देबादित्यो सिन्हा का साक्षात्कार
जब हम भारत में वन्यजीव संरक्षण की बात करते हैं, तो अक्सर हमारी नज़रें हिमालय की चोटियों या पश्चिमी घाट के घने जंगलों पर टिक जाती हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर का विंध्य क्षेत्र एक ऐसी पारिस्थितिक धरोहर है, जो दशकों से औद्योगिक दबाव और उपेक्षा के बीच अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहा है। इस संघर्ष को वैश्विक पटल पर लाने और 'विंध्य बचाओ' अभियान के माध्यम से जंगलों की रक्षा करने वाले संरक्षणवादी देबादित्यो सिन्हा आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उनके योगदान और विंध्य के अद्वितीय इकोसिस्टम को समझने के लिए हमने उनसे एक विशेष बातचीत की।
देबादित्यो सिन्हा के अनुसार, विंध्य क्षेत्र केवल चट्टानों या झाड़ियों का समूह नहीं है, बल्कि यह गंगा के मैदान और मध्य भारत के वनों के बीच एक महत्वपूर्ण 'इकोलॉजिकल ब्रिज' (पारिस्थितिक सेतु) का काम करता है। यहाँ के 'स्लॉथ बियर' न केवल इस जंगल की पहचान हैं, बल्कि इस क्षेत्र की पूरी खाद्य श्रृंखला और जैव विविधता के संकेतक भी हैं। मिर्ज़ापुर की छोटी नदियां और जलधाराएं न केवल वन्यजीवों की प्यास बुझाती हैं, बल्कि भूजल स्तर को बनाए रखने में भी बड़ी भूमिका निभाती हैं। दुर्भाग्यवश, अवैध खनन और अनियंत्रित विकास ने इस अनमोल विरासत के सामने एक गंभीर संकट खड़ा कर दिया है, जिसे समय रहते समझना और रोकना अनिवार्य है।
देबादित्यो वन्यजीव और पर्यावरण के क्षेत्र में कई प्रतिष्ठित संस्थाओं जैसे WWF-India और Wildlife Trust of India के साथ काम कर चुके हैं। मिर्ज़ापुर के झरनों के पुनरुद्धार और पर्यावरण न्याय के लिए वे नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में भी सक्रिय रूप से कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। उनकी सेवाओं के लिए उन्हें 2011 में 'एनवायरनमेंट इक्विटी एंड जस्टिस पार्टनरशिप' फेलोशिप और 2019 में प्रतिष्ठित 'द सैंक्चुअरी वाइल्डलाइफ सर्विस अवार्ड' से सम्मानित किया जा चुका है।
आपको पर्यावरण और संरक्षण के क्षेत्र में काम करने की प्रेरणा कहाँ से मिली?
प्रेरणा की बात करूँ तो मुझे लगता है कि यह रुचि मुझे बचपन से ही थी, खासकर वन्यजीवों को लेकर, मैंने अपनी पढ़ाई जूलॉजी (प्राणी विज्ञान) में की है, जिसमें जीव-जंतुओं के बारे में अध्ययन किया जाता है। लेकिन असल में मेरी सोच और दिशा में बड़ा बदलाव मिर्ज़ापुर आने के बाद आया। मैं 2009 में एमएससी करने के लिए मिर्ज़ापुर आया था। वहाँ का कैंपस लगभग 2500 एकड़ में फैला हुआ है और वह पूरी तरह विंध्य क्षेत्र में स्थित है, जहाँ गंगा के मैदानी इलाके खत्म होते हैं और विंध्य की पहाड़ियाँ शुरू होती हैं। उस समय न तो इंटरनेट की सुविधा थी, न ही बिजली की पर्याप्त व्यवस्था। ऐसे में मैं अक्सर आसपास के जंगलों में घूमने चला जाता था। जो चीज़ें मैंने किताबों में पढ़ी थीं, उन्हें मैंने वहाँ प्रत्यक्ष रूप से देखा। फिर धीरे-धीरे प्रकृति के साथ मेरा रिश्ता और गहरा होता गया।
विंध्य बचाओ अभियान की नीव कैसे पड़ी?
