्य परिवेश और उसको लेकर अपने अनुभव साझा करते हुए रामगाड़ नदी अध्ययन यात्रा को सफल बनाने वाली टीम को बधाई दी।
हीरा जंगपांगी रौतेला ने बताया कि महिलाएं प्रकर्ति के सबसे नज़दीक होती हैं। पर्वतीय उत्तराखंड की ग्रामीण महिलाओं का जीवन खेत, पानी , घास , पशुओं और जंगलों के साथ ही जुड़ा होता है। इसीलिए नदी अभियान में उनकी बड़ी भागीदारी बहुत जरुरी है। पर ऐसा प्रयास है जिसे आगे बढ़ाने की जरुरत है। महिलाओं को अधिक से अधिक जोड़ने के लिए उनकी अधिकतम सक्रिय भागीदारी बढ़ाने की जरुरत है।
श्री हेमंत बोरा जी ने नदी को माता कहा और मनुष्य की आध्यात्मिक चेतना की उच्यता का केंद्र बताया। उन्होंने जीवन की उत्पति , सभ्यताओं के विकास और अन्य आध्यात्मिक पूर्णताओं की प्राप्ति का केंद्र नदी को बताया।
उन्होंने कहा कि नदी, समाज, जंगल , खेत सब एक दूसरे के पूरक हैं। यह सरकार का कार्य बाद में है , पहले समाज का कार्य है।
समापन से पूर्व ग्राम प्रधान सतबूंगा द्वारा सभी जल अध्ययन यात्रियों का भव्य स्वागत किया गया। यात्रा के समापन पर अध्यक्ष जीवन गौड़ ने सभी को बधाई दी और जल संचय के अपने कार्यों के साथ व्यापक जल कोष नियोग के लिए साथ जुड़ने की जरुरत पर बल दिया। चार दिवसीय नदी अध्ययन यात्रा ने अनेक पहलुओं पर समझ को बढ़ाया। जिसके निष्कर्षों पर सभी यात्री अपने अपने अनुभव लिखकर एक साझा रिपोर्ट तैयार करेंगे।
नदी जीवन शून्य कैसे हो गया , हमारे पहले और हमारे सामने रामगाड़ नदी में सैकड़ों बड़े बड़े तालाब थे , जिसको हम अपनी बोली मछली का “गाड़ या गढ़ “ कहते थे, हमने पाया कि इधर शिवजटा उदगम से बूढी बना मोक्ष धाम से रामगाड़ संगम तक वे पुराने सभी ताल और डोबरे भर चुके हैं। मछली के घर मलबे , रेता , बोल्डर से पट चुके हैं। रामगाड़ तक के झरने भी समाप्त हो चुके हैं। जो नदी कभी उद्धाह लेती , जीवन से भरपूर थी। सदियों से इसमें जीवन मौजूद था, इसे जीवन विहीन करने के अनेक कारण हमको समझ में आये, जिनमे मुख्य कारणों को हमने अनुभव से समझा है।
रामगाड़ एक जीवनदायिनी नदी है। सदियों से यह आसपास के खेतों, ग्रामवासियों के लिए सिंचाई , पेयजल , धार्मिक एवं पारम्परिक रीति रिवाजों के लिए जल उपलब्ध करवाती रही है। अचानक से यह अपने रौद्र और विनाशकारी स्वरुप में आकर लोगों के खेतों, घरों और जीवन को समाप्त करने लगती है। वर्ष 2021, अक्टूबर में आई आपदा में नदी और उसकी सहायक धाराओं ने 25 से भी अधिक लोगों की जान ले ली। सैकड़ों नाली जमीन , बगीचों और कृषि उदपादक क्षेत्र को रौखड़ में बदल दिया , सैकड़ों लोगों को घरों से बेघर कर दिया तथा अनेक मकानों को क्षतिग्रस्त व् कइयों को जमीनदोज़ कर दिया। जिसके कारण लोग नदी से डरने लग गए हैं।
सुरक्षित गांव , नदी क्षेत्र का इलाका आपदा क्षेत्र बन गया, जिसके पीछे के कारणों को समझने का भी प्रयास इस नदी अध्ययन यात्रा के दौरान किया गया। रामगाड़ व् उसकी सहायक धाराओं में 30 के करीब पारम्परिक घराट और पम्पिंग योजनाएं थी , जिनमे से सिर्फ 2 पम्पिंग हाउस और 1 घराट ही जीवित है। अधिकतर नदी प्रवाह की कमी से सूख गए हैं या पिछली आपदाओं में बह चुके हैं। इनके कारण की पड़ताल का प्रयास हमने इस नदी अध्ययन के दौरान किया, तमाम कारण जो हमारी स्थानीय अध्ययन टोली को दिखे , बताये गए और समझ में आये उनकी अपने अध्ययन विवरण में स्थान देने का प्रयास किया है -
लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें