भीषण गर्मी और लू के थपेड़े (हीटवेव) फसलों को प्रभावित करने के साथ ही किसानों व कृषि श्रमिकों के लिए खेतों में काम करना भी काफी मुश्किल कर देते हैं।
स्रोत : विकी कॉमंस
जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग के चलते गर्मियां साल दर साल और भी गर्म होती जा रही हैं। चिंताजनक बात यह है कि तेजी से चढ़ता पारा केवल तापमान या पर्यावरण से जुड़ी समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह हमारी खाद्य सुरक्षा के लिए भी एक गंभीर खतरा बनता जा रहा है। बढ़ती गर्मी भारत जैसे कृषि प्रधान देशों के लिए एक गंभीर संकट बनती जा रही है। क्योंकि, इसका असर खेती, पशुपालन से लेकर मत्स्य पालन तक पर पड़ रहा है, इन देशों की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। साथ ही देश की भारी-भरकम आबादी का पेट भरने के लिए भी इनका उत्पादन बेहद ज़रूरी है।
खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) और विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की रिपोर्ट के अनुसार अत्यधिक गर्मी वैश्विक स्तर पर कृषि के लिए सबसे गंभीर खतरों के रूप में तेजी से उभर रही है। इससे उत्पादन, आजीविका और खाद्य सुरक्षा प्रभावित हो रही है। इस तरह, बढ़ता तापमान अब केवल कभी-कभार आने वाली समस्या नहीं, बल्कि यह एक गंभीर खतरा बन गया है जो दुनिया भर की कृषि और खाद्य सुरक्षा को प्रभावित कर रहा है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और केंद्रीय शुष्क कृषि अनुसंधान संस्थान (CRIDA) की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में इस प्रवृत्ति का स्पष्ट उदाहरण देखने को मिला है। रिपोर्ट में बताया गया है कि 2022 में मार्च और अप्रैल सबसे गर्म महीने रहे, जब तापमान सामान्य से 8 से 10.8 डिग्री सेल्सियस अधिक था। कई क्षेत्रों में वर्षा में 99 प्रतिशत तक की कमी दर्ज की गई। गर्मी और सूखे के संयुक्त प्रभाव ने उत्तर और मध्य भारत में फसलों, पशुधन और किसानों की आय को गंभीर रूप से प्रभावित किया।
एफएओ-डब्ल्यूएमओ की रिपोर्ट के अनुसार, जब तापमान 30°C से ऊपर चला जाता है तो अधिकांश फसलें प्रभावित होने लगती हैं। अत्यधिक गर्मी प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया को कम करती है, फसलों के विकास चक्र को छोटा कर देती है और प्रजनन चरण को नुकसान पहुंचाती है। इससे उत्पादन घटता है और गुणवत्ता भी प्रभावित होती है।
भारत में ये प्रभाव 2022 की हीटवेव के दौरान स्पष्ट रूप से देखने को मिले। गेहूं की पैदावार में 9 से 34 प्रतिशत तक गिरावट आई, जिससे देश को निर्यात रोकना पड़ा। मक्का की फसल में वृद्धि रुक गई और कीटों के हमले बढ़े, जिससे उत्पादन में 18 प्रतिशत तक कमी आई। चना जैसी दलहनी फसलों में कमजोर वृद्धि और सिकुड़े हुए दाने देखने को मिले।
बागवानी फसलें इससे भी अधिक प्रभावित रहीं। पत्तागोभी, फूलगोभी और टमाटर जैसी सब्जियों में उत्पादन 50 प्रतिशत तक घट गया, जबकि सेब, आलूबुखारा और नींबू जैसी फलों की फसलों में फूल झड़ना, सनबर्न और कीट प्रकोप जैसी समस्याएं सामने आईं। ये नुकसान दर्शाते हैं कि अत्यधिक गर्मी केवल खाद्यान्न ही नहीं, बल्कि उच्च मूल्य वाली फसलों को भी गंभीर रूप से प्रभावित करती है।
