नदियों और जलाशयों का जल स्तर घटने से नदी के पानी पर निर्भर लोगों की ज़िन्दगी में कई तरह की परेशानियां आती हैं। कई बार रोज़ी-रोटी के संकट के चलते लोगों को पलायन भी करना पड़ता है।
स्रोत : विकी कॉमंस
गर्मी के दस्तक देने के साथ ही देश में जल संकट गहराने लगा है। यह बात केंद्रीय जल आयोग की एक हालिया रिपोर्ट में सामने आई है। आयोग द्वारा जारी एक बुलेटिन के अनुसार अप्रैल की शुरुआत की तुलना में कई प्रमुख नदी बेसिनों में जल स्तर घटा है। गंगा बेसिन 53.8% से गिरकर लगभग 50.01% पर आ गया है। गोदावरी 47.58 से घटकर 40.69% और नर्मदा 46.09 से गिरकर 38.82 % पर पहुंच गई है।
रिपोर्ट के मुताबिक देश में जल भंडारण की स्थिति तेजी से बिगड़ रही है, जिससे गर्मियों की शुरुआत में ही जल संकट के स्पष्ट संकेत सामने आने लगे हैं। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार देश के 166 प्रमुख जलाशयों में उपलब्ध पानी घटकर कुल क्षमता के 40 % से नीचे आ गया है। वहीं कई प्रमुख नदी घाटियों में भी जल स्तर में गिरावट दर्ज की गई है, जिससे क्षेत्रीय जल असंतुलन गहराने की आशंका बढ़ गई है।
केंद्रीय जल आयोग के साप्ताहिक बुलेटिन के अनुसार देश के 166 जलाशयों में कुल लाइव स्टोरेज 71.082 अरब घन मीटर (बीसीएम) रह गया है, जो उनकी कुल क्षमता 183.565 बीसीएम का केवल 38.72 % है। 9 अप्रैल 2026 को यह स्तर 44.71 % था, यानी तीन सप्ताह में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। ये 166 जलाशय देश की कुल अनुमानित जल भंडारण क्षमता 257.812 बीसीएम का लगभग 71.20 % हिस्सा रखते हैं। इनमें से 20 जलाशय जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े हैं, जिनकी संयुक्त क्षमता 35.299 बीसीएम है।
केंद्रीय जल आयोग के अनुसार अप्रैल की शुरुआत की तुलना में कई प्रमुख नदी बेसिनों में जल स्तर घटा है। गंगा बेसिन 53.8% से गिरकर लगभग 50.01% पर आ गया है। गोदावरी 47.58 से घटकर 40.69% और नर्मदा 46.09 से गिरकर 38.82 % पर पहुंच गई है। नर्मदा 46.09 से गिरकर 38.82 % पर पहुंच गई है। कृष्णा बेसिन पहले से ही कमजोर स्थिति में था और अब भी लगभग 22.55% के आसपास बना हुआ है। कावेरी (अब 35.74%) और महानदी (43.51%) में भी गिरावट दर्ज की गई है, जबकि ताप्ती अपेक्षाकृत संतुलित स्थिति में बनी हुई है।
मध्य प्रदेश के जलाशयों में पिछले वर्ष की तुलना में कमी दर्ज की गई है। वहीं गोवा में केवल एक प्रमुख जलाशय होने के बावजूद वहां भी 12 % से अधिक गिरावट दर्ज की गई है, जो स्थानीय जल उपलब्धता के लिहाज से महत्वपूर्ण संकेत है। कई प्रमुख जलाशयों में गंभीर स्थिति देश के कई प्रमुख जलाशयों में जल स्तर अत्यंत निम्न स्तर पर पहुंच गया है। असम का खांडोंग जलाशय लगभग 21.16 % पर है, जबकि झारखंड का चंदन डैम पूरी तरह खाली हो गया है। कर्नाटक का तट्टिहल्ला 24.63, केरल का पेरियार 29.21, तमिलनाडु के वैगई 15.17, करायर 49.89 और अलियार 48.89 % नीचे हैं। कुल 166 जलाशयों में से 22 ऐसे हैं, जहां जल स्तर सामान्य के 80 % कम है।
वर्तमान में भारत एक गंभीर जल संकट का सामना कर रहा है, जहाँ लगभग 60 करोड़ लोग उच्च जल तनाव से प्रभावित हैं। 2030 तक देश की 40% आबादी को पीने के पानी की कमी हो सकती है। अत्यधिक भूजल दोहन, प्रदूषण, जनसंख्या वृद्धि, और कृषि में जल-गहन फसलों (जैसे गन्ना/चावल) का उपयोग इस संकट के मुख्य कारण हैं। भारत दुनिया में भूजल का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता है, जिसके कारण जल स्तर तेजी से गिर रहा है। जल गुणवत्ता सूचकांक में भारत 122 देशों में 120वें स्थान पर है, और 70% जल स्रोत प्रदूषित हैं। शहरी जल संकट को देखें तो नीति आयोग के अनुसार, 21 प्रमुख भारतीय शहर भूजल समाप्त होने के कगार पर हैं। देश में कुल पानी का लगभग 75% से अधिक हिस्सा कृषि में उपयोग होता है, जो अक्सर अक्षम पद्धतियों के कारण बर्बाद होता है।
हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में शिवालिक पहाड़ियों के बीच ब्यास नदी पर बना पौंग बांध भी उत्तर भारत के प्रमुख बांधों में शुमार है। केंद्रीय जल आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक देश के 166 प्रमुख जलाशयों का जल स्तर 40% तक घट गया है।
देश के बड़े बांधों और जलाशयों के जल स्तर की निगरानी के लिए Central Water Commission ने एक विस्तृत तकनीकी व्यवस्था विकसित की है। हर बड़े जलाशय पर गेज स्टेशन और ऑटोमेटेड मॉनिटरिंग सिस्टम लगाए जाते हैं, जो पानी की ऊंचाई (Water Level) को लगातार रिकॉर्ड करते हैं। जल स्तर को आमतौर पर “मीटर” में मापा जाता है और इसे समुद्र तल से ऊंचाई (Mean Sea Level) के आधार पर दर्ज किया जाता है। कई प्रमुख बांधों पर अब सेंसर आधारित रियल टाइम डेटा लॉगर और टेलीमेट्री सिस्टम भी लगाए गए हैं, जो हर कुछ मिनट या घंटों में डेटा सीधे नियंत्रण केंद्र तक भेजते हैं।
जलाशयों की क्षमता को समझने के लिए केवल पानी की ऊंचाई नहीं, बल्कि “लाइव स्टोरेज” यानी उपयोग योग्य पानी की मात्रा भी मापी जाती है। इसके लिए पहले से तैयार किए गए Elevation-Area-Capacity Chart का उपयोग होता है, जिसमें जल स्तर के अनुसार संग्रहित पानी की मात्रा का अनुमान लगाया जाता है। केंद्रीय जल आयोग देश के 150 से अधिक महत्वपूर्ण जलाशयों से साप्ताहिक आंकड़े एकत्र करता है। इन आंकड़ों की तुलना पिछले वर्ष और पिछले 10 वर्षों के औसत स्तर से की जाती है, ताकि यह समझा जा सके कि जल स्थिति सामान्य है या संकट की ओर बढ़ रही है।
अधिकांश रिपोर्टें केवल कुल जल स्तर बताती हैं, लेकिन कई जलाशयों में जो पानी बचा होता है उसका बड़ा हिस्सा “डेड स्टोरेज” में चला जाता है। यह वह स्तर होता है जहां से पानी को सामान्य तरीके से सिंचाई या पेयजल के लिए निकालना मुश्किल हो जाता है। यानी आंकड़ों में पानी मौजूद दिख सकता है, लेकिन उसका उपयोग सीमित हो जाता है। जलाशयों के जल स्तर से जुड़े आंकड़ों को समझने के लिए “लाइव स्टोरेज” और “डेड स्टोरेज” का अंतर जानना बेहद जरूरी है। आमतौर पर मीडिया रिपोर्टों में केवल यह बताया जाता है कि किसी बांध में कुल कितना प्रतिशत पानी बचा है, लेकिन यह नहीं बताया जाता कि उसमें से वास्तव में उपयोग योग्य पानी कितना है। कई बार जलाशय में दिखाई देने वाला बड़ा हिस्सा ऐसे स्तर पर पहुंच चुका होता है, जहां से पानी को सामान्य तरीके से बाहर निकालना संभव नहीं रहता।
दरअसल, किसी भी बांध या जलाशय को तकनीकी रूप से अलग-अलग स्तरों में विभाजित किया जाता है। “लाइव स्टोरेज” वह हिस्सा होता है, जहां मौजूद पानी को सिंचाई, पेयजल आपूर्ति, उद्योगों या बिजली उत्पादन के लिए छोड़ा जा सकता है। बांधों के आउटलेट गेट और टर्बाइन आमतौर पर इसी स्तर को ध्यान में रखकर डिजाइन किए जाते हैं। इसके नीचे का हिस्सा “डेड स्टोरेज” कहलाता है। यहां पानी तो मौजूद रहता है, लेकिन उसका स्तर इतना नीचे चला जाता है कि गुरुत्वाकर्षण आधारित सामान्य निकासी संभव नहीं रहती। कई मामलों में इस पानी को निकालने के लिए विशेष पंपिंग की जरूरत पड़ती है, जो महंगी और सीमित होती है।
