थूथुकुडी के नमक के खेतों में बारिश का पानी भरने से बनी खारी झीलों में प्रवास के लिए आ पहुंचे लाखों रोजी स्टार्लिंग पक्षी। 

 

स्रोत : विकी कॉमंस

जलवायु परिवर्तन

जलवायु का नया संकेत : थूथुकुडी के नमक के खेत बने रोजी स्टार्लिंग पक्षियों का नया ठिकाना

जाड़े में बेमौसम हुई बारिश का पानी भरने से तमिलनाडु का थूथुकुडी इलाक़ा खारे पानी की झील और वेटलैंड में बदल गया। अनुकूल माहौल और भरपूर भोजन मिलने के कारण प्रवास के लिए आए सैलानी पक्षियों के झुंड।

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय

नमक उत्‍पादन या नमक के खेतों की बात की जाए, तो लोगों के ज़हन में आमतौर पर गुजरात के कच्‍छ के रण की तस्‍वीरें ही उभरती हैं, जहां से देश का तरकीबन 75% नमक आता है। इसके बाद राजस्‍थान की सांभर झील का नमक मशहूर हैं। लेकिन, इन दोनों से सैकड़ों किलोमीटर दूर तमिनाडु के तटीय इलाके थूथुकुडी (तूतीकोरन) में भी नमक की खेती होती है, जिसके बारे में लोग कम ही जानते हैं। थूथुकुडी के यह नमक के खेत आजकल एक अनूठी घटना का गवाह बन गए हैं। आमतौर पर एकरंगी और निर्जीव माने जाने वाले इन नमक के खेतों में गज़ब के जीवंत नज़ारे देखने को मिल रहे हैं। 

हाल ही में हुई बेमौसम बारिश के बाद जब प्रवासी पक्षी रोजी स्टार्लिंग के झुंडों ने यहां डेरा जमाया, तो यहां के नीरव-नीरस परिदृश्य में भी एक गुलाबी सी मनभावन रंगत और पंछियों की चहचहाटों का सुमधुर संगीत गूंज उठा। पंछियों के गुलाबी पंखों और सामूहिक उड़ान ने दूर तक सफेद और मटमैली नज़र आने वाली इस भूमि को एकदम से एक जीवंत परिदृश्‍य दे दिया। यह बदलाव केवल दृश्य का नहीं, बल्कि इस बात का भी संकेत है कि अनुकूल हालात बनने पर प्रकृति कई बार सबसे अप्रत्याशित जगहों में भी जीवन के अवसर खोज लेती है।

तमिलनाडु के तटवर्ती इलाके थूथुकुडी में नमक के खेत, जहां से आता है देश का करीब 10–12% नमक।

पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण घटना

पिछले दिनों हुई भारी बारिश ने तमिलनाडु के थूथुकुडी बंदरगाह के आसपास के इलाकों में स्थित नमक के खेतों को प्रवासी पक्षियों का नया ठिकाना बना दिया है। खासतौर पर प्रवास के लिए लंबी दूरी की उड़ान भरने वाली पक्षियों की प्रजाति रोजी स्टार्लिंग की बड़ी संख्‍या में मौजूदगी लोगों के बीच कुतुहल का विषय बनी हुई है। वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक जनवरी के अंतिम सप्‍ताह में हुई भारी बारिश की वजह से नमक के खेत अस्थायी रूप से उथली वेटलैंड्स में बदल गए हैं। इसके चलते यहां सैलानी पंछियों की गतिविधियां अचानक से बढ़ गई हैं। इसे एक दुर्लभ और पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण घटना के रूप में देखा जा है।

वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार हाल ही में असामान्य रूप से हुई भारी बारिश के कारण थूथुकुडी के आसपास के उपनगरीय नमक के खेतों में बड़े पैमाने पर पानी जमा हो गया है। इस जलभराव के कारण यह नमक के खेत, जिनका इस्तेमाल आमतौर पर सिर्फ नमक बनाने के लिए होता है, अस्थायी रूप से एक खारे पानी की उथली झील और वेटलैंड्स में बदल गए हैं। इससे पक्षियों को खाने और आराम करने के लिए एक आदर्श जगह मिल गई है, क्‍योंकि वह ऐसे ही इलाक़ों में प्रवास करना पसंद करते हैं। थूथुकुडी में प्रवासी पक्षियों का इस तरह बड़े पैमाने पर इकट्ठा होना आम बात नहीं, पर अनुकूल परिस्थितयां उत्‍पन्‍न होने के कारण अचानक से बड़ी संख्‍या में पक्षियों के झुंड यहां आ गए हैं।