जब मैं मिर्ज़ापुर आया था, उस दौरान जंगल बेहद सुंदर थे। साथ ही कई गंभीर समस्याएँ भी थीं। उस समय मिर्ज़ापुर में बड़े पैमाने पर खनन हो रहा था और शासन-प्रशासन की ओर से कोई ठोस प्रयास होता नहीं दिख रहा था। हमने विंडम फॉल जैसे जलप्रपातों में सफ़ाई अभियान शुरू किया। तब मुझे महसूस हुआ कि लोग पर्यावरण का आनंद तो लेते हैं, लेकिन उसकी देखभाल और रक्षा करने वाला कोई नहीं है। वहीं से यह भावना पैदा हुई कि इस क्षेत्र के लिए कुछ करना चाहिए। 2010 में हमने कुछ स्थानीय लोगों और छात्रों के साथ मिलकर “विंध्य बचाओ” नाम से एक आंदोलन शुरू किया। उस समय यह कोई पंजीकृत संस्था नहीं थी। हमने सोशल मीडिया पेज बनाया, विंध्य क्षेत्र पर लगभग आधे घंटे की एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म बनाई और लोगों को जोड़ना शुरू किया। स्थानीय लोगों और प्रशासन से भी हमें उस समय अच्छा समर्थन मिला। शुरुआत में हमारा उद्देश्य जंगलों और वन्यजीवों को समझना, उनकी सराहना करना और उनके संरक्षण के लिए जागरूकता फैलाना था।
आपके जीवन में कोई ऐसा मोड़ या घटना हुई जिसने आपको एक्टिविज़्म की ओर बढ़ाया?
सच कहूँ तो मैंने कभी जानबूझकर एक्टिविस्ट बनने का फैसला नहीं किया था। मुझे लगता है कि यह सब अपने आप होता चला गया। मेरा सपना तो एक पर्यावरण वैज्ञानिक बनने का था। मुझे फ़िल्म बनाना भी पसंद था और फ़िल्ममेकर बनने का शौक था। कानून, नीतियाँ और तकनीकी प्रक्रियाएँ मुझे पहले थोड़ी जटिल लगती थीं। मिर्ज़ापुर के जंगलों में कई ऐसे वन्यजीव हैं, जो आज भी इंटरनेट या सामान्य दस्तावेज़ों में दर्ज नहीं हैं। कई प्रजातियाँ धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही हैं। हमारा मुख्य उद्देश्य यह रहा है कि मिर्ज़ापुर के जंगलों को कानूनी संरक्षण कैसे दिलाया जाए।
आज यह क्षेत्र रिज़र्व फ़ॉरेस्ट तो है, लेकिन जब तक इसे वन्यजीव संरक्षण कानून के दायरे में नहीं लाया जाएगा, तब तक इसकी वास्तविक सुरक्षा संभव नहीं है।
पर्यावरण की दृष्टि से मिर्ज़ापुर में सबसे बड़ी समस्या क्या है?
आम तौर पर लोग जंगल को सिर्फ़ पेड़ों के रूप में देखते हैं, जबकि जंगल वन्यजीवों का आवास होता है, और उस आवास को सुरक्षित रखने के लिए कई कारकों की ज़रूरत होती है। मिर्ज़ापुर के जंगल कई नदियों और जलप्रपातों का जलग्रहण क्षेत्र हैं। यहीं से नदियाँ निकलती हैं और आगे चलकर गंगा में मिलती हैं। इसलिए यह क्षेत्र जल-सुरक्षा की दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है। हमारा प्रयास यह रहा है कि मिर्ज़ापुर की भूमि और जंगलों को कानूनी रूप से सुरक्षित किया जाए। आज पेड़ कटना एक समस्या है, लेकिन उससे भी बड़ी समस्या यह है कि पूरी की पूरी ज़मीन ही खत्म होती जा रही है। अगर ज़मीन ही नहीं बचेगी, तो जंगल और वन्यजीव भी नहीं बचेंगे। भालू और अन्य वन्यजीवों को लेकर हमने लंबे समय तक काम किया है। मिर्ज़ापुर में वर्षों से वन्यजीव अपराध—यानी अवैध शिकार—होता आ रहा है। हमने इस मुद्दे को लगातार उठाया है और इसके खिलाफ़ काम किया है।
हिमालय और पश्चिमी घाट की तुलना में विंध्य क्षेत्र पर कम चर्चा होती है। पारिस्थितिक दृष्टि से यह इलाक़ा कितना महत्वपूर्ण है?
