मानसून के दौरान सीतामढ़ी शहर के कई मोहल्लों में जलजमाव की स्थिति स्थानीय लोगों के दैनिक जीवन को प्रभावित करती है।
चित्र: लाइवहिंदुस्तान
उत्तर बिहार का शहर सीतामढ़ी हर मानसून में जलजमाव की समस्या से जूझता है। शहर की कई सड़कों और आवासीय इलाकों में बारिश का पानी लंबे समय तक जमा रहता है, जिससे आवाजाही और दैनिक जीवन प्रभावित होता है।
इसी समस्या को कम करने के लिए लगभग पांच साल पहले शहर में एक स्टॉर्म वाटर ड्रेनेज परियोजना को मंजूरी दी गई थी। इस परियोजना में शहर के वर्षा जल को लखनदेई नदी तक पहुंचाने की योजना बनाई गई है, जो सीतामढ़ी की प्रमुख नदियों में से एक है।
इस परियोजना के तहत शहर में लगभग 12.3 किलोमीटर लंबा स्टॉर्म वाटर ड्रेनेज नेटवर्क विकसित करने का प्रस्ताव है।
परियोजना की रूपरेखा: शहर को जलजमाव से राहत देने की योजना
इस परियोजना का उद्देश्य वर्षा जल की व्यवस्थित निकासी के लिए नालों का नेटवर्क विकसित करना है, ताकि मानसून के दौरान होने वाले जलभराव को कम किया जा सके। हालांकि परियोजना को स्वीकृति मिलने के बावजूद इसका निर्माण अभी तक पूरी तरह पूरा नहीं हो सका है, जिससे शहर में जलनिकासी की समस्या बनी हुई है।
मानसून के दौरान शहर के कई मोहल्लों में जलजमाव की स्थिति स्थानीय लोगों के दैनिक जीवन को प्रभावित करती है। वार्ड 19 सहित कुछ इलाकों में लोगों की शिकायतों के बाद जिला प्रशासन को मौके पर जाकर स्थिति का निरीक्षण करना पड़ा।
एक स्थानीय निवासी के अनुसार, “हल्की बारिश के बाद भी सड़कों पर पानी भर जाता है और कई बार दो-तीन दिन तक नहीं निकलता।” स्थानीय पार्षदों और नागरिकों ने प्रशासन से स्थायी जलनिकासी व्यवस्था की मांग की है।
इस परियोजना के तहत शहर में लगभग 12.3 किलोमीटर लंबा स्टॉर्म वाटर ड्रेनेज नेटवर्क विकसित करने का प्रस्ताव है। इसके माध्यम से वर्षा जल को लखनदेई नदी तक पहुंचाया जाएगा। कम ढाल वाले इलाकों में पानी निकालने के लिए छह पम्पिंग स्टेशन स्थापित करने का प्रस्ताव भी है।
धीमी प्रगति और स्थानीय चुनौतियां
परियोजना को स्वीकृति मिलने के कई वर्ष बाद भी निर्माण कार्य पूरी तरह शुरू नहीं हो सका है, जिससे शहर के कई इलाकों में मानसून के दौरान जलजमाव की समस्या बनी हुई है। प्रशासनिक और तकनीकी कारणों के चलते परियोजना की प्रक्रियाएं लंबे समय तक प्रारंभिक चरणों में ही अटकी रहीं, जिससे शहर को तत्काल राहत नहीं मिल सकी है।
स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार डिज़ाइन स्वीकृति, तकनीकी अनुमोदन और विभिन्न विभागों के बीच समन्वय से जुड़े मुद्दों के कारण परियोजना की प्रगति कई बार प्रभावित हुई और निर्माण कार्य की समय सीमा आगे बढ़ती रही।
डिज़ाइन स्वीकृति, तकनीकी अनुमोदन और विभिन्न विभागों के बीच समन्वय से जुड़े मुद्दों के कारण परियोजना की प्रगति कई बार प्रभावित हुई।
इसी प्रकार, कुछ स्थानों पर प्रस्तावित नालों के निर्माण को लेकर स्थानीय स्तर पर विरोध भी सामने आया, जिसके कारण परियोजना के कार्यान्वयन में अतिरिक्त विलंब हुआ।
हालांकि प्रशासन का कहना है कि परियोजना को पूरा करने के लिए आवश्यक प्रक्रियाएं चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाई जा रही हैं। हाल ही में जिला प्रशासन द्वारा स्टॉर्म वाटर ड्रेनेज परियोजना के निर्माण कार्य का निरीक्षण भी किया गया, जिसमें अधिकारियों ने काम की धीमी गति पर नाराजगी जताते हुए इसे समय पर पूरा करने के निर्देश दिए।
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की रिपोर्ट के अनुसार विशेषज्ञों का मानना है कि शहरी जलनिकासी परियोजनाओं में केवल तकनीकी डिजाइन ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि भूमि उपयोग योजना, स्थानीय समुदाय की भागीदारी और विभिन्न सरकारी एजेंसियों के बीच समन्वय भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इन पहलुओं पर शुरुआत में पर्याप्त ध्यान न दिया जाए तो परियोजनाओं के क्रियान्वयन में देरी होना स्वाभाविक है।
शहरी जलनिकासी प्रणाली की चुनौतियां केवल सीतामढ़ी तक सीमित नहीं हैं। भारत के कई छोटे शहरों में ड्रेनेज सिस्टम दशकों पुराने हैं और वर्तमान शहरी विस्तार के अनुरूप नहीं हैं। नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के कई शहरों में शहरी बुनियादी ढांचा तेजी से बढ़ते शहरीकरण के अनुरूप विकसित नहीं हो पाया है, जिससे जलनिकासी और शहरी बाढ़ जैसी समस्याएं बढ़ती जा रही हैं।
कुछ प्रमुख कारण इस प्रकार हैं:
शहरी नियोजन में जलनिकासी को पर्याप्त प्राथमिकता न मिलना।
तेजी से बढ़ते निर्माण के कारण पानी के प्राकृतिक बहाव के रास्ते बंद हो जाना।
नालों में ठोस कचरे और सिल्ट का जमा होना।
परियोजना को लागू करने में की जाने वाली प्रशासनिक देरी।
इन कारणों से बारिश का पानी प्राकृतिक रूप से बह नहीं पाता और शहरों में जलजमाव की समस्या बढ़ जाती है।
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की रिपोर्ट के अनुसार विशेषज्ञों का मानना है कि शहरी जलनिकासी परियोजनाओं में केवल तकनीकी डिजाइन ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि भूमि उपयोग योजना, स्थानीय समुदाय की भागीदारी और विभिन्न सरकारी एजेंसियों के बीच समन्वय भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण कई क्षेत्रों में कम समय में अधिक वर्षा होने की घटनाएं बढ़ रही हैं। कई अध्ययनों के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण कई शहरों में कम समय में अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ रही हैं, जिससे कमजोर जल-निकासी व्यवस्था वाले क्षेत्रों में शहरी बाढ़ का जोखिम बढ़ सकता है।
यदि शहरों में वर्षा जल के प्रबंधन की प्रभावी व्यवस्था नहीं होती, तो जल-जमाव केवल असुविधा का कारण नहीं रहता बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी प्रभाव डाल सकता है।
शहरी जलजमाव की समस्या से निपटने के लिए केवल ड्रेनेज निर्माण पर्याप्त नहीं है। इसके लिए व्यापक जल प्रबंधन दृष्टिकोण जरूरी है।
शहरी जल प्रबंधन पर काम करने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि ड्रेनेज नेटवर्क के साथ-साथ वर्षा जल संचयन, प्राकृतिक जलमार्गों का संरक्षण और ठोस कचरा प्रबंधन को भी शहरी योजना का हिस्सा बनाना आवश्यक है।
कुछ संभावित उपाय इस प्रकार हैं:
शहरों में आधुनिक और वैज्ञानिक ड्रेनेज योजनाओं का निर्माण
वर्षा जल संचयन और प्राकृतिक जलमार्गों के संरक्षण को बढ़ावा
नालों की नियमित सफाई और ठोस कचरा प्रबंधन में सुधार
शहरी नियोजन में जल निकासी को प्राथमिकता देना
सीतामढ़ी की अधूरी ड्रेनेज परियोजना यह दिखाती है कि शहरी जल प्रबंधन केवल बुनियादी ढांचा बनाने का मुद्दा नहीं है। इसके लिए प्रभावी योजना, समयबद्ध क्रियान्वयन और स्थानीय स्तर पर निगरानी भी जरूरी है।
अगर भारत के छोटे शहरों में जल-निकासी और वर्षा जल प्रबंधन को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो जलजमाव और शहरी बाढ़ की समस्या आने वाले कुछ सालों में और गंभीर हो सकती है।
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