उत्‍तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी और सीतापुर जिलों में नाले में तब्‍दील हो चुकी गोमती की सहायक नदी सरायन को पुनर्जीवित करने के लिए बीते दिनों नदी की सफाई और अतिक्रमण हटाने का काम तेज किया गया।

 

स्रोत : फ्रीपिक

नीतियां और कानून

सीएमसी की 21वीं बैठक में हुई नदी पुनर्जीवन प‍रियोजनाओं की रफ्तार पर चर्चा

केंद्रीय निगरानी समिति ने नदियों के प्रदूषण की स्थिति, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों की प्रगति और राज्यों द्वारा तैयार की गई कार्य-योजनाओं का जायजा लिया। परियोजनाओं की प्रगति और कमियों पर राज्‍यों को दिए गए निर्देश।

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय

भारत को नदियों का देश कहा जाता है। नदियां केवल जलधाराएं नहीं, बल्कि सभ्यता की धड़कन हैं। लेकिन, शहरी विस्तार, अनियोजित सीवेज प्रबंधन, औद्योगिक प्रदूषण और घटते भूजल रीचार्ज जैसी समस्‍याओं ने इन जीवनदायिनी नदियों को गंभीर संकट में डाल दिया है। नतीजतन, गंगा-यमुना सहित देश की कई बड़ी नदियों का पानी आज इतना प्रदूषित हो चुका है कि यह न तो पीने योग्य है और न ही जैव विविधता के लिए सुरक्षित। गंगा से लेकर छोटी सहायक नदियों तक, पुनर्जीवन की चुनौती बहुआयामी है। ऐसे समय में केंद्र और राज्यों के बीच समन्वित निगरानी तंत्र की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है। नदी पुनर्जीवन के इन्‍हीं कामों की समीक्षा के लिए केंद्रीय निगरानी समिति की 21वीं बैठक आयोजित की गई, जिसमें प्रगति और कमियों पर चर्चा हुई।

बैठक की अध्यक्षता जल शक्ति मंत्रालय के तहत जल संसाधन, नदी विकास और गंगा पुनर्जीवन विभाग के सचिव वी.एल. कंथा राव ने की। इस दौरान प्रदूषित नदी खंडों की स्थिति, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों की प्रगति और राज्यों द्वारा तैयार की गई कार्ययोजनाओं का जायजा लिया गया। साथ ही राज्यों द्वारा प्रदूषित नदी खंडों की सफाई, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की प्रगति और न्यायाधिकरणों द्वारा दिए गए निर्देशों के पालन की भी समीक्षा की गई। विशेष रूप से उन नदी खंडों पर चर्चा हुई जिन्हें केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने ‘प्रदूषित’ श्रेणी में रखा है। राज्यों को निर्देश दिया गया कि वे समयबद्ध ढंग से सीवेज प्रबंधन और ठोस कचरे (सॉलिड वेस्‍ट) नियंत्रण की योजनाओं को लागू करें। सचिव ने कहा कि केवल परियोजनाओं की घोषणा नहीं, बल्कि जमीनी परिणाम और नदियों के जल की गुणवत्ता में वास्तविक सुधार दिखाई देना चाहिए।

योजनाओं की प्रगति का आकलन

बैठक में राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के महानिदेशक राजीव कुमार मित्तल सहित वरिष्ठ अधिकारियों, एनएमसीजी के अन्य अधिकारियों और राज्य सरकारों तथा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। समिति ने सीपीसीबी की 2025 की रिपोर्ट के आधार पर प्रदूषित नदी क्षेत्रों की ताजा स्थिति की समीक्षा की और स्वीकृत कार्य योजनाओं के कार्यान्वयन में राज्यों की प्रगति का आकलन किया। अध्यक्ष ने इस बात पर जोर दिया कि नदी के जल की गुणवत्ता में सतत सुधार न केवल बुनियादी ढांचे के निर्माण पर बल्कि उसके प्रभावी उपयोग, नियामक अनुपालन और समय पर परियोजना के काम पूरे करने पर भी निर्भर करता है। प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में सीवेज उपचार की कमियों को दूर करना, मौजूदा सीवेज उपचार संयंत्रों (एसटीपी) के प्रदर्शन में सुधार करना, चल रही और निविदा प्रक्रिया वाली एसटीपी परियोजनाओं और सीवेज नेटवर्क के विकास से संबंधित कार्यों में तेजी लाना, औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण को मजबूत करना, उपचारित अपशिष्ट जल यानी ट्रीटेड सीवेज वाटर के पुन: उपयोग (रीयूज़) को बढ़ाना और बाढ़ के मैदानों के सीमांकन के काम में तेजी लाना शामिल थे। सचिव ने राज्यों को प्रदूषण नियंत्रण प्रयासों में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए रीयल टाइम निगरानी को सक्षम करने का भी निर्देश दिया।

