तमिलनाडु में स्थित कुंडलकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र। तमिलनाडु भारत का इकलौता राज्‍य है, जहां दो परमाणु ऊर्जा संयंत्र कार्यरत हैं।

 

स्रोत : विकी कॉमंस

नीतियां और कानून

न्यूक्लियर प्लांट में कैसे बनती है बिजली : भारत का परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम, उपलब्धियां और भविष्य

तमिलनाडु के कलपक्‍कम परमाणु ऊर्जा संयंत्र ने 'क्रिटिकल' चरण में पहुंच कर हासिल की बड़ी उपलब्धि, परमाणु ईंधन आत्‍मनिर्भरता की दिशा में भारत का बड़ा कदम

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय

भारत जैसी तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था की ऊर्जा की मांग को जब पूरा करने की बात आती है, तो परमाणु ऊर्जा यानी न्यूक्लियर एनर्जी का जि़क्र आना लाज़मी है। भारत आज़ादी के तुरंत बाद 1948 में परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना, 1969 में तारापुर में पहले परमाणु संयंत्र की स्‍थापना और 1974 में पोखरण में अपने पहले परमाणु परीक्षण से ही इस क्षेत्र में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज़ करा चुका है। इस दिशा में निरंतर प्रगति करते हुए भारत ने हाल ही में एक बड़ी छलांग लगाई है। तमिलनाडु के कलपक्कम में प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) का क्रिटिकलिटी चरण तक पहुंचना इस दिशा में ऐतिहासिक उपलब्धि माना जा रहा है। यह रिएक्टर न केवल बिजली पैदा करेगा, बल्कि खपत से अधिक परमाणु ईंधन (विशेषकर प्लूटोनियम और आगे चलकर यूरेनियम-233) भी उत्पन्न करने की क्षमता रखता है, जो थोरियम आधारित ईंधन चक्र का मार्ग प्रशस्त करता है। इसका मतलब है कि भविष्य में भारत को परमाणु ईंधन के लिए बाहरी देशों पर निर्भरता काफी हद तक कम हो सकती है। इसके साथ ही 700 मेगावाट के स्वदेशी रिएक्टरों का विस्तार और थोरियम आधारित तकनीकों पर तेजी से हो रहा शोध भारत को वैश्विक परमाणु ऊर्जा परिदृश्य में एक मजबूत दावेदार बना रहा है।

परमाणु ऊर्जा को लेकर आम लोगों के मन में अकसर कई तरह के सवाल उठते हैं। मसलन, अतिसूक्ष्‍म परमाणु से भारी मात्रा में बिजली कैसे बनाती है। इसकी प्रक्रिया क्‍या होती है? न्यूक्लियर प्‍लांट कैसा होता है? इसमें पानी की क्या भूमिका होती है? क्या यह पर्यावरण के लिए सुरक्षित है? इस लेख में हम इन सभी पहलुओं के बारे में विस्तार से चर्चा करने जा रहे है। साथ ही भारत के परमाणु कार्यक्रम की दिशा व उपलब्धियों पर भी नजर डालेंगे।

भारत के लिए क्‍यों ज़रूरी है परमाणु ऊर्जा?