आम बात नहीं है पक्षियों का यह जमावड़ा

एक मीडिया रिपोर्ट में वन विभाग के पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन विभाग की डिप्टी डायरेक्टर डॉ. आर. मीनाक्षी ने बताया, “नमक के खेतों में पानी के पक्षियों का इस तरह बड़े पैमाने पर इकट्ठा होना आम बात नहीं है। बारिश के पानी से छोटी मछलियों, लार्वा और कीड़ों जैसे पानी के जीवों को बढ़ने में मदद मिली है, जिससे खाने की उपलब्धता में काफी सुधार हुआ है।”

विशेषज्ञों के मुताबिक उथले पानी में कीट, छोटे जलीय जीव और बीजों की उपलब्धता ने इन पक्षियों को यहां रुकने के लिए आकर्षित किया है। ऐसे में प्रवासी पक्षी स्वाभाविक रूप से, इस प्रचुरता पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं और नमक के मैदानों में पक्षियों के झुंड अक्सर उतरते हुए देखे जा रहे हैं। यह झुंड पूरे दिन इन खेतों में घूम-घूम कर अपने आहार का लुत्फ उठा रहे हैं। पर्यावरण की दृष्टि से एक और दिलचस्प बात यह है कि रोजी स्टार्लिंग्स के बड़े झुंड भी आए हैं, जिन्हें जिले के ऊपर घने, एक साथ उड़ते हुए देखा जा रहा है।

तमिलनाडु के थूथुकुडी में रोजी स्टार्लिंग का यह बसेरा जितना आकर्षक दिखता है, उतना ही यह असामान्य भी है।

प्रवासी पंछियों के अचानक आने से लोग चकित

आमतौर पर खुले मैदानों, कृषि क्षेत्रों और पेड़ों पर बसेरा करने वाली रोजी स्टार्लिंग का नमक के खेतों में दिखना स्थानीय लोगों के लिए चौंकाने वाला है। अचानक प्रवासी पंछियों के बड़े झुंडों के आने से स्थानीय लोग जहां चकित हैं वहीं वह पक्षियों की मनमोहक गतिविधियों का आनंद भी ले रहे हैं। कुल मिलाकर इस बदलाव ने स्‍थानीय लोगों और पक्षी प्रेमियों का ध्यान खींचा है, क्‍योंकि यह लोग पहली बार ऐसे दृश्य यहां देख रहे हैं।

नमक मजदूरों और आसपास के गांवों के लोगों के लिए रोजी स्टार्लिंग का यह जमावड़ा केवल एक दृश्य भर नहीं है, बल्कि बदलते मौसम का संकेत भी है। थूथुकुडी के बुजुर्ग निवासी एन अरिवल्गन का कहना है कि पहले भी असाधारण बारिश के बाद पक्षियों की गतिविधि बढ़ती रही है, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में रोजी स्टार्लिंग पहले कम ही देखी गई। यह घटना जलवायु परिवर्तन और तटीय इलाकों की संवेदनशीलता पर भी सवाल खड़े करती है।

लंबी दूरी के प्रवासी पक्षी रोजी स्टार्लिंग्स, जो उत्तर-पश्चिम एशिया और पूर्वी यूरोप में अपने प्रजनन क्षेत्रों से प्रवास करते हैं और आमतौर पर अक्टूबर और नवंबर के बीच भारत पहुंचते हैं, वह भी बड़ी संख्‍या में यहां नज़र आ रहे हैं। इन प्रवासी पक्षियों के मार्च या अप्रैल तक यहां रहने की उम्‍मीद की जा रही है। आमतौर पर तमिलनाडु, गुजरात, कर्नाटक, केरल, तेलंगाना और मध्य भारत के कुछ हिस्सों में ये प्रजाति सर्दियों में रहने के लिए आती हैं। इन पक्षियों की मौजूदगी अनुकूल स्थितियों और खाद्य सुरक्षा का संकेत देती है।