गाद के जमाव, प्रदूषण और अतिक्रमण के चलते संकटग्रस्‍त उत्‍तर प्रदेश में बहने वाली तमसा नदी को ग्राम पंचायतों के सहयोग से पुनर्जीवित करने का काम आज़मगढ़ में तेजी से चल रहा है।

ट्रीटेड सीवेज वाटर के रीयूज़ पर जोर

2018, 2022 और 2025 में पहचाने गए प्रदूषित नदी क्षेत्रों की तुलनात्मक समीक्षा से पता चला कि 2018 से प्रदूषित क्षेत्रों की कुल संख्या में लगातार कमी आई है। हालांकि, समिति ने पाया कि कुछ राज्यों ने नए प्रदूषित क्षेत्रों के जुड़ने और विशिष्ट नदी खंडों में गिरावट की सूचना दी है, जिसके लिए लक्षित सुधारात्मक कार्रवाई की आवश्यकता है। समिति ने उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, हरियाणा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान, अंडमान और निकोबार, लक्षद्वीप, ओडिशा, जम्मू और कश्मीर और पंजाब के संबंध में सीवेज उपचार संयंत्रों, क्षमता उपयोग, बाढ़क्षेत्र जोनिंग, उपचारित अपशिष्ट जल के पुन: उपयोग और नदी पुनर्जीवन समितियों के माध्यम से संस्थागत निगरानी पर हुई प्रगति की समीक्षा की। बैठक के अंत में राज्यों से नदी पुनर्जीवन के लिए समयबद्ध, परिणाम-उन्मुख (रिजल्‍ट ओरिएंटेड) दृष्टिकोण अपनाने को कहा गया। इसके लिए परिचालन दक्षता, अंतर-विभागीय समन्वय और दीर्घकालिक जल गुणवत्ता सुधार प्राप्त करने के लिए निरंतर अनुपालन पर जोर दिया गया।

सीएमसी का गठन कब और क्यों हुआ?

नदी प्रदूषण पर बढ़ती चिंताओं और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के निर्देशों के बाद वर्ष 2018 में इस केंद्रीय निगरानी समिति का गठन किया गया। इसका उद्देश्य था देशभर के प्रदूषित नदी खंडों की निगरानी, कार्य योजनाओं की नियमित समीक्षा करना और राज्यों की जवाबदेही सुनिश्चित करना।

समिति का गठन एक समन्वयकारी तंत्र के रूप में किया गया, ताकि केंद्र और राज्य सरकारों के बीच नदी पुनर्जीवन योजनाओं के क्रियान्वयन में तालमेल बना रहे।

क्रमांकयोजना का नामलॉन्च वर्षकवर की जाने वाली नदी/क्षेत्रसंक्षिप्त जानकारीबजट / व्यय (लगभग)वर्तमान स्थिति
1गंगा कार्य योजना (GAP)1985गंगा नदीगंगा प्रदूषण नियंत्रण का पहला राष्ट्रीय कार्यक्रम; सीवेज शोधन व अपशिष्ट प्रबंधन पर फोकस₹900 करोड़ (चरण I व II)2009 में NMCG ढांचे में समाहित
2यमुना कार्य योजना (YAP)1993यमुना नदीJICA सहयोग से शुरू; सीवेज ट्रीटमेंट व ड्रेनेज सुधार₹1,500 करोड़+ (विभिन्न चरण)चरणबद्ध रूप से जारी
3राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (NRCP)1995गंगा के अलावा 30+ नदियाँप्रदूषित नदी खंडों में सीवेज व अपशिष्ट प्रबंधन परियोजनाएँ₹8,000 करोड़+ (संचयी)जारी
4राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG)2011गंगा बेसिनगंगा संरक्षण हेतु समर्पित प्राधिकरण; परियोजनाओं की स्वीकृति व मॉनिटरिंगनमामि गंगे के अंतर्गतजारी
5नमामि गंगे कार्यक्रम2014गंगा व प्रमुख सहायक नदियाँअविरलता-निर्मलता, STP निर्माण, जैव विविधता संरक्षण₹20,000 करोड़+ (प्रारंभिक स्वीकृति)सक्रिय रूप से जारी
6रिवर सिटी एलायंस2021नदी किनारे बसे शहरनदी-आधारित शहरी नियोजन व अनुभव साझा मंचपृथक बड़ा बजट नहींजारी

समिति के सदस्य कौन होते हैं?

