पर्यावरण से हमारा तात्पर्य अखिल विश्व का प्राकृत सृष्टि रूप है। इस स्वरूप को यथावत बनाए रखना प्रमुख सद प्रयोजनों में सम्मिलित है। पर्यावरण की दृष्टि से भी इसे स्वर्णयुग कहा जा सकता है। अध्यात्म और विज्ञान का समुन्नत तादात्म्य, इस युग की परम विशिष्टता रही है। प्रकति के रहस्यों से सर्वथा भिन्न वैदिक मंत्र दृष्टाओं ने, पर्यावरण के उच्च मानकों की अक्षुण्णता हेतु सूत्र व आप्तोपदेश किये है। जिन्हें भारत में विदेशी शासन से पूर्व तक सर्वांशतः स्वीकारा गया। इन श्रेष्ठ परम्पराओं के मूल में मानव जीवन के स्वरूप को श्रेष्ठ आश्रम पद्धति में जीने का आदर्श सिद्धान्त था।
जड़ प्रकृति और समस्त जीवों से भावात्मक सम्प्रक्तता परस्पर उपादेयी और संतुलित थी। तत्कालीन मानव पशु पक्षियों की भाषा, प्रकृति के जीवन्त संगीत और वनस्पत्यादिकों के महत्व पूर्ण संकेतों से भलीभांति परिचित था। इनमें सुसामंजस्य, सन्तुलन एवं सुनिश्चत परम्परा चक्रित थी। त्याग और सेवा, आश्रम पद्धति का मुख्य आधार होने से सभ्य, सुसंस्कृत और समर्थ मानव की पहचान थी। वर्तमान सदृश पर्यावरण प्रदूषण, अशान्ति और रोगों की भरमार न थी। वेदों के विशिष्ट ज्ञान (विज्ञान) का उपयोग किंसी मानव अथवा राष्ट्र की सत्ता, संस्कृति और सम्पति के बलात अपहरण में होना, आसुरी माना जाता था। तथा इसकी प्रबल निन्दा एवं विरोध होता था। सर्वभूत हितेरता की सर्वमान्य परम्परा जड़ और चेतन के प्रति समान रूप से व्यवहृत थी। इन श्रेष्ठ परम्पराओं के पालन में निर्दोष पर्यावरण का स्वतः निर्माण होता था।
इसके विपरित आधुनावैज्ञानिक आविष्कार और प्रगति स्व-स्वार्थ हितेरता के धरातल पर मानव को विनाश के कगार तक खींच लाए हैं। अपने शासन काल में विदेशी शासक अपनी अधिकांश ऊर्जा, उक्त श्रेष्ठ भारतीय परम्पराओं और संस्कृति को पाखंड से विवेचित करने तथा उसे नष्ट करने के उपायों में ही व्यय करते रहे। जिसका हमारे देश में पर्याप्त दुष्प्रभाव भाव (पर्यावरण - प्रदूषण के रुप में) भी उजागर है। सीखने एवं लाभार्जन हेतु विदेशियों ने सदैव भारत को प्रयोग भूमि बनाया है। भारतीयों में उपभोक्तावाद का जन्म, इन्हीं प्रयोगों की तलछट से हुआ है। पर्यावरण की शुद्धता भी इससे नहीं बच सकी है। जल, वायु, शब्द और आहार भी निरापद नहीं है। असमय वृष्टि-सूखा- चक्रवात-बाढ-भूस्खलन एवं भूकंप के अप्रिय प्रसंगो के सूत्र, इन्हीं प्रदूषणों से कहीं गहरे जुड़े है। और हम सभी मूढ़मति होकर इन्हें दैवी आपदा कह सन्तोष करते हुए आगामी आपदा तंक निश्चिन्त रहते है।
हम यह भूल जाते है कि इन आपदाओं के मूल में भौगोलिक कारणों के साथ कहीं उपभोक्तावादी दुष्प्रवृत्ति तो संलग्न नहीं हैं? इसमें शासक से जनता तक दोषी है।
भारत में जनसंख्या वृद्धि से उसके पालन हेतु और अधिक अनाज उत्पादन की प्रेरणा हुई है। एतदर्थ वैज्ञानिक शोधों ने रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशी द्रव्यों के विषाक्त प्रभावों की, अनाज के माध्यम से मानव के उदर तक की यात्रा कराई है। समाज के नीति निर्धारकों ने कृषि योग्य अधिक भूमि प्राप्ति हुते, पूर्व में वनों की अधाधुंध कटाई को क्रियान्वित करा डाला। अवैधानिक और वैधानिक लकड़ी के व्यापार ने भी इसमें अपनी सहयोगी भूमिका निभायी। समृद्धता और विकास क्रम में असंतुलित उद्योगों की संख्या ने औद्योगिक विषों को ही उगलना प्रारम्भ कर दिया। स्वतंत्रता ने स्वच्छन्दता को जन्म दे डाला। कदाचारों ने नैतिक पतन के साथ विभिन्न विकारों एवं पर्यावरणीय असन्तुलनों की सौगात प्रस्तुत की।
