भारत में एडवेंचर टूरिज़्म यानी साहसिक पर्यटन का चलन तेज़ी पकड़ रहा है। इसमें सबसे ज़्यादा रुझान हिमालय की ऊंची बर्फी़ली चोटिंयों पर पर्वतारोहण (ट्रेकिंग) करना, स्नोफॉल वाली ढलानों पर स्कीइंग और पर्वतीय घाटियों में पैरा ग्लाइडिंग का देखने को मिलता है। इसमें लद्दाख में हर साल होने वाले चादर ट्रेक एक एडवेंचर प्रेमियों के बीच लोकप्रिय मुकाम है। इसका उन्हें सालभर इंतज़ार रहता है, इस बार उन्हें निराशा का सामना करना पड़ा है। इसकी वजह है ज़ांस्कर नदी की सतह पर पर्याप्त रूप से बर्फ न जमने के कारण 10 जनवरी 2026 से शुरू होने वाली इस एडवेंचर ट्रेकिंग को स्थगित कर दिया गया है।
चादर ट्रेक भारत की सबसे चुनौतीपूर्ण सर्दियों की ट्रेकिंग रूटों में गिनी जाती है, जो हर साल बड़ी संख्या में देश-विदेश के साहसिक पर्यटकों को आकर्षित करती है। यह ट्रैक 10 जनवरी को शुरू होने वाला था, पर इस साल इसे सुरक्षा कारणों से स्थगित कर दिया गया है। लेह के अतिरिक्त उपायुक्त और डिस्ट्रिक्ट डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी के सीईओ गुलाम मोहम्मद ने लेह में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में मीडिया को इसकी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि ज़ांस्कर नदी के कई अहम हिस्सों में बर्फ़ की मोटाई सुरक्षित मानक से कम पाई गई। प्रशासन ने स्थितियों का जायजा लेने के लिए सीमा सड़क संगठन (BRO) और केंद्र शासित प्रदेश डिजास्टर रिस्पॉन्स फोर्स की एक कमेटी को मौके पर भेजा था। कमेटी ने पाया कि नदी पिघलना शुरू हो गई है, जिसके चलते चादर ट्रेक खतरनाक हो गया है। इस निरीक्षण दल की रिपोर्ट के आधार पर चादर ट्रेक को स्थगित कर दिया गया।
गुलाम मोहम्मद ने बताया कि सस्पेंशन के दौरान इस रूट पर कोई भी ट्रेकिंग या उससे जुड़ी एडवेंचर एक्टिविटी करने की इजाज़त नहीं होगी। प्रशासन ने टूर ऑपरेटरों, गाइडों और कुलियों को सख्त निर्देश दिए हैं कि वे इस अवधि में किसी भी ट्रेकिंग गतिविधि का आयोजन, प्रचार या संचालन न करें। पर्यटकों को भी सलाह दी गई है कि वे अपनी सुरक्षा के लिए इन नियमों का कड़ाई से पालन करें।
प्रशासन ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय नदी की अनिश्चित प्रकृति और मौजूदा मौसम परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए पूरी तरह जन सुरक्षा के हित में लिया गया है। इस तरह चादर ट्रेकिंग के शौकीनों को लगातार दूसरे साल झटका लका है, क्योंकि पछिले साल (2024) में भी सीमा सड़क संगठन (BRO) द्वारा निमू–पदम–दारचा मार्ग के निर्माण कार्य के कारण ट्रेकक रूट को छोटा कर दिया गया था।
ज़स्कार झील के अलावा भी हिमालय पर तमाम जगहें हैं, जहां पर बर्फ जमना या तो बंद हो गई है, या फिर कम हो गई है। हिमालय क्षेत्र में हो रहे इस प्रकार के परिवर्तनों को बीते 25 वर्षों से बेहद करीब से देख रहे दिनेश गौड़ से हमने बात की। फरीदाबाद के निवासी दिनेश प्रोफेशनल फोटोग्राफर होने के साथ-साथ प्रोफेशनल ट्रैकर भी हैं। 1993 में जब वे दसवीं कक्षा में थे तब पहली बार अलमोड़ा गए थे। प्रकृति से उन्हें इस कदर प्रेम हुआ कि वे अपनी छुट्टियां व्यस्त शहरों की जगह पहाड़ों पर बिताना ज्यादा पसंद करने लगे। 2001 में उन्होंने पहली बार लद्दाख क्षेत्र में ट्रेक्किंग की। बीते 25 वर्षों में उन्होंने हिमालय पर्वत पर स्थित अलग-अलग राज्यों में पहाड़ों का दौरा किया।