भारत परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में साल दर साल नए प्रतिमान गढ़ रहा है और ऐसा करना उसके लिए कई मायनों में बेहद ज़रूरी भी है। दूसरे शब्दों में कहें तो परमाणु शक्ति भारत के लिए कोई दिखावा या टशन नहीं, बल्कि एक रणनीतिक और विकासात्मक आवश्यकता है। इसकी वजह यह है कि देश में बढ़ती आबादी, तेजी से औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के कारण बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है। कोयला आधारित बिजली उत्पादन जहां पर्यावरण और स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल रहा है, वहीं नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत जैसे सौर और पवन अभी निरंतर “बेसलोड” आपूर्ति देने में पूरी तरह सक्षम नहीं हैं। ऐसे में परमाणु ऊर्जा एक स्थिर, कम-कार्बन और बड़े पैमाने पर बिजली देने वाला विकल्प बनकर उभरती है, जो ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु लक्ष्यों दोनों को साधने में मदद कर सकती है। कोयला आधारित संयंत्रों की एक बड़ी तकनीकी सीमा यह भी है कि उनकी कार्यक्षमता (efficiency) सीमित होती है और ईंधन की गुणवत्ता पर काफी निर्भर करती है, जबकि परमाणु रिएक्टर बहुत कम ईंधन से लगातार अधिक ऊर्जा उत्पन्न कर सकते हैं। इसके अलावा, कोयला और नवीकरणीय स्रोतों के विपरीत परमाणु ऊर्जा संयंत्र उच्च क्षमता कारक (capacity factor) पर काम करते हैं, यानी वे साल भर लगभग लगातार बिजली देते हैं और ग्रिड को स्थिर बनाए रखने में मदद करते हैं। साथ ही आधुनिक रिएक्टर डिजाइन में लोड-फॉलोइंग क्षमता भी विकसित की जा रही है, जिससे मांग के अनुसार उत्पादन को नियंत्रित करना संभव हो रहा है। यह विशेषता भविष्य के ऊर्जा मिश्रण में परमाणु ऊर्जा को और महत्वपूर्ण बनाती है।

उत्‍तर प्रदेश में स्थित नरोरा न्‍यूक्लियर पावर प्‍लांट की चिमनियां। 

न्यूक्लियर पावर प्लांट में बिजली बनने की पूरी प्रक्रिया

परमाणु ऊर्जा संयंत्र में बिजली उत्पादन का आधार “न्यूक्लियर फिशन” यानी परमाणु विखंडन है। इसमें यूरेनियम-235 जैसे भारी परमाणुओं को नियंत्रित तरीके से तोड़ा जाता है, जिससे अत्यधिक मात्रा में ऊष्मा (हीट) उत्पन्न होती है। यह प्रक्रिया रिएक्टर के भीतर नियंत्रित चेन रिएक्शन के रूप में चलती है, जिसे कंट्रोल रॉड्स और कूलिंग सिस्टम द्वारा संतुलित रखा जाता है।

इससे उत्पन्न गर्मी का उपयोग पानी को भाप में बदलने के लिए किया जाता है। यह भाप अत्यधिक दबाव के साथ टरबाइन को घुमाती है। टरबाइन एक जनरेटर से जुड़ा होता है, जो यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदल देता है। इस प्रकार, बिना किसी प्रत्यक्ष दहन (combustion) के, परमाणु ऊर्जा से बिजली पैदा की जाती है। 

यह प्रक्रिया देखने में पारंपरिक थर्मल पावर प्लांट जैसी ही लगती है, लेकिन यहां कोयले की जगह परमाणु ईंधन का उपयोग होता है। यही कारण है कि परमाणु ऊर्जा संयंत्रों से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बहुत कम होता है। इस प्रक्रिया को संक्षेप में इस प्रकार समझा जा सकता है :-

न्यूक्लियर फिशन → हीट → भाप → टरबाइन → जनरेटर → बिजली

भारत की परमाणु क्षमता और लक्ष्‍य
भारत में वर्तमान में लगभग 7,500 मेगावाट (MW) से अधिक परमाणु ऊर्जा उत्पादन क्षमता स्थापित है, जो देश की कुल बिजली क्षमता का करीब 2% से भी कम है। सरकार का लक्ष्य इसे बढ़ाकर 2031 तक 22,000 MW से अधिक करना है।

दुनिया में न्यूक्लियर एनर्जी की प्रमुख तकनीकें

दुनिया में परमाणु ऊर्जा उत्पादन के लिए कई तरह की तकनीकों का विकास हुआ है, जो मुख्य रूप से रिएक्टर के डिजाइन, कूलिंग सिस्टम और ईंधन के प्रकार पर आधारित होती हैं।

प्रेसराइज्ड वाटर रिएक्टर (PWR) दुनिया में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाली तकनीक है। इसमें पानी को बहुत अधिक दबाव में रखा जाता है ताकि वह उबलने न पाए और ऊष्मा को सुरक्षित रूप से दूसरे सर्किट में स्थानांतरित किया जा सके। इसके विपरीत, बॉइलिंग वाटर रिएक्टर (BWR) में पानी सीधे रिएक्टर के भीतर उबलता है और भाप टरबाइन को चलाती है।

