विश्व आर्थिक मंच (WEF) ने वैश्विक जोखिम रिपोर्ट 2026 (Global Risks Report 2026) जारी कर दी है। इस रिपोर्ट में आने वाले 10 वर्षों में विभिन्न देशों के बीच आर्थिक टकराव, सशस्त्र संघर्ष और जलवायु परिवर्तन की वजह से चरम मौसमी घटनाओं को दुनिया के लिए तीन सबसे बड़े जोखिम करार दिए गए हैं। इस रिपोर्ट में आने वाले समय में सामाजिक ध्रुवीकरण, गलत एवं भ्रामक जानकारियों के फैलने और आर्थिक मंदी पर विशेष चिंता व्यक्त की गई है। साथ ही यह रिपोर्ट स्पष्ट कहती है, "पानी की कमी, बाढ़, प्रदूषण और बिगड़ते पारिस्थितिक तंत्र अब सिर्फ पर्यावरणीय मुद्दे नहीं रह गए हैं। ये संकट वैश्विक अर्थव्यवस्था, आजीविका और सामाजिक स्थिरता को सीधे प्रभावित कर रहे हैं।
पूरा विश्व जिस दिशा में आगे बढ़ रहा है उससे यह साफ है कि जलवायु परिवर्तन, पर्यावरणीय क्षरण और असमानता जैसे जोखिम आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं। इसके दीर्घकालिक निष्कर्ष भी साफ हैं - जल संकट और पारिस्थितिकी तंत्र का टूटना आने वाले दशक में वैश्विक अस्थिरता। यह लेख ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट के उन्हीं हिस्सों पर फोकस करता है, जो पानी, जलवायु और पर्यावरण से जुड़े जोखिमों को समझने में मदद करते हैं।
दुनिया के सभी देशों में मौजूद शोधकर्ताओं की मदद से विशेषज्ञ सर्वेक्षण और डेटा विश्लेषण के आधार पर विश्व आर्थिक मंच वैश्विक जोखिमों का आकलन करता है और हर वर्ष एक जोखिम रिपोर्ट जारी करती है। 2026 की रिपोर्ट इसका 21वां संस्करण है। यह रिपोर्ट अल्पकालिक (2 वर्ष), मध्यम (10 वर्ष) और दीर्घकालिक (20 वर्ष) जोखिमों को उजागर करती है। साथ ही यह बताती है कि ये जोखिम कैसे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। रिपोर्ट में दुनिया के सामने आने वाली बड़ी चुनौतियों को सामने रखा जाता है और उसके क्या प्रभाव हो सकते हैं यह भी बताया जाता है।
रिपोर्ट के अनुसार पूरा विश्व कई ऐसे संकटों के दौर में प्रवेश कर चुका है जो एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। ये वो संकट हैं जिनकी वजह से विभिन्न प्रकार के टकराव, आर्थिक अनिश्चितता और पर्यावरणीय दबाव एक साथ वैश्विक स्थिरता को प्रभावित कर रहे हैं। सभी जोखिमों को प्रतिशत के पैमाने पर मापा गया है। जो इस प्रकार हैं।
ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट 2026 में जलवायु परिवर्तन और उससे जुड़ी चरम मौसमी घटनाओं को अगले दस वर्षों के सबसे गंभीर वैश्विक जोखिमों में शामिल किया गया है। जलवायु परिवर्तन आने वाले समय में न केवल पर्यावरण, बल्कि अर्थव्यवस्था, समाज और शासन प्रणालियों पर भी गहरा प्रभाव डालेंगे।
अगले 10 वर्षों में शीर्ष जोखिम चरम मौसमी घटनाएं समय के साथ और अधिक तीव्र तथा व्यापक होती जाएंगी। इसके प्रभाव तुरंत नहीं, बल्कि धीरे-धीरे आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय प्रणालियों को कमजोर करते हैं। इसकी वजह से खाद्य असुरक्षा, जल संकट, असमानता और विस्थापन बढ़ते हैं। रिपोर्ट बताती है कि जलवायु परिवर्तन पानी से जुड़े जोखिमों को और जटिल बना रहा है। बाढ़ और सूखे जैसी घटनाएँ अब अधिक बार और अधिक तीव्र रूप में सामने आ रही हैं।
रिपोर्ट में दीर्घकालिक जोखिमों की सूची में पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन से जुड़े जोखिम तीसरे स्थान पर हैं। लेकिन तमाम देशों की अगले दो वर्षों की प्राथमिकताओं में यह अपेक्षाकृत पीछे चला गया है। आर्थिक मंदी और बेरोजगारी व आर्थिक सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं नीति-निर्माताओं का ध्यान पर्यावरणीय जोखिमों से हटा रही हैं। इसकी वजह से निम्न संकट गहरे हो रहे हैं-
