ग्रेट निकोबार भारत के सबसे अधिक वर्षा वाले द्वीपीय क्षेत्रों में गिना जाता है। निकोबार द्वीपसमूह में सालाना औसत वर्षा लगभग 3000 से 3800 मिमी तक दर्ज की जाती है।
चित्र: earth.org
ग्रेट निकोबार के घने वर्षावनों में बारिश केवल आसमान से गिरने वाला पानी नहीं होती। यह पेड़ों की छतरी से छनती है, मिट्टी में उतरती है, छोटे ताजे पानी के सोते (freshwater streams) बनाती है और समुद्र के किनारे बसे द्वीपीय जीवन को सहारा देती है। इसी पानी पर इस द्वीप की मिट्टी, जंगल और जीवन टिका हुआ है।
ग्रेट निकोबार भारत के सबसे अधिक वर्षा वाले द्वीपीय क्षेत्रों में गिना जाता है। निकोबार द्वीपसमूह में सालाना औसत वर्षा लगभग 3000 से 3800 मिमी तक दर्ज की जाती है।
नीति आयोग से जुड़े जल संसाधन अध्ययनों में ग्रेट निकोबार के कुछ कैचमेंट क्षेत्रों में औसत वार्षिक वर्षा 2500 मिमी से अधिक दर्ज की गई है। यही भारी वर्षा वहां के वर्षावनों, भूजल पुनर्भरण और छोटे मीठे पानी के स्रोतों को बनाए रखने में केंद्रीय भूमिका निभाती है।
अब इसी जल-संतुलन के बीच भारत की ग्रेट निकोबार नाम की सबसे बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना आकार ले रही है। इस परियोजना में ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट, टाउनशिप और ऊर्जा से जुड़े प्रोजेक्ट शामिल हैं।
सरकार इसे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की रणनीतिक और आर्थिक उपस्थिति मजबूत करने वाला प्रोजेक्ट बता रही है, जबकि पर्यावरणविद, मानवशास्त्री और कई वैज्ञानिक इसे द्वीप की नाजुक पारिस्थितिकी और जल प्रणाली के लिए गंभीर खतरे के रूप में देख रहे हैं।
यहां मामला केवल पेड़ों की कटाई तक ही सीमित नहीं है। असल चिंता यह है कि अगर निकोबार के उष्णकटिबंधीय वर्षावन (tropical rainforests) में बड़े पैमाने पर बदलाव आता है, तो वहां का पानी, उसकी उपलब्धता, गुणवत्ता और भूजल संतुलन में भी बदलाव आ सकता है।
छोटे द्वीपीय पारिस्थितिकी तंत्रों में जंगल, मिट्टी, समुद्र और बारिश एक-दूसरे से गहराई से जुड़े होते हैं। इसलिए यहां पारिस्थितिकी में कोई भी बड़ा बदलाव सीधे जल चक्र को प्रभावित करता है
ग्रेट निकोबार द्वीप भारत के सबसे संवेदनशील पारिस्थितिकी क्षेत्रों में गिना जाता है। यहां घने वर्षावन, मैंग्रोव, प्रवाल भित्तियां (coral reefs), दुर्लभ जीव-जंतु और आदिवासी समुदाय एक जटिल प्राकृतिक तंत्र का हिस्सा हैं।
इसी क्षेत्र में प्रस्तावित लगभग 92,000 करोड़ रुपये की मेगा परियोजना को लेकर विवाद खड़ा हुआ है। परियोजना के तहत बड़े पैमाने पर वन भूमि परिवर्तन, बंदरगाह निर्माण, एयरपोर्ट, नई बस्तियां और पर्यटन ढांचे विकसित किए जाने हैं। हालांकि दी हिंदू की ताजा रिपोर्ट कह रही है कि इस परियोजना को मंज़ूरी देने वाली ग्रामसभा ने न्यूनतम शर्तों में से पचास फ़ीसद शर्तों को भी पूरा नहीं किया है।
