जल जीवन मिशन योजना के तहत देश के शहरी और ग्रामीण इलाकों में जलापूर्ति में बड़ा सुधार देखने को मिला है। इसे देखते हुए योजना को 2028 तक विस्तार दिया गया है।
स्रोत : इंडिया वाटर पोर्टल
हाल ही में केंद्र सरकार ने जल जीवन मिशन (JJM) को दिसंबर 2028 तक विस्तार देने की स्वीकृति प्रदान की है। इस योजना को अब JJM 2.0 में तकनीक और नवाचार की भूमिका
स्मार्ट मीटरिंग, रिमोट मॉनिटरिंग और GIS मैपिंग : JJM 2.0 में IoT आधारित सेंसर, स्मार्ट मीटरिंग, रिमोट मॉनिटरिंग और GIS मैपिंग जैसे उपायों को बढ़ावा दिया जा सकता है। इससे लीकेज, जल चोरी और आपूर्ति बाधाओं को कम करने में मदद मिल सकती है। जल शोधन तकनीकों और विकेंद्रीकृत जल प्रणालियों का उपयोग ग्रामीण क्षेत्रों के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है।
डिजिटल डैशबोर्ड और रियल-टाइम डेटा एनालिटिक्स : जल स्रोतों के जलस्तर, आपूर्ति मात्रा, पंपिंग समय और ऊर्जा खपत जैसे डेटा का रियल-टाइम विश्लेषण करके योजनाओं की दक्षता बढ़ाई जा सकती है तथा समय रहते खराबी या आपूर्ति संकट की पहचान संभव हो जाती है।
सौर ऊर्जा आधारित पंपिंग और स्वचालित नियंत्रण प्रणाली : बिजली की अनियमित उपलब्धता वाले ग्रामीण क्षेत्रों में सोलर-पावर्ड पंप और ऑटोमैटिक वाल्व/कंट्रोल सिस्टम जल आपूर्ति को अधिक विश्वसनीय और लागत-प्रभावी बना सकते हैं, साथ ही कार्बन उत्सर्जन में भी कमी ला सकते हैं।
जल जीवन मिशन 2.0 केवल पेयजल योजना नहीं, बल्कि जल संसाधन प्रबंधन का व्यापक कार्यक्रम बन सकता है यदि इसे नदी संरक्षण, जल पुनर्भरण, वेटलैंड संरक्षण और जलवायु अनुकूलन से जोड़ा जाए।
आप जैसे जल-पर्यावरण विषयों पर काम करने वाले लेखकों के लिए यह योजना कई ग्राउंड रिपोर्ट और डेटा-एनालिसिस स्टोरी के अवसर भी देती है, जैसे- जल स्रोत स्थिरता, पाइपलाइन कवरेज बनाम वास्तविक जल आपूर्ति, या पंचायत स्तर पर जल प्रबंधन की स्थिति।
जल जीवन मिशन 2.0 भारत की ग्रामीण जल नीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ का प्रतिनिधित्व करता है। यह केवल एक विस्तार नहीं, बल्कि नीतिगत सोच में बदलाव है, जहां लक्ष्य ‘कनेक्शन’ से आगे बढ़कर ‘सतत सेवा’ बन गया है।
यदि वित्तीय संसाधनों का पारदर्शी उपयोग, सामुदायिक भागीदारी, जल स्रोत संरक्षण और तकनीकी नवाचार को प्रभावी ढंग से लागू किया गया, तो यह योजना ग्रामीण भारत के जीवन स्तर में ऐतिहासिक बदलाव ला सकती है।
हालांकि, जल संकट की जड़ें गहरी हैं। जलवायु परिवर्तन, भूजल दोहन, प्रदूषण और प्रशासनिक क्षमता जैसी चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। इसलिए JJM 2.0 की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे एक समग्र जल प्रबंधन अभियान के रूप में लागू किया जाए, न कि केवल पाइपलाइन परियोजना के रूप में।
2.0 या JJM 2.0 के नाम से जाना जाएगा। जल जीवन मिशन का यह नया चरण एक संसाधन के रूप में पानी से जुड़ी राष्ट्रीय प्राथमिकता को केवल अवसंरचना (इन्फ्रास्ट्रक्चर) निर्माण तक सीमित रखने के स्थान पर सतत और नागरिक-केंद्रित सेवा व सुचारु जल वितरण प्रणाली के रूप में विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ाएगा।
समय-सीमा बढ़ी : देशभर में 19.36 करोड़ ग्रामीण परिवारों तक स्वच्छ पेयजल की उपलब्ध कराने के लक्ष्य को पूरा करने लिए मिशन की अवधि को अब दिसंबर 2028 तक बढ़ा दिया गया है।
योजना का बजट बढ़ाया गया : मिशन का कुल बजट बढ़ाकर 8.69 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया है।
केंद्रीय सहायता में बढ़ोतरी : JJM 2.0 के लिए केंद्रीय वित्तीय सहायता बढ़ाकर 3.59 लाख करोड़ रुपये कर दी गई है। यह 2019 में योजना के आरंभ में इसके लिए किए गए मूल बजट आवंटन की तुलना में 1.51 लाख करोड़ रुपये अधिक है।
