इंदौर में नलों से दूषित पानी की आपूर्ति से चार लोगों की मौत और दर्ज़नों के बीमार होने के बाद यह मुद्दा देश भर की सुर्खियों में छाया हुआ है। सबसे ज़्यादा चर्चा गंदे पानी से लोगों की मौत के सवाल पर मध्य प्रदेश के मंत्री कैलाश विजय वर्गीय के गैर-जिम्मेदाराना बयान की हो रही है। इसके अलावा अपनी स्वच्छता, वेस्ट मैनेजमेंट और बेहतरीन सीवेज व वाटर सप्लाई सिस्टम के लिए करीब डेढ़ दशक तक देश में अव्वल रहने वाले इंदौर में ऐसी भयावह स्थिति कैसे आ गई, यह भी चर्चा का विषय बना हुआ है। इन सबके बीच जो सबसे अहम और मूलभूत मुद्दा है कि जब हमारे अधिकारियों व नीति निर्माताओं को सुरक्षित जल का विज्ञान पता है, तो इंदौर की पाइपलाइनों में जहरीला पानी आने की घटना कैसे हुई? खैर, इस सवाल का उत्तर तो जांच की रिपोर्ट आने के बाद पता चलेगा, लेकिन उससे पहले हम आपको बतायेंगे कि सीलबंद पाइप लाइन के भीतर बैक्टीरिया युक्त प्रदूषित पानी कैसे आता है? सीवर और जलापूर्ति की पाइपें अलग होने पर भी ऐसा कैसे हो जाता?
सुरक्षित पानी वह है जो रोगाणुओं, हानिकारक रसायनों और विषैले तत्वों से मुक्त हो, स्वाद-गंध सामान्य हो और लंबे समय तक पीने योग्य बना रहे। जलापूर्ति के पीछे विज्ञान की चार मुख्य परतें काम करती हैं:
1) स्रोत की सुरक्षा - सरकार की जिम्मेदारी होती है कि जिस नदी, झील या भूजल स्रोत से पानी लिया जा रहा है उसमें सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट, कृषि रसायन और ठोस कचरे का प्रवेश नहीं होना चाहिए।
2) वॉटर ट्रीटमेंट - इस प्रक्रिया के अंतर्गत कोएग्युलेशन/फ्लोक्युलेशन (गंदगी के महीन कण आपस में जुड़ते हैं), सेडिमेंटेशन (भारी कण नीचे बैठ जाते हैं), फिल्ट्रेशन (रेत/कार्बन फ़िल्टर से बचे कण हटते हैं) और डिसइन्फेक्शन ( क्लोरीन/यूवी/ओज़ोन से बैक्टीरिया-वायरस नष्ट होते हैं) शामिल हैं।
3) वितरण और भंडारण - यह सुनिश्चित करना होता है कि पाइपलाइन में लीकेज नहीं हो, जंग और क्रॉस-कनेक्शन नहीं हो। पानी का दबाव नियंत्रित हो और टंकियों की नियमित सफाई हो।
4) निगरानी और मानक - पीने के पानी की गुणवत्ता के मानक विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिर्शानिर्देश के अंतर्गत तय किए जाते हैं और सभी देश अपने हिसाब से उनको लागू करते हैं।
आमतौर पर लोगों को लगता है कि शहरों में पीने के पानी और सीवर की लाइनें अलग-अलग होती हैं, जोकि पूरी तरह से सीलबंद होती हैं। इसलिए गंदा पानी उनके नल तक नहीं पहुंच सकता। सैद्धांतिक तौर पर यह बात सही भी है, लेकिन वास्तव में कई तरह की तकनीकी खामियों, पाइपों में क्रैक, दरार या क्षरण (कोरोजन) के चलते लीकेज होने, ज्वाइंट् में ढीलापन, पुरानी पाइपलाइनों के टूट-फूट जाने और रख-रखाव यानी मेंटेनेंस में लापरवाही के चलते पानी के प्रदूषित होने से इंदौर जैसी घटनाएं गंभीर हो जाती हैं।
ऐसे में सीवेज और जलापूर्ति पाइप लाइनों का अलगाव भी बेअसर हो जाता है और सीवर का गंदा पानी वाटर सप्लाई की पाइपों में चला जाता है। इंदौर में गंदे पानी की आपूर्ति के चलते हुई मौतों और बीमारी की घटनाएं इसी अदृश्य खतरे की ओर इशारा करती हैं।