अल्पकालिक जोखिमों को देखते हुए विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों का दोहन पारिस्थितिकी तंत्र के क्षरण और जैव विविधता को नुकसान पहुंचा रहा है। ये दोनों ही दीर्घकालिक वैश्विक जोखिम हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि प्राकृतिक प्रणालियों का कमजोर होना जल सुरक्षा, खाद्य उत्पादन और मानव जीवन के लिए संरचनात्मक खतरे पैदा करता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि जल प्रबंधन और उससे जुड़े नियमन में कमियों और जल संसाधनों के बेहिसाब उपयोग के कारण केवल क्षेत्रीय जल संकट ही नहीं बढ़ता है बल्कि कई अन्य क्षेत्र इससे प्रभावित होते हैं। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि आने वाले 10 वर्षों में बड़े देशों के बीच भू-आर्थिक तनाव के चलते समुद्र के नीचे बिछे संचार केबलों, सेटेलाइटों, व अन्य आधारभूत ढांचों को नुकसान पहुंचने की आशंका है। यही नहीं समुद्री रास्तों में बाधाएं डालने से कई अन्य जोखिम पैदा हो सकते हैं जैसे मालवाहक जहाजों के देर से पहुंचने पर छोटे-बड़े देशों की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंच सकता है।
ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट कहती है कि पूरे विश्व में मौजूदा जल अवसंरचनाएं जलवायु से जुड़े बढ़ते जोखिमों का सामना करने में सक्षम नहीं हैं। जब कोई बड़ी मौसमी घटना होती है तब पेय जल आपूर्ति, स्वच्छता और बाढ़ प्रबंधन प्रणालियों की कमजोरियां खुल कर सामने आ जाती हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण चरम मौसमी घटनाएँ मौजूदा जल अवसंरचनाओं की सीमाओं को उजागर कर रही हैं। कई प्रणालियाँ इन दबावों के लिए तैयार नहीं हैं। रिपोर्ट में यह संकेत दिया गया है कि पुरानी और अपर्याप्त जल प्रणालियां भविष्य के जोखिमों को संभालने में असमर्थ हो सकती हैं, जिससे संकट और गहरा सकता है।
Global Risks Report 2026 यह स्पष्ट करती है कि पारिस्थितिकी तंत्र और जल प्रणालियाँ एक-दूसरे पर निर्भर हैं। किसी एक में गिरावट दूसरे को भी अस्थिर करती है। जैव विविधता का नुकसान केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं है, बल्कि यह आजीविका, खाद्य सुरक्षा और सामाजिक जोखिमों को जन्म देता है।
वैश्विक जोखिम रिपोर्ट का मानना है कि पानी से जुड़े जोखिम की वजह से खाद्य प्रणाली, स्वास्थ्य और सामाजिक स्थिरता भी प्रभावित होती है। रिपोर्ट इन्हें “systemic risks” के रूप में देखती है, जिनका असर एक साथ कई क्षेत्रों में दिखता है। रिपोर्ट बताती है कि जलवायु परिवर्तन के कारण भीषण बाढ़, अत्याधिक सूखा, मूसलाधार बारिश जैसी घटनाएं जल प्रणाली को नुकसान पहुंचाते हैं जिससे जल असुरक्षा जैसी समस्या बढ़ रही है। कमजोर जल प्रबंधन और बढ़ता दबाव इन जोखिमों को और गंभीर बनाता है, जिससे जल संकट अन्य वैश्विक जोखिमों के साथ मिलकर व्यापक प्रभाव पैदा करता है। रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि बिजली और पानी की आपूर्ति बाधित होने से न केवल आम लोगों का दैनिक जीवन प्रभावित होता है बल्कि तमाम व्यापारिक गतिविधियां भी रुक जाती हैं, जिससे एक-एक मिनट में लाखों का नुकसान होता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि पारिस्थितिकी तंत्र के क्षरण और प्राकृतिक प्रणालियों के कमजोर होने से पानी की उपलब्धता और गुणवत्ता कम होने का जोखिम बढ़ रहा है। यह जोखिम देखने में अल्पकालिक लग रहा है लेकिन यह दीर्घकालिक होने के साथ-साथ इसके परिणाम भी दीर्घकालिक हो सकते हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि जिस गति से समुद्री