भारत की लगभग 70 प्रतिशत कैलोरी आवश्यकता पूरी करने वाला चावल भी इस बढ़ते खतरे का सामना कर रहा है। वैश्विक स्तर पर भी चावल लगभग 20 प्रतिशत आहार ऊर्जा प्रदान करता है, जिससे यह खाद्य सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाता है। भारत में बढ़ते तापमान और अनियमित मानसून के कारण चावल की खेती, विशेष रूप से इंडो-गंगा के घनी आबादी वाले मैदानों में, अधिक जोखिम में आने की आशंका है।
एफएओ-डब्ल्यूएमओ की रिपोर्ट से स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग जैसी चीजें अब केवल एक पर्यावरणीय चिंता या बौद्धिक विमर्श का विषय नहीं रह गई हैं। अब यह प्रत्यक्ष रूप से हमारे जीवन और अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रही हैं। बढ़ती गर्मी और हीटवेव ने कृषि उत्पादन को गंभीर रूप से प्रभावित करना शुरू कर दिया है। लोगों के जीवन और रोज़गार पर भी इसका असर पड़ रहा है। यह हमारे और सरकारों के लिए एक गंभीर चेतावनी है। अगर समय रहते ग्लोबल वॉर्मिंग और जलवायु परिवर्तन को रोकने के कारगर कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में दुनिया को खाद्यान्न संकट से जूझना पड़ सकता है। इसलिए सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ ही हमें व्यक्तिगत स्तर पर खुद भी इस चुनौती से निपटने की पहल करनी होगी। सरकारों को कृषि और पर्यावरण के क्षेत्र में रिसर्च को बढ़ावा देना होगा और नीतिगत बदलावों के साथ ही इस समस्या से निपटने के लिए पर्याप्त संसाधन भी उपलब्ध कराने होंगे।हरवीर सिंह, कृषि विशेषज्ञ व एडिटर-इन-चीफ़, रूरल वॉयस
विश्वभर में हीट स्ट्रेस (अत्यधिक गर्मी) का प्रभाव पशुधन प्रणालियों पर भी पड़ रहा है। एफएओ-डब्ल्यूएमओ की रिपोर्ट के अनुसार बढ़ते तापमान से पशुओं में चारे का सेवन कम होता है, दूध उत्पादन घटता है और प्रजनन क्षमता प्रभावित होती है।
भारत में वर्ष 2022 की हीटवेव के दौरान दूध उत्पादन में लगभग 15% तक की गिरावट दर्ज की गई। डेयरी पशुओं के शरीर का तापमान बढ़ा, भूख कम हुई और बीमारियों की घटनाएं बढ़ीं। पोल्ट्री क्षेत्र भी प्रभावित हुआ, जहां शुरुआती दिनों में अंडा उत्पादन में लगभग 10% तक कमी आई और मृत्यु दर में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
रिपोर्ट के अनुसार यदि उत्सर्जन उच्च स्तर पर बना रहता है तो सदी के अंत तक दुनिया के लगभग आधे मवेशी खतरनाक हीट स्ट्रेस की स्थिति का सामना कर सकते हैं। इससे डेयरी और मांस उत्पादन प्रणालियों के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है।
अत्यधिक गर्मी का प्रभाव केवल भूमि आधारित कृषि तक सीमित नहीं है। समुद्री हीटवेव वैश्विक स्तर पर बढ़ रही है, जिससे मछलियों की संख्या और जलीय पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो रहे हैं। बढ़ते तापमान से पानी में ऑक्सीजन का स्तर घटता है, खाद्य श्रृंखला बाधित होती है और मछलियां ठंडे क्षेत्रों की ओर पलायन करने लगती हैं।
भारत का मत्स्य क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है, विशेष रूप से अंतर्देशीय जलीय कृषि प्रणाली अधिक संवेदनशील है, जहां बढ़ता तापमान पानी की गुणवत्ता को प्रभावित करता है और रोगों के प्रकोप को बढ़ाता है। जहां लाखों लोग आजीविका और पोषण के लिए मत्स्य पालन पर निर्भर हैं, यह बदलाव दूरगामी प्रभाव डाल सकते हैं।