विंध्य क्षेत्र अत्यंत महत्वपूर्ण है, इतना कि मैं कहूँगा कि इसे समझे बिना भारत की भौगोलिक और पारिस्थितिक संरचना को समझना अधूरा है। इतिहास और भूगोल दोनों दृष्टियों से विंध्य पर्वतमाला उत्तर भारत और दक्षिण भारत के बीच एक प्राकृतिक अवरोध (Barrier) की तरह काम करती है। देश की अधिकांश मध्य भारत की नदियाँ इसी विंध्य क्षेत्र और दक्षिणी प्रायद्वीप के परिदृश्य से निकलती हैं। यह पूरा क्षेत्र जल, जंगल और जमीन तीनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। मध्य भारत के जंगलों की विशिष्टता आम धारणा यह है कि जंगल केवल वे होते हैं जो साल भर हरे-भरे रहते हैं, जैसे हिमालय या पश्चिमी घाट के घने वन। लेकिन यह अब स्पष्ट हो चुका है कि मध्य भारत के शुष्क पर्णपाती वन (Dry Deciduous Forests) भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
मिर्जापुर में पावर प्लांट का निर्माण
जैव विविधता की दृष्टि से मिर्ज़ापुर का वन क्षेत्र कितना महत्वपूर्ण है?
ये जंगल साल के कई महीनों तक सूखे रहते हैं और मानसून के दौरान हरे हो जाते हैं। ऐसे जंगल और घास के मैदान सबसे अधिक मध्य भारत में देखने को मिलते हैं। जैव विविधता के लिहाज़ से यह क्षेत्र अत्यंत समृद्ध है, यहाँ विभिन्न प्रकार के औषधीय पौधे, वनस्पतियाँ और जीव-जंतु पाए जाते हैं। विंध्य क्षेत्र पर कम चर्चा का एक कारण यह भी है कि हिमालय और पश्चिमी घाट में शोध और अध्ययन बहुत अधिक हुए हैं, जैसे पन्ना, बांधवगढ़, रणथंभौर जैसे नाम प्रचलित हो गए हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि सबसे अधिक वन क्षेत्र मध्य भारत में ही फैला हुआ है।
विंध्य क्षेत्र में नदियों, नालों, छोटी धाराओं और भूजल की स्थिति में क्या बदलाव दिख रहे हैं?
यदि हम विंध्य क्षेत्र की नदियों की स्थिति देखें, तो पिछले 10–20 वर्षों में बड़ा बदलाव आया है। पहले ये नदियाँ फ्री-फ्लोइंग होती थीं, यानी बिना अवरोध के बहती थीं। अब स्थिति यह है कि इस क्षेत्र में लगातार बाँध बनाए जा रहे हैं। पहले बड़े बाँध मुख्यतः हिमालयी क्षेत्रों में बनते थे, लेकिन अब विंध्य क्षेत्र में भी नए बाँध प्रस्तावित या निर्माणाधीन हैं। सोन नदी पर कई बाँध बन चुके हैं और उसकी सहायक नदियों पर भी परियोजनाएँ आई हैं। ये सहायक नदियाँ न केवल जैव विविधता के लिए, बल्कि स्थानीय लोगों की आजीविका के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण थीं। पंप स्टोरेज और ऊर्जा परियोजनाएँ एक नई और गंभीर समस्या है, पंप स्टोरेज पावर प्रोजेक्ट्स। इसमें कृत्रिम बाँध बनाकर पानी को ऊपर स्टोर किया जाता है आवश्यकता पड़ने पर नीचे छोड़कर बिजली बनाई जाती है। सोनभद्र, मिर्ज़ापुर और आसपास के क्षेत्रों में इस तरह की कई बड़ी परियोजनाएँ प्रस्तावित हैं या शुरू हो चुकी हैं। इसका सीधा असर नदियों की प्राकृतिक धारा, जल-भंडारण क्षमता और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ेगा।
मिर्ज़ापुर में इस समय सबसे गंभीर पर्यावरणीय चुनौती आपको कौन-सी लगती है? आज विंध्य क्षेत्र किन सबसे बड़े पर्यावरणीय खतरों का सामना कर रहा है?