जल का स्तर बढ़ रहा है उससे अधिक गति से दुनिया के तमाम बड़े शहर जमीन की ओर धंस रहे हैं। शहरों के धसने का सबसे बड़ा कारण है बेतरतीब तरीके से हो रहा भूगर्भ-जल का दोहन। शहरों में हम जितनी इमारतें खड़ी कर कर रहे हैं उसे कहीं ज्यादा पानी हम जमीन से निकाल रहे हैं, जिससे नीचे की मिट्टी पर दबाव बढ़ रहा है। अलग-अलग स्थानों में जमीन पर दबाव वहां की मिट्टी के प्रकार पर निर्भर है क्योंकि बोरिंग व बोरवेल के जरिए हम मिट्टी को स्थाई क्षति पहुंचा रहे हैं। और इस वजह से भूगर्भीय जोखिम बढ़ रहे हैं। जमीन के ऊपर बाढ़ के कारण मिट्टी में कटाव व विस्थापन बढ़ जाता है और जमीन अस्थिर हो जाती है। ऊंची-ऊंची इमारतों वाले शहरों में जब बाढ़ आती है तब इमारतों की नींव को नुकसान पहुंचता है इससे जान हानि का जोखिम बढ़ जाता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि तमाम देशों में जल सुरक्षा इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि सरकारें अपने पड़ोसी देशों के साथ पानी के बंटवारे को अपने देश की जनता की जरूरतों से ऊपर नहीं रखना चाहती हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि नदियों और जल संसाधनों पर नियंत्रण की वजह से देशों के बीच तनाव बढ़ने का जोखिम बढ़ रहा है। रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा है कि अगले एक दशक में पानी के बंटवारे को लेकर संभावित टकराव भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी बेसिन को लेकर हो सकता है। इसके अलावा अफ़ग़ानिस्तान द्वारा कोश टेपा नहर का निर्माण एक नए टकराव को जन्म दे सकता है क्योंकि इस नहर से अमू दरिया नदी का प्रवाह तुर्कमेनिस्तान और उज़्बेकिस्तान की ओर कम हो सकता है।
जल और वायु प्रदूषण को रिपोर्ट एक ऐसे जोखिम के रूप में देखती है, जो कई अन्य संकटों से जुड़ा है। इसके प्रभाव स्वास्थ्य, पारिस्थितिकी और सामाजिक स्थिरता तक फैलते हैं, लेकिन नीति स्तर पर इसे अक्सर कम प्राथमिकता मिलती है। आम तौर पर इसे तभी संज्ञान में लिया जाता है, जब कोई बड़ी घटना होती है जैसे दूषित जल पीने से लोगों की मृत्यु होना, बड़े शहरों का स्मॉग से ढक जाना, तेल रिसाव के कारण समुद्री प्रदूषण समुद्री जीवों के मौतों की घटना या फिर पहाड़ी क्षेत्रों में बादल फटने या ग्लेशियर टूटना। सामान्य दिनों में प्रदूषण एक अनदेखा अध्याय बन जाता है।
रिपोर्ट में उन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य और जल सुरक्षा पर चिंता व्यक्त की गई है जहां पर आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस तकनीकी को विस्तार देने के लिए डाटा केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं। इसके पीछे कारण है डाटा केंद्रों को स्थापित करने के लिए व और संयंत्र के संचालन में पैदा होने वाली गर्मी को नियंत्रित करने के लिए भारी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है।
WEF की इस रिपोर्ट में सभी देशों को सुझाव दिया गया है कि जल अवसंरचना पर दबाव केवल तकनीकी समस्या नहीं है। यह शासन, निवेश और दीर्घकालिक योजना से भी जुड़ा हुआ जोखिम है। इसलिए क्षेत्र कोई भी हो, नीति निर्धारण के समय जल संरचनाओं का खास ध्यान रखने में ही भलाई है। यह रिपोर्ट असमानता को सबसे अधिक आपस में जुड़े वैश्विक जोखिमों में से एक मानती है। जल संकट इस असमानता को और गहरा करता है, क्योंकि सुरक्षित पानी और स्वच्छता के संसाधन समाज के सभी वर्गों में समान नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार, पर्यावरणीय दबाव और जलवायु जोखिम लोगों को विस्थापन के लिए मजबूर कर रहे हैं। पानी की कमी, बाढ़ और पारिस्थितिकी क्षरण सामाजिक तनाव और अस्थिरता को बढ़ाते हैं, खासकर संवेदनशील और प्रकृति के बीच रहने वाले आदिवासी समुदायों में।