एफएओ-डब्ल्यूएमओ की रिपोर्ट के मुताबिक हीटवेव का कहर दुनिया की कृषि उत्पादकता को 50% तक घटा सकता है।
प्रचंड धूप और गर्म हवाओं का मिश्रण देश के कई इलाकों में खेतों की मिट्टी को सुखाकर इस कदर सख्त कर देता है कि उसपर कोई भी फसल उग नहीं पाती।
वन और बागान फसलें लगातार बढ़ते तापमान के कारण हीट स्ट्रेस (गर्मी के दबाव) की चपेट में आ रही हैं। वैश्विक स्तर पर उच्च तापमान का संबंध जंगलों में आग की बढ़ती घटनाओं, कीट प्रकोप में वृद्धि और वनों में गिरावट से जोड़ा जा रहा है।
भारत में भी अत्यधिक गर्मी के दौरान बागान फसलें और बाग-बगीचे स्ट्रेस के संकेत दिखा चुके हैं। वर्ष 2022 में फलदार पेड़ों की उत्पादकता घटी और कीटों का प्रकोप बढ़ा। ऐसे प्रभाव न केवल किसानों की आय को कम करते हैं, बल्कि पारिस्थितिक संतुलन और जैव विविधता पर भी नकारात्मक असर डालते हैं।
अत्यधिक गर्मी का का गंभीर असर कृषि श्रमिकों और आर्थिक रूप से कमजोर ग्रामीणें की आजीविकाओं पर पड़ता है, जिसे अकसर नजरअंदाज कर दिया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार 20°C से ऊपर हर 1 डिग्री तापमान बढ़ने पर श्रम उत्पादकता में 2-3% की गिरावट आती है।
भारत जैसे देश के लिए यह संकट और भी गंभीर है, क्योंकि यहां बड़ी आबादी खेतों में मज़दूरी करके गुज़ारा करती है। केवल धान की खेती में ही लाखों श्रमिक खुले खेतों में बुवाई से लेकर निराई-गुड़ाई और कटाई तक का काम प्रचंड धूप और चिलचिलाती गर्मी के बीच करते हैं। हीटवेव के दौरान श्रमिकों को डिहाइड्रेशन, लू (हीटस्ट्रोक) और काम के घंटों में कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जिससे खेती-किसानी और ग्रामीण आय पर सीधा असर पड़ता है। चरम परिस्थितियों में कुछ क्षेत्रों में साल में 250 दिनों तक काम करना असुरक्षित हो सकता है।
इसके अलावा अत्यधिक गर्मी का असर ग्रामीण क्षेत्रों के अन्य रोज़गारों पर भी साफ दिखता है। जैसे मनरेगा यानी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के तहत काम करने वाले मज़दूरों को तेज धूप में काम करना मुश्किल हो जाता है, जिससे कार्यदिवस घट जाते हैं। मनरेगा को अब विकसित भारत रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) योजना में बदल दिया गया है, जिसका प्रचलित नाम Viksit Bharat- G RAM G Act 2025 या VB-G RAM G है।
इसी तरह निर्माण कार्य, ईंट-भट्ठों और छोटे ग्रामीण उद्योगों में भी उत्पादन धीमा पड़ता है। पशुपालन और दुग्ध उत्पादन पर भी असर पड़ता है, क्योंकि गर्मी के कारण पशुओं की सेहत और दूध देने की क्षमता घट जाती है। कुल मिलाकर, हीटवेव ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कई परतों को एक साथ प्रभावित करती है।
जलवायु अनुमानों के अनुसार दक्षिण एशिया में इस सदी के अंत तक वेट-बल्ब तापमान (Wet-Bulb Temperature) मानव जीवन के लिए खतरनाक स्तर तक पहुंच सकता है। गर्मी और आर्द्रता (नमी) का एक संयुक्त माप है, जो यह बताता है कि पसीना सूखने से शरीर कितनी अच्छी तरह ठंडा हो सकता है। यह तापमान इंसानों के लिए जानलेवा माना जाता है, क्योंकि इस पर शरीर खुद को ठंडा करने में असमर्थ हो जाता है।