परियोजना से जुड़े नीति आयोग के विज़न दस्तावेज़ में इस क्षेत्र में भविष्य में बड़े पैमाने पर आबादी वृद्धि की संभावना भी जताई गई है। कुछ पर्यावरणीय विश्लेषणों में आशंका जताई गई है कि इतनी बड़ी आबादी और निर्माण गतिविधियां भविष्य में द्वीप की सीमित जल प्रणालियों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती हैं।
पर्यावरण मंत्रालय (MoEFCC) और प्रेस इन्फ़ॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) द्वारा जारी आधिकारिक दस्तावेज़ों के अनुसार, परियोजना के लिए लगभग 130.75 वर्ग किलोमीटर वन भूमि डायवर्ट की जानी है। यह अंडमान-निकोबार के कुल वन क्षेत्र का लगभग 1.82 फ़ीसद हिस्सा है। वहीं आधिकारिक आकलन बताते हैं कि परियोजना क्षेत्र में लगभग 18.65 लाख पेड़ मौजूद हैं। इनमें से चरणबद्ध तरीके से लगभग 7.11 लाख पेड़ों की कटाई संभावित बताई गई है।
सरकार का कहना है कि परियोजना में “पर्याप्त पर्यावरणीय सुरक्षा उपाय” शामिल हैं और यह राष्ट्रीय रणनीतिक हितों के लिए जरूरी है। मई 2023 में NGT ने पर्यावरणीय मंजूरी को रद्द करने से इनकार किया, लेकिन प्रभावों की निरंतर निगरानी की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।
| ग्रेट निकोबार परियोजना: एक नज़र में | |
|---|---|
| पहलू | विवरण |
| अनुमानित लागत | लगभग ₹72,000 - 80,000 करोड़ |
| प्रमुख घटक | ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, एयरपोर्ट, टाउनशिप, ऊर्जा परियोजना |
| वन भूमि डायवर्जन | 130.75 वर्ग किमी |
| अनुमानित पेड़ | 18.65 लाख |
| संभावित कटाई | लगभग 7.11 लाख पेड़ |
| संरक्षित ग्रीन ज़ोन | 65.99 वर्ग किमी |
| क्षतिपूर्ति वनीकरण (compensatory afforestation) | 97.30 वर्ग किमी (हरियाणा) |
| स्थानीय समुदाय | शॉम्पेन, निकोबारी |
वर्षावन केवल घने पेड़ों वाले इलाके नहीं होते, बल्कि वे एक सक्रिय जल और जलवायु प्रणाली की तरह काम करते हैं। भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में ये जंगल बारिश की गति को नियंत्रित करते हैं। इसके अलावा वे मिट्टी में पानी के रिसाव (infiltration) को बढ़ाने और भूजल पुनर्भरण (groundwater recharge) में भी मदद करते हैं। इससे तापमान व आर्द्रता का संतुलन भी बना रहता है और ये मिट्टी कटाव और अचानक आने वाले बाढ़ जैसे जोखिमों को भी कम करते हैं।
निकोबार जैसे छोटे द्वीपीय क्षेत्रों में वर्षावनों की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। इसका कारण यह है कि यहां बड़ी नदियां नहीं हैं और पूरा जल तंत्र मुख्य रूप से वर्षा, मिट्टी और भूजल के संतुलन पर आधारित है। ऐसे में जंगल केवल जैव विविधता का हिस्सा नहीं रहते, बल्कि द्वीप की जल सुरक्षा संरचना (water security infrastructure) की तरह काम करते हैं।