भारत की खास पहचान प्रेसराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर (PHWR) तकनीक है, जिसमें भारी जल (D₂O) यानी ड्यूटोरियम का उपयोग मॉडरेटर और कूलेंट के रूप में किया जाता है। यह तकनीक प्राकृतिक यूरेनियम पर भी काम कर सकती है, जो भारत जैसे देशों के लिए उपयुक्त है जहां समृद्ध यूरेनियम की कमी है।

इसके अलावा फास्ट रिएक्टर और फास्ट ब्रीडर रिएक्टर उन्नत तकनीकें हैं, जो न केवल ऊर्जा पैदा करती हैं बल्कि नए परमाणु ईंधन का उत्पादन भी कर सकती हैं। भविष्य की तकनीकों में एडवांस्ड हेवी वाटर रिएक्टर (AHWR) शामिल है, जो थोरियम आधारित ऊर्जा उत्पादन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जाता है। 

परमाणु ऊर्जा संयंत्रों की प्रमुख तकनीकों को संक्षेप में इस प्रकार समझा जा सकता है-

1. प्रेशशराइज्ड वाटर रिएक्टर (PWR)

इसमें पानी को बहुत अधिक दबाव में गर्म किया जाता है ताकि वह उबले नहीं।
यह सबसे आम तकनीक है, अमेरिका और फ्रांस में व्यापक रूप से उपयोग होती है।

2. बॉइलिंग वाटर रिएक्टर (BWR)

इसमें पानी सीधे रिएक्टर में उबलकर भाप बनाता है और टरबाइन चलाता है।

3. प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर (PHWR)

इसमें भारी जल  (Heavy Water - D₂O) का उपयोग होता है। भारत में सबसे ज्यादा यही तकनीक इस्तेमाल होती है।

4. फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBR)

यह रिएक्टर जितना ईंधन खर्च करता है, उससे ज्यादा ईंधन (प्लूटोनियम/यूरेनियम-233) पैदा करता है।

5. एडवांस्ड हैवी वाटर रिएक्टर (AHWR)

यह भारत द्वारा विकसित तकनीक है, जो थोरियम आधारित ऊर्जा उत्पादन के लिए बनाई गई है।

परमाणु ऊर्जा संयंत्र का मॉडल, जिसमें बिजली बनाने की प्रक्रिया को समझाया गया है। 

न्यूक्लियर रिएक्टर के प्रकार 

न्यूक्लियर रिएक्टरों को कई आधारों पर वर्गीकृत किया जाता है, जिससे उनकी कार्यप्रणाली और उपयोग को समझना आसान हो जाता है। न्यूट्रॉन की गति के आधार पर रिएक्टर दो प्रमुख श्रेणियों में आते हैं—थर्मल रिएक्टर और फास्ट रिएक्टर। थर्मल रिएक्टर धीमे न्यूट्रॉन का उपयोग करते हैं, जबकि फास्ट रिएक्टर तेज न्यूट्रॉन पर आधारित होते हैं।

इसी तरह, मॉडरेटर के आधार पर रिएक्टरों को लाइट वाटर, हेवी वाटर और ग्रेफाइट आधारित श्रेणियों में बांटा जाता है। ईंधन के आधार पर भी रिएक्टरों को यूरेनियम, प्लूटोनियम और थोरियम आधारित वर्गों में रखा जा सकता है। यह विविधता बताती है कि परमाणु ऊर्जा तकनीक कितनी व्यापक और जटिल है।

न्यूक्लियर रिएक्टर को मुख्य रूप से इन आधारों पर वर्गीकृत किया जाता है:

ईंधन के आधार पर

  • यूरेनियम आधारित

  • प्लूटोनियम आधारित

  • थोरियम आधारित

मॉडरेटर के आधार पर

  • लाइट वाटर

  • हेवी वाटर

  • ग्रेफाइट

न्यूट्रॉन स्पीड के आधार पर

  • थर्मल रिएक्टर

  • फास्ट रिएक्टर

दुनिया के बिजली उत्‍पादन में परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी
International Atomic Energy Agency (IAEA) के आंकड़ों के मुताबिक इस समय दुनिया में करीब 440 से अधिक परमाणु रिएक्टर काम कर रहे हैं, जो वैश्विक बिजली का लगभग 9–10% उत्पादन करते हैं।