इंडिया वॉटर पोर्टल से बातचीत में दिनेश गौड़ ने कहा, "बीते 25 वर्षों में जो मैंने हिमालय पर देखा है वो बेहद अफसेसजनक है। स्थितियां दिन पर दिन खतरनाक होती जा रही हैं। एक समय था जब अक्टूबर-नवंबर में ही बर्फबारी शुरू हो जाती थी, लेकिन आज देखिए हिमाचल के औली और दयारा बुग्याल जैसी जगहों पर अब तक बर्फ नहीं गिरी। और तो और पिंडारी ग्लेशियर के बेस पर स्थित गांव अब तक बर्फ से पट जाते थे, आज पूरी तरह सूखे पड़े हैं।
ज़स्कार नदी कई सारी हिमनद झीलों (glacial lake) का समूह है। जाहिर है नदी पर उम्मीद से कम बर्फ जमने का कारण सूखती हिमनद झीलें और पिघलते ग्लेशियर भी हैं। बीते 10-15 वर्षों में ग्लेशियरों का आकार किस तरह बदला, इस पर दिनेश गौड़ ने कहा, "मैंने अपने 25 वर्षों के ट्रेकिंग के अनुभव में पहाड़ों पर हो रहे परिवर्तनों को देखा है। तमाम ऐसी हिमनद झीलें हैं जो एक समय में पहाड़ों का सौंदर्य थीं अब सूख गई हैं। ग्लेशियर की बात करें तो गंगोत्री ग्लेशियर ग्लोबल वॉर्मिंग से प्रभावित ग्लेशियरों का एक बड़ा उदाहरण है। 10 साल पहले यह करीब 35 किमी लंबा था आज चार से पांच किमी कम हो गया है। ऐसे तमाम ग्लेशियर हैं जिनका आकार तेजी से घट रहा है।"
बर्फबारी कम होने और जमने की तीव्रता में आयी कमी पर दिनेश कहते हैं, "हिमालय में हो रहे क्षरण का सबसे बड़ा कारण इमारतों का निर्माण है। 2013 में उत्तराखंड त्रासदी में यह साफ पाया गया था कि इस भारी नुकसान की वजह कॉन्क्रीट है, लेकिन हम नहीं माने, क्योंकि हम सीमेंट को ही विकास का पैमाना मानते हैं। हिमालय में प्राकृति संपदा के क्षरण का दूसरा सबसे बड़ा कारण यहां आने वाले लोगों द्वारा किया जाने वाला कूड़ा-करकट है।"
उन्होंने कहा कि गर्मियां आते ही लोग पहाड़ों पर जाने के लिए पागल हो जाते हैं, कारों की लंबी-लंबी कतारों की वजह से तो प्रदूषण होता ही होता है, ऊपर से प्लास्टिक बैग, चिप्स के पैकेट, कोल्ड ड्रिंक की बोतलें, आदि यहां की मिट्टी को खराब करते हैं। हिमालय में बर्फबारी में कमी के लिए हम केवल ग्लोबल वॉर्मिंग और कार्बन उत्सर्जन को दोषी नहीं ठहरा सकते। स्थानीय स्तर पर बहुत अधिक जागरूकता की जरूरत है।
जब सरकार कोई सड़क बनाती है, तब उसे ऑल वेदर रोड घोषित कर देती है और फिर हर प्रकार के वाहन उस पर चलने शुरू हो जाते हैं। मेरी राय में दूरस्थ क्षेत्रों तक जाने वाली सड़कों को केवल आर्मी या स्थानीय लोगों के लिए खोलना चाहिए बाकी पर्यटकों के लिए पाबंदी होनी चाहिए। अगर सर्दियों में ये सड़कें बंद कर दी जाएं, तो पर्यटकों की संख्या कम होगी और प्रकृति को भी खुद को पुनर्जीवित करने का मौका मिलेगा।दिनेश कुमार, पर्वतारोही एवं प्रोफेशनल फोटोग्राफर
