मध्य-पूर्व में चल रहे युद्ध से फैलते भरंकर वायु प्रदूषण के बीच इलाके में कुछ इस तरह के काले बादल घुमड़ कर काले रंग के पानी की बारिश कर रहे हैं।
स्रोत : विकी कॉमंस
जंग अपने साथ तबाही लेकर आती है। राजनीतिक और रणनीतिक स्तर पर युद्ध के नतीजे चाहे जो भी हों, उससे बड़े पैमाने पर आर्थिक नुकसान होना तय है। इस आर्थिक नुकसान के साथ ही अकसर बड़ा पर्यावरणीय नुकसान भी देखने को मिलता है, जिसकी झलक मध्यपूर्व में ईरान-इजराइल-अमेरिका के युद्ध के बीच दिखाई देने लगी है। ईरान की राजधानी तेहरान और उसके आसपास के इलाकों में 'ब्लैक रेन' की असामान्य मौसमीय घटना ने लोगों को चौंका दिया है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक बारिश के दौरान काले रंग की बूंदें गिरती देखी गईं हैं। यह घटना बीते दिनों इज़राइल द्वारा ईरान की तेल रिफाइनरियों और भंडारण केंद्रों पर हमले और ईरान द्वारा सऊदी अरब की तेल रिफाइनरियों को तबाह किए जाने की घटनाओं के बाद सामने आई है।
अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी रायटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक संयुक्त राष्ट्र की स्वास्थ्य एजेंसी विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के ईरान में स्थित कार्यालय को स सप्ताह तेल से लथपथ "काली बारिश" की कई रिपोर्टें मिली हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े पैमाने पर तेल और पेट्रोकेमिकल भंडारों और रिफाइनरीज पर हमले से लगी आग से उठते धुएं, कालिख और विषैले कणों के बादलों के साथ मिलने से इस तरह की “ब्लैक रेन” का कारण बने हैं। यह घटना सिर्फ एक मौसमीय विसंगति नहीं, बल्कि युद्ध के पर्यावरणीय प्रभावों का एक प्रत्यक्ष उदाहरण बन गई है।
समाचार एजेंसी AP की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले हफ्ते कई ईंधन तेल डिपो और एक रिफाइनरी के प्रभावित होने के बाद ईरानी राजधानी तेहरान के पास काला और तैलीय पानी बरसने से स्थानीय निवासियों ने आंखों में जलन और सांस लेने में कठिनाई की शिकायत की। कुछ लोगों ने इसे “तेल मिश्रित पानी” जैसा बताया, जबकि कुछ ने कारों और खिड़कियों पर जमी कालिख जैसी परत की तस्वीरें साझा कीं।
हालांकि आधिकारिक स्तर पर विस्तृत वैज्ञानिक जांच रिपोर्ट सामने आने में समय लग सकता है, लेकिन मौसम वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों ने शुरुआती तौर पर इसे औद्योगिक धुएं, तेल जलने से उत्पन्न कालिख और वातावरण में फैले भारी कणों से जोड़कर देखा है। युद्ध या बड़े औद्योगिक हादसों के बाद इस तरह की घटनाएं पहले भी दर्ज की जा चुकी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बारिश अपेक्षाकृत कम समय में वायुमंडल से खतरनाक रसायनों को धोकर निकाल देती है, लेकिन काली बारिश के संपर्क में आने वाले लोगों को अल्पकालिक और दीर्घकालिक स्वास्थ्य जोखिमों से बचने के लिए सावधानी बरतनी चाहिए।
युद्ध में तेल ठिकानों पर हुए हमलों से लगी आग के कारण ईरान में इन दिनों जगह-जगह पर काले, ज़हरीले धुएं का गुबार उठता दिख रहा है।
तेल रिफाइनरियों और भंडारण केंद्रों पर हमले के बाद लगी आग कई दिनों तक जल सकती है। इससे निकलने वाला धुआं केवल कार्बन डाइऑक्साइड या कार्बन मोनोऑक्साइड तक सीमित नहीं होता, बल्कि इसमें सल्फर यौगिक, नाइट्रोजन ऑक्साइड, बेंजीन जैसे कार्सिनोजेनिक रसायन और सूक्ष्म कण भी शामिल होते हैं। जब यह प्रदूषण वातावरण में ऊपर उठता है तो हवाओं के साथ फैलकर बादलों के निर्माण क्षेत्र तक पहुंच सकता है। यदि उस समय क्षेत्र में नमी और वर्षा की स्थिति बनती है, तो ये कण जल बूंदों में घुलकर “ब्लैक रेन” का रूप ले सकते हैं। यह तब होता है जब वायुमंडल में मौजूद कालिख, राख और विषैले रसायन पानी की बूंदों के साथ मिलकर बारिश के दौरान वापस पृथ्वी पर गिरते हैं। तेल रिफाइनरियों या तेल क्षेत्रों में आग लगने के बाद यह आम बात है, और यह जंगल की आग, ज्वालामुखी विस्फोट और औद्योगिक प्रदूषण के कारण भी हो सकता है।
