वधावन पोर्ट कॉरिडोर के लिए बड़े पैमाने पर वन भूमि डायवर्जन और मैंग्रोव कटाई के बीच सवाल उठ रहा है कि क्या compensatory afforestation वास्तव में तटीय जल प्रणालियों और भूजल संतुलन की भरपाई कर सकती है।
चित्र:अतीक़ शेख़ (फ़्रंटलाइन)
महाराष्ट्र के पालघर-दहानू क्षेत्र में प्रस्तावित वधावन पोर्ट कॉरिडोर पर केंद्र सरकार ने मेगा पोर्ट और सड़क-रेल नेटवर्क को जोड़ने के लिए मंजूरी दी है। इसकी अनुमानित लागत 76,220 करोड़ रुपये है। इस परियोजना के तहत आठ-लेन सड़क और रेल कॉरिडोर बनाया जाएगा। इसके लिए लगभग 237 हेक्टेयर वन भूमि का डायवर्जन प्रस्तावित है। साथ ही करीब 40 हजार पेड़ों की कटाई को मंजूरी दी गई है, जिनमें लगभग 1600 मैंग्रोव शामिल हैं।
आमतौर पर इस तरह की निर्माण-केंद्रित बड़ी परियोजनाओं के लिए यही तर्क दिया जाता है कि यदि एक जगह जंगल कटेंगे तो दूसरी जगह नए पेड़ लगाकर उसकी भरपाई कर दी जाएगी।
लेकिन अहम सवाल यह है कि क्या जंगलों को केवल पेड़ों की संख्या के रूप में देखना पर्याप्त है? क्या दशकों पुराने प्राकृतिक जंगलों की जल-भूमिका को उसके बदले किसी दूसरे भौगोलिक क्षेत्र में लगाए गए पौधे वास्तव में निभा और दोहरा सकते हैं? तटीय महाराष्ट्र का यह मामला इसी बड़े सवाल को सामने लाता है।
अक्सर जंगलों को जैवविविधता या कार्बन भंडारण के नजरिए से समझा जाता है, जबकि उनका एक महत्वपूर्ण काम पानी को नियंत्रित करना भी है।
पुराने जंगल बारिश के पानी को रोकते हैं, मिट्टी में उसकी पैठ बढ़ाते हैं और उसे धीरे-धीरे भूजल एक्वीफ़ायर तक पहुंचाने में मदद करते हैं। जंगल की जमीन पत्तियों, जैविक पदार्थों और जड़ों की वजह से स्पंज की तरह काम करती है।
जब बारिश होती है तो पानी तेजी से बहकर निकल नहीं जाता, बल्कि जमीन के भीतर समाने लगता है। यही प्रक्रिया भूजल रिचार्ज को मजबूत बनाती है और आसपास की जल-इकाइयों और छोटे जलस्रोतों को ज़िंदा रखती है।
विशेषज्ञों के अनुसार जंगल केवल सतह पारिस्थितिकी नहीं, बल्कि पूरे जल-विज्ञान चक्र का हिस्सा हैं।
संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन और भारत में जल संसाधन एवं वन पारिस्थितिकी पर किए गए अध्ययन बताते हैं कि परिपक्व वन पारिस्थितिकी तंत्र वर्षा जल के रिसाव को बढ़ाते हैं, सतही अपवाह को कम करते हैं और भूजल पुनर्भरण को स्थिर बनाते हैं। यही कारण है कि वैज्ञानिक जंगलों को केवल वृक्षों का समूह नहीं, बल्कि सक्रिय जल-नियामक प्रणाली मानते हैं।
अक्सर जंगलों को जैवविविधता या कार्बन भंडारण के नजरिए से समझा जाता है, जबकि उनका एक महत्वपूर्ण काम पानी को नियंत्रित करना भी है।
पालघर-दहानू जैसे समुद्र तटीय क्षेत्रों में जंगलों और मैंग्रोव का महत्व और बढ़ जाता है। दहानू क्षेत्र लंबे समय से पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील माना जाता रहा है। यहां की अर्थव्यवस्था मछली पालन, बागवानी और वर्षा-आधारित जल प्रणालियों से जुड़ी है। ऐसे में तटीय एक्वीफ़ायर में खारे पानी के रिसाव का खतरा स्थानीय आजीविका को भी प्रभावित कर सकता है।
दहानू क्षेत्र को भारत सरकार द्वारा पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र (इको-सेंसिटिव ज़ोन) के रूप में अधिसूचित किया गया है, जिसका उद्देश्य इस क्षेत्र की नाज़ुक पारिस्थितिकी और तटीय जल-प्रणालियों की सुरक्षा करना है।
मैंग्रोव समुद्री तूफानों और तटीय क्षरण से सुरक्षा देने के साथ-साथ फ्रेशवॉटर और समुद्रीजल के बीच संतुलन बनाए रखने में भी मदद करते हैं। वे समुद्र के खारे पानी को अंदरूनी भूजल क्षेत्रों तक तेजी से पहुंचने से रोकने वाली प्राकृतिक बफ़र प्रणाली की तरह काम करते हैं।