ग्रेट निकोबार से जुड़े पर्यावरणीय अध्ययनों में यह चिंता जताई गई है कि यदि बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई और भूमि उपयोग में बदलाव होता है, तो द्वीप की जलवैज्ञानिक स्थिरता प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसका असर भूजल रिचार्ज, मौसमी ताजे पानी के सोतों और तटीय एक्विफ़ायर की स्थिरता पर पड़ सकता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार उष्णकटिबंधीय वर्षावन “प्राकृतिक स्पंज” की तरह काम करते हैं। वे भारी वर्षा को रोककर धीरे-धीरे जमीन में पहुंचाते हैं और बाद में उसी पानी को नियंत्रित रूप से छोड़ते हैं। अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में भी पाया गया है कि बड़े पैमाने पर वन क्षरण स्थानीय जलचक्र और runoff को अस्थिर कर सकता है।
खाद्य एवं कृषि संस्थान (FAO) द्वारा किये गये वाटरशेड अध्ययन में भी यही सामने आया है कि वन क्षेत्र मिट्टी की जलधारण क्षमता बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं।
निकोबार जैसे द्वीपीय क्षेत्रों में पानी केवल बारिश का परिणाम नहीं होता, बल्कि यह जंगल, मिट्टी, समुद्र, भूजल और तटीय पारिस्थितिकी के बीच बने संतुलन से तैयार होता है। वैज्ञानिक इसे द्वीपीय जल प्रणाली (Island Hydrology) कहते हैं। यही कारण है कि यहां भूमि उपयोग या जंगल-क्षेत्र में होने वाला कोई भी बड़ा बदलाव सीधे पानी की उपलब्धता, गुणवत्ता और भूजल संरचना को प्रभावित कर सकता है। जलविज्ञान अध्ययनों में वर्षावन क्षरण और स्थानीय जलचक्र अस्थिरता के बीच संबंध दर्ज किए गए हैं।
घने वर्षावन मिट्टी की छिद्रयुक्त संरचना बनाए रखते हैं, जिससे वर्षा जल धीरे-धीरे जमीन में समा पाता है और भूजल रिचार्ज संभव होता है। लेकिन बड़े पैमाने पर निर्माण, सड़कें, बंदरगाह और कंक्रीट सतहें बढ़ने पर पानी का बहाव तेज़ हो जाता है और रिचार्ज कम होने लगता है।
भारतीय और अंतरराष्ट्रीय जल विज्ञान अध्ययन (hydrology studies) के अनुसार वनावरण घटने पर surface runoff बढ़ता है और भूजल रिचार्ज कमजोर पड़ सकता है।
खाद्य एवं कृषि संस्थान (FAO) द्वारा किये गये वॉटरशेड अध्ययन में भी यही सामने आया है कि वन क्षेत्र मिट्टी की जलधारण क्षमता बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं।
द्वीपीय क्षेत्रों में भूजल सामान्य महाद्वीपीय जलभृत (continental aquifer) जैसा नहीं होता। यहां फ्रेशवॉटर लेंस प्रणाली बनती है, जिसमें वर्षा से बना मीठा पानी समुद्री खारे पानी के ऊपर एक पतली परत के रूप में जमा रहता है। अगर रिचार्ज दर कम हो जाए, भूजल दोहन बढ़ने लगे या समुद्र स्तर ऊपर उठे, तो खारा पानी धीरे-धीरे भूजल में प्रवेश करने लगता है। इस प्रक्रिया को खारे पानी का प्रवेश (saline intrusion) कहा जाता है।
यूनेस्को की द्वीपीय जल विज्ञान अध्ययनों के अनुसार छोटे द्वीपों में यह खतरा जलवायु परिवर्तन और भूमि उपयोग बदलाव के साथ और तेज़ हो सकता है।
ग्रेट निकोबार परियोजना को लेकर कई पर्यावरणीय विश्लेषणों में भी यह चिंता जताई गई है कि बड़े पैमाने पर भूमि परिवर्तन और निर्माण गतिविधियां ताजे पानी के संतुलन (फ़्रेशवॉटर बैलेंस) को प्रभावित कर सकती हैं।
जंगलों की कटाई के बाद जल गुणवत्ता क्यों घटने लगती है?