चादर ट्रेक हिमालय के सबसे अनोखे और चुनौतीपूर्ण शीतकालीन ट्रेक्स में से एक है, जो लद्दाख क्षेत्र में ज़ांस्कर नदी की जमी हुई सतह पर किया जाता है। नदी पर जमी बर्फ की चादरों, बर्फ की ढलानों, झरनों और गुफाओं से होकर गुजरने वाला इसका शानदार मार्ग रोमांच पसंद करने वालों के लिए यह एक अनूठा अनुभव है। ‘चादर’ शब्द स्थानीय भाषा में बर्फ की उस मोटी परत को कहा जाता है, जो सर्दियों में नदी के ऊपर सफ़ेद चादर की तरह जम जाती है। जब तापमान लगातार कई हफ्तों तक शून्य से नीचे, अक्सर –15 से –30 डिग्री सेल्सियस तक बना रहता है, तब ज़ांस्कर नदी पूरी तरह जम जाती है और उस पर पैदल चलना संभव हो पाता है। इसी जमी हुई नदी पर कई दिनों तक चलने की प्रक्रिया को चादर ट्रेक कहा जाता है।
चादर ट्रेक की जड़ें आधुनिक पर्यटन से कहीं पहले की हैं। परंपरागत रूप से, लद्दाख के स्थानीय लोग सदियों से इस मार्ग का उपयोग व्यापार के लिए करते रहे हैं, क्योंकि सर्दियों में जब नदी की सतह पर मोटी बर्फ की चादरें जम जाती हैं, तो लेह को ज़ांस्कर घाटी से जोड़ने और बाहरी दुनिया से जुड़ने का यही एकमात्र रास्ता होता है। भारी बर्फबारी के कारण जब पहाड़ी दर्रे बंद हो जाते थे, तब स्थानीय लोग राशन, दवाइयों और जरूरी सामान के लिए इसी जमी हुई नदी के सहारे लेह तक सफ़र करते थे। लद्दाख की सर्दियों की अत्यधिक कठोर मौसम स्थितियों ने इस क्षेत्र को कई वर्षों तक बाहरी लोगों से अछूता रखा। बाद में यही पारंपरिक मार्ग साहसिक पर्यटन के रूप में प्रसिद्ध हो गया और दुनिया भर के ट्रेकर्स के लिए आकर्षण का केंद्र बना। कुछ विदेशियों ने रोमांच के लिए स्थानीय लोगों के साथ इस मार्ग पर जाने का साहस किया और धीरे-धीरे चादर ट्रेक भारत का एक बहुत लोकप्रिय शीतकालीन ट्रेक बन गया ।
चादर ट्रेक पूरी तरह मौसम की स्थितियों पर निर्भर करता है। दिन और रात के तापमान में मामूली बदलाव भी बर्फ की मोटाई और स्थिरता को प्रभावित कर सकता है। दिन में धूप निकलने पर बर्फ पिघलने लगती है और रात में फिर जमती है, जिससे कई जगहों पर बर्फ पतली या टूटने की स्थिति में आ जाती है। ट्रेकर्स और स्थानीय लोगों ने बर्फ के सिकुड़ते और कमजोर होते हिस्सों की समस्या को बार-बार उठाया है, जिसे तेजी से ग्लोबल वार्मिंग का कारण माना जा रहा है। यही कारण है कि यह ट्रेक आमतौर पर जनवरी के पहले सप्ताह से फरवरी के मध्य तक ही संभव होता है और मौसम असामान्य होने पर इसे टालना या रद्द करना पड़ता है। करीब डेढ़ दशक से चादर ट्रेकिंग करती आ रही मेधावी दावड़ा ने इस यात्रा से जुड़े जोखिमों की जानकारी अपने ब्लॉग में देते हुए बताया है कि 2014 में चादर ट्रेक के दौरान इससे जुड़े खतरे का प्रत्यक्ष अनुभव हुआ। उन्होंने बताया कि तिलाद सुम्दो से शुरू होकर नेरक तक जाने वाली सात दिवसीय चादर ट्रेक यात्रा शुरू करने के बाद तीसरे दिन चादर ट्रेक पर जमी हुई नदी में गिरने का उनका अनुभव बेहद भयावह रहा। वह टूटी हुई बर्फ की चादरों के नीचे दब गई थीं। चादर नदी उनके गिरने वाले स्थान से कुछ मीटर आगे ही टूट गई थी, जिससे सीने तक गहरे, बर्फीले पानी को पार करना किसी के लिए भी असंभव हो गया था। उन्हें अपना जिंदा बच निकलना एक नए जीवन जैसा लगा।
चादर ट्रेक को अक्सर दुनिया के सबसे कठिन विंटर ट्रेक्स में गिना जाता है। ट्रेक के दौरान ट्रेकर्स को जमी हुई नदी के साथ-साथ खड़ी चट्टानों, संकरे रास्तों और बर्फीली हवाओं का सामना करना पड़ता है। रात में तापमान बेहद नीचे चला जाता है, जिससे खुले आसमान के नीचे या अस्थायी शिविरों में रुकना एक अलग ही अनुभव होता है। साथ ही, यह ट्रेक केवल साहसिक खेल नहीं, बल्कि लद्दाख की जलवायु, बदलते मौसम और ग्लेशियरों की स्थिति को करीब से देखने का अवसर भी देता है, जिससे यह पर्यावरणीय बदलावों का एक जीवंत संकेतक बन गया है।