अगर भूमि के उपयोग में बड़े पैमाने पर बदलाव किया जाता है तो इसका सीधा असर इस संतुलन पर पड़ता है। इसलिए सड़कों के निर्माण, माल-ढुलाई के लिए बनाए गए रास्तों और ज़मीन के कंक्रीटीकरण या ऐसे ही तमाम औद्योगिक ढांचे के निर्माण से आसपास की पारिस्थितिकी प्रभावित होती है। इससे शहरों और आसपास के इलाकों में अचानक जलभराव और तेज़ बाढ़ जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है।
पालघर-दहानू क्षेत्र के कई गांव आज भी पानी की अपनी रोज़मर्रा की ज़रूरतों के लिए कुओं, छोटे तालाबों और स्थानीय भूजल स्रोतों पर निर्भर हैं। यहां की बागवानी और वर्षा-आधारित कृषि सीधे पानी की उपलब्धता और उसकी गुणवत्ता से जुड़ी हुई है। मछली पालन करने वाले समुदायों के लिए भी तटीय जल संतुलन और खारे-मीठे पानी का अनुपात बेहद महत्वपूर्ण है।
इस क्षेत्र में जल कोई अलग संसाधन नहीं है, बल्कि पूरे जीवन-तंत्र का आधार है। ऐसे में जब बड़े पैमाने पर भूमि उपयोग में बदलाव होता है (जैसे जंगलों की कटाई, मैंग्रोव क्षेत्र में हस्तक्षेप या भारी इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण आदि) तो समय के साथ इसका असर स्थानीय जल व्यवस्था पर दिखाई देने लगता है। यह सीधे तौर पर पीने के पानी की उपलब्धता, सिंचाई की क्षमता और खेती की उत्पादकता को प्रभावित कर सकता है।
ये बदलाव तुरंत नहीं, बल्कि वर्षों में सामने आते हैं। यही कारण है कि स्थानीय समुदायों, मछुआरा संगठनों और पर्यावरण समूहों ने इस परियोजना के समग्र और संचयी पारिस्थितिक प्रभावों पर अधिक विस्तृत और स्वतंत्र अध्ययन की मांग की है।
विकास परियोजनाओं की बहस अक्सर बड़े आर्थिक आंकड़ों पर केंद्रित रहती है, लेकिन स्थानीय स्तर पर पानी का बदलता संतुलन ही असली दीर्घकालिक प्रभाव तय करता है।
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की रिपोर्ट भी इस बात की ओर इशारा करती है कि compensatory afforestation कई मामलों में प्राकृतिक जंगलों की पारिस्थितिक सेवाओं की पूर्ण भरपाई नहीं कर पाती।
यहीं compensatory afforestation की सबसे बड़ी चुनौती सामने आती है।
कागजों में किसी दूसरी जगह पौधे लगाना आसान समाधान लगता है, लेकिन पारिस्थितिकीय सच्चाई इससे कहीं अधिक जटिल है।
एक पुराना और परिपक्व जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होता। वह मिट्टी, नमी, फफूंद, सूक्ष्म जीवों, जलधाराओं और स्थानीय जलवायु के बीच विकसित हुआ एक जीवित तंत्र होता है, जिसे बनने में कई दशक लगते हैं।
इसके उलट, compensatory plantations अक्सर मोनोकल्चर आधारित होते हैं, जहां एक ही प्रकार के पेड़ लगाए जाते हैं। भारत में कई अध्ययन यह दिखाते हैं कि क्षतिपूरक वनीकरण के तहत लगाए गए पौधे अक्सर एक ही प्रजाति पर आधारित वृक्षारोपण में बदल जाते हैं।
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की रिपोर्ट भी इस बात की ओर इशारा करती है कि compensatory afforestation कई मामलों में प्राकृतिक जंगलों की पारिस्थितिक सेवाओं की पूर्ण भरपाई नहीं कर पाती।
ऐसे वृक्षारोपण में जैवविविधता सीमित होती है और वे पुराने प्राकृतिक मिश्रित जंगलों जैसी पारिस्थितिकीय सेवाएं प्रदान नहीं कर पाते।
इस तरह के वृक्षारोपण अभियानों से हरियाली तो बढ़ाई जा सकती है, लेकिन जरूरी नहीं कि वे भूजल रिचार्ज, मिट्टी में नमी की और जैवविविधता को बनाए रखने में भी उसी अनुपात में सहायक हों जैसा कि प्राकृतिक जंगल करते हैं।
यही कारण है कि कई जल-वैज्ञानिक और पारिस्थितिकी विशेषज्ञ दोनों ही वृक्षारोपण और जंगल को समान नहीं मानते हैं।
भारत में वन विपथन नीतियों (forest diversion policies) पर काम करने वाले विशेषज्ञ लंबे समय से यह कहते रहे हैं कि नीति-निर्माण में अक्सर वृक्ष-आवरण और वन पारिस्थितिकी तंत्र को एक जैसा मान लिया जाता है।
लेकिन वास्तव में दोनों में बहुत अंतर होता है।