सुरक्षा और शान्ति हेतु वैज्ञानिकों ने अत्यन्त घातक आयुधों के अम्बार लगा दिये। जो पर्यावरण प्रदूषण का एक अन्य प्रभावी कारण है। युद्ध और देवी आपदाएं, विनाश का पर्याप्त संकेत दे रहे हैं। ओजोन का अस्तित्व अपनी छिद्रयुक्त चादर दिखा रहा है। आक्सीजन स्वयं दमाग्रस्त है। विषाक्ता वायु (कार्बन मोनो एवं डाई आक्साइड) का जिन्न, बोतल से स्वतन्त्र हो चुका है। और हमारे रक्षक वृक्ष, न जाने कब के धराशायी किये जा रहे है। ये सूत्रबद्ध कारण ही पर्यावरण असन्तुलन के प्रमुख उत्तरदायी है।
विगत सदी के आठवें दशक से पर्यावरण असन्तुलन की समस्या, विश्व के मानचित्र पर प्रमुखता से उभरी है। निदानार्थ इसे पृथक विषय के रूप में प्रमुखता से ग्रहण भी किया गया है। तथापि इसके समूल नाश में परमावश्यक उपभोक्तावाद के बहिष्कार को वस्तुतः तत्पर कोई दृष्टिगोचर नहीं होता।
वर्तमान की आयातित वैश्विक संकल्पना, उपभोक्तावाद की संजीवनी है। जो भारतीय संस्कृति को बाजारू बनाने में संलग्न है। पाश्चात्य बंधक हमारे कतिपय शीर्ष मस्तिष्क, वृक्षारोपण अभियान के शानदार आयोजनों एवं उत्कोच प्राप्ति के सुविधाजनक व्यायाम तक सीमित है। भारत के सामान्य कृषक भी अधिक और द्रुत धन अर्जन में प्रायः यूकेलिप्टस, पोपलर अथवा मशरुम, सूरजमुखी उगाने तक के पाठ ही पढ़ पाए हैं। एततब हम सभी जिस शाखा पर बैठें है, प्रसन्नतापूर्वक उसी पर कुठाराघात कर रहे है। विशुद्ध पर्यावरण की सुरक्षा लच्छेदार भाषणों में सिमट गई है। आसन्न संकट से दृष्टि फेरकर हम उसकी चर्चा और उनके उपायों का उपदेश देकर अपने कर्तव्यों की इति श्री समझ रहें है। मानो हम मानव समाज से कहीं ऊपर बैठे हैं। यदि हम पर्यावरण के बिन्दु पर यथार्थतः चिन्तित है, तो विगत 25-30 वर्षों के सघन अभियान से हमें चौथाई सफलता भी क्यों नहीं प्राप्त हो सकी ?
नगरीय उपभोक्तावादी प्रवृत्ति के चलते, प्राचीन गौरव को प्राप्त कर पाना दिवा स्वप्न ही है। भारत में विशुद्ध पर्यावरण हेतु भी सर्वथा ग्रामोन्मुखी दृष्टि ही समीचीन है। निःसन्देह ट्रैक्टर से कई लाभ हैं, किन्तु यह भी सत्य है कि ट्रैक्टर ने पशुओं की खाद, दुग्ध और ग्रामीण रोजगार (अंशतः) को डीजल के साथ हजम करके विषाक्त वायु ही निकाली है। और कृषकों में पशुपालन की प्राथमिकता को बाधित किया है। औद्योगिक कल कारखानों ने अपनी चिमनियों से समृद्धता की अपेक्षा विषाक्तता ही अधिक वमन की है।
रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशी द्रव्यों ने प्रकारान्तर से खाघान्नों, शाक फलों और दुग्ध में अपनी उपस्थिति ही दर्शायी है। पर्यावरण प्रदूषण से मुक्ति हेतु अनेक पर्यावरणविदों ने विभिन्न हितकर उपायों को समय समय पर रेखांकित करते रहे है। तथापि उनसे पूर्ण आशाजनक परिणाम परिलक्षित नहीं हैं। इसका मुख्य कारण और आश्रम के अनुकूल धर्म में तत्परता एवं सतत वेद मार्ग का अनुसरण। जो सर्वथा मनोनूकूल रहेगी। अनियंत्रित उपभोक्तावाद है। जब तक हम सभी मनसा वाचा कर्मणा इसका परित्याग नहीं करते। अन्य समस्याओं के साथ- साथ पर्यावरण प्रदूषण के विपरीत परिणाम ही प्राप्त करते रहेगे।
पूज्य बापू के ग्रामोन्मुखी विचार अन्ततः रामराज्य स्थापना के आदि सूत्र है। जिसमें :- ‘दैहिक दैविक भौतिक तापा। रामराज नहिं काहुहि व्यापा ‘की कल्पना है। आज की पर्यावरणीय समस्याओं को इन सभी परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यक है।
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