शहरों की जलापूर्ति प्रणाली में आमतौर पर पानी ऊंचे वाटरहेड टैंकों से काफ़ी दबाव (प्रेशर) के साथ सप्लाई किया जाता है। जलापूर्ति के समय इस प्रेशर के चलते लीकेज या दरारों से रिसकर पानी बाहर निकलता है। लेकिन, जब पानी की सप्लाई बंद होती है, तो पाइपलाइन के भीतर का प्रेशर अचानक कम हो जाता है। इसे तकनीकी भाषा में नेगेटिव प्रेशर कहा जाता है। यही वह क्षण होता है, जब वाटर सप्लाई के पानी के प्रदूषित होने की समस्या शुरू होती है। पानी की पाइप में प्रेशर घटते ही आसपास जमा गंदा पानी, सीवर का बहाव, कीचड़, गंदगी और दस्त (पेचिश), बुख़ार, हैज़ा, पीलिया जैसी गंभीर बीमारियां फ़ैलाने वाले बैक्टीरिया, वायरस उसी दरार से पाइप में अंदर की ओर खिंच जाते हैं, जिसे तकनीकी भाषा में 'बैकफ्लो’ कहा जाता है। मोटे तौर पर, यह घटना तब होती है, जब पानी की पाइप लाइन में कहीं भी निम्न समस्याएं होती हैं-
पाइप के दो हिस्सों के बीच जॉइंट ढीला हो।
पाइप काफ़ी पुराना या जंग लगी हो।
सड़क खुदाई के दौरान दरार आ गई हो।
ज़मीन या मिट्टी के धंसाव से पाइप क्रैक हुई हो।
सीवर लाइन बहुत पास से गुजर रही हो और उसमें भी दरार हो।
ऐसा होने पर जलापूर्ति पाइप लाइन के आसपास जमा गंदा पानी, सीवर का बहाव, या कीचड़ उसी दरार से अंदर की ओर खिंच जाता है।
सीवर और पानी की लाइनें अलग-अलग होती हैं। पर, अकसर नगर नियोजन में तो दोनों लाइनों को अलग रखने पर पर भी ज़मीन के नीचे हालात समान होते हैं। अकसर कई पुराने शहरों में यह समस्याएं देखने को मिलती हैं-
सीवर और वाटर लाइनें दशकों पहले बिना वैज्ञानिक प्लानिंग के बिछाया जाना।
लाइनें बिछाते वक्त सड़कों के संकरा होने के कारण दोनों लाइनें काफ़ी पास-पास में डाला जाना।
दोनों लाइनों की मरम्मत और रख-रखाव का जिम्मा अलग-अलग एजेंसियों के पास होने के कारण दूसरी लाइन में समस्या पता चलने पर भी समय पर उसकी मरम्मत या समाधान न हो पाना।
सड़क निर्माण, बिजली के केबल बिछाने या ऑप्टिक फाइबर बिछाने के दौरान पानी या सीवर की पाइपों को नुकसान पहुंना।
लोगों द्वारा जगह-जगह अवैध कनेक्शन जुड़वाना, जिसमें पाइप को ठीक से सील नहीं किया जाता।
ऐसी स्थितियों में जब पानी की सप्लाई बंद होने पर निम्न वायुदाब के कारण पानी की पाइप एक तरह से “सक्शन पंप” बन जाता है और आसपास मौजूद सीवर के पानी को अंदर खींच लेती है।
ऊपर बताई गई स्थितियों में सीवेज का गंदा पानी जलापूर्ति की पाइप में पहुंचने के बाद जैसे ही दोबारा वाटर सप्लाई शुरू होती है, पाइप में घुसा दूषित पानी बिना किसी फिल्टर के सीधे घरों के नलों तक पहुंचता है। इस पानी में कई तरह की अशुद्धियां और दूषण (कंटेमिनेशन) मौज़ूद होता है-
ई. कोलाई जैसे बैक्टीरिया
वायरस
मल-जनित रोगाणु (जर्म्स)
रासायनिक अपशिष्ट
धूल, मिट्टी और कीचड़
सीवेज वाटर की बदबू
पेयजल में मिली यह अशुद्धियां ही लागों में डायरिया, टाइफाइड, हैजा, हेपेटाइटिस जैसी बीमारियों का कारण बनती हैं। कई बार इसका असर बच्चों, बुज़ुर्गों और पहले से बीमार लोगों पर बेहद जानलेवा साबित होता है। इंदौर की घटना में ऐसा ही देखने को मिला है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने इस मामले का संज्ञान लेते हुए मध्य प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया है। आयोग ने कहा कि मीडिया रिपोर्टों से पता चलता है कि पाइप लाइन में लीकेज की वजह से ड्रेनेज (सीवर) पानी पीने के पानी में मिला, जिससे बीमारी और मौतें हुईं। आयोग ने इस लापरवाही पर राज्य सरकार से स्पष्टीकरण मांगा है।
