अब हरियाली दूर-दूर तक नजर नहीं आती। 
जलवायु परिवर्तन

सस्टेनेबिलिटी अब एक विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता है

सस्टेनेबिलिटी का अर्थ है प्राकृतिक संसाधनों का इस प्रकार उपयोग करना कि वे फिर से प्राकृतिक वातावरण में लौट सकें। यह वर्तमान आवश्यकताओं को पूरा करते हुए भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं का ध्यान रखने का कार्य है।

Author : प्रशांत सिन्हा पर्यावरणविद्

सस्टेनेबिलिटी यानी प्राकृतिक संसाधनों का इस तरह उपयोग करना कि वे वापस प्रकृति में लौट सकें। या यूं समझें वर्तमान की जरूरतों को पुरा करना और साथ ही यह सुनिश्चित करना कि भविष्य की पीढियां भी अपनी जरूरतें पूरी कर सकें। दुनिया तेजी से बदल रही है।

औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और उपभोक्तावाद की इस दौड़ में मानवता ने कई महत्वपूर्ण प्रगति हासिल की हैं, लेकिन इन उपलब्धियों की कीमत हमारे पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों ने चुकाई है। आज, जब हम अपने आसपास के वातावरण की ओर देखते हैं, तो हमें एक बात स्पष्ट होती है। अगर हमने अभी भी अपनी जीवनशैली और उपभोग के तरीकों में बदलाव नहीं किया, तो हमारा भविष्य अस्थिर होगा। सस्टेनेबल विकास (सतत विकास) का मतलब केवल पर्यावरण की सुरक्षा नहीं है; इसका संबंध एक ऐसे संतुलित विकास से है जो पर्यावरण, समाज और अर्थव्यवस्था के बीच तालमेल बैठाकर सभी की भलाई सुनिश्चित करें। इसके लिए आर्थिक, पर्यावरणीय, और सामाजिक इन तीन क्षेत्रों में नीतियों को एक साथ काम करना होगा। 


जलवायु परिवर्तन का प्रभाव हर जगह देखा जा सकता है। तापमान में वृद्धि, समुद्र के जलस्तर का बढ़ना, और चरम मौसम की घटनाएँ, जैसे बाढ़, सूखा और चक्रवात। इन सबका परिणाम न केवल पर्यावरणीय हानि में होता है, बल्कि सामाजिक और आर्थिक असमानता भी बढ़ती है। कृषि उत्पादकता घट रही है, जिससे गरीब और हाशिए पर रहने वाले लोग सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। इन समस्याओं के बीच, अगर हमें भविष्य को सस्टेनेबल बनाना है, तो हमें सभी स्तरों पर समग्र और ठोस कदम उठाने होंगे। 

सस्टेनेबिलिटी की शुरुआत हमें अपनी रोजमर्रा की जीवन-शैली से करनी होगी। इसमें सबसे पहले हमें अपनी उपभोग की आदतों पर ध्यान देना होगा। प्लास्टिक जैसी वस्तुएं, जो पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाती हैं, उनका इस्तेमाल कम करना जरूरी है। इसके अलावा, 'मिनिमलिज्म' (कम से कम उपयोग करने की आदत) की ओर बढ़ना होगा, जिससे हम केवल वही खरीदें और उपयोग करें जो हमारे लिए वास्तव में आवश्यक हो। 

ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोतों का इस्तेमाल बढ़ाना भी इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और जलविद्युत जैसे विकल्पों का इस्तेमाल न केवल जीवाश्म ईंधन पर हमारी निर्भरता को कम करेगा, बल्कि यह पर्यावरणीय प्रदूषण को भी कम करेगा। हमें अपने घरों में ऊर्जा-बचत उपकरणों का उपयोग करना चाहिए और ऊर्जा की खपत को कम करने के तरीकों को अपनाना चाहिए, जैसे दिन के उजाले में काम करने की आदत डालना। 