विंध्य क्षेत्र खनिजों से भरपूर है,सैंडस्टोन, बलुआ पत्थर,चूना पत्थर,बॉक्साइट और कुछ क्षेत्रों में हीरे तक पाए जाते हैं। लेकिन खनन के कारण नदियों के कैचमेंट क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। नदी केवल पानी की धारा नहीं होती, वह पहाड़ों, मिट्टी, जंगल और वर्षा के संतुलन से जीवित रहती है। पहाड़ों के कटने से मिट्टी की पकड़ खत्म हो जाती है, पानी का प्राकृतिक भंडारण नहीं हो पाता और धीरे-धीरे पूरा इको-सिस्टम कमजोर हो जाता है। बारिश का बदलता स्वरूप पहले जहाँ बारिश 2–3 महीनों तक लगातार होती थी, अब वह कुछ ही दिनों में सिमट जाती है। इसका सीधा असर ग्राउंडवॉटर रिचार्ज पर पड़ता है। पानी तो गिरता है, लेकिन ज़मीन में समाने का समय नहीं मिलता, सड़कें,इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास का सवाल विकास के नाम पर इस क्षेत्र में चौड़ी सड़कें, फोर-लेन और सिक्स-लेन हाईवे बनाए जा रहे हैं, सवाल यह है कि क्या वास्तव में हर जगह इतने बड़े हाईवे की ज़रूरत है? सड़कों के कारण जंगल कटते हैं, वन्यजीवों के गलियारे टूटते हैं और मानव हस्तक्षेप बढ़ता है।
खनन के बाद इस तरह के ढेर लगा कर छोड़ देते हैं लोग, मौका मिलते ही वाहनों से होती है सप्लाई
औद्योगिक विस्तार ने यहाँ की ज़मीन, पानी और जंगलों को किस तरह प्रभावित किया है?
सोनभद्र क्षेत्र में पावर प्लांट्स के दुष्प्रभाव पहले ही देखे जा चुके हैं। मिर्ज़ापुर में भी एक पावर प्लांट प्रस्तावित है, जिसका लोगों ने विरोध किया। हालांकि हाल के समय में यह परियोजना फिर से आगे बढ़ रही है। इसके परिणामस्वरूप जल संकट, रेलवे लाइनें, ट्रांसमिशन लाइनें, भूमि अधिग्रहण और विस्थापन जैसी समस्याएँ पैदा होंगी। यह संकट तत्काल नहीं दिखेगा, लेकिन जब परियोजनाएँ पूरी होंगी, तब पूरे क्षेत्र पर इसका गंभीर प्रभाव पड़ेगा। वन्यजीवों का तेज़ी से लुप्त होना एक बड़े संकट की ओर इशारा है। मिर्ज़ापुर में कुल आठ फॉरेस्ट रेंज थीं। मेरी आँखों के सामने कम से कम चार रेंज पूरी तरह खत्म हो चुकी हैं। पहले यहाँ सोन कुत्ता पाया जाता था, जिसे देखने के लिए आज लोग कर्नाटक या मध्य प्रदेश जाते हैं। भालू (जामवंत) अब केवल दो–तीन रेंज में सिमट गए हैं। बाघों की संख्या भी बेहद कम हो चुकी है। इतना बड़ा जंगल होने के बावजूद न तो पर्याप्त स्टाफ है, न संसाधन, अंदर ही अंदर जंगल खोखले होते जा रहे हैं, जंगलों पर लोग कब्ज़ा कर खेती शुरू कर चुके हैं।
अगले 10–20 क्या विंध्य क्षेत्र में खनन, इंफ्रास्ट्रक्चर और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन संभव है?
