अनुपम मिश्र तर्क देते हैं कि राजस्थान का जल-संकट वास्तव में प्रकृति की असफलता का संकट नहीं है बल्कि यह याददाश्त का संकट है।

 

चित्र: राजस्थान की रजत बूंदें डॉक्युमेंट्री

भूजल

राजस्थान की रजत बूंदें: पानी से जुड़ा स्थानीय विज्ञान और उससे जुड़ी नैतिकता

अमित तिवारी के निर्देशन में बनी यह लघु फिल्म एक तरह से यादों का जीवंत चित्र है। यह फ़िल्म बताती है कि रेगिस्तान में रहने वाले लोग न केवल सदियों से साथ मिलकर जीते आए हैं बल्कि अनाज, पानी और मिट्टी के संरक्षण को नैतिक कर्तव्य और साझी ज़िम्मेदारी मानते हैं।

Author : अमिता भादुड़ी

पानी से जुड़ी एक प्रचलित और आम सोच का ही नतीजा है कि बारिश की कम मात्रा को अक्सर जल-संकट से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन ‘राजस्थान की रजत बूंदे’ इस धारणा को ग़लत साबित करने का एक अच्छा उदाहरण है। इसमें जीवंत और प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर यह दिखाने की कोशिश की गई है कि बारिश, ज़मीन और इससे जुड़ी संस्थाओं के बीच के असंतुलन और तालमेल की कमी से ही सामाजिक स्तर पर संकट पैदा होता है। 

यह सोच लेखक अनुपम मिश्र की किताब ‘राजस्थान की रजत बूंदे’ के केंद्रीय विषय से काफ़ी मिलती-जुलती है। अपनी इस किताब में अनुपम मिश्र तर्क देते हैं कि राजस्थान का जल-संकट वास्तव में प्रकृति की असफलता का संकट नहीं है बल्कि यह याददाश्त का संकट है। ख़ासकर, उन स्थानीय ज्ञान में आई कमी जिसने पहले कभी अनियमित वर्षा जल को विश्वसनीय जल-सुरक्षा से जोड़ दिया।

अमित तिवारी के निर्देशन में बनी यह लघु फिल्म एक तरह से यादों का जीवंत चित्र है। यह फ़िल्म बताती है कि रेगिस्तान में रहने वाले लोग सदियों से साथ मिलकर जीते आए हैं। वे अनाज और पानी को आपस में बांटकर संभालते हैं और जितनी ज़रूरत हो, उतना ही इस्तेमाल करते हैं, और यही उनके जीवन का तरीका रहा है। 

अपनी इसी पारंपरिक समझ और सूझ-बूझ से ये लोग अनियमित और अनिश्चित रूप से होने वाली बारिश को भी अपने हक में बदलते आए हैं। यानी उन इलाक़ों में जहां बारिश की मात्रा और समय दोनों ही तय नहीं होते, वहां के लोग भी अपनी समझदारी और सामूहिक व्यवस्था से जीवन को स्थिर बनाए रखते हैं

इंडिया वाटर पोर्टल से बातचीत में अमित कहते हैं, “जब मैंने पहली बार अनुपम मिश्र की किताब पढ़ी, तब मुझे महसूस हुआ कि इस कहानी को दृश्य माध्यम से लोगों तक पहुंचाए जाने की ज़रूरत है। मेरी इस सोच ने मुझे राजस्थान के विभिन्न हिस्सों की यात्रा के लिए प्रेरित किया ताकि मैं उन ज्ञान और स्थानीय समझदारी के उदाहरणों को ख़ुद भी देख सकूं। कई सालों तक मैं राजस्थान के सुदूर इलाक़ों की यात्राएं करता रहा ताकि अधिक से अधिक जल-स्रोतों और जल-निकायों के बारे में जानकारी इकट्ठा करने के साथ ही उनका दस्तावेज़ीकरण कर सकूं। अपने इस प्रयास से मैं राजस्थान की धरती को एक अलग परिपेक्ष्य में समझना चाहता था।"

आधुनिकीकरण से पहले के समाजों में लोगों ने पानी के प्रबंधन के तरीक़ों को कई परतों में विकसित किया था।