इंदौर की घटना भले ही इस वक्त देशभर की सुर्खियों में छाई हुई है। पर, वास्तव में यह केवल इंदौर की समस्या नहीं हैं। देश के कई शहरों, खासकर दिल्ली, जयपुर, जोधपुर, भोपाल, भोपाल, ग्वालियर, पटना, लखनऊ, बनारस, प्रयागराज, हैदराबाद, कोलकाता, चेन्नई, मुंबई आदि में समय-समय पर इसी तरह की घटनाएं सामने आती रही हैं। इसकी वजह इन पुराने शहरों की पाइप लाइनों का काफ़ी पुराना होने के कारण जर्जर हो जाना है। यह समस्या खासकर शहरों के घनी आबादी वाले पुराने इलाकों में ज़्यादा देखने को मिलती है। फर्क सिर्फ इतना है कि ऐसी घटनाएं होने पर अकसर मामला दब जाता है और कभी-कभी इंदौर की घटना की तरह मामला तूल पकड़ लेता है।
ऐसी गंभीर और जानलेवा घटनाएं दुर्घटनाएं वास्तव में हालात के चलते नहीं, बल्कि प्रबंधन की विफलता के कारण होती हैं। इनका कारण सिस्टम में मौज़ूद यह ख़ामियां होती है-
पाइपलाइनों की नियमित व समयबद्ध जांच न होना।
पाइप लाइनों में लीक डिटेक्शन सिस्टम न होना या ख़राब होना।
सीवर और वाटर लाइनों के बीच मानकों के अनुरूप सुरक्षित दूरी न होना।
जलापूर्ति के पानी की गुणवत्ता की रियल-टाइम मॉनिटरिंग में लापारवाही।
जबतक जलापूर्ति और सीवर लाइनों में इस प्रकार की ख़ामियां बनी रहेंगी, तब तक हर शहर प्रदूषित जलापूर्ति से होने वाली मौतों और बीमारी के इस खतरे की चपेट में आते रहेंगे।
इंदौर की दुखद घटना के बाद मामले से संबंधित लोगों के बयान व स्पष्टीकरण सामने आए हैं। जिनमें, हादसे की वजह बताने के साथ कई और अहम बातें कही गई हैं। आइए, एक नज़र डालते हैं इन बयानों पर-
प्रारंभिक जांच में यही संकेत मिला है कि सीवेज का पानी पीने के पानी की पाइपलाइन में लीक के कारण मिल गया है, जिससे दस्त और उल्टी जैसी बीमारी फैलती गई और लोगों की मौतें हुईं।पुष्यमित्र भार्गव, मेयर, इंदौर (द न्यू इंडियन एक्सप्रेस को दिया बयान)
इंदौर की घटना बहुत ही दुःखद और दुर्भाग्यपूर्ण है। राज्य सरकार प्रभावित लोगों के इलाज का पूरा खर्च उठाएगी और मृतकों के परिजनों को आर्थिक सहायता दी जाएगी। साथ ही स्थिति का ठीक से मूल्यांकन कर हादसे में हुई मौतों की संख्या जारी की जाएगी ।मोहन यादव, मुख्यमंत्री, मध्य प्रदेश ( द हंस इंडिया को दिया गया बयान)
अस्पताल में भर्ती मरीजों ने बताया कि उन्हें गंदा पानी पीने के बाद उल्टी, दस्त और निर्जलीकरण जैसे लक्षण दिखे। अधिकारियों ने बताया कि यह दूषित पानी संभवतः पाइपलाइन में लीकेज होने की वजह से आया था।डॉ. माधव प्रसाद हसनानी, इंदौर के मुख्य चिकित्सा और स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) (टीओआई को दिया बयान)
जब किसी क्षेत्र में जल आपूर्ति के दूषित होने की आशंका हो, तो लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। सबसे पहली और जरूरी सलाह यह है कि पीने के लिए पानी को कम से कम 20 मिनट तक उबालकर ही इस्तेमाल किया जाए, क्योंकि उबालने से अधिकांश बैक्टीरिया, वायरस और परजीवी नष्ट हो जाते हैं।