तेहरान का भौगोलिक और मौसमीय ढांचा भी इस प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। यह शहर पहाड़ियों से घिरा है और कई बार तापमान उलटाव (temperature inversion) जैसी स्थिति बनती है, जिसमें प्रदूषक जमीन के पास ही फंस जाते हैं। यदि इसी दौरान आग और धुएं का उत्सर्जन बढ़ जाए, तो प्रदूषण का घनत्व बहुत ज्यादा हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार ईरान में ईंधन तेल में मौजूद हाइड्रोकार्बन के अपूर्ण दहन से सूक्ष्म कालिख उत्पन्न हुई। तेल जलाने से पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (पीएएच) नामक यौगिक और सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसी जहरीली गैसें भी उत्पन्न होती हैं, जो अम्लीय वर्षा का कारण बनती हैं।
तेल रिफाइनरियों की आग से भारी मात्रा में उठता काला धुआं हवा के झोकों के साथ उड़कर बादलों तक पहुंच रहा है, जिसके चलते कई इलाकों में ब्लैक रेन की घटनाएं देखने को मिली हैं।
ब्लैक रेन के बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी दी कि तेल भंडारों पर हुए हालिया हमलों के बाद हो रही इस 'ब्लैक रेन' की बूंदों में हवा में मौजूद जहरीले यौगिकों मिले होने के कारण लोगों को सांस संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। इसे दिखते हुए WHO ने लोगों से घर के अंदर रहने का आग्रह करने वाली ईरान सरकार की सलाह का समर्थन किया। देश के स्वास्थ्य एवं पर्यावरण अधिकारियों ने लोगों को घर के अंदर रहने और मास्क पहनने की सलाह दी। उन्होंने चेतावनी दी कि बारिश का पानी अत्यधिक अम्लीय है और त्वचा को जला सकता है तथा फेफड़ों को नुकसान पहुंचा सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सूक्ष्म कालिख के कण, जो मानव बाल की चौड़ाई से लगभग 40 गुना छोटे होते हैं, फेफड़ों में गहराई तक जम सकते हैं और रक्तप्रवाह में प्रवेश कर सकते हैं, जिससे सांस लेने और हृदय संबंधी समस्याएं हो सकती हैं और समय से पहले मृत्यु हो सकती है। पीएएच के संपर्क में आने से कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। ब्लैक रेन की घटनाएं स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे सकती हैं और अस्पताल में भर्ती होने वालों की संख्या बढ़ा सकती हैं, खासकर बुजुर्गों, बच्चों और पहले से ही स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रस्त लोगों में। लेकिन यह प्रदूषण का उच्च स्तर है, इसलिए संभवतः इसके कारण अभी भी स्वास्थ्य समस्याएं चल रही हैं।
ब्लैक रेन का सबसे सीधा प्रभाव कृषि पर पड़ता है। बारिश के साथ गिरने वाली कालिख और रासायनिक कण फसलों की पत्तियों पर जम जाते हैं, जिससे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। पत्तियों की सतह पर कणों की परत बनने से सूर्य के प्रकाश का अवशोषण कम हो जाता है और पौधों की वृद्धि धीमी पड़ सकती है।
इसके अलावा, यदि बारिश में सल्फर या नाइट्रोजन आधारित रसायनों की मात्रा ज्यादा हो, तो यह पत्तियों को झुलसा सकती है या मिट्टी की रासायनिक संरचना बदल सकती है। कुछ मामलों में यह बीज अंकुरण और फूल-फल बनने की प्रक्रिया को भी प्रभावित करती है।
ब्लैक रेन के साथ गिरने वाले भारी धातु कण मिट्टी में जमा होकर उसकी उर्वरता को प्रभावित कर सकते हैं। लंबे समय तक ऐसी स्थिति बने रहने पर किसान उत्पादन में गिरावट और मिट्टी की गुणवत्ता में कमी जैसी समस्याओं का सामना कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, लेड (सीसा), कैडमियम या निकेल जैसे तत्व यदि अधिक मात्रा में जमा हो जाएं, तो यह सूक्ष्मजीवों की गतिविधि को कम कर सकते हैं। इससे जैविक अपघटन की प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है और मिट्टी का पोषण चक्र प्रभावित होता है। जंगलों और घास के मैदानों में पौधों की पत्तियों पर जमने वाली कालिख प्रकाश संश्लेषण को बाधित कर सकती है।
ब्लैक रेन किसी एक क्षेत्र की समस्या नहीं रहती। वातावरण में फैले प्रदूषक सैकड़ों किलोमीटर तक यात्रा कर सकते हैं, जिससे दुनिया के एक बड़े इलाके में वायु गुणवत्ता बिगड़ सकती है। इसका मतलब है कि तेल संरचनाओं पर हमले का प्रभाव सीमित क्षेत्र से बाहर भी महसूस किया जा सकता है।