भारतीय न्यूक्लियर प्लांट्स : आत्मनिर्भरता की कहानी

भारत ने अपने परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को स्वदेशी तकनीक पर आधारित करने की रणनीति अपनाई है। देश के अधिकांश परमाणु संयंत्र PHWR तकनीक पर आधारित हैं, जिन्हें भारतीय वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने विकसित किया है।

महाराष्ट्र के तारापुर में स्थित पुराने प्लांट्स में BWR तकनीक का उपयोग किया गया था, जो अमेरिका से मिली थी। वहीं तमिलनाडु के कुडनकुलम में रूस की VVER तकनीक पर आधारित आधुनिक रिएक्टर लगाए गए हैं। हाल ही में इस संयंत्र के प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) का क्रिटिकलिटी चरण तक पहुंचना इस दिशा में ऐतिहासिक उपलब्धि माना जा रहा है। इसका मतलब है कि यह रिएक्टर अब न्यूक्लियर पावर बनाने के साथ ही अपनी खपत से अधिक प्लूटोनियम और यूरेनियम-233 जैसे परमाणु ईंधन भी उत्पन्न कर सकेगा, जो थोरियम आधारित ईंधन चक्र के रूप में भारत की परमाणु ईंधन आत्‍मनिर्भरता का मार्ग प्रशस्त करेगा।

इसके अलावा, भारत अब 700 मेगावाट क्षमता वाले उन्नत PHWR रिएक्टरों का निर्माण कर रहा है, जो अधिक सुरक्षित और कुशल माने जाते हैं। यह तकनीकी विविधता और आत्मनिर्भरता भारत को वैश्विक परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में एक मजबूत स्थिति प्रदान करती है। 

संक्षेप में भारत के परमाणु संयंत्रों में इस्‍तेमाल तकनीकें इस प्रकार हैं - 

  • PHWR (Pressurised Heavy Water Reactor) – भारत की रीढ़

  • BWR – पुराने प्लांट्स (जैसे तारापुर)

  • VVER (रूसी तकनीक) – कुडनकुलम प्लांट

  • FBR – कलपक्कम में प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर

भारत ने PHWR तकनीक में आत्मनिर्भरता हासिल कर ली है और अब 700 मेगावाट के रिएक्टर बना रहा है।

न्यूक्लियर प्लांट का “क्रिटिकल” चरण क्या होता है?

किसी भी न्यूक्लियर रिएक्टर के संचालन में “क्रिटिकल” एक बेहद अहम और तकनीकी रूप से निर्णायक चरण होता है। इसका मतलब है कि रिएक्टर के भीतर परमाणु विखंडन (फिशन) की श्रृंखला प्रतिक्रिया (chain reaction) अब स्थिर और स्वयं-संचालित (self-sustaining) हो गई है। यानी जितने न्यूट्रॉन एक फिशन से निकलते हैं, उतने ही अगले फिशन को बनाए रखने के लिए पर्याप्त होते हैं न कम, न ज्यादा। इस अवस्था में रिएक्टर नियंत्रित तरीके से लगातार ऊर्जा उत्पन्न कर सकता है, लेकिन अभी यह पूरी क्षमता से बिजली उत्पादन नहीं कर रहा होता। क्रिटिकलिटी हासिल करना किसी भी परमाणु संयंत्र के लिए “पहली सफलता” जैसा होता है, जिसके बाद धीरे-धीरे पावर बढ़ाकर इसे कमर्शियल ऑपरेशन तक पहुंचाया जाता है।

तमिलनाडु का कलपक्‍कम पावर प्‍लांट, जिसने हाल ही में 'क्रिटिकल' चरण में पहुंचने की उपलब्धि हासिल की है। 