इसके अलावा, उपलब्ध होने पर घरेलू वॉटर प्यूरीफायर या फिल्टर का इस्तेमाल किया जाए, खासकर ऐसे फिल्टर जिनमें UV, UF या RO तकनीक से पानी को साफ़ किया जाए। हालांकि, कई मामलों में साधारण वाटर फिल्टर हर तरह के रोगाणुओं को नहीं रोक पाते। इसलिए उबले हुऐ पानी का इस्तेमाल ही सबसे सुरक्षित विकल्प माना जाता है।
इसके अलावा दूषित जल की आशंका होने पर बर्फ, कच्ची सब्जियों, खुले में रखे कटे फल-सब्जियां और बिना उबले पानी का खाने-पीने में इस्तेमाल न करें। बच्चों, बुज़ुर्गों और गर्भवती महिलाओं को विशेष सतर्कता बरतने की जरूरत होती है, क्योंकि उनमें संक्रमण का खतरा ज्यादा रहता है। यदि किसी व्यक्ति को दस्त, उल्टी, बुखार, पेट दर्द या निर्जलीकरण (डीहाइड्रेशन) के लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र से संपर्क करना चाहिए और स्वयं दवा लेने से बचना चाहिए। इन बातों को संक्षेप में बिंदुवार इस प्रकार समझा जा सकता है-
पीने के लिए पानी को कम से कम 20 मिनट तक उबालकर ही उपयोग करें।
संभव हो तो RO, UV या UF आधारित वॉटर प्यूरीफायर का इस्तेमाल करें।
उबले हुए पानी को साफ, ढंके हुए बर्तन में ही रखें।
बच्चों, बुज़ुर्गों, बीमार लोगों और गर्भवती महिलाओं को केवल सुरक्षित या उबला हुआ पानी ही दें।
खाना बनाने, हाथ धोने और बर्तन धोने के लिए भी साफ पानी का प्रयोग करें।
यदि दस्त, उल्टी, बुखार या कमजोरी जैसे लक्षण दिखें तो डॉक्टर को दिखाएं।
स्थानीय प्रशासन या नगर निगम द्वारा जारी स्वास्थ्य एडवाइजरी का पालन करें।
नल के पानी को फिल्टर किए बिना या बिना उबाले सीधे न पिएं, भले ही वह देखने में साफ लगे।
बिना उबाले पानी से खाना, शरबत या जूस, बर्फ आदि न बनाएं।
सड़क किनारे खुले में बिकने वाले कटे फल, जूस या पानी न खाएं-पिएं।
बच्चों को सीधे नल के पानी से दवा या दूध तैयार करके न दें।
दस्त या उल्टी होने पर खुद से दवाइयां न लें, डॉक्टर की सलाह ज़रूरी है।
पाइपलाइन लीकेज या गंदे पानी की जानकारी को नज़रअंदाज़ न करें, तुरंत नगर निगम को सूचित करें।
इंदौर की घटना केवल एक शहर की लापरवाही नहीं, बल्कि पूरे देश में जलापूर्ति व्यवस्था और जल प्रबंधन तंत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी है। इस अफ़सोसनाक घटना ने साफ कर दिया है कि पाइपलाइनों के रख-रखाव, निगरानी और जवाबदेही में छोटी-सी चूक भी जानलेवा साबित हो सकती है। जब तक जलापूर्ति व्यवस्था की नियमित जांच, लीकेज की समय पर मरम्मत और जल गुणवत्ता लेकर प्रशासनिक अमले और लोगों में सतर्कता व जागरूकता नहीं होगी, ऐसे हादसों की आशंका बनी रहेगी। सरकारी तंत्र को भी यह बात गंभीरता से समझनी होगी कि स्वच्छ और शुद्ध पेयजल की आपूर्ति केवल सुविधा नहीं, बल्कि नागरिकों का मूल अधिकार है, जिसकी उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी सिस्टम को हर हाल में निभानी होगी। इंदौर की इस घटना से देश के बाकी शहरों के जलापूर्ति व सीवेज से जुड़े महकमों को अलर्ट हो जाना चाहिए। ऐसी घटनाएं उनके शहर में न होने पाएं इसकी तैयारी भी उन्हें इस घटना से सबक लेकर करनी चाहिए।