वर्षावन केवल पानी को जमीन में पहुंचाने का काम नहीं करते, बल्कि वे मिट्टी को बहने से भी रोकते हैं। जब जंगल कटते हैं, तो भारी वर्षा की स्थिति में मिट्टी तेजी से बहती है। इससे नदियों और जल स्रोतों में तलछट (sedimentation) की मात्रा बढ़ने के साथ ही पानी की गुणवत्ता घटने लगती है। इसका असर तटीय कोरल रीफ़्स और मैंग्रोव पर भी पड़ सकता है।
वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि उष्णकटिबंधीय द्वीपों में वनों की कटाई के बाद तलछट कई गुना तक बढ़ सकता है। इसका असर फ्रेशवॉटर सिस्टम के साथ-साथ कोरल रीफ़्स और तटीय पारिस्थितिक तंत्रों पर भी पड़ सकता है।
छोटे द्वीपों में जल संकट हमेशा “कम बारिश” का संकट नहीं होता, बल्कि रिचार्ज, भंडारण और saline intrusion के असंतुलन का संकट होता है।
वैज्ञानिक मानते हैं कि वर्षावन स्थानीय तापमान, आर्द्रता और वर्षा चक्र को भी प्रभावित करते हैं। पेड़ों से होने वाली वाष्पीकरण-उत्सर्जन (evapotranspiration) वातावरण में नमी को बनाए रखती है।
NASA Earth Observatory के अनुसार उष्णकटिबंधीय वन हानि (tropical forest loss) वर्षा वितरण और सतही तापमान को प्रभावित कर सकता है। उष्णकटिबंधीय वन, जैविक पंप (biotic pump) प्रणाली का हिस्सा भी होते हैं, जहां बड़े वन क्षेत्र वातावरण में नमी बनाए रखने और क्षेत्रीय वर्षा चक्र को प्रभावित करने में भूमिका निभाते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार निकोबार में खतरा केवल “पानी कम होने” का नहीं है, बल्कि पानी के पूरे चरित्र के बदलने का है। यानी पहली जितनी ही बारिश होने के बावजूद भी भूजल-स्तर की स्थिरता में कमी आ सकती है, सूखे मौसम में फ्रेशवॉटर की उपलब्धता घट सकती है और खारे पानी का दबाव बढ़ सकता है।
कई जल वैज्ञानिकों का कहना है कि छोटे द्वीपों में जल संकट हमेशा “कम बारिश” का संकट नहीं होता, बल्कि रिचार्ज, भंडारण और saline intrusion के असंतुलन का संकट होता है।
इसी वजह से वैज्ञानिक निकोबार के वर्षावनों को प्राकृतिक जल संरचना (natural water infrastructure) की तरह देखते हैं। इन आशंकाओं का असर केवल पारिस्थितिकी तक सीमित नहीं है। निकोबार में पानी और जंगल स्थानीय समुदायों की जीवन प्रणाली से भी गहराई से जुड़े हैं।
अंडमान-निकोबार पर लंबे समय से काम कर रहे पर्यावरण शोधकर्ता पंकज सेखसरिया ने ग्रेट निकोबार के वर्षावनों को “विशाल और अत्यंत मूल्यवान स्थानिक जैव विविधता का भंडार” बताया है। उनका कहना है कि ये वर्षावन केवल जैव विविधता नहीं, बल्कि द्वीप की पारिस्थितिक और जल स्थिरता के लिए भी केंद्रीय हैं।
शॉम्पेन (Shompen) और निकोबारी समुदायों के लिए जंगल केवल संसाधन नहीं, बल्कि भोजन, दवा, जल, संस्कृति और आवाजाही का आधार हैं।
ग्रेट निकोबार द्वीप केवल जैव विविधता का क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह उन समुदायों का भी घर है जिनका जीवन सीधे जंगल, वर्षा और प्राकृतिक जल स्रोतों पर निर्भर रहा है। विशेष रूप से शॉम्पेन (Shompen) और निकोबारी समुदायों के लिए जंगल केवल संसाधन नहीं, बल्कि भोजन, दवा, जल, संस्कृति और आवाजाही का आधार हैं।
PIB द्वारा जारी हालिया दस्तावेज़ों के अनुसार ग्रेट निकोबार में शॉम्पेन समुदाय की अनुमानित आबादी लगभग 237 और निकोबारी समुदाय की आबादी लगभग 1,094 बताई गई है। ये समुदाय लंबे समय से जंगल, तटीय संसाधनों और स्थानीय मीठे पानी की प्रणाली पर आधारित जीवन पद्धति के साथ जुड़े रहे हैं।