सतत् विकास को ध्यान में रखते हुए पूरे विश्व में कोयला अधाारित ऊर्जा संयंत्रों को कम कर नवीरीकरण ऊर्जा पर जोर दिया जा रहा है। इसमें सौर्य ऊर्जा प्रमुख है। ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट में कहा गया है कि चूंकि आधुनिक सौर्य ऊर्जा संयंत्र तकनीकी रूप से विभिन्न प्रकार के सॉफ्टवेयरों से जुड़े हुए हैं इसलिए इन पर साइबर हमले का खतरा हमेशा बना रहता है। दुनिया के 150 देशों में 40 लाख से अधिक सौर्य ऊर्जा प्रणालियों पर साइबर हमले का जोखिम बड़े जोखिमों में से एक है और इसके कई प्रकार के दुष्परिणाम हो सकते हैं। ऐसे साइबर हमलों की वजह से दीर्घकालिक ब्लैकआउट, दूषित जल और यातायात दुर्घटनाओं की आशंका रिपोर्ट में जताई गई है।
Organisation for Economic Co-operation and Development (OCED) यानि आर्थिक सहयोग और विकास संगठन के सदस्य देशों पर एक अलग प्रकार का दबाव है। भारत समेत 38 देश इस संगठन के सदस्य हैं। ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट 2026 में कहा गया है कि इन देशों पर सतत् विकास को लेकर काफी दबाव है। इनमें से अधिकांश देशों की आधारभूत संरचना, यातायात नेटवर्क, विद्युत ग्रिड, जल प्रणाली, आदि काफी पुराने समय से हैं। उन्हें अपग्रेड करने की जरूरत है। रिपोर्ट के अनुसार केवल कम आय और मध्यम आय वाले देशों में गैर भरोसेमंद यातायात, बिजली और जल प्रणाली की वजह से हर साल कुल 300 बिलियन डॉलर का नुकसान होता है। इससे इन देशों पर आर्थिक जोखिम निरंतर बढ़ रहा है।
ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट में भारत और दक्षिणी देशों को सुझावों के साथ कुछ चेतावनियां भी दी गई हैं, जो इस प्रकार हैं-
विकासशील देशों पर पर्यावरणीय और जलवायु जोखिमों का असर बाकियों की तुलना में अधिक होगा।
सीमित संसाधन, उच्च जनसंख्या दबाव और कमजोर प्रणालियां इन देशों को अधिक संवेदनशील बनाती हैं।
सीमित संसाधनां के कारण विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाएँ अधिक संवेदनशील बताई गई हैं।
अगर जलवायु और जल जोखिमों को नीति और योजना में पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया, तो भविष्य में अस्थिरता बढ़ सकती है।
दीर्घकालिक आकलन दर्शाता है कि 2036 तक पर्यावरण और जलवायु से जुड़े जोखिम वैश्विक खतरे की सूची में प्रमुख बने रहेंगे।
केवल संकट के बाद प्रतिक्रिया देना पर्याप्त नहीं है। सभी देशों को जोखिमों को कम करने के लिए बेहतर शासन और संरचनात्मक निवेश करना होगा।
साइबर असुरक्षा
संपत्ति और आय की असमानता
अपर्याप्त जन सेवाएं एवं सामाजिक सुरक्षा जैसे शिक्षा, आधारभूत अवसंरचना, आदि
आर्थिक मंदी एवं स्थिरता
सशस्त्र संघर्ष (प्रॉक्सी युद्ध, गृहयुद्ध, आतंकवाद, आदि)
ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट 2026 का समग्र संदेश स्पष्ट है - पूरी दुनिया एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुकी है जहां जलवायु परिवर्तन, जल संकट, पारिस्थितिकी क्षरण, असमानता, तकनीकी जोखिम और भू-राजनीतिक तनाव एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। अगर नीति-निर्माण में पर्यावरण और जलवायु जोखिमों को केंद्र में नहीं रखा गया, तो ये संकट अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य, आजीविका और सामाजिक स्थिरता को और कमजोर करेंगे। रिपोर्ट यह भी संकेत देती है कि केवल तात्कालिक प्रतिक्रियाएँ पर्याप्त नहीं होंगी। दीर्घकालिक सोच, समन्वित शासन और समय रहते रोकथाम ही भविष्य की वैश्विक अस्थिरता को कम करने का एकमात्र रास्ता है।