सीएमसी की अध्यक्षता जल शक्ति मंत्रालय के सचिव स्तर के अधिकारी करते हैं। इसके सदस्य के रूप में आमतौर पर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वरिष्ठ अधिकारी, संबंधित मंत्रालयों के प्रतिनिधि, और विभिन्न राज्यों के मुख्य सचिव या उनके नामित अधिकारी शामिल होते हैं।

इसके अलावा पर्यावरण, शहरी विकास और जल आपूर्ति से जुड़े विभागों के अधिकारी भी बैठक में भाग लेते हैं, ताकि नदी प्रदूषण के बहुआयामी पहलुओं पर समग्र चर्चा हो सके।

सीएमसी के प्रमुख कार्य

समिति का मुख्य कार्य प्रदूषित नदी खंडों की पहचान के बाद राज्यों द्वारा तैयार की गई कार्ययोजनाओं की निगरानी करना है। यह सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की स्थापना, अपशिष्ट प्रबंधन, औद्योगिक उत्सर्जन नियंत्रण और नदी किनारे अतिक्रमण हटाने जैसे मुद्दों की समीक्षा करती है।

इसके अलावा समिति न्यायालयों और पर्यावरणीय निकायों द्वारा दिए गए निर्देशों के अनुपालन की भी निगरानी करती है। समय-समय पर प्रगति रिपोर्ट तैयार कर केंद्र सरकार को सौंपी जाती है।

उत्‍तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में बहती घाघरा (सरयू) नदी में इस साल अच्‍छी बारिश के चलते भरपूर पानी नज़र आ रहा है।

कब और कितनी बार होती हैं बैठकें?

सीएमसी की बैठकें निश्चित वार्षिक कैलेंडर के बजाय आवश्यकता और प्रगति की स्थिति के अनुसार आयोजित की जाती हैं। आम तौर पर वर्ष में एक से दो बार समीक्षा बैठक होती है। हालांकि यदि किसी राज्य में प्रदूषण की स्थिति गंभीर हो या न्यायालय का विशेष निर्देश हो, तो अतिरिक्त बैठक भी बुलाई जा सकती है।

पिछली बैठक में क्या हुआ था?

सीएमसी की 20वीं बैठक में राज्यों द्वारा प्रदूषित नदी खंडों की संख्या में कमी लाने के प्रयासों की समीक्षा की गई थी। कुछ राज्यों ने सीवेज ट्रीटमेंट क्षमता बढ़ाने और अपशिष्ट प्रबंधन ढांचे को मजबूत करने का दावा किया था। हालांकि समिति ने पाया कि कई परियोजनाएं अभी भी निर्माणाधीन हैं और अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रही हैं।

राज्यों को निर्देश दिया गया था कि वे समय-सीमा का कड़ाई से पालन करें और जल गुणवत्ता के मानकों में सुधार के ठोस आंकड़े प्रस्तुत करें।

अगली बैठक कब?

सीएमसी की अगली बैठक की संभावित तिथि आधिकारिक रूप से घोषित नहीं की गई है, लेकिन संकेत दिए गए हैं कि वर्ष के उत्तरार्ध में यानी जून 2026 के बाद प्रगति की फिर से समीक्षा की जाएगी। अगली समीक्षा के लिए राज्यों से सही समय पर विस्तृत और अप टू डेट रिपोर्ट देने को कहा गया है, जिसके आधार पर अगली बैठक में नदी पुनर्जीवन योजनाओं की प्रगति की समीक्षा की जाएगी। 

नदी पुनर्जीवन योजनाएं : सफलता बनाम चुनौतियां

पिछले चार दशकों में देश में नदियों की दशा में सुधार लाने और संकटग्रस्‍त नदियों को पुनर्जीवित करने को लेकर कई महत्वाकांक्षी कार्यक्रम शुरू किए गए, जिनके तहत सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों की क्षमता में वृद्धि, घाटों का विकास और औद्योगिक अपशिष्ट पर नियंत्रण जैसे कदम उठाए गए। इससे कुछ नदियों के पानी की गुणवत्ता और प्रवाह में कुछ सुधार भी देखने को मिला है। साथ ही शहरी सीवेज प्रबंधन की संरचना पहले की तुलना में मजबूत व बेहतर हुई है। गंगा बेसिन में इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर के निर्माण की गति बढ़ी है। कई शहरों में नदियों में हो रहे प्रदूषण को कम करने के प्रयास भी सफल होते दिखाई दिए हैं।

इसके बावजूद ढरों चुनौतियां अब भी बाकी हैं। नदियों की सफाई और नदी पुनर्जीवन की ज्‍यादातर परियोजनाएं समय-सीमा से पीछे चल रही हैं। इसके लिए स्थापित संयंत्रों का संचालन और रख-रखाव भी कमजोर है। तेजी से हो रहे शहरीकरण और अनियोजित बसावट के कारण प्रदूषण का दबाव लगातार बढ़ रहा है। इसके अलावा नदी में पर्यावरणीय प्रवाह बनाए रखना, ठोस अपशिष्ट नियंत्रण और सामुदायिक भागीदारी सुनिश्चित करना अभी भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। इस सबके बीच सीएमसी की  21वीं बैठक ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया कि नदी पुनर्जीवन केवल कागजी योजना नहीं, बल्कि निरंतर निगरानी और जवाबदेही की प्रक्रिया है। सीएमसी का दायित्व है कि वह प्रदूषण नियंत्रण के प्रयासों को सक्रिय और परिणाम-उन्‍मुखी बनाए रखे। अब नजर इस बात पर रहेगी कि बैठक में राज्यों द्वारा दिए गए आश्वासन कितनी जल्दी जमीन पर पूरे होते नज़र आएंगे।

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