मानवशास्त्रीय अध्ययनों और अंडमान-निकोबार से जुड़े सामाजिक शोध बताते हैं कि द्वीपों के आदिवासी समुदाय लंबे समय से वर्षावनों और छोटे मीठे पानी के जलसोतों पर आधारित जीवन प्रणाली विकसित करते आए हैं। इन समुदायों की पानी की ज़रूरतें पारंपरिक रूप से वर्षा जल, छोटे प्राकृतिक झरनों, वन आधारित जलधाराओं और उथले भूजल स्रोतों से पूरी होती हैं।
भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण के अध्ययन में भी यह उल्लेख मिलता है कि शॉम्पेन समुदाय का जीवन घने वन क्षेत्रों और मौसमी ताजे पानी की प्रणालियों (seasonal freshwater systems) से गहराई से जुड़ा रहा है।
शॉम्पेन जैसी 'अत्यंत संवेदनशील' (PVTG) जनजाति, जो बाहरी दुनिया से पूरी तरह कटी हुई है, उनके इलाके में अचानक लाखों लोगों की आवाजाही और निर्माण कार्य उनके लिए किसी 'नरसंहार' से कम नहीं होगा।नवा ठकुरिया, पर्यावरण विशेषज्ञ
दरअसल चिंता केवल पानी की कमी की नहीं है, बल्कि एक पूरी सभ्यता के मिट जाने की है। हालिया विश्लेषणों (जैसे नवा ठाकुरिया का लेख) में विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि शॉम्पेन जैसी 'अत्यंत संवेदनशील' (PVTG) जनजाति, जो बाहरी दुनिया से पूरी तरह कटी हुई है, उनके इलाके में अचानक लाखों लोगों की आवाजाही और निर्माण कार्य उनके लिए किसी 'नरसंहार' से कम नहीं होगा। विकास की यह दौड़ उस जनजाति को खत्म कर सकती है जो हज़ारों सालों से इस द्वीप की रक्षक रही है।
इसी संदर्भ में जनजातीय परिषद (Tribal Council), निकोबार के पूर्व अध्यक्ष रशीद यूसुफ का कहना है कि “निकोबारी लोगों के लिए, मीठे पानी के स्रोत (झरने और कुएं) केवल प्यास बुझाने की जगह नहीं हैं, बल्कि वे पवित्र स्थल हैं। हमारी पूरी जीवनशैली इन स्रोतों के इर्द-गिर्द बुनी गई है। जब हम जंगल में नए गांव या घर के लिए जगह चुनते हैं, तो सबसे पहले यह देखते हैं कि वहां मीठे पानी का बारहमासी स्रोत है या नहीं। जंगल के ये झरने हमारे पुरखों का आशीर्वाद हैं।”
पर्यावरण समूहों द्वारा तैयार ए मोनुमेंटल फ़ॉली नामक दस्तावेज़ में भी परियोजना से जुड़े पारिस्थितिक विखंडन, लेदरबैक कछुओं के प्रजनन तट, वन भूमि परिवर्तन और जनजातीय प्रभावों को लेकर गंभीर चिंताएं दर्ज की गई हैं।
निकोबार का तट लेदरबैक कछुओं के लिए प्रजनन स्थल है।
स्थानीय शोध और फील्ड रिपोर्ट में यह बात सामने आती रही है कि निकोबार के कई हिस्सों में जल स्रोतों का उपयोग सामुदायिक और पारिस्थितिक समझ के आधार पर होता रहा है।
स्थानीय समुदाय वर्षा के मौसमी व्यवहार को पहचानते हैं, जंगलों और जल स्रोतों के संबंध को समझते हैं। साथ ही कई जगहों पर सीमित जल उपयोग की पारंपरिक प्रणालियों को अपनाते रहे हैं।
स्थानीय समुदायों और पर्यावरण समूहों की चिंताएं
ग्रेट निकोबार परियोजना को लेकर कई सामाजिक संगठनों और पर्यावरण समूहों ने यह सवाल उठाया है कि क्या इतने बड़े भूमि परिवर्तन का असर स्थानीय जल स्रोतों और आदिवासी जीवन प्रणाली पर ठीक तरह से आंका गया है।
पर्यावरण समूहों द्वारा तैयार ए मोनुमेंटल फ़ॉली नामक दस्तावेज़ में भी परियोजना से जुड़े पारिस्थितिक विखंडन, लेदरबैक कछुओं के प्रजनन तट, वन भूमि परिवर्तन और जनजातीय प्रभावों को लेकर गंभीर चिंताएं दर्ज की गई हैं।