डेड स्टोरेज का एक और महत्व यह है कि यही हिस्सा समय के साथ गाद और तलछट जमा होने की जगह बनता है। पुराने जलाशयों में वर्षों की सिल्टेशन के कारण डेड स्टोरेज तेजी से बढ़ता जाता है और लाइव स्टोरेज घटता जाता है। इसका मतलब यह है कि भले ही आंकड़ों में जलाशय में 30-40% पानी दिख रहा हो, लेकिन उपयोग योग्य पानी उससे काफी कम हो सकता है। यही वजह है कि कई बार जलाशय “खाली नहीं” दिखते, फिर भी शहरों में पानी कटौती और किसानों के लिए सिंचाई प्रतिबंध लागू करने पड़ते हैं।
गर्मी के मौसम में भारत के कई इलाकों में जल संकट इतना गंभीर हो जाता है कि महिलाओं को पानी लेने के लिए कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता है।
देश में गहराते जल संकट का असर केवल पानी की किल्लत तक सीमित नहीं रहता। इसका प्रभाव कृषि, पशुपालन उद्योगों के संचालन से लेकर बिजली उत्पादन तक पर पड़ता है। इसे इन बिंदुओं के ज़रिये समझा जा सकता है-
देश के कई पुराने बांधों और जलाशयों की वास्तविक जल संग्रहण क्षमता वर्षों में कम हो चुकी है। नदियों से आने वाली मिट्टी और गाद (Siltation) धीरे-धीरे तल में जमा होकर स्टोरेज स्पेस कम कर देती है। ऐसे में जलाशय “भरने” के बावजूद पहले जितना पानी संग्रहित नहीं कर पाते। यह संकट अक्सर आधिकारिक प्रतिशत आंकड़ों में स्पष्ट नहीं दिखता।
जल स्तर घटने का असर केवल पीने के पानी और सिंचाई तक सीमित नहीं है। कई जलविद्युत परियोजनाओं में पर्याप्त “हेड” यानी ऊंचाई का दबाव कम होने लगता है, जिससे बिजली उत्पादन प्रभावित होता है। गर्मियों में बिजली मांग बढ़ने के दौरान यह समस्या ऊर्जा संकट को भी बढ़ा सकती है।
जब जलाशयों से कम पानी छोड़ा जाता है तो डाउनस्ट्रीम नदियों में पर्यावरणीय प्रवाह (Environmental Flow) प्रभावित होता है। इससे मछलियों, वेटलैंड, डॉल्फिन और नदी किनारे की जैव विविधता पर असर पड़ता है। कई नदियों में गर्मियों में प्रदूषण का स्तर भी इसी कारण तेजी से बढ़ जाता है, क्योंकि पतला करने के लिए पर्याप्त पानी नहीं बचता।
जल संकट के दौरान कई राज्यों में उपलब्ध पानी का बड़ा हिस्सा शहरों और उद्योगों की ओर मोड़ा जाता है। इससे ग्रामीण इलाकों, छोटे किसानों और टेल एंड गांवों में सिंचाई संकट ज्यादा गहरा जाता है। यह “जल वितरण असमानता” का पहलू है, जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है।
भीषण गर्मी के दौरान बड़े जलाशयों से प्रतिदिन लाखों लीटर पानी वाष्प बनकर उड़ जाता है। भारत जैसे उष्णकटिबंधीय देशों में यह नुकसान बहुत बड़ा हो सकता है, लेकिन जल प्रबंधन की चर्चाओं में इसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
कई बार जलाशयों में पानी कम होने के पीछे केवल कम बारिश नहीं, बल्कि समय से पहले पानी छोड़ना, अधिक सिंचाई मांग, बिजली उत्पादन या खराब जल प्रबंधन भी जिम्मेदार होता है। इसलिए जलाशयों का कम स्तर हमेशा “प्राकृतिक सूखा” ही नहीं दर्शाता, बल्कि “प्रबंधन संकट” का संकेत भी हो सकता है।
कई क्षेत्रों में नदियों और जलाशयों का स्तर गिरने से आसपास के भूजल रिचार्ज पर भी असर पड़ता है। दूसरी ओर अत्यधिक भूजल दोहन से नदियों में बेस फ्लो कम होता है, जिससे जलाशयों में आने वाला पानी भी घट सकता है। यानी सतही जल और भूजल संकट एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।
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