जब उत्तर प्रदेश का कोई किसान गेहूं की पैदावार नौ कट्टा से घटकर चार कट्टा होते देखता है, तो केवल फसल की खराब होने की बात नहीं होती, बल्कि हम जलवायु परिवर्तन को अपने खाने की मेज पर दस्तक देते हुए देख रहे होते हैं। 2025 की एफएओ-डब्ल्यूएमओ रिपोर्ट इस बात की पुष्टि करती है कि हमारे किसान लंबे समय से क्या महसूस करते आ रहे हैं। अत्यधिक गर्मी अब वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बन गई है। यह संकट एक 'तेजी से बढ़ते खाई' की तरह है। हर 1 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि के साथ, वैश्विक गेहूं की पैदावार में 6% की गिरावट आती है। भारत में, लू (हीटवेव) के कारण खाद्य महंगाई में होने वाली बढ़ोतरी एक गंभीर समस्या बन गई है, जो इस दशक में 6.3% बढ़ी है। गर्मी न केवल खेतों की मिट्टी को सुखाती है, बल्कि पशुओं के लिए शारीरिक समस्याएं भी पैदा करती है और उनके लि खुले में काम करना जानलेवा बना देती है। गर्मी के कारण कृषि श्रमिकों की मौत की संभावना अब किसी भी अन्य क्षेत्र के श्रमिकों की तुलना में 35 गुना अधिक है। बढ़ते तापमान से पानी का वाष्पीकरण और जलभंडारों का क्षरण ठीक उसी समय तेज होता है जब फसलों को पानी की सबसे अधिक जरूरत होती है। ऐसे में अगर हम वाटरशेड मैनेजमेंट और जलवायु-अनुकूल सिंचाई को नहीं अपनाते तो हमारे लिए अपना पेट भरना तक मुश्किल हो सकता है। हालांकि गर्मी सहन करने वाली फसलें और बीमा महत्वपूर्ण हैं, लेकिन केवल इनके ज़रिये इस स्थिति से निपटने की कोशिश डूबती नाव को चम्मच से पानी निकाल कर बचाने की कोशिश जैसी है। अगर हम उत्सर्जन (इमिशन) में कमी लाने के उपाय तत्काल लागू नहीं करते, तो 65 करोड़ भारतीयों की कृषि विरासत विनाश के कगार पर पहुंच सकती है।डॉ. शैलेंद्र कुमार, प्रोफेसर (सहायक), पर्यावरण विज्ञान
गर्मी और लू के कारण कुएं व तालाब जैसे जलस्रोतों के सूखने के कारण ग्रामीण इलाकों में जल संकट काफी बढ़ जाता है।
दुनिया भर में हो रहे जलवायु परिवर्तन पर नज़र रखने और काम करने वाले इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) ने पिछले साल ही मूल्यांकन रिपोर्ट में वेट-बल्ब तापमान, ड्राई-बल्ब तापमान और ओसांक बिंदु तापमान का जिक्र किया है। यह गर्मी और आर्द्रता के संयुक्त प्रभाव एवं स्वास्थ्य पर इसके असर को जानने में मददगार ताम मापन प्रणालियां हैं।
वेट-बल्ब तापमान : वेट-बल्ब तापमान वह न्यूनतम (सबसे कम) तापमान होता है, जिससे हवा में पानी के वाष्पीकरण द्वारा निरंतर दबाव में हवा को ठंडा किया जा सकता है। यह गर्मी एवं आर्द्रता की वह सीमा है, जिससे अधिक तापमान को मनुष्य सहन नहीं कर सकता है। इस तरह वैज्ञानिक दृष्टि से ‘वेट बल्ब’ तापमान रुद्धोष्म संतृप्ति का तापमान (adiabatic saturation temperature) है। रुद्धोष्म प्रक्रम वह है, जिसमें न तो कोई ऊष्मा प्राप्त की जाती है और न ही खोई जाती है। वेट-बल्ब तापमान को गीले मलमल के कपड़े की पट्टी में लिपटे बल्ब के साथ थर्मामीटर का उपयोग करके ‘वेट बल्ब’ तापमान मापा जाता है। बल्ब पर लिपटी गीली पट्टी से वाष्पीकरण की दर और सूखे बल्ब तथा गीले बल्ब के बीच तापमान का अंतर हवा की नमी पर निर्भर करता है, क्योंकि वायु में जलवाष्प की मात्रा अधिक होने पर वाष्पीकरण की दर कम हो जाती है। वेट बल्ब का तापमान हमेशा ड्राइ बल्ब के तापमान से कम होता है लेकिन यह 100% सापेक्ष आर्द्रता (जब हवा संतृप्ति की सीमा पर पहुंच जाती है) के समान होगा। 31 डिग्री सेल्सियस पर वेट-बल्ब का तापमान मनुष्यों के लिये अत्यधिक हानिकारक होता है, जबकि 35 डिग्री सेल्सियस पर तापमान 6 घंटे से अधिक समय तक सहनीय नहीं हो सकता है।