हवा को प्रदूषित करने के साथ ही यह प्रदूषक कण वर्षा जल के साथ बहकर तालाबों, नदियों और भूजल स्रोतों तक पहुंच सकते हैं। इससे पीने के पानी की गुणवत्ता और जलीय पारिस्थितिकी तंत्र दोनों पर असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों को डर है कि प्रदूषित बारिश, जिसमें भारी धातुएं भी शामिल हैं, पीने के पानी के जलाशयों और जलमार्गों को दूषित कर सकती है। जलीय पारिस्थितिकी तंत्र में प्रदूषण से मछलियों और प्लवकों पर असर पड़ सकता है। युद्ध के दौरान इस तरह के पर्यावरणीय नुकसान को अक्सर “साइलेंट कैजुअल्टी” कहा जाता है क्योंकि इसका असर लंबे समय तक दिखाई देता है।
पर्यावरण विशेषज्ञ ब्लैक रेन के पर्यावरण पर दीर्घकालिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका जता रहे हैं।
इतिहास में इससे पहले भी कई बार ब्लैक रेन की घटनाएं देखी गई हैं। पहली बार आधिकारिक तौर पर द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिरने के बाद “ब्लैक रेन” की घटनाएं दर्ज की गई थीं। उस समय बारिश के साथ रेडियोधर्मी राख और धूल गिरने की रिपोर्टें सामने आई थीं।
इसी तरह 1991 के खाड़ी युद्ध में कुवैत के तेल कुओं में लगी आग के बाद भी क्षेत्र में काले धुएं और प्रदूषण के कारण असामान्य वर्षा की घटनाओं का उल्लेख मिलता है। औद्योगिक दुर्घटनाओं के बाद भी स्थानीय स्तर पर काली या धूसर बारिश की घटनाएं देखी गई हैं, जो यह दर्शाती हैं कि बड़े पैमाने पर जलते ईंधन और रसायनों का मौसमीय प्रक्रियाओं पर कितना गहरा प्रभाव हो सकता है।
ब्लैक रेन की तरह “रेड रेन” भी घटनाएं दुनिया के कुछ इलाकों में समय-समय पर देखी गई हैं, जिन्हें शुरुआत में रहस्यमय मौसमीय घटना के तौर पर देखा गया। भारत के केरल में 2001 में लाल रंग की बारिश की घटना ने वैज्ञानिकों और आम लोगों दोनों को चौंका दिया था।
हालांकि बाद में हुए अध्ययनों में पाया गया कि इस रंग का कारण हवा में मौजूद सूक्ष्म जैविक कण ( बायो एरोसोल) या शैवाल बीजाणु थे, जो बादलों के साथ मिलकर वर्षा में शामिल हो गए थे। यह घटना बताती है कि वर्षा का रंग बदलने के पीछे कई तरह के प्राकृतिक या मानवजनित कारण हो सकते हैं।
ब्लैक रेन की तरह ही एसिड रेन यानी अम्लीय वर्षा तब होती है जब वातावरण में सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसे गैसों की मात्रा बढ़ जाती है। ये गैसें पानी की बूंदों के साथ मिलकर सल्फ्यूरिक और नाइट्रिक अम्ल बना सकती हैं।
इस तरह की बारिश मिट्टी की उर्वरता कम कर सकती है, जलाशयों का pH स्तर घटा सकती है और ऐतिहासिक इमारतों को भी नुकसान पहुंचा सकती है। यूरोप और उत्तरी अमेरिका में 20वीं सदी के उत्तरार्ध में एसिड रेन एक बड़ी पर्यावरणीय चिंता बन गई थी। ब्लैक रेन और एसिड रेन दोनों इस बात की याद दिलाती हैं कि औद्योगिक गतिविधियां और युद्ध जैसे कारक मौसमीय प्रक्रियाओं को भी प्रभावित कर सकते हैं।
तेहरान में देखी गई ब्लैक रेन केवल एक असामान्य मौसम घटना नहीं, बल्कि आधुनिक युद्ध और औद्योगिक जोखिमों का प्रतीक बनती जा रही है। वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण चरम मौसम घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ रही है। यदि ऐसे समय में युद्ध या औद्योगिक आग जैसी घटनाएं होती हैं, तो उनका प्रभाव और जटिल हो सकता है। ब्लैक रेन जैसी घटनाएं केवल स्थानीय प्रशासन या एक देश की जिम्मेदारी नहीं होतीं। यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण सुरक्षा, युद्ध नियमों और औद्योगिक जोखिम प्रबंधन से जुड़ा मुद्दा है। इसलिए युद्ध के दौरान ऊर्जा और रसायन संरचनाओं को निशाना बनाने से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान पर वैश्विक स्तर पर सख्त नियम बनाए जाने चाहिए। साथ ही, प्रदूषण निगरानी और आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली को मजबूत करना जरूरी है। यदि इस तरह की घटनाओं को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो आने वाले समय में यह कृषि, स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बड़ी चुनौती बन सकती हैं। इसलिए ब्लैक रेन को आसमान से बरसती एक ज़रूरी चेतावनी के रूप में देखना जरूरी है।
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