मिट्टी में मौजूद कीड़े-मकौड़े और पेड़ों के नन्‍हें फल व पत्तियां रोजी स्टार्लिंग का मुख्‍य भोजन हैं।

रोजी स्टार्लिंग की क्‍या हैं खूबियां

रोज़ी स्टार्लिंग (Rosy Starling) एक आकर्षक प्रवासी पक्षी है, जिसकी सबसे बड़ी खूबी इसकी सामूहिक जीवन शैली है। ये पक्षी सर्वाहारी होते हैं और कीड़ों, घास के मैदानों और खेतों वाले इलाकों में अच्छी तरह पनपते हैं। यह हज़ारों की संख्या में झुंड बनाकर उड़ते हैं और खेतों, चारागाहों व खुले इलाकों में एक साथ भोजन करते हैं। इनका गुलाबी शरीर और काले सिर-पंख इन्हें आसानी से पहचानने योग्य बनाता है। तेज़ आवाज़ में चहचहाना और पेड़ों-इमारतों पर सामूहिक रूप से बसेरा करना भी इनकी खास पहचान है।

कृषि विशेषज्ञों की मानें तो रोज़ी स्टार्लिंग कृषि के लिए बेहद उपयोगी मानी जाती है। यह मुख्य रूप से टिड्डियों, कीट-पतंगों और फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़ों को खाती है, जिससे प्राकृतिक कीट नियंत्रण में मदद मिलती है। यही कारण है कि भारत सहित कई देशों में इसके आगमन को किसानों के लिए शुभ संकेत माना जाता है। साथ ही, बदलते मौसम के अनुसार लंबी दूरी तक प्रवास करने की क्षमता इसे एक मजबूत और अनुकूलनशील पक्षी बनाती है। 

वन अधिकारियों का कहना ​​है कि अगर कुछ और हफ्तों तक गीली स्थिति बनी रहती है, जो प्रवासी और स्थानीय पक्षियों के लिए एक महत्वपूर्ण अस्थायी ठिकाने के रूप में उपयुक्त जगह है। प्रवास के दौरान पक्षियों के झुंड में रहने से शिकार का खतरा भी कम हो जाता है।

रोज़ी स्टार्लिंग अपने बच्चों को पालने के लिए सामूहिक घोंसले बनाते हैं और पूरा झुंड मिलकर सुरक्षा करता है—यह पक्षी जगत में सामूहिक सहयोग और “कम्युनिटी पैरेंटिंग” का बेहतरीन उदाहरण माना जाता है।

रोजी स्टार्लिंग की अटखेलियां और चहचहाहट से इन दिनों थूथुकुडी का पूरा इलाक्रा गुलज़ार हो गया है।

नमक उद्योग और प्रकृति का अस्थायी सह-अस्तित्व

भारी बारिश से जहां नमक उत्पादन को नुकसान पहुंचा है, वहीं यह स्थिति कुछ समय के लिए प्रकृति के लिए अवसर भी बन गई है। नमक के खेत, जो आम दिनों में जैव विविधता के लिहाज से सीमित माने जाते हैं, फिलहाल एक अस्थायी आर्द्रभूमि की तरह व्यवहार कर रहे हैं। इसमें रोजी स्टार्लिंग के साथ अन्य स्थानीय पक्षियों की मौजूदगी भी बढ़ी है। यह दृश्य दिखाता है कि कैसे मौसम की एक घटना औद्योगिक भू-दृश्य को पारिस्थितिक स्पेस में बदल सकती है।