ड्राई-बल्ब तापमान (Dry-Bulb Temperature) : ड्राई बल्ब तापमान को आमतौर पर हवा का तापमान (Air Temperature) भी कहा जाता है। यानी जब लोग हवा की गर्मी या हवा के तापमान का जिक्र करते हैं, तो वे आमतौर पर ड्राई बल्ब के तापमान (Dry Bulb Temperature) की बात करते हैं। ड्राई बल्ब तापमान मूल रूप से वातावरण में महसूस होने वाली हवा की गर्मी को बताता है। इसे "ड्राई बल्ब तापमान" इसलिए कहा जाता है, क्योंकि हवा का तापमान एक सूखे थर्मामीटर से लिए जाता है, जो हवा की नमी से प्रभावित नहीं होता है। ड्राई बल्ब तापमान को एक सामान्य थर्मामीटर का उपयोग करके मापा जाता है, जो स्वतंत्र रूप से हवा के संपर्क में आता है, लेकिन विकिरण (radiation) और नमी (humidity) से अप्रभावित या परिरक्षित (preserved) होता है। इस तरह ड्राई बल्ब तापमान शुद्ध रूप से हवा में मौजूद ऊष्मा (गर्मी) की मात्रा का सूचक है, जो आर्द्रता से प्रभावित नहीं होता।
ओसांक बिंदु तापमान (Dew Point Temperature) : ओसांक बिंदु वह तापमान है, जिसपर जल वाष्प संघनित (condense) होने लगती है। यानी यह वह तापमान है, जिस पर हवा आर्द्रता (नमी) से पूरी तरह से संतृप्त हो जाती है। इस तापमान के ऊपर जाने पर हवा में हमेशा नमी बनी रहती है। यदि ओसांक-बिंदु (Dew Point) तापमान शुष्क हवा के तापमान के लगभग बराबर है तो सापेक्षिक आर्द्रता (Relative Humidity) अधिक होती है। यदि ओसांक बिंदु शुष्क हवा के तापमान से काफी नीचे है, तो सापेक्षिक आर्द्रता (Relative Humidity) कम होती है। ओसांक बिंदु तापमान हमेशा ड्राइ-बल्ब तापमान से कम होता है और 100% सापेक्ष आर्द्रता (संतृप्त वायु पर) के समान होता है।
भीषण गर्मी के दौरान जल संकट कृषि, बागवानी, पशुपालन और मत्स्य पालन जैसे क्षेत्रों के लिए एक गंभीर चुनौती बनकर उभरता है। तापमान बढ़ने से मिट्टी की नमी तेजी से खत्म होती है, जिससे फसलों को अधिक सिंचाई की जरूरत पड़ती है, लेकिन तालाब, नहरें और भूजल जैसे जल स्रोत प्रचंड गर्मी के कारण सूखने लगते हैं। इसके अलावा लू (हीट वेव) के गर्म थपेड़ों से फसलें झुलस भी जाती हैं। इन सभी चीजों का सीधा असर इन क्षेत्रों के उत्पादन पर पड़ता है, खासकर धान, गेहूं और सब्जियों जैसी पानी-आधारित फसलों पर।
बागवानी वाली फसलों पर भी जल संकट का सीधा और गहरा असर पड़ता है, क्योंकि फल, सब्जियां और फूलों की खेती नियमित सिंचाई पर निर्भर करती है। पानी की कमी से पौधों की वृद्धि रुक जाती है, फल छोटे रह जाते हैं और उनकी गुणवत्ता व उत्पादन दोनों घट जाते हैं। अत्यधिक गर्मी के कारण फल समय से पहले पकने या झुलसने (sunburn) का खतरा भी बढ़ जाता है, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
पशुपालन में भी स्थिति चिंताजनक हो जाती है। पानी की कमी और गर्मी के तनाव के कारण पशुओं में डिहाइड्रेशन, चारा पाचन में दिक्कत और दूध उत्पादन में गिरावट देखने को मिलती है। कई क्षेत्रों में पशुओं के लिए पीने का पानी जुटाना भी मुश्किल हो जाता है।