कल्पवृक्ष, कंसर्वेशन एक्शन ट्रस्ट और अन्य पर्यावरणीय समूहों की रिपोर्ट में बताया गया है कि बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई, सड़क और बंदरगाह निर्माण और नए टाउनशिप इस द्वीप की जल और पारिस्थितिक स्थिरता को प्रभावित कर सकते हैं।
इस परियोजना पर आपत्ति जताते हुए यह भी कहा गया है कि वन अधिकार अधिनियम और स्थानीय समुदायों की स्वतंत्र, पूर्व और सूचित सहमति (free, prior and informed consent) प्रक्रिया को लेकर पर्याप्त पारदर्शिता नहीं दिखाई गई।
इसी संदर्भ में पर्यावरणविद् पंकज सेखसरिया ने अपनी सार्वजनिक टिप्पणियों में कहा है कि ग्रेट निकोबार में पारिस्थितिक और स्थानीय चिंताओं को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। क्योंकि द्वीप की पारिस्थितिकी और स्थानीय समुदायों का जीवन एक-दूसरे से गहराई से जुड़ा हुआ है।
लेकिन सरकार का तर्क है कि मलक्का जलडमरूमध्य (Malacca Strait) के पास स्थित होने के कारण ग्रेट निकोबार का रणनीतिक महत्व बहुत अधिक है। यहां ट्रांसशिपमेंट पोर्ट विकसित होने से भारत की समुद्री व्यापार क्षमता बढ़ सकती है। साथ ही रोजगार, पर्यटन तथा स्थानीय आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा।
ग्रेट निकोबार में पारिस्थितिक और स्थानीय चिंताओं को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। क्योंकि द्वीप की पारिस्थितिकी और स्थानीय समुदायों का जीवन एक-दूसरे से गहराई से जुड़ा हुआ है।पंकज सेखसरिया, पर्यावरणविद्
सरकारी दस्तावेज़ों के अनुसार compensatory afforestation किया जाएगा और वन्यजीव प्रबंधन योजनाएं लागू की जाएंगी। लेदरबैक कछुओं जैसे संवेदनशील जीवों के संरक्षण के लिए भी विशेष उपाय प्रस्तावित किए गए हैं। साथ ही परियोजना की निरंतर पारिस्थितिक निगरानी का दावा किया गया है।
सरकार ने यह भी कहा है कि परियोजना “सतत विकास ढांचा के तहत आगे बढ़ाई जाएगी और निर्माण गतिविधियों को चरणबद्ध तरीके से किया जाएगा ताकि पर्यावरणीय नुकसान कम किया जा सके।”
प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) द्वारा जारी स्पष्टीकरणों में कहा गया है कि परियोजना को लेकर कई “भ्रामक दावे” किए गए हैं और पर्यावरणीय प्रभावों का विस्तृत आकलन पहले ही किया जा चुका है। इस स्पष्टीकरण के अनुसार परियोजना क्षेत्र का केवल सीमित हिस्सा विकसित किया जाएगा, जैवविविधता संरक्षण योजनाएं (biodiversity conservation plans) बनाई गई हैं और आदिवासी समुदायों के हितों की रक्षा का दावा भी किया गया है।
हालांकि, पर्यावरण वैज्ञानिक मानते हैं कि द्वीपीय पारिस्थितिकी में mitigation measures की वास्तविक प्रभावशीलता को लंबे समय तक लगातार मॉनिटर करना ज़रूरी होगा।
इसीलिए यह बहस लगातार बनी हुई है कि क्या इतने संवेदनशील द्वीपीय पारिस्थितिकी तंत्र में “संतुलित विकास” वास्तव में संभव है, या फिर इसकी पर्यावरणीय लागत आने वाले वर्षों में पानी और पारिस्थितिकी दोनों के रूप में सामने आएगी।
सरकार का दावा है कि परियोजना “सतत विकास ढांचा के तहत आगे बढ़ाई जाएगी और निर्माण गतिविधियों को चरणबद्ध तरीके से किया जाएगा ताकि पर्यावरणीय नुकसान कम किया जा सके।
क्या किसी रणनीतिक जीत की कीमत एक आदिम जनजाति का विनाश हो सकती है?
विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रेट निकोबार की बहस केवल एक इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना की बहस नहीं है, यह उस बड़े सवाल की ओर भी इशारा करती है कि क्या मुख्यभूमि (mainland) आधारित विकास मॉडल को उसी रूप में छोटे द्वीपीय पारिस्थितिकी तंत्रों पर लागू किया जा सकता है, जहां पूरा जल तंत्र वर्षावनों, सीमित भूजल और तटीय फ्रेशवॉटर प्रणाली पर निर्भर करता है।
भारत के प्रसिद्ध पारिस्थितिकी वैज्ञानिक माधव गाडगिल लगातार यह कहते रहे हैं कि विकास और पारिस्थितिकी को एक-दूसरे के विरोध में नहीं, बल्कि साथ लेकर चलना होगा। उनके अनुसार पारिस्थितिक सीमाओं को समझे बिना किया गया विकास लंबे समय वाला पर्यावरणीय असंतुलन पैदा कर सकता है।
क्या किसी रणनीतिक जीत की कीमत एक आदिम जनजाति का विनाश हो सकती है? जानकारों का तर्क है कि 'ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट' जिस बड़े पैमाने पर आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन को प्रभावित करेगा, वह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों और पारिस्थितिक नैतिकता के खिलाफ है। किसी भी राष्ट्रीय परियोजना को एक पूरी जनजाति के अस्तित्व को खतरे में डालने का नैतिक आधार नहीं दिया जा सकता है।
जल वैज्ञानिकों के अनुसार छोटे द्वीपों में जल-धारण क्षमता (water carrying capacity) को समझना बेहद जरूरी होता है, क्योंकि यहां भूमि और फ्रेशवॉटर प्रणालियां मुख्यभूमि की तुलना में अधिक संवेदनशील होती हैं।
हाल के वर्षों में ग्रेट निकोबार को लेकर सामने आए विश्लेषणों में भी यह सवाल उठाया गया है कि प्रस्तावित टाउनशिप, बंदरगाह और अन्य निर्माण गतिविधियों के बाद द्वीप की जल-धारण क्षमता पर कितना दबाव पड़ेगा।
पारिस्थितिक सीमाओं को समझे बिना किया गया विकास लंबे समय वाला पर्यावरणीय असंतुलन पैदा कर सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि निकोबार जैसे द्वीपीय क्षेत्रों में विकास की चर्चा अब जलवायु परिवर्तन से अलग होकर नहीं की जा सकती। समुद्र-स्तर वृद्धि, तटीय कटाव और अत्यधिक वर्षा जैसी घटनाएं पहले से ही छोटे द्वीपों के फ्रेशवॉटर प्रणालियों पर दबाव बढ़ा रही हैं।
ग्रेट निकोबार का भूगोल इस जोखिम की जटिलता को बढाता है। 2004 की हिंद महासागर सुनामी के दौरान निकोबार द्वीपसमूह में बड़े भू-आकृतिक बदलाव दर्ज किए गए थे। कई क्षेत्रों में भूमि धंसने (subsidence), तटीय कटाव और समुद्री जल प्रवेश की घटनाएं सामने आई थीं। वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसे भूकंपीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में भूजल और तटीय फ्रेशवॉटर एक्विफ़ायर पहले से ही अत्यधिक नाजुक माने जाते हैं।
ग्रेट निकोबार परियोजना को लेकर उठी बहस में क्षतिपूर्ति वनीकरण (compensatory afforestation) सबसे विवादित मुद्दों में से एक रहा है। कई वैज्ञानिकों का कहना है कि प्राथमिक उष्णकटिबंधीय वर्षावन (primary tropical rainforest) और नए लगाए गए जंगलों (plantation forest) की पारिस्थितिक भूमिका समान नहीं होती।