स्थानीय लोगों के लिए कौतूहल और संकेत

नमक मजदूरों और आसपास के गांवों के लोगों के लिए रोजी स्टार्लिंग का यह जमावड़ा केवल एक मनोरंजक दृश्य भर नहीं है, बल्कि यह उनके लिए बदलते मौसम का संकेत भी है। स्‍थानीय बुजुर्गों का कहना है कि पहले भी असाधारण बारिश के बाद पक्षियों की गतिविधि बढ़ती रही है, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में विदेश पक्षियों (रोजी स्टार्लिंग) की मौजूदगी पहले कम ही देखी गई है। पक्षी विशेषज्ञों का कहना है कि खेतों में जलभराव होने से नमक उत्पादन रुकने के चलते इन इलाकों में मानवीय गतिविधि कम हुई है। यही शांति रोजी स्टार्लिंग के लिए एक सुरक्षित माहौल बनाती है। प्रवासी पक्षी अक्सर ऐसे स्थानों को चुनते हैं जहां भोजन के साथ-साथ खतरा कम हो। इस लिहाज से थूथुकुडी के जलमग्न खेत फिलहाल एक “लो-डिस्टर्बेंस ज़ोन” बन गए हैं। हालांकि यह घटना बदलती आबोहवा यानी जलवायु परिवर्तन और तटीय इलाकों की संवेदनशीलता पर भी सवाल खड़े करती है।

अस्थायी बसेरा, स्थायी सवाल

रोजी स्टार्लिंग का यह बसेरा जितना आकर्षक दिखता है, उतना ही यह असामान्य भी है। विशेषज्ञ इसे सामान्य प्रवासन व्यवहार के बजाय अत्यधिक बारिश और मौसम के असंतुलन से जोड़कर देख रहे हैं। यानी नमक के खेतों में फैली यह गुलाबी छटा एक तरफ प्रकृति की अनुकूलन क्षमता दिखाती है, तो दूसरी तरफ बदलते जलवायु पैटर्न की ओर भी इशारा करती है। भले ही बारिश का पानी उतरने के साथ ये नमक के खेत फिर अपने पुराने रूप में लौट जाएं और रोजी स्टार्लिंग आगे बढ़ जाए, लेकिन यह ठहराव कई सवाल छोड़ जाता है। 

क्या असामान्‍य बारिश या तापमान में बदलाव जैसी घटनाओं के चलते भविष्य में ऐसे औद्योगिक इलाके बार-बार पक्षियों के लिए वैकल्पिक बसेरा बनेंगे? और क्या यह बदलाव स्थायी पर्यावरणीय असंतुलन की ओर इशारा कर रहा है? थूथुकुडी के नमक के खेतों में फैले ये गुलाबी काले पंख फिलहाल इसी सवाल को हवा में तैरता छोड़ देते हैं।

कुछ इस तरह किया जाता है खेतों में समुद्र या झीलों का खारा पानी भर कर नमक का उत्‍पादन।

एक नज़र : भारत में नमक उत्पादन पर 

नमक उत्पादन में भारत विश्‍व का तीसरे स्थान पर आता है। पहले नंबर पर चीन और दूसरे नंबर पर अमेरिका आता है। विश्‍व में होने वाले कुल नमक उत्पादन का 10–11% भारत में होता है। एक नज़र नमक उत्पादन से जुड़े तथ्‍यों पर : 

  • नमक का उत्पादन मुख्यतः तटीय इलाकों में ही समुद्री जल के वाष्पीकरण (solar evaporation) और brine sources से होता है।

  • भारत में नमक उत्पादन कुछ ही राज्यों में होता है। गुजरात देश का प्रमुख नमक उत्पादक राज्य है, खासकर कच्छ (Rann of Kutch) और तटीय क्षेत्रों में, जो अकेले भारत के लगभग तीन-चौथाई से अधिक नमक उत्पादन का योगदान देता है।

  • नमक उत्‍पादन के मामले में तमिलनाडु दूसरे स्थान पर है। थूथुकुड़ी, वेदारण्यम आदि तटीय इलाकों में बड़े पैमाने पर नमक बनाया जाता है।

  • राजस्थान में मुख्य रूप से सांभर झील और अन्य खारे पानी के आंतरिक जलस्रोतों  (inland brine) से नमक का उत्पादन होता है। 

  • नमक उत्‍पादक राज्यों में आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, गोवा, पश्चिम बंगाल भी शामिल हैं, जहां कुछ चुनिंदा स्‍थानों पर काफी छोटे स्तर पर नमक उत्पादन होता है। 