उन्‍होंने आगे कहा, “मैं अपनी इस फ़िल्म में राजस्थान को अलग-अलग मौसमों के माध्यम से दिखाना चाहता था। मानसून के पहले के सूखे से लेकर, बारिश के दिनों का राजस्थान और फिर धीरे-धीरे वापस लौटने वाला सूखापन, इन सबको अपनी फ़िल्म में लाने की मेरी कोशिश थी। मैंने खदीन की बुआई जैसे कृषि-चक्रों के बारे में भी जानने का प्रयास किया। मैंने बुआई से पहले और बुआई के बाद, दोनों ही स्थितियों में उसके खेत की मिट्टी की जांच-परख की। इस पूरी प्रक्रिया में मेरा ध्यान फसल के विकास के साथ मिट्टी के जीवंत होते स्वरूप और फिर कटाई के लिए उसके तैयार होने पर था। इन सभी बदलावों को दर्ज करना मेरे लिए बहुत ही ज़रूरी और महत्वपूर्ण था।”

मैंने खदीन की बुआई जैसे कृषि-चक्रों के बारे में भी जानने का प्रयास किया। मैंने बुआई से पहले और बुआई के बाद, दोनों ही स्थितियों में उसके खेत की मिट्टी की जांच-परख की।

इस डॉक्युमेंट्री फ़िल्म की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि यह पानी से जुड़ी स्थानीय लोगों की तीन-परतों वाली समझ को बहुत ही स्पष्ट और सरल ढंग से आपके सामने लाने का काम करती है। दरअसल स्थानीय लोगों के अनुसार यहां तीन तरह का पानी मिलता है - पलार पानी, यानी बरसात का ऊपर बहने वाला पानी, रेजानी पानी, यानी नीचे के खारे पानी के ऊपर जमा हुआ मीठा रिसा हुआ पानी और पाताल पानी, यानी ज़मीन के बहुत गहरे में मौजूद भूजल। 

पानी का यह वर्गीकरण केवल कहने की बात नहीं है। यह ज़मीन के नीचे की संरचना से जुड़ी समझ को दिखाती है। ख़ासकर जिप्सम और चिकनी मिट्टी की परतें (जिसे स्थानीय भाषा में मुलतानी मिट्टी कहते हैं) ऊपरी और निचली परत के पानी को आपस में मिलने से रोकने का काम करती है। खारे भूजल के ऊपरी परत में जमा रेजानी पानी को यहां के लोग बहुत अच्छा और पीने लायक़ पानी मानते हैं। इसलिए उसे सम्भालकर और किफ़ायत से इस्तेमाल में लाने के लिए छोटे मुंह वाले कुएं बनाए जाते हैं, जिसे कुईन या बेरी कहा जाता है।

रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जुड़ा जल ज्ञान

भारत के पारंपरिक जल-तंत्र किसी एक जैसे इंजीनियरिंग मॉडल पर नहीं बने थे। वे स्थानीयता के आधार पर मिट्टी, मौसम और स्थानीय ज़रूरतों को समझकर तैयार किए गए थे।

अगर इसे आजकल के वैज्ञानिक नज़रिए से देखा जाए, तो उनकी यह समझ उसी तरह की है जैसे मिट्टी में ठहरे पानी, ऊपर की परत में फंसे पानी और ज़मीन के बहुत नीचे जमा पानी को हम अलग-अलग मानते हैं। बस फर्क इतना है कि यहां यह जानकारी किसी किताब या लैब से नहीं आई, बल्कि पीढ़ियों के अनुभव और रोज़मर्रा की ज़िंदगी से सीखी गई है।

यह फ़िल्म बताने का प्रयास करती है कि आधुनिकीकरण से पहले के समाजों में लोगों ने पानी के प्रबंधन के तरीक़ों को कई परतों में विकसित किया था। उन्होंने यह काम किसी आधुनिक मशीन या नक्शे की मदद से नहीं, बल्कि सालों तक प्रकृति को देखते-समझते और उससे होने वाले अनुभवों को जोड़कर किया था।

मिट्टी पर आधारित वाटर मैनेजमेंट के इंजीनियरिंग मॉडल

कुइन का मुंह बहुत छोटा और उसकी गहराई ज़्यादा होती है, ताकि पानी कम से कम उड़े और सीधे रेजानी पानी तक पहुंचा जा सके।

यह बात उन कई अध्ययनों से भी मिलती है, जिनमें बताया गया है कि भारत के पारंपरिक जल-तंत्र किसी एक जैसे इंजीनियरिंग मॉडल पर नहीं बने थे। वे स्थानीयता के आधार पर मिट्टी, मौसम और स्थानीय ज़रूरतों को समझकर तैयार किए गए थे। 