पानी की भूमिका : परमाणु ऊर्जा का सबसे अहम घटक

न्यूक्लियर पावर प्लांट में पानी सिर्फ एक सहायक तत्व नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया का केंद्र है। यह कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाता है, जिनके बिना रिएक्टर का संचालन संभव नहीं है। सबसे पहले, पानी कूलेंट के रूप में काम करता है और रिएक्टर से उत्पन्न अत्यधिक गर्मी को बाहर निकालता है। इसके अलावा, PHWR जैसे रिएक्टरों में भारी पानी मॉडरेटर के रूप में न्यूट्रॉन की गति को नियंत्रित करता है, जिससे चेन रिएक्शन स्थिर बनी रहती है। पानी का एक और महत्वपूर्ण उपयोग भाप उत्पादन में होता है, जो टरबाइन को चलाने के लिए आवश्यक है। इसके साथ ही, आपातकालीन परिस्थितियों में पानी का उपयोग रिएक्टर को ठंडा करने और दुर्घटनाओं को रोकने के लिए किया जाता है।  न्यूक्लियर पावर प्लांट में पानी की भूमिका को संक्षेप में इस प्रकार समझा जा सकता है:

1. कूलेंट (Coolant)

रिएक्टर की गर्मी को बाहर निकालने के लिए पानी का उपयोग होता है।

2. मॉडरेटर (Moderator)

न्यूट्रॉन की गति को धीमा करने के लिए (PHWR में भारी पानी)

3. भाप उत्पादन

टरबाइन चलाने के लिए भाप बनाना

4. सुरक्षा

आपात स्थिति में रिएक्टर को ठंडा करने के लिए

इस प्रकार एक बड़ा न्यूक्लियर प्लांट प्रतिदिन लाखों लीटर पानी का उपयोग कर सकता है। हालांकि, इतने बड़े पैमाने पर पानी के उपयोग से तापीय प्रदूषण (Thermal Pollution) का खतरा भी होता है, जिससे आसपास के जल स्रोतों और जलीय जीवन पर असर पड़ सकता है। 

परमाणु ऊर्जा और पर्यावरण : संतुलन की चुनौती

परमाणु ऊर्जा को अक्सर “क्लीन एनर्जी” कहा जाता है, क्योंकि इससे कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन बहुत कम होता है। यह जलवायु परिवर्तन से निपटने में मददगार है और बड़े पैमाने पर स्थिर बिजली उपलब्ध कराता है।

लेकिन इसके साथ कुछ गंभीर चुनौतियां भी जुड़ी हैं। सबसे बड़ा खतरा रेडियोधर्मी कचरे का है, जिसे हजारों वर्षों तक सुरक्षित रखना पड़ता है। इसके अलावा, चेरनोबिल (1986) और फुकुशिमा (2011) जैसी दुर्घटनाएं यह दिखाती हैं कि यदि सुरक्षा मानकों में कमी हो, तो इसके परिणाम बेहद विनाशकारी हो सकते हैं।

इसके साथ ही, परमाणु संयंत्रों से निकलने वाला गर्म पानी आसपास के जल स्रोतों के तापमान को बढ़ा सकता है, जिससे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है। इसलिए परमाणु ऊर्जा को “कम-कार्बन लेकिन उच्च जिम्मेदारी” वाली ऊर्जा कहा जा सकता है।

भारत के पास दुनिया का एक चौथाई थोरियम मौजूद
भारत के पास दुनिया के कुल थोरियम भंडार का लगभग 25% हिस्सा है, जो मुख्य रूप से केरल और ओडिशा के तटीय इलाकों में पाया जाता है। यह भारत को भविष्य में थोरियम आधारित ऊर्जा महाशक्ति बना सकता है।

भारत के पास अब फास्ट ब्रीडर रिएक्टर की बड़ी उपलब्धि

भारत ने परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करते हुए फास्ट ब्रीडर रिएक्टर तकनीक में प्रवेश कर लिया है। तमिलनाडु के कलपक्कम में स्थित 500 मेगावाट क्षमता वाला प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) इस दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। यह उपलब्धि इस मामले में खास है कि रूस के बाद भारत इस क्षमता को हासिल करने वाला दुनिया का दूसरा देश बन गया है। इसके अलावा भारत ने कलपक्‍कम संयंत्र में PFBR लेवल को भारत द्वारा केवल 1 अरब डॉलर के खर्च में हासिल कर लिया है। जबकि, अमेरिका 50 अरब डॉलर, जापान 12 अरब डॉलर और ब्रिटेन व जर्मनी भी कई बिलियन डॉलर लगा कर इसे हासिल कर पाने में नाकाम रहे।

यह रिएक्टर न केवल बिजली पैदा करता है, बल्कि इस्तेमाल किए गए ईंधन से अधिक नया ईंधन (प्लूटोनियम-239) भी उत्पन्न करता है। यही “ब्रीडिंग” क्षमता इसे सामान्य फास्ट रिएक्टर से अलग बनाती है। हाल के वर्षों में यह रिएक्टर “क्रिटिकलिटी” के चरण तक पहुंच चुका है, जो इसके संचालन के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जाता है।

यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि दुनिया में बहुत कम देशों ने इस तकनीक में महारत हासिल की है। भारत के लिए यह उसके तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम के दूसरे चरण को मजबूत करता है और भविष्य में थोरियम आधारित ऊर्जा उत्पादन का रास्ता खोलता है। 

गुजरात में स्थित काकरापार परमाणु ऊर्जा संयंत्र।

भारतीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के अहम पड़ाव (टाइमलाइन)

  • 1948 – परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना:
    स्वतंत्रता के तुरंत बाद भारत ने परमाणु ऊर्जा के महत्व को समझते हुए इस आयोग का गठन किया। इसका उद्देश्य शांतिपूर्ण उपयोग के लिए परमाणु अनुसंधान को बढ़ावा देना था।

  • 1954 – परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) का गठन:
    सरकार ने इस क्षेत्र में तेजी लाने के लिए एक अलग विभाग बनाया, जिसने अनुसंधान और विकास को संस्थागत रूप दिया।

  • 1969 – तारापुर में पहला परमाणु संयंत्र:
    यह भारत का पहला न्यूक्लियर पावर प्लांट था, जिसने देश में परमाणु बिजली उत्पादन की शुरुआत की।

  • 1974 – पोखरण परमाणु परीक्षण:
    इस परीक्षण ने भारत को वैश्विक परमाणु शक्ति के रूप में स्थापित किया, हालांकि इसके बाद अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध भी लगे।

  • 1980–90 का दशक – PHWR तकनीक का विकास:
    भारत ने इस दौरान स्वदेशी तकनीक विकसित कर आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम उठाया।

  • 2008 – भारत-अमेरिका परमाणु समझौता:
    इस समझौते के बाद भारत को वैश्विक परमाणु व्यापार में प्रवेश मिला और ईंधन व तकनीक तक पहुंच आसान हुई।

  • 2010–2020 – उन्नत रिएक्टरों का विस्तार:
    700 MW PHWR और कुडनकुलम जैसे प्रोजेक्ट्स ने भारत की क्षमता बढ़ाई।

  • 2020 के बाद – FBR और थोरियम पर फोकस:
    वर्तमान में भारत उन्नत तकनीकों और थोरियम आधारित ऊर्जा उत्पादन की दिशा में तेजी से काम कर रहा है।

भारत के प्रमुख न्यूक्लियर पावर प्लांट्स

भारत में परमाणु ऊर्जा उत्पादन कुछ चुनिंदा प्रमुख पावर प्लांट्स के जरिए किया जाता है, जिनमें अलग-अलग तकनीकों पर आधारित कई रिएक्टर संचालित हैं। इन संयंत्रों का विस्तार और आधुनिकीकरण देश की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति का अहम हिस्सा है।

  1. तारापुर परमाणु ऊर्जा संयंत्र (महाराष्ट्र)
    1969 में स्थापित यह भारत का पहला न्यूक्लियर पावर प्लांट है। यहां कुल 4 रिएक्टर हैं, शुरुआती दो BWR (Boiling Water Reactor) और बाद में जोड़े गए दो PHWR रिएक्टर। यह संयंत्र भारत के परमाणु कार्यक्रम की शुरुआती नींव माना जाता है।

  2. रावतभाटा परमाणु ऊर्जा संयंत्र (कोटा, राजस्थान)
    राजस्थान के कोटा जिले में स्थित यह देश के सबसे बड़े परमाणु परिसरों में से एक है। यहां कुल 7 रिएक्टर संचालित हैं, जो मुख्य रूप से PHWR तकनीक पर आधारित हैं। यह भारत के परमाणु ऊर्जा उत्पादन में बड़ी हिस्सेदारी रखता है।