वहीं मत्स्य पालन पर भी इसका गंभीर असर पड़ता है। तालाबों और झीलों का जलस्तर घटने से मछलियों के लिए ऑक्सीजन की कमी हो जाती है, जिससे उनकी वृद्धि रुकती है या बड़े पैमाने पर मृत्यु हो सकती है। इस तरह, भीषण गर्मी से उत्पन्न जल संकट न केवल किसानों और ग्रामीण आजीविका को प्रभावित करता है, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा पर भी सीधा खतरा पैदा करता है।
महिला किसानों व श्रमिकों के लिए हीटवेव के बीच काम करना काफी मुश्किल हो जाता है।
भीषण गर्मी का असर केवल खेतों में उत्पादन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि फसल कटाई के बाद की पूरी सप्लाई चेन को भी कमजोर कर देता है। यह पहलू अकसर चर्चा से बाहर रह जाता है। उच्च तापमान के कारण अनाज, फल और सब्जियों के खराब होने (post-harvest losses) की दर तेजी से बढ़ जाती है, खासकर उन ग्रामीण इलाकों में जहां कोल्ड स्टोरेज, वेयरहाउसिंग और तापमान नियंत्रित परिवहन की सुविधाएं सीमित हैं। फल-सब्जियों में नमी की कमी, जल्दी पकना और सड़न जैसी समस्याओं के चलते किसानों को उचित कीमत नहीं मिल पाती, जबकि उपभोक्ताओं तक पहुंचते-पहुंचते कीमतें बढ़ जाती हैं।
गर्मी का असर मंडियों और स्थानीय बाजारों में भी दिखता है, जहां लंबे समय तक भंडारण संभव नहीं होता। कई बार किसान मजबूरी में जल्दी बिक्री कर देते हैं, जिससे उन्हें नुकसान उठाना पड़ता है। वहीं परिवहन के दौरान भी तापमान नियंत्रण न होने से खाद्य सामग्री की गुणवत्ता गिरती है और अपव्यय बढ़ता है। इस तरह, उत्पादन में मामूली गिरावट भी सप्लाई चेन की कमजोरियों के कारण बड़े खाद्य संकट में बदल सकती है, जो अंततः खाद्य उपलब्धता और कीमत दोनों ही को प्रभावित करती है।
अत्यधिक गर्मी का एक और कम चर्चित लेकिन गंभीर पहलू खाद्य पदार्थों की पोषण गुणवत्ता में गिरावट है। वैज्ञानिक अध्ययनों से संकेत मिलता है कि तापमान में वृद्धि और जल संकट के कारण फसलों में प्रोटीन, आयरन, जिंक और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों की मात्रा कम हो सकती है। यानी सिर्फ उत्पादन ही नहीं, बल्कि भोजन की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। इसका सबसे ज्यादा असर उन समुदायों पर पड़ता है जो पहले से कुपोषण और सीमित आहार विविधता की समस्या से जूझ रहे हैं।
मिसाल के तौर पर, सब्जियों और दालों की गुणवत्ता घटने से संतुलित आहार पाना कठिन हो जाता है, जबकि पशुपालन और मत्स्य पालन पर असर के कारण दूध, अंडे और मछली जैसे प्रोटीन स्रोतों की उपलब्धता भी कम हो सकती है। इसके अलावा, गर्मी के कारण खाद्य पदार्थों का तेजी से खराब होना भी पोषण हानि को बढ़ाता है। यह स्थिति हिडन हंगर (Hidden Hunger) यानी छिपी भूख को जन्म देती है, जिसमें पेट तो भर जाता है, लेकिन शरीर को जरूरी पोषक तत्व नहीं मिलते। लंबे समय में यह बच्चों के विकास, प्रतिरोधक क्षमता और समग्र स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल सकता है, जिससे खाद्य सुरक्षा का संकट और गहरा हो जाता है।
हीटवेव की मार शहरी जीवन पर भी जमकर पड़ती है, जहां इसके चलते लोगों का घरों से निकलना तक मुश्किल हो जाता है।