  • आंध्र प्रदेश में नमक उत्पादन मुख्यतः नेल्लोर, प्रकाशम और कृष्णा जिलों के तटीय क्षेत्रों में होता है। 

  • महाराष्ट्र में मुंबई उपनगर, ठाणे, रायगढ़ और रत्नागिरी के तटीय इलाकों में नमक बनाया जाता है। 

  • ओडिशा में नमक उत्पादन गंजाम, पुरी और बालासोर जिलों के समुद्री तटों पर होता है। 

  • गोवा में पारंपरिक रूप से मांडवी और ज़ुआरी नदी के मुहानों के आसपास नमक उत्पादन किया जाता है। 

  • पश्चिम बंगाल में पूर्वी मेदिनीपुर, दक्षिण 24 परगना और सुंदरबन क्षेत्र नमक उत्पादन के प्रमुख केंद्र हैं। 

  • भारत का अधिकांश नमक उत्पादन (लगभग 95%+) गुजरात, तमिलनाडु और राजस्थान से आता है, जबकि अन्य राज्य अपेक्षाकृत कम भागीदारी रखते हैं।

राज्य/क्षेत्रवार्षिक उत्पादन (लगभग)कुल में हिस्सा (%)
गुजरात~28 मिलियन टन~75–87%
तमिलनाडु~3–4 मिलियन टन~10–12%
राजस्थान~2–3 मिलियन टन~6–9%
आंध्र प्रदेश~0.8 मिलियन टन~2–3%
महाराष्ट्र एवं अन्य छोटे प्रदेश~0.5–1 मिलियन टन~2–3%

खारे पानी से नमक बनने के बाद उसे खेतों में इस तरह ऊंचे ढेरों के रूप में इकट्ठा कर लिया जाता है। 

नमक उत्पादन में वेटलैंड्स की भूमिका

नमक उत्पादन और वेटलैंड्स (आर्द्रभूमि) का आपस में गहरा संबंध है। आर्द्रभूमियों से नमक निकालना एक प्राचीन कला है जो पीढ़ियों से चली आ रही है। ऐतिहासिक और वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो दुनिया का एक बड़ा हिस्सा नमक के लिए इन्हीं वेटलैंड्स पर निर्भर है। आर्द्रभूमियों की मुख्य भूमिका इस प्रकार हैं :

प्राकृतिक सौर वाष्पीकरण (Solar Evaporation) 

अधिकांश नमक उत्पादन तटीय वेटलैंड्स और अंतर्देशीय खारी झीलों में होता है। इन क्षेत्रों में उथले पानी के बड़े विस्तार होते हैं। जब सूरज की गर्मी इन पर पड़ती है, तो पानी वाष्पित हो जाता है और पीछे नमक के क्रिस्टल रह जाते हैं। वेटलैंड्स की सपाट जमीन और मिट्टी की संरचना पानी को रोके रखने में मदद करती है, जिससे वाष्पीकरण की प्रक्रिया आसान हो जाती है।

खारे पानी का भंडारण (Brine Storage)

वेटलैंड्स प्राकृतिक जलाशयों के रूप में कार्य करते हैं जो समुद्र के ज्वार या भूमिगत लवणीय जल को इकट्ठा करते हैं। जैसे-जैसे पानी इन वेटलैंड्स में ठहरता है, उसकी लवणता (Salinity) बढ़ती जाती है, जिसे 'ब्राइन' (Brine) कहा जाता है। यही गाढ़ा खारा पानी नमक बनाने के लिए प्राथमिक कच्चा माल है।

पारिस्थितिकी तंत्र और सूक्ष्मजीवों का योगदान

नमक के पैन (Salt Pans) में रहने वाले विशिष्ट सूक्ष्मजीव, जैसे कि हेलोबैक्टीरिया और शैवाल, नमक उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये सूक्ष्मजीव पानी को गहरा रंग (अक्सर गुलाबी या लाल) देते हैं। यह गहरा रंग सूरज की किरणों को अधिक सोखता है, जिससे पानी तेजी से गर्म होता है और वाष्पीकरण की गति बढ़ जाती है।

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