ऑल लद्दाख होटल एंड गेस्ट हाउस एसोसिएशन की अध्यक्ष रिगज़िन वांगमो लाचिक ने बताया कि इस बार ट्रेक में देरी का मुख्य कारण ज़ांस्कर नदी पर बर्फ का अधूरा जमाव है। नदी पर बर्फ का पूरा और स्थिर जमाव न होने के कारण ही ट्रेकिंग चालू नहीं की जा सकी है।
उन्होंने बताया कि आमतौर पर सर्दियों में लगातार कई हफ्तों तक शून्य से नीचे तापमान बने रहने पर नदी की सतह पर मोटी और सुरक्षित बर्फ जम जाती है, जिस पर चादर ट्रेक संभव होता है। लेकिन इस बार अपेक्षाकृत अधिक तापमान और सर्दियों में बर्फबारी की कमी के चलते नदी की बर्फ पतली और असमान बनी हुई है, जिससे उस पर चलना जोखिम भरा हो गया है।
उन्होंने बताया कि यदि मौसम और तापमान अनुकूल रहने पर आगे चलकर ट्रेक को सीमित रूप में शुरू किया जाता है, तो सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए जिला प्रशासन अतिरिक्त सतर्कता बरतेगा। बर्फ की अस्थिरता और अचानक टूटने की आशंका को देखते हुए नेशनल डिजास्टर रिस्पांस फोर्स (NDRF) के अतिरिक्त जवानों की तैनाती की जाएगी, ताकि किसी भी आपात स्थिति में ट्रेकर्स को तुरंत सहायता मिल सके। स्थानीय प्रशासन के स्तर पर ट्रेक रूट की नियमित निगरानी और बर्फ की मोटाई का आकलन भी किया जाएगा, जिससे संभावित दुर्घटनाओं के जोखिम को न्यूनतम किया जा सके।
वैज्ञानिक और स्थानीय विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय क्षेत्र में बर्फ जमने के पारंपरिक पैटर्न में गंभीर परिवर्तन आ रहा है। यह हिमालयी क्षेत्रों में बर्फबारी और नदियों के जमने की प्रक्रिया को भी प्रभावित कर रहा है। इसके चलते पिछले साल भी, चादर ट्रेकिंग देरी से शुरू हुई थी। यह जनवरी के पहले सप्ताह के बजाय 13 जनवरी को शुरू हुई, जिससे इस बात की चिंता और बढ़ गई कि लद्दाख के पारंपरिक शीतकालीन कैलेंडर में धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है। इस संबंध में Theoretical and Applied Climatology नामक वैज्ञानिक जर्नल में Climate Change over Leh (Ladakh) शीर्षक से प्रकाशित शोध अध्ययन में बताया गया है कि क्षेत्र में तापमान वृद्धि और मौसमी वर्षा में गिरावट के कारण अब गंभीर सर्दी वाले दिनों की संख्या कम होती जा रही है, जिससे स्थिर बर्फ जमना मुश्किल हो रहा है।
इस वैज्ञानिक अध्ययन में लेह-लद्दाख क्षेत्र के मौजूदा जलवायु पैटर्न पर तापमान और वर्षा/बर्फबारी से जुड़े दीर्घकालिक डेटा का विश्लेषण करके बदलावों और जलवायु के बदलते रुझानों का ट्रेंड-आधारित विश्लेषण किया गया है। शोध के परिणाम यह दिखाते हैं कि इस क्षेत्र में गर्मियों में तापमान बढ़ रहा है और मौसमी वर्षा/बर्फबारी में गिरावट देखी जा रही है, जिससे बर्फ़ जमने और हिमपात के लिए ज़रूरी कड़ाके की ठंड वाले दिनों की संख्या कम होती जा रही है। बर्फ़ जमने के दिनों में कमी के कारण ट्रेकिंग करने लायक ठोस और स्थिर बर्फ़ का निर्माण कठिन हो रहा है। इसका असर क्षेत्रीय जल संसाधनों और पारंपरिक जीवनशैली पर देखने को मिल रहा है।