जल, जीवन का सबसे महत्वपूर्ण संसाधन है, लेकिन हमारी लापरवाही के कारण यह तेजी से दुर्लभ होता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन और मानवजनित गतिविधियों के चलते दुनिया के कई हिस्सों में जल संकट गहरा रहा है। ऐसे में जल की बचत और संरक्षण को लेकर जागरूकता फैलाना बेहद जरूरी है। हमें जल का विवेकपूर्ण उपयोग करना होगा और वर्षा जल संचयन जैसी तकनीकों को बढ़ावा देना होगा। इसके अलावा, जलस्रोतों की सफाई और पुनर्स्थापना भी जरूरी है ताकि हम आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्याप्त जल भंडार छोड़ सकें। कृषि में सस्टेनेबिलिटी लाना एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि परंपरागत कृषि प्रणाली ने हमारे प्राकृतिक संसाधनों पर गहरा दबाव डाला है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अधिक प्रयोग से मिट्टी की उर्वरता कम हो रही है और जल प्रदूषण भी बढ़ रहा है। जैविक खेती और परंपरागत कृषि प्रणालियों की ओर वापसी करके हम इस समस्या का समाधान कर सकते हैं। इसके अलावा, 'किसान उपभोक्ता कड़ी' को भी सशक्त बनाना जरूरी है, ताकि किसानों को उनके उत्पाद का उचित मूल्य मिले और उपभोक्ता को जैविक और ताजा उत्पाद प्राप्त हो सके। सस्टेनेबिलिटी का संदेश समाज के हर व्यक्ति तक पहुंचाना होगा। इसके लिए शिक्षा और जागरूकता सबसे महत्वपूर्ण उपकरण हैं। हमें सस्टेनेबिलिटी से जुड़े मुद्दों पर स्कूलों, कॉलेजों और समाज में व्यापक जागरूकता अभियान चलाने होंगे। 

बच्चों और युवाओं को पर्यावरणीय शिक्षा से जोड़ना होगा ताकि वे पर्यावरण संरक्षण की दिशा में सजग हो सकें। इसके साथ ही, हमें सस्टेनेबल तकनीकों और नवाचारों को भी बढ़ावा देना होगा, ताकि हम नई पीढ़ी को ऐसी तकनीकों से लैस कर सकें जो पर्यावरण के अनुकूल हों। सरकार की नीतियों का भी सस्टेनेबल विकास में महत्वपूर्ण योगदान है। ऐसे कानून और नीतियां बनाई जानी चाहिए जो प्राकृतिक संसाधनों के अनावश्यक दोहन को रोकें और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा दें। सरकार को ऊर्जा की खपत, जल संरक्षण, और पर्यावरणीय सुरक्षा के लिए कठोर मानदंड स्थापित करने चाहिए। साथ ही, उद्योगों को भी इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।

ताकि वे अपनी उत्पादन प्रक्रियाओं में सस्टेनेबल तरीकों का पालन करें। सस्टेनेबल विकास का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को दूर करने में भी मदद करता है। आज भी दुनिया में करोड़ों लोग गरीबी, भूख, और असमानता से जूझ रहे हैं। ऐसे में सस्टेनेबिलिटी का लक्ष्य केवल पर्यावरण को बचाना नहीं है, बल्कि समाज के सभी वर्गों को विकास की धारा से जोड़ना है। हमें महिलाओं, हाशिए पर रहने वाले लोगों और ग्रामीण समुदायों को सशक्त बनाना होगा, ताकि वे अपनी जीवनशैली को सस्टेनेबल बना सकें और विकास की प्रक्रिया में बराबरी से भाग ले सकें। सस्टेनेबिलिटी के मुद्दे केवल एक देश या क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह एक वैश्विक चुनौती है। जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का विनाश और प्राकृतिक संसाधनों की कमी जैसी समस्याएं सभी देशों को प्रभावित करती हैं। ऐसे में हमें वैश्विक स्तर पर सहयोग और समझौते करने होंगे। पेरिस समझौते जैसी पहलें इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं, लेकिन यह जरूरी है कि सभी देश अपनी जिम्मेदारियों को समझें और मिलकर इन चु चुनौतियों का सामना करें। सस्टेनेबल भविष्य के लिए केवल सरकार और संगठनों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। नागरिकों की भागीदारी भी जरूरी है। हम सभी को अपने स्तर पर छोटे-छोटे कदम उठाने होंगे, जैसे ऊर्जा की बचत करना, जल का संरक्षण करना, और सस्टेनेबल उत्पादों का उपयोग करना। इसके अलावा, हम अपने आसपास के लोगों को भी इस दिशा में प्रेरित कर सकते हैं, ताकि सामूहिक प्रयासों से हम एक सस्टेनेबल समाज का निर्माण कर सकें।

सस्टेनेबल भविष्य की दिशा में हमें तेजी से आगे बढ़ना होगा। यह यात्रा आसान नहीं होगी, लेकिन यह जरूर है कि अगर हम अभी भी चेत गए और ठोस कदम उठाए, तो हम एक सस्टेनेबल, सुरक्षित और समृद्ध भविष्य का निर्माण कर सकते हैं। यह भविष्य न केवल हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए होगा, बल्कि हम सबके लिए एक बेहतर और स्वस्थ जीवन का आधार बनेगा। अब समय आ गया है कि हम सस्टेनेबिलिटी को अपनी जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा बनाएं और इस ग्रह को एक बार फिर से संतुलित और समृद्ध बनाएं। (जगत फीचर्स)

SCROLL FOR NEXT