इंफ्रास्ट्रक्चर और पर्यावरण के बीच संतुलन की संभावना हमेशा रहती है। हम लोकतंत्र में रहते हैं, जहाँ अधिकार हैं, लेकिन कानून और संविधान भी हैं। समस्या यह है कि कानूनी प्रक्रिया आम आदमी के लिए बेहद लंबी और कठिन है। यहाँ सरकार की भूमिका सबसे अहम है। अगर सरकार चाहे, तो बहुत कुछ किया जा सकता है। लेकिन कई बार स्थानीय राजनीतिक और सामाजिक दबाव संरक्षण के प्रयासों को कमजोर कर देते हैं। इसके साथ ही समाज की भी ज़िम्मेदारी है। जब तक हम अपने लालच से ऊपर नहीं उठेंगे, तब तक केवल सरकार से उम्मीद करना पर्याप्त नहीं होगा। मिर्ज़ापुर का भविष्य खतरे में है, जबकि मिर्ज़ापुर में संभावनाएं बहुत है, अगर आप वाराणसी, प्रयागराज या किसी अन्य शहर से मिर्ज़ापुर आएँगे, तो आपको एक अलग तरह की शांति महसूस होगी। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।
मिर्ज़ापुर में लगभग 30 जलप्रपात (वॉटरफॉल्स) हैं। यदि इन्हें वैज्ञानिक और टिकाऊ तरीके से विकसित किया जाए, तो स्थानीय लोगों को रोज़गार मिलेगा, पर्यटन बढ़ेगा और जंगल भी सुरक्षित रहेंगे। यहाँ बड़े प्रोजेक्ट्स की नहीं, बल्कि स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर छोटे और संतुलित विकास मॉडल की ज़रूरत है। उत्तर प्रदेश में वन क्षेत्र केवल 5–6% है, जबकि राष्ट्रीय औसत 22–25% है। मिर्ज़ापुर, सोनभद्र और चंदौली जैसे जिले इस दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हैं, मड़िहान सुकृत और पटेहरा जैसे जंगल कभी मिर्ज़ापुर की पहचान थे। आज वे तेज़ी से सिमट रहे हैं। यदि हमने समय रहते ध्यान नहीं दिया, तो मिर्ज़ापुर भी सिंगरौली जैसे औद्योगिक क्षेत्र में बदल सकता है, जहाँ पर्यावरणीय संकट स्थायी हो जाता है। अगर बचा हुआ जंगल बचा लिया गया, तो मिर्ज़ापुर का भविष्य उज्ज्वल है। नहीं तो नुकसान इतना होगा कि उसकी भरपाई कभी नहीं हो पाएगी।
मिर्जापुर के जंगल
स्लॉथ बेयर के लिए विंध्य क्षेत्र क्यों अहम है?
इसके पीछे दो–तीन महत्वपूर्ण कारण हैं। सबसे पहले हमारे सांस्कृतिक संदर्भ की बात करना चाहूँगा। रामायण में जामवंत का चरित्र आता है, जो एक भालू हैं। उनका रामायण में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है, उन्होंने भगवान राम को उनकी शक्ति का बोध कराया। इस तरह भालू हमारी भारतीय संस्कृति का भी अभिन्न हिस्सा रहा है।दुर्भाग्य से हमारे स्कूलों में हमें पोलर बियर, ग्रिज़ली, बियर जैसे विदेशी भालुओं के बारे में पढ़ाया जाता है, फिल्मों में भी अमेरिकी भालू दिखाए जाते हैं। लेकिन भारत का अपना भालू स्लॉथ बियर पर कभी ध्यान नहीं दिया गया। स्लॉथ बियर का मुख्य प्राकृतिक आवास डेक्कन प्रायद्वीप है। कुछ हद तक यह पश्चिमी घाट, तराई क्षेत्र और सीमित रूप से हिमालयी इलाकों में भी मिलता है, लेकिन इसका सबसे मजबूत गढ़ विंध्य क्षेत्र चित्रकूट और मिर्ज़ापुर है। भारत में कुल चार प्रजातियों के भालू पाए जाते हैं: हिमालयन ब्लैक बियर, सन बियर (मुख्यतः पूर्वोत्तर भारत में), ब्राउन बियर (लद्दाख क्षेत्र में), इनमें स्लॉथ बियर सबसे अलग और अनोखा है। ज़्यादातर भालू ठंडे इलाकों में पाए जाते हैं और सर्दियों में हाइबरनेशन (लंबी नींद) में चले जाते हैं। स्लॉथ बियर दुनिया में एकमात्र ऐसा भालू है जो गर्म जलवायु में रहता है। गर्म क्षेत्रों में रहने के कारण यह हाइबरनेट नहीं करता।