तापमान में बढ़ोतरी के बढ़ते जोखिमों को देखते हुए FAO और WMO के अध्ययनों में अत्यधिक गर्मी के प्रभाव को कम करने के लिए कई अनुकूलन रणनीतियों पर जोर दिया गया है। एफएओ-डब्ल्यूएमओ की रिपोर्ट में गर्मी के प्रति सहनशील फसल किस्मों के विकास, बेहतर सिंचाई व्यवस्था, उन्नत मृदा प्रबंधन और जलवायु-स्मार्ट खेती को अपनाने की आवश्यकता जताई गई है।
इसके अलावा बुवाई की तारीखों में बदलाव और जल्दी पकने वाली किस्मों का उपयोग करने की सलाह भी दी गई है, क्योंकि ऐसा करके किसान और कृषि श्रमिक प्रचंड गर्मी के प्रकोप से बच सकते हैं। कुछ सरल उपायों को अपना कर कृषि, पशुपालन जैसे क्षेत्रों में प्रचंड गर्मी के प्रभाव को कम किया जा सकता है-
हीटवेव के दौरान काम के समय में बदलाव (सुबह-शाम शिफ्ट) और दोपहर में विश्राम की व्यवस्था करना।
खेतों में शेड नेट, मल्चिंग और एग्रोफॉरेस्ट्री जैसे उपायों से सतही तापमान कम करना।
वर्षा जल संचयन (रेनवॉटर हार्वेस्टिंग) और सूक्ष्म सिंचाई तकनीक जैसे ड्रिप व स्प्रिंकलर सिस्टम का विस्तार करना।
सामुदायिक जल संरचनाओं (तालाब, कुएं) को पुनर्जीवित करने और इनके संरक्षण पर जोर देना।
मौसम आधारित कृषि सलाह (Weather Advisory) को मोबाइल और लोकल नेटवर्क के जरिए किसानों तक पहुंचाना।
हीटवेव के लिए विशेष एक्शन प्लान और स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण कार्यक्रमों का अयोजन करना।
पशुओं के लिए शेड, पर्याप्त पानी और ठंडा रखने के लिए कूलिंग सिस्टम, फॉगिंग जैसे उपाय करना।
फसल विविधीकरण, ताकि एक ही फसल पर निर्भरता कम हो और जोखिम बंट जाए।
स्थानीय स्तर पर बीज बैंक और जलवायु अनुकूल किस्मों की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
महिला और छोटे किसानों के लिए लक्षित वित्तीय सहायता और आसान ऋण उपलब्ध कराना।
अच्छी बात यह है कि भारत में इस तरह की रणनीतियों पर काम किया भी जा रहा है। धान की खेती में जल्दी फूल आने वाली किस्मों का उपयोग, रोपाई के समय में बदलाव और सिंचाई के माध्यम से सतह के तापमान को कम करना प्रमुख उपायों में शामिल हैं। इसके साथ ही, गर्मी सहन करने वाली फसलों के विकास पर भी जोर बढ़ रहा है।
संस्थागत स्तर पर अर्ली वार्निंग सिस्टम, फसल बीमा योजनाएं और जलवायु परामर्श सेवाएं बेहद महत्वपूर्ण मानी गई हैं। हालांकि विशेषज्ञों के अनुसार जागरूकता की कमी, सीमित वित्तीय संसाधन और कमजोर विस्तार सेवाएं, विशेषकर छोटे और सीमांत किसानों के लिए, अब भी बड़ी बाधाएं बनी हुई हैं।
कृषि पर अत्यधिक गर्मी का बढ़ता प्रभाव यह दर्शाता है कि जलवायु जोखिम आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं। भारत जैसे देश में, जहां कृषि आजीविका और खाद्य सुरक्षा का मुख्य आधार है, यह चुनौती और भी गंभीर है। किसानों की सुरक्षा और स्थिर खाद्य आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए अनुकूलन उपायों, निवेश और मजबूत नीतिगत समर्थन के माध्यम से लचीलापन बढ़ाना बेहद जरूरी होगा। रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि केवल अनुकूलन ही पर्याप्त नहीं है। दीर्घकालिक नुकसान से बचने के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी लाना और तापमान वृद्धि को सीमित करना अनिवार्य है।
लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें