भारत में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अब हमारे घरों की दहलीज तक पहुंच चुका है। साल 2026 की शुरुआत के साथ ही भारतीय शहरों में तापमान के पिछले सारे रिकॉर्ड टूटते नजर आ रहे है। अर्बन हीट आइलैंड (Urban Heat Island) प्रभाव के कारण दिल्ली, मुंबई और बैंगलोर जैसे महानगरों में रात का तापमान भी सामान्य से 5 डिग्री अधिक दर्ज किया जा रहा है। ऐसे में हीटवेव की घटनाएं भी तेजी से बढ़ रही हैं। पहले हीटवेव की घटनाएं आम तौर पर मई-जून में होती थीं, लेकिन अब अप्रैल में ही तापमान चरम सीमा तक पहुंच रहा है। ऐसे में आपको जानना जरूरी है कि हीटवेव क्या होता है?
हीटवेव की वैज्ञानिक परिभाषा समझने से पहले एक नज़र कुछ आंकड़ों पर डालते हैं। एल्डोराडो वेदर के अप्रैल 2026 के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, दुनिया के शीर्ष 100 सबसे गर्म स्थानों की सूची में भारत के 92 -98 शहर शामिल है। यह आंकड़ा बेहद चिंताजनक है।
भारतीय मौसम विभाग (IMD) के आंकड़ों के अनुसार अप्रैल माह में भारत के तमाम शहरों का तापमान 45 के पार हुआ। छत्तीसगढ़ के राजनंदगांव का अधिकतम तापमान 45.1 डिग्री तक चला गया। वहीं आदिलाबाद में 45.3, नागपुर में 45.4, प्रयागराज में 45.7, जैसलमेर 46, वर्धा 46.4, बाड़मेर में 46.4, अमरावती, महाराष्ट्र में 46.8, अकोला में 46.9 और उत्तर प्रदेश के बाँदा में 47.4 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचा।
लम्बे समय तक अत्यधिक गर्म मौसम बरकरार रहने से हीटवेव बनता है। हीटवेव असल में एक स्थान के वास्तविक तापमान और उसके सामान्य तापमान के बीच के अंतर से बनता है। आईएमडी के मुताबिक, यदि एक स्थान का अधिकतम तापमान मैदानी इलाकों में कम-से-कम 40 डिग्री सेल्सियस तक और पहाड़ी क्षेत्रों में कम-से-कम 30 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है तो हीटवेव चलती है।
यदि वृद्धि 6.4 डिग्री से अधिक है और वास्तविक तापमान 47 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाए, तो इसे एक गम्भीर हीटवेव कहा जाता है। तटीय क्षेत्रों में, जब अधिकतम तापमान से 4.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाए या तापमान 37 डिग्री सेल्सियस हो जाए तो हीटवेव चलता है।
हीटवेव को मोटे तौर पर एक जलवायु सम्बन्धी घटना के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन इसमें आस-पास के पर्यावरणीय कारक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। उच्च वायुमंडलीय दबाव प्रणाली वायुमंडल के ऊपरी स्तर पर रहने वाली हवा को नीचे लाकर घुमाती है। इससे हवा में संकुचन के कारण तापमान बढ़ता है और हवा वहाँ से निकल नहीं पाती। इससे हीटवेव कई दिनों तक टिका रहता है।
मौसम विभाग (IMD) के अनुसार, जब किसी मैदानी इलाके का अधिकतम तापमान 40°C और पहाड़ी क्षेत्रों का 30°C से ऊपर चला जाता है, तो उसे हीटवेव घोषित किया जाता है। 2026 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में वेट-बल्ब तापमान (Wet-bulb temperature) में वृद्धि हुई है, जिससे पसीना सूखना बंद हो जाता है और हीट स्ट्रोक का खतरा 40% तक बढ़ गया है।
2026 में हीटवेव के प्रमुख कारण रहे है , जिनमें ग्लोबल वार्मिंग और अल-नीनो मुख्य है। प्रशांत महासागर में होने वाले बदलावों ने 2026 में भारत की गर्मी को और तीव्र कर दिया है। शहरों में बढ़ती ऊंची इमारतें और पेड़ों की कमी गर्मी को सोख लेती हैं, जिससे रात में भी राहत नहीं मिलती है। गिरता भूजल स्तर हवा में नमी कम कर रहा है, जिससे शुष्क गर्मी (Dry Heat) बढ़ रही है।
लू लगने पर शरीर में बदलाव होते है और शरीर कुछ संकेत देता है, जिन्हें नजरअंदाज करना घातक हो सकता है। इसमें तेज सिरदर्द और चक्कर आना। त्वचा का लाल, पसीना न आना। मांसपेशियों में ऐंठन और कमजोरी। दिल की धड़कन तेज होना और सांस फूलना। गंभीर स्थिति में बेहोश भी हो सकते है।
हीटवेव से बचने के लिए कुल 40 उपायों को हमने विभिन्न श्रेणियों में बांटा है जो इस प्रकार हैं-
प्यास न लगने पर भी पर्याप्त पानी पिएं ।
अपने आपको को हाइड्रेटेड रखने के लिए ओआरएस (ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्यूशन), घर के बने पेय जैसे लस्सी, निम्बू पानी ,छाछ, नारियल पानी आदि का प्रयोग करें।
निर्जलीकरण करने वाले तत्त्व शराब, चाय, कॉफी और कार्बोनेटेड शीतल पेय से बचें। कार्यस्थल पर पीने का ठंडा पानी उपलब्ध कराएं।
नमक और जीरे के साथ प्याज का सलाद और कच्चे आम जैसे पारंपरिक उपचार हीट स्ट्रोक से बचा जा सकता है। आपके घर या घर पर आने वाले वेंडरों और डिलीवरी करने वालों को पानी दें ।
पीड़ित व्यक्ति के सिर पर गीले कपड़े का प्रयोग करें/पानी डालें। व्यक्ति को ओआरएस पिलाएं या नींबू का शरबत/तोरानी या जो कुछ भी हो, ये शरीर को रिहाइड्रेट करने में उपयोगी होते है ।
उच्च प्रोटीन, नमकीन, मसालेदार और तैलीय भोजन से बचें। बासी खाना ना खाएं।
दिन में बाहर जाने से पहले अपना सिर ढक लें,कपड़े, टोपी या छाते का प्रयोग करें। आंखों के लिए धूप के चश्मे का प्रयोग करें और आपकी त्वचा की रक्षा के लिए सनस्क्रीन जरूर लगाएं।
हल्के रंग के, ढीले, सूती कपड़े पहनें।
धूप में जाने से बचें, विशेष रूप से दोपहर 12.00 बजे से 3.00 बजे के बीच।
नंगे पैर बाहर न निकलें।
अधिक गर्मी की चपेट में आने वाले बुजुर्गों, बच्चों, बीमार या अधिक वजन वाले लोगों का विशेष ध्यान रखें।
जो लोग मिर्गी, दिल, किडनी लिवर की बीमारी से ग्रस्त है वे डॉक्टर से परामर्श लेकर ही लिक्विड ले।
कर्मचारी और श्रमिक सीधी धूप से बचे। कठिन कामों को दिन के ठंडे समय में शेड्यूल करें।
गर्भवती महिलाओं और बीमार कर्मचारियों पर अतिरिक्त ध्यान दिया जाना चाहिए हीट वेव अलर्ट के बारे में कर्मचारियों को सूचित करें।
पालतू जानवरों को खड़ी गाड़ियों में अकेला न छोड़ें।
खड़ी फसलों में हल्की और बार-बार सिंचाई करें।
बढ़ती फसलों में सिंचाई को बढ़ाएं।
मिट्टी की नमी का संरक्षण करें।
केवल शाम या सुबह के समय सिंचाई करें।
फव्वारा या सिंचाई का प्रयोग करें।
पशुओं को छाया में रखें और उन्हें पीने के लिए भरपूर स्वच्छ और ठंडा पानी दें।
सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे के बीच उनसे काम न कराएं।
अत्यधिक गर्मी के दौरान, पानी का छिड़काव करें और मवेशियों को ठंडा करने के लिए जलाशय में ले जाएं।
मवेशियों को हरी घास, प्रोटीन-वसा बाईपास पूरक, खनिज मिश्रण और नमक दें। उन्हें ठंडे में घंटों के दौरान चरने दें।
पोल्ट्री हाउस में पर्दे और उचित वेंटिलेशन प्रदान करें।
यदि आपका क्षेत्र लू की चपेट में है - तो शेल्टर बेल्ट और विंड ब्रेक को अपनाएं (खेतों की फसलों/पशुओं को ठंड/गर्म हवा से बचाने, मिट्टी के कटाव को रोकने और वाष्पीकरण को कम करने के लिए उपयोग में लाया जाता है )
शेड की छत को पुआल से ढक दें, उस पर सफेद रंग करवाएं या गोबर-मिट्टी से प्लास्टर करें तापमान कम करें। शेड में पंखे, वाटर स्प्रे और फॉगर्स का प्रयोग करें।
दोपहर के समय मवेशियों को चराने/खाने से बचें।
सूखे पत्ते, कृषि अवशेष और कचरा न जलाएं।
नियमित दीवारों के बजाय कैविटी वॉल तकनीक का उपयोग करें।
मोटी दीवारों का निर्माण करें। ये इंटीरियर को ठंडा रखते हैं।
दीवारों को कोट करने के लिए चूने या मिट्टी जैसी प्राकृतिक सामग्री का उपयोग करें।
निर्माण से पहले किसी बिल्डिंग टेक्नोलॉजी विशेषज्ञ से सलाह लें।
रेडियो सुनो,टीवी देखें, स्थानीय मौसम समाचार के लिए समाचार पत्र पढ़ें या मौसम की जानकारी संबंधी मोबाइल ऐप डाउनलोड करें।
पीक आवर्स के दौरान खाना पकाने से बचें। खाना बना भी रहे हो तो वेंटिलेशन के लिए दरवाजे और खिड़कियां खोले।
पंखे, गीले कपड़ों का प्रयोग करें और बार-बार ठंडे पानी से स्नान करें।
सार्वजनिक परिवहन और कार-पूलिंग का उपयोग करें।
जल निकायों का संरक्षण करें। वर्षा जल संचयन का अभ्यास करें।
ऊर्जा कुशल उपकरणों, स्वच्छ ईंधन और वैकल्पिक स्रोतों का उपयोग करें।
अगर आपको चक्कर या बीमारी महसूस हो, तो तुरंत डॉक्टर से मिलें या किसी को ले जाने के लिए कहें और आप तुरंत डॉक्टर के पास जाएं ।
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