इस तरह यह फिल्म साफ़ करती है कि स्थानीय ज्ञान कोई सुनी-सुनाई या प्रतीकात्मक बात नहीं है, बल्कि ठोस अनुभव पर टिका हुआ और अपने वातावरण के अनुसार ढला हुआ ज्ञान होता है।

फ़िल्म में कुइन और कुंड को जिस बारीकी से दिखाया गया है, उससे इस तर्क को और मज़बूती मिलती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि जल-संरक्षण से जुड़ी इन संरचनाओं को यूं ही नहीं बनाया गया था। बल्कि बारिश कितनी होती है, पानी कितनी जल्दी उड़ जाता है और एक घर को साल भर में कितना पानी चाहिए, इन सब बातों को ध्यान में रखकर ये बनाए गए थे

स्थानीय ज्ञान कोई सुनी-सुनाई या प्रतीकात्मक बात नहीं है, बल्कि ठोस अनुभव पर टिका हुआ और अपने वातावरण के अनुसार ढला हुआ ज्ञान होता है।

कुइन का मुंह बहुत छोटा और उसकी गहराई ज़्यादा होती है, ताकि पानी कम से कम उड़े और सीधे रेजानी पानी तक पहुंचा जा सके। वहीं कुंड में घर की छत और आंगन से बहकर आने वाला बरसाती पानी जमा होता है, ताकि पूरे साल घर और मवेशियों की ज़रूरत पूरी हो सके। ये तरीके ऐसे जल-तंत्र हैं जो कम ऊर्जा में चलते हैं और किसी एक बड़े सिस्टम पर नहीं, बल्कि अलग-अलग जगहों पर छोटे स्तर पर काम करते हैं।

सरकारी परियोजनाओं की तुलना में ज्यादा कारगर हैं जल प्रबंधन के पारम्परिक तरीके

कुंड में घर की छत और आंगन से बहकर आने वाला बरसाती पानी जमा होता है, ताकि पूरे साल घर और मवेशियों की ज़रूरत पूरी हो सके।

सूखे और आंशिक रूप से सूखे इलाकों में कई बार स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार ढले बारिश के पानी को जमा करने वाले तरीके बड़े सरकारी स्तर पर शुरू की गई परियोजनाओं से ज़्यादा कारगर साबित होते हैं। क्योंकि ये पानी की कमी को सच मानकर चलते हैं, बेवजह ज़्यादा दोहन नहीं करते, और भारी मशीनों या बिजली पर पूरी तरह से निर्भर भी नहीं रहते। यह फ़िल्म इस सिद्धांत का एक जीता-जागता उदाहरण पेश करती है। इसमें दिखाया गया है कि साल में कुछ ही दिनों के लिए आने वाले मानसून में भी कैसे यहां के लोग पूरे साल के पानी की अपनी ज़रूरतों को लेकर आत्म-निर्भर हो जाते हैं।

डाक्यूमेंट्री में दिखाई गई खदीन की खेती से जुड़ी जानकारी भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है। इसमें बताया गया है कि कैसे यह फसल बाढ़ के पानी को एक ख़तरे के रूप में नहीं बल्कि उर्वरता के स्रोत के रूप में देखती है। खेतों में बारिश का पानी थोड़ी देर के लिए बहता है। खदीन उसे रोककर धीरे-धीरे फैलाते हैं, ताकि वही पानी मिट्टी में समा जाए और लंबे समय तक नमी को बनाए रखे। इससे बिना खाद या अतिरिक्त सिंचाई के भी सिर्फ बारिश के भरोसे खेती हो पाती है।

खेतों में बारिश का पानी थोड़ी देर के लिए बहता है। खदीन उसे रोककर धीरे-धीरे फैलाते हैं, ताकि वही पानी मिट्टी में समा जाए और लंबे समय तक नमी को बनाए रखे। इससे बिना खाद या अतिरिक्त सिंचाई के भी सिर्फ बारिश के भरोसे खेती हो पाती है।

यह तरीका उसी सोच से मेल खाता है जिसे जलवायु परिवर्तन के इस दौर में टिकाऊ खेती के लिए सही माना जाता है। इसमें पानी, मिट्टी और पोषक तत्वों को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक मानकर और उन्हें आपस में जोड़कर काम किया जाता है।