उदाहरण के लिए, पश्चिमी घाट या तटीय मिश्रित जंगलों की जगह यूकेलिप्टस जैसी तेजी से बढ़ने वाली एकल प्रजातियों का वृक्षारोपण करने से हरित आवरण तो बढ़ सकता है, लेकिन ऐसी प्रजातियां कई बार भूजल की खपत बढ़ाती हैं और स्थानीय जैवविविधता को सीमित कर देती हैं।
हालांकि कुछ परिस्थितियों में ये वृक्षारोपण कार्बन अवशोषण में उपयोगी हो सकते हैं।किसी पुराने मिश्रित जंगल को काटकर दूसरी जगह तेजी से बढ़ने वाली प्रजातियों के पौधे लगा देना सांख्यिकीय रूप से हरियाली बढ़ा सकता है, लेकिन इससे वही पारिस्थितिक कार्य वापस नहीं आते।
पुराने जंगल, बारिश के पानी को सोखने, बाढ़ के ख़तरे को कम करने, जल-धाराओं को जीवित और भूजल रिचार्ज को स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
नए वृक्षारोपण को इन प्रक्रियाओं में प्रभावी होने में वर्षों और कई बार तो दशकों का समय लगता है।
यह बहस ऐसे समय में हो रही है जब भारत के तटीय क्षेत्र पहले से जलवायु तनाव का सामना कर रहे हैं।
भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM) के अध्ययन में यह सामने आया है कि अरब सागर में समुद्र के तापमान में वृद्धि और अत्यधिक वर्षा की घटनाएं, दोनों में बढ़ोतरी देखी जा रही है।
इसके साथ ही पश्चिमी तट पर अत्यधिक वर्षा की तीव्रता और अनियमितता भी बढ़ी है। इन दोनों प्रवृत्तियों को मिलाकर देखा जाए तो यह क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के उच्च जोखिम वाले तटीय क्षेत्रों में शामिल होता जा रहा है।
ऐसे समय में जंगलों और मैंग्रोव जैसी प्राकृतिक जल-संरचनाओं का नुकसान केवल पारिस्थितिकीय मुद्दा नहीं रह जाता, बल्कि यह जल-सुरक्षा और जलवायु स्थिरता का भी सवाल बन जाता है।
यदि प्राकृतिक रिचार्ज प्रणालियां कमजोर होती हैं तो भविष्य में बाढ़, जलभराव, भूजल के स्तर में कमी और salinity intrusion जैसी समस्याओं की गंभीरता बढ़ सकती है।
सरकार वधावन पोर्ट कॉरिडोर जैसी परियोजनाओं को आर्थिक विकास, व्यापार और लॉजिस्टिक्स क्षमता बढ़ाने के लिए जरूरी मानती है। इसी दृष्टि से वधावन पोर्ट को महाराष्ट्र के समृद्धि महामार्ग से जोड़ने के लिए लगभग 104 से 105 किलोमीटर लंबा एक उच्च गति फ्रेट कॉरिडोर प्रस्तावित किया गया है। यह मार्ग दहानू, विक्रमगढ़, जव्हार और मोखाड़ा जैसे पालघर जिले के क्षेत्रों से होकर गुजरेगा, जबकि नासिक जिले में यह त्र्यंबकेश्वर और इगतपुरी के क्षेत्रों को जोड़ते हुए भरवीर के पास समृद्धि महामार्ग से मिलेगा।
इस कॉरिडोर के बनने के बाद वधावन पोर्ट से समृद्धि महामार्ग तक की दूरी लगभग 183 किलोमीटर से घटकर करीब 105 किलोमीटर रह जाएगी, जिससे माल ढुलाई का समय लगभग 4-5 घंटे से घटकर 1 से 1.5 घंटे तक आ जाने की उम्मीद है।
लेकिन यह मामला इस बात की भी याद दिलाता है कि निर्माण-योजनाओं में जल-प्रणालियों को अक्सर पर्याप्त प्राथमिकता नहीं मिलती। पर्यावरणीय आकलनों में पेड़ों की संख्या तो दर्ज हो जाती है लेकिन जल-विज्ञान तंत्रों को लेकर होने वाली गंभीर चर्चाएं कहीं पीछे छूट जाती हैं।
आज जरूरत इस बात की है कि जंगलों को केवल कार्बन या वृक्ष आवरण नहीं, बल्कि पानी के प्राकृतिक ढांचे के रूप में भी समझा जाए।
सवाल केवल पेड़ों की संख्या का नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या नए पौधे उन जटिल जल-तंत्रों की भरपाई कर सकते हैं जिन्हें पुराने जंगल दशकों से संभालते आए हैं।
तटीय भारत में, जहां पानी का संतुलन पहले से दबाव में है, यह प्रश्न और महत्वपूर्ण हो जाता है।
क्योंकि जंगल केवल हरियाली नहीं, बल्कि पानी की वह आधारभूत संरचना हैं जिस पर तटीय जीवन टिका है।
विकास की बहस तब अधूरी रह जाती है जब उसमें पानी की वह अदृश्य व्यवस्था शामिल न हो, जिस पर पूरा तटीय जीवन टिका है।
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