स्लॉथ बियर की गतिविधियों के बारे में बताएं
स्लॉथ बियर का विकास (Evolution) भी अलग तरह से हुआ है। यह घने जंगलों की बजाय पथरीले इलाकों, चट्टानों और गुफाओं में रहना पसंद करता है। मादा भालू लगभग तीन साल में एक बार बच्चे देती है, और बच्चों को अपनी पीठ पर बैठाकर चलती है, जो इसे और भी विशिष्ट बनाता है। स्लॉथ बियर का भोजन भी बेहद अनोखा है। इसका मुँह वैक्यूम क्लीनर की तरह काम करता है। इसके लंबे नाखून होते हैं, जिनसे यह मिट्टी खोदता है और दीमक व चींटियों को ज़ोर से खींचकर खा लेता है। दीमक और चींटियाँ इसका मुख्य भोजन हैं, साथ ही यह फल भी खाता है। बहुत दुर्लभ परिस्थितियों में, जब भोजन उपलब्ध न हो, तो यह मरे हुए जानवर को खा सकता है। लेकिन यह आक्रामक या शिकारी प्रवृत्ति का जानवर नहीं है।
क्या भालू इंसानों को नुकसान पहुंचाते हैं?
मिर्ज़ापुर में मैंने स्वयं ऐसे कई गाँव देखे हैं जहाँ भालू और इंसान शांतिपूर्वक साथ रहते हैं। पटेहरा के पास एक गाँव में एक बूढ़ी मादा भालू रहती थी, जिसकी दृष्टि कमज़ोर हो चुकी थी। भालुओं की दृष्टि वैसे भी कमजोर होती है, लेकिन उनकी सूंघने की शक्ति बहुत तेज़ होती है। वह भालू गाँव में आती-जाती थी और लोग सामान्य रूप से अपना जीवन जीते थे। मिर्ज़ापुर में ऐसी कई कहानियाँ हैं जो बताती हैं कि भालू आमतौर पर नुकसान नहीं करता। अधिकांश भालू हमले तभी करते हैं जब मादा भालू अपने बच्चों के साथ होती है और उसे खतरा महसूस होता है।
स्लॉथ बियर
स्लॉथ बियर के संरक्षण के लिए सरकार के प्रयासों पर आपकी क्या राय है?
मिर्ज़ापुर में स्लॉथ बियर का उल्लेख रामायण काल से लेकर आज तक मिलता है। आज जो भालू हम देख रहे हैं, वे उसी वंश के हैं, जिनका उल्लेख रामायण में हुआ था। यह दर्शाता है कि ये जानवर लाखों वर्षों से इस क्षेत्र में रहते आए हैं। लेकिन आज अगर भालू केवल दो-तीन रेंज तक सिमट गए हैं, तो यह हमारी सामूहिक विफलता है। बीच के दौर में डांसिंग बियर के लिए इनका बड़े पैमाने पर शिकार किया गया। हालाँकि अब इस पर काफी हद तक नियंत्रण हो चुका है, जिसमें सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। केंद्र सरकार द्वारा “प्रोजेक्ट भालू” की शुरुआत भी की गई है। देश में 2–3 विशेष अभयारण्य भी हैं, जैसे कर्नाटक का दारोजी भालू अभयारण्य, जहाँ देश-विदेश से लोग भालू देखने आते हैं। इसी तरह के प्रयास मिर्ज़ापुर में भी किए जाने की आवश्यकता है।
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