फ़िल्म साफ़ दिखाती है कि खदीन यूरिया या बाहर से लाए गए महंगे साधनों के बिना भी काम करते हैं। यह अधिक से अधिक मात्रा में रसायनों के उपयोग और बाहरी संसाधनों पर निर्भरता वाली खेती से जुड़ी सोच को सीधे चुनौती देती है। 

दरअसल, पारंपरिक तरीके इसलिए टिकाऊ होते थे, क्योंकि वे पानी, मिट्टी की उर्वरता और पशुओं को अलग-अलग नहीं, बल्कि आपस में एक जुड़ी हुई व्यवस्था का हिस्सा मानकर चलते थे।

नौकरी या सरकारी योजना भर नहीं पानी से जुड़े काम

कुओं आदि का नाम किसी व्यक्ति विशेष के नाम पर ही रखा जाता है, लेकिन उसका पानी सबके लिए होता है। प्रतिष्ठा का संबंध मालिकाने हक़ से नहीं बल्कि सेवा के भाव से जुड़ा होता है। 

तकनीक से परे, इस डॉक्युमेंट्री की सबसे मुख्य बात यह है कि यह पानी को केवल एक सरकारी सुविधा या सेवा की तरह नहीं, बल्कि नैतिक ज़िम्मेदारी की तरह दिखाती है। रेगिस्तान में पानी से जुड़ा काम नौकरी या सरकारी योजना भर नहीं है, बल्कि सबकी साझी ज़िम्मेदारी है। एक ऐसा कर्तव्य, एक ऐसा काम जिसे लोग साथ मिलकर निभाते और पूरा करते हैं, क्योंकि इसका संबंध उनके जीवन से है।

हालांकि कुओं आदि का नाम किसी व्यक्ति विशेष के नाम पर ही रखा जाता है, लेकिन उसका पानी सबके लिए होता है। प्रतिष्ठा का संबंध मालिकाने हक़ से नहीं बल्कि सेवा के भाव से जुड़ा होता है। 

यह सोच ‘टेमिंग द एनार्की’ वाले तर्क से मिलती-जुलती है। इस तर्क में कहा गया है कि दक्षिण एशिया में भूजल की समस्या इसलिए बढ़ी, क्योंकि लोग धीरे-धीरे सामूहिक नियमों और सामाजिक जिम्मेदारी से दूर हो गए।

मैं अपनी इस फ़िल्म में राजस्थान को अलग-अलग मौसमों के माध्यम से दिखाना चाहता था। मानसून के पहले के सूखे से लेकर, बारिश के दिनों का राजस्थान और फिर धीरे-धीरे वापस लौटने वाला सूखापन, इन सबको अपनी फ़िल्म में लाने की मेरी कोशिश थी।
अमित तिवारी, निर्देशक, राजस्थान की रजत बूंदें डॉक्युमेंट्री

जब पानी के इस्तेमाल पर मिलकर तय किए गए नियम कमजोर पड़ते हैं, तब उसका असर भूजल के गलत इस्तेमाल के रूप में सामने आता है। जिन जगहों पर पानी का दोहन व्यक्तिगत जवाबदेही से मुक्त हो जाता है, वहां के जल भंडार नष्ट हो जाते हैं। यह फ़िल्म एक अलग तरह का मॉडल लेकर आती है। इसमें लोग एक-दूसरे पर नज़र रखते हुए नैतिक ज़िम्मेदारी निभाते हैं। यही प्रवत्ति नियम का काम करती है। इस तरह बिना कड़े सरकारी नियंत्रण के भी पानी के ज़्यादा और गलत इस्तेमाल को रोका जा सकता है।

पीने लायक भी हो सकता है जमा किया गया बारिश का पानी

अगर पानी जमा करने की जगहों को ठीक से बचाकर रखा जाए और लोग उसके इस्तेमाल के तरीक़ों की देखभाल करें, तो जमा हुआ पानी भी साफ़ और पीने लायक़ रह सकता है।

यह फ़िल्म “ठहरा हुआ पानी गंदा होता है” वाली कहावत पर सवाल उठाती है। और यह बात सिर्फ़ कहने भर की नहीं, बल्कि सोचने लायक़ भी है। फिल्म दिखाती है कि अगर पानी जमा करने की जगहों को ठीक से बचाकर रखा जाए और लोग उसके इस्तेमाल के तरीक़ों की देखभाल करें, तो जमा हुआ पानी भी साफ़ और पीने लायक़ रह सकता है। 