  3. कुंडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र (तमिलनाडु)
    रूस के सहयोग से निर्मित यह भारत का सबसे बड़ा न्यूक्लियर पावर प्लांट है। यहां वर्तमान में 2 VVER रिएक्टर चालू हैं और अतिरिक्त यूनिट्स (3, 4, 5, 6) निर्माणाधीन हैं। यह अत्याधुनिक सुरक्षा फीचर्स के लिए जाना जाता है।

  4. काइगा परमाणु ऊर्जा संयंत्र (कर्नाटक)
    कर्नाटक में स्थित इस संयंत्र में कुल 4 रिएक्टर हैं, जो PHWR तकनीक पर आधारित हैं। काइगा अपने उच्च क्षमता कारक (capacity factor) के लिए जाना जाता है और लगातार बेहतर प्रदर्शन करता रहा है।

  5. काकरापार परमाणु ऊर्जा संयंत्र (मांडवी, गुजरात)
    गुजरात के मांडवी क्षेत्र में स्थित इस प्लांट में कुल 4 रिएक्टर हैं, जिनमें से नए 700 MW के उन्नत PHWR रिएक्टर भी शामिल हैं। यह भारत की स्वदेशी तकनीक का एक प्रमुख उदाहरण है।

  6. कलपक्कम परमाणु ऊर्जा परिसर (तमिलनाडु)
    यह केवल पावर प्लांट ही नहीं, बल्कि अनुसंधान और उन्नत तकनीक का केंद्र भी है। यहां MAPS के 2 रिएक्टर संचालित हैं और इसके साथ ही प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) भी स्थापित है, जो भारत के दूसरे चरण के परमाणु कार्यक्रम का प्रमुख हिस्सा है।

  7. नरोरा परमाणु ऊर्जा संयंत्र (उत्तर प्रदेश)
    उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले में स्थित इस संयंत्र में कुल 2 PHWR रिएक्टर हैं। यह उत्तरी भारत में परमाणु ऊर्जा आपूर्ति का महत्वपूर्ण स्रोत है और ग्रिड स्थिरता में अहम भूमिका निभाता है।

इस तरह वर्तमान में  भारत में 7 परमाणु ऊर्जा संयंत्र कार्यरत हैं, जिनमें कुल 24 परमाणु रिएक्टर संचालित हैं, जिनकी कुल स्थापित क्षमता लगभग 8,780 मेगावाट है। इनमें से अधिकांश PHWR तकनीक पर आधारित हैं, जबकि कुडनकुलम जैसे प्लांट्स में आधुनिक VVER (रूसी) रिएक्टर भी लगाए गए हैं।

भविष्‍य की विस्‍तार योजनाएं

परमाणु ऊर्जा के मामले में भारत केवल मौजूदा क्षमता पर निर्भर नहीं है, बल्कि तेजी से विस्तार की दिशा में काम कर रहा है। संसद में एक सवाल के जवाब में सरकार की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, 18 नए रिएक्टर (करीब 13,600 MW क्षमता) अलग-अलग चरणों में विकसित किए जा रहे हैं—जिनमें कुछ निर्माणाधीन हैं और कुछ प्री-प्रोजेक्ट स्टेज में हैं। निर्माणाधीन प्रमुख परियोजनाओं में काकरापार (गुजरात), राजस्थान, कुडनकुलम (तमिलनाडु) और कलपक्कम (PFBR) शामिल हैं।

इसके अलावा, कई नए परमाणु ऊर्जा प्रोजेक्ट्स की योजना भी तैयार की जा चुकी है। मध्य प्रदेश के चुटका, हरियाणा के गोरखपुर, कर्नाटक के कैगा विस्तार, और राजस्थान के माही बांसवाड़ा प्रोजेक्ट जैसे स्थानों पर नए रिएक्टर प्रस्तावित हैं।