सरकारी दस्तावेज़ों के अनुसार compensatory afforestation के लिए हरियाणा में लगभग 97.30 वर्ग किलोमीटर भूमि चिन्हित की गई है। हालांकि कई पर्यावरण वैज्ञानिकों का कहना है कि उष्णकटिबंधीय द्वीपीय वर्षावनों की जलवैज्ञानिक और पारिस्थितिक भूमिका की भरपाई किसी दूसरे भौगोलिक क्षेत्र में वृक्षारोपण से पूरी तरह संभव नहीं होती।
संवेदनशील द्वीपीय पारिस्थितिकी तंत्रों में विकास को केवल इंफ्रास्ट्रक्चर और निवेश के पैमाने से मापा जा सकता है, या फिर पानी, जंगल और पारिस्थितिक स्थिरता को भी विकास की मूल शर्तों में शामिल करना होगा।
ग्रेट निकोबार की बहस अब केवल एक इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना की बहस नहीं रह गई है। यह उस बड़े सवाल की ओर इशारा करती है कि जलवायु संकट और पारिस्थितिक अस्थिरता के दौर में विकास की सीमाएं क्या होनी चाहिए।
विशेषज्ञों का कहना है कि निकोबार जैसे द्वीपों में पानी की सुरक्षा केवल जलापूर्ति परियोजनाओं से तय नहीं होगी, बल्कि इस बात से भी तय होगी कि वर्षावनों, भूजल और तटीय पारिस्थितिकी के बीच मौजूद प्राकृतिक संतुलन को किस हद तक सुरक्षित रखा जाता है।
आखिरकार बहस इसी सवाल पर आकर टिकती है कि क्या ऐसे संवेदनशील द्वीपीय पारिस्थितिकी तंत्रों में विकास को केवल इंफ्रास्ट्रक्चर और निवेश के पैमाने से मापा जा सकता है, या फिर पानी, जंगल और पारिस्थितिक स्थिरता को भी विकास की मूल शर्तों में शामिल करना होगा। ग्रेट निकोबार आने वाले समय में यह तय करने वाले सबसे बड़े उदाहरणों में से एक बन सकता है कि जलवायु संकट के दौर में विकास की सीमाएं कहां तय होंगी।
द्वीपों में पानी केवल संसाधन नहीं होता, वह पूरी पारिस्थितिकी की स्मृति होता है।
मुख्यभूमि (Mainland) का विकास मॉडल उन संवेदनशील द्वीपों के लिए सही है, जहां पूरा जीवन तंत्र केवल वर्षा और सीमित भूजल के नाजुक संतुलन पर टिका है?
क्या किसी रणनीतिक या आर्थिक लाभ के लिए एक ऐसी प्राचीन जनजाति (शॉम्पेन) के अस्तित्व को दांव पर लगाना नैतिक होगा जो दुनिया की सबसे कम आबादी वाली और संवेदनशील संस्कृतियों में से एक है?
क्या हरियाणा या किसी अन्य मैदानी इलाके में लगाए गए पेड़, निकोबार के उन वर्षावनों की जगह ले सकते हैं जो द्वीप के लिए 'प्राकृतिक जल संरचना' (Natural Water Infrastructure) का काम करते हैं?
अगर निर्माण और आबादी बढ़ने से द्वीप का 'फ्रेशवॉटर लेंस' (मीठे पानी की परत) प्रभावित होता है और खारा पानी भूजल में मिल जाता है, तो भविष्य में वहां रहने वाले लाखों लोगों के लिए पानी का इंतज़ाम कितना टिकाऊ होगा?
जलवायु संकट के इस दौर में, क्या हमें 'प्रोजेक्ट' को बचाने के लिए 'पर्यावरण' में बदलाव करना चाहिए, या 'पर्यावरण' को बचाने के लिए 'प्रोजेक्ट' की रूपरेखा बदलने के बारे में सोचना चाहिए?
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