इस तरह यह फ़िल्म हमें समझने में मदद करती है कि पानी को बाद में साफ़ करने से ज़्यादा ज़रूरी है उसके स्रोत को ही सुरक्षित रखना।

अपने अंतिम हिस्से में, फ़िल्म निर्णायक तरीक़े से एक आलोचनात्मक रुख अपना लेती है। फ़िल्म, पारंपरिक जल संस्कृतियों के पतन को शहरीकरण, भूमि के व्यवसायीकरण और जल-संबद्धता को बाधित करने वाले बुनियादी ढांचे से जोड़ती है।

तालाबों के सूखने का कारण कम बारिश का होना नहीं है। कई बार वे इसलिए भी सूख जाते हैं क्योंकि उनके आसपास की ज़मीन खोद दी जाती है, वहां पक्की सड़कें बन जाती हैं या जलग्रहण क्षेत्र टूट-फूट जाता है।

यह विश्लेषण समकालीन नीति से जुड़े शोध से काफी हद तक मेल खाता है, यह नीति बताती है कि कई तथाकथित “जल-संकटग्रस्त” क्षेत्र मुख्य रूप से जल संबंधी सीमाओं के बजाय कई बार योजना की असफलताओं से ग्रस्त हैं।

सोचने पर मजबूर करती 'राजस्थान की रजत बूंदें'

कुल मिलाकर, 'राजस्थान की रजत बूंदें' जल सुरक्षा के बारे में सोचने के लिए एक सुसंगत वैकल्पिक ढांचा प्रस्तुत करती है। यह बताती है कि असली मजबूती दूर-दूर से पानी खींचने या ज़्यादा दोहन करने से नहीं आती। वह तब आती है जब पानी अलग-अलग जगहों पर थोड़ा-थोड़ा जमा किया जाए, कम ऊर्जा वाले तरीके अपनाए जाएं, लोग मिलकर नियमों का पालन करें और ज़रूरत भर ही पानी इस्तेमाल में लाएं। 

अनुपम मिश्र के ऐतिहासिक वृत्तांत के साथ मिलाकर देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि यह डाक्यूमेंट्री केवल यादों का एक संग्रह भर नहीं है बल्कि जल-विज्ञान से जुड़े व्यावहारिक तर्कों को हमारे सामने रखने का काम करती है। यह मुख्य रूप से बताना चाहती है कि सूखे इलाक़ों में जल सुरक्षा बारिश की कमी से जुड़ी समस्या नहीं है, बल्कि इस बात की अपर्याप्त समझ से जुड़ी समस्या है कि बारिश, मिट्टी और समाज को एक साथ मिलकर कैसे काम करना चाहिए।

असली मजबूती दूर-दूर से पानी खींचने या ज़्यादा दोहन करने से नहीं आती। वह तब आती है जब पानी अलग-अलग जगहों पर थोड़ा-थोड़ा जमा किया जाए, कम ऊर्जा वाले तरीके अपनाए जाएं, लोग मिलकर नियमों का पालन करें और ज़रूरत भर ही पानी इस्तेमाल में लाएं।

“सीमित संसाधनों” के साथ ही मैंने इन परिदृश्यों को फ़िल्म में दिखाने की न केवल ईमानदार कोशिश की है बल्कि अनुपम मिश्र की किताब में दर्ज तथ्यों और जानकारियों को उनके मूल रूप में रखने का भी प्रयास किया है। किताब में कही गई ज़्यादातर बातें इस फ़िल्म में शामिल की गईं हैं, फिर भी कुछ जल-निकाय शामिल होने से छूट गए हैं। मेरी यह फिल्म राजस्थान के लोगों, अनुपम मिश्र और उन सभी लोगों को समर्पित है जो इस पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित करने और साझा करने के लिए काम कर रहे हैं।

अंत में तिवारी कहते हैं, “फ़िल्म बनाने के दौरान, मैंने यह भी महसूस किया कि कई युवा इस पारंपरिक ज्ञान से पूरी तरह से कट गए हैं। यहां तक कि खदीन जैसे बुनियादी शब्दों से भी अनजान हैं। मैं उम्मीद करता हूं कि यह फिल्म भारत की पारंपरिक जल प्रबंधन प्रणालियों के प्रति जागरूकता और सम्मान को फिर से जगाने में मदद करेगी।”

इंडिया वाटर पोर्टल पर अंग्रेज़ी में प्रकाशित इस समीक्षा का यह अनुवाद डॉ कुमारी रोहिणी ने किया है।

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