सरकार ने हाल ही में कलपक्कम में दो नए 500 MW फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBR-1 और FBR-2) के लिए प्री-प्रोजेक्ट गतिविधियों (जैसे साइट तैयारी और खुदाई) को मंजूरी दी है। यह कदम इसलिए खास है क्योंकि यह भारत के दूसरे चरण (Fast Breeder Programme) को विस्तार देने की दिशा में ठोस प्रगति दर्शाता है। कुल मिलाकर, भारत अब केवल परमाणु ऊर्जा का उपयोगकर्ता नहीं, बल्कि तेजी से विस्तार और तकनीकी आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता हुआ देश बन चुका है, जिसका लक्ष्य 2030 और 2047 तक अपनी परमाणु क्षमता को कई गुना बढ़ाना है।

तमिलनाडु के कुंडनकुलम संयंत्र में काम करते वैज्ञानिकों व तकनीशियनों की टीम।

भारत का तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम

भारत का परमाणु कार्यक्रम एक अनूठी तीन-चरणीय रणनीति पर आधारित है, जिसे वैज्ञानिक होमी भाभा ने डिजाइन किया था। इसका उद्देश्य सीमित यूरेनियम संसाधनों का अधिकतम उपयोग करते हुए थोरियम जैसे प्रचुर संसाधन का दोहन करना है।

पहले चरण में PHWR रिएक्टरों के माध्यम से यूरेनियम से ऊर्जा और प्लूटोनियम का उत्पादन किया जाता है। दूसरे चरण में फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों के जरिए इस प्लूटोनियम का उपयोग कर अधिक ईंधन तैयार किया जाता है। तीसरे चरण में थोरियम का उपयोग कर यूरेनियम-233 उत्पन्न किया जाता है, जो एक प्रभावी परमाणु ईंधन है।

वर्तमान में भारत दूसरे और तीसरे चरण के बीच संक्रमण की स्थिति में है। PFBR की सफलता इस दिशा में एक निर्णायक कदम मानी जा रही है।

थोरियम उत्‍पादन से आई परमाणु ऊर्जा में आत्‍मनिर्भरता

भारत के पास दुनिया के सबसे बड़े थोरियम भंडारों में से एक है, जो मुख्य रूप से केरल और ओडिशा के तटीय इलाकों में पाए जाते हैं। थोरियम को भविष्य का परमाणु ईंधन माना जाता है, क्योंकि यह अपेक्षाकृत सुरक्षित है और इससे कम रेडियोधर्मी कचरा उत्पन्न होता है।

भारत ने एडवांस्ड हेवी वाटर रिएक्टर (AHWR) जैसे डिजाइनों के माध्यम से थोरियम आधारित ऊर्जा उत्पादन की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है। हालांकि यह तकनीक अभी व्यावसायिक स्तर पर पूरी तरह लागू नहीं हुई है, लेकिन शोध और परीक्षण तेजी से जारी हैं।

निष्कर्ष: जोखिम और संभावनाओं का संगम है परमाणु ऊर्जा 

परमाणु ऊर्जा भारत के लिए एक रणनीतिक और पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण विकल्प है। यह न केवल ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती है, बल्कि जलवायु परिवर्तन से निपटने में भी मददगार साबित हो सकती है।

हालांकि इसके साथ जुड़े जोखिमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन उन्नत तकनीक, सख्त सुरक्षा मानक और जिम्मेदार प्रबंधन इसे सुरक्षित बना सकते हैं। भारत का तीन-चरणीय कार्यक्रम और थोरियम पर फोकस यह संकेत देते हैं कि देश भविष्य की ऊर्जा चुनौतियों के लिए तैयार हो रहा है। 

सकारात्मक पहलू

  • कार्बन उत्सर्जन बहुत कम

  • बेसलोड पावर (24x7 बिजली)

  • कम भूमि उपयोग

नकारात्मक पहलू

  • रेडियोधर्मी कचरा (Radioactive Waste)

  • दुर्घटना का खतरा (जैसे चेरनोबिल, फुकुशिमा)

  • पानी के तापीय प्रदूषण (Thermal Pollution)

इस तरह हम देखते हैं कि परमाणु ऊर्जा “लो-कार्बन” होने के कारण पर्यावरण के लिए बेहतर है, लेकिन विकिरण के खतरों के चलते यह “जीरो-रिस्क” नहीं है यानी इससे पर्यावरण के लिए जोखिम भी है।

जानकारी के स्रोत 

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