संरचना में और नज़रिये में बदलाव : JJM 2.0 के तहत योजना के क्रियान्वयन को इस प्रकार पुनर्गठित किया जा रहा है कि यह योजना अबतक के अवसंरचना-केंद्रित मॉडल (Infrastructure-centric Model) से आगे बढ़कर उपयोगिता-आधारित सेवा वितरण मॉडल (Utility-Based Service Delivery) के रूप में कार्य कर सके।
JJM 2.0 के अंतर्गत नई पहल: दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिये पुनर्गठित मिशन के तहत अनेक शासन तथा डिजिटल सुधार लागू किये जा रहे हैं-
सुजलम भारत डिजिटल ढाँचा : एकीकृत राष्ट्रीय डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से प्रत्येक गाँव को एक विशिष्ट सुजल गाँव/सेवा क्षेत्र ID प्रदान की जाएगी। इससे जल स्रोत से लेकर प्रत्येक घरेलू नल तक की संपूर्ण आपूर्ति शृंखला का मानचित्रण संभव हो सकेगा।
जल अर्पण पहल: सामुदायिक स्वामित्व को सुदृढ़ करने के लिये ग्राम पंचायतों तथा ग्राम जल एवं स्वच्छता समितियों (VWSC) को जल योजनाओं के संचालन और हस्तांतरण की प्रक्रिया में औपचारिक रूप से सम्मिलित किया जाएगा।
हर घर जल प्रमाणन: कोई भी ग्राम पंचायत स्थानीय स्तर पर पर्याप्त संचालन एवं रख-रखाव (O&M) व्यवस्था सुनिश्चित करने के पश्चात ही स्वयं को ‘हर घर जल’ के रूप में प्रमाणित कर सकेगी।
जल उत्सव: यह एक वार्षिक सामुदायिक-नेतृत्व वाला कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य ग्राम स्तर पर जल प्रणालियों के कार्यनिष्पादन की समीक्षा करना तथा जल स्थिरता को प्रोत्साहित करना है।
वर्तमान प्रगति और प्रभाव: मार्च 2026 तक, वर्ष 2019 में मिशन के आरंभ के बाद से उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की गई है-
कवरेज में वृद्धि: नल के जल कनेक्शन वर्ष 2019 में 17% (3.23 करोड़) से बढ़कर अब ग्रामीण परिवारों के लगभग 81.6% (15.80 करोड़) तक पहुँच चुके हैं।
जल जीवन मिशन के चलते देश में पेयजल आपूर्ति में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है, जिसे देखते हुए योजना को तीन साल का विस्तार दिया गया है।
भारत में ग्रामीण पेयजल आपूर्ति लंबे समय से विकास की एक केंद्रीय चुनौती रही है। सुरक्षित और पर्याप्त पेयजल की उपलब्धता न केवल स्वास्थ्य, बल्कि शिक्षा, महिलाओं के सशक्तिकरण, कृषि उत्पादकता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से भी सीधे जुड़ी हुई है। इसी संदर्भ में केंद्र सरकार ने अगस्त 2019 में जल जीवन मिशन (JJM) की शुरुआत की, जिसका लक्ष्य हर ग्रामीण परिवार को नल के माध्यम से सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना था। अब इस मिशन को जल जीवन मिशन 2.0 के रूप में पुनर्गठित और विस्तारित किया गया है, जो दिसंबर 2028 तक लागू रहेगा। इस नए चरण में केवल पाइपलाइन बिछाने और कनेक्शन देने की बजाय दीर्घकालिक जल सेवा, गुणवत्ता, संचालन-रखरखाव और सामुदायिक भागीदारी पर अधिक जोर दिया गया है।
यह लेख जल जीवन मिशन 2.0 के विस्तार, पुनर्गठन, प्रमुख बदलावों, उपलब्धियों, सीमाओं और भविष्य की संभावनाओं का समीक्षात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
जल जीवन मिशन का पहला चरण (2019–2024/26) मुख्य रूप से ग्रामीण घरों तक Functional Household Tap Connections (FHTC) पहुंचाने पर केंद्रित रहा। इसका उद्देश्य प्रति व्यक्ति प्रतिदिन लगभग 55 लीटर सुरक्षित जल उपलब्ध कराना था। इस चरण के दौरान देशभर में करोड़ों ग्रामीण परिवारों को पहली बार घर पर नल-जल सुविधा मिली। योजना के पहले चरण के तहत कुछ राज्यों ने लगभग सार्वभौमिक कवरेज के लक्ष्य को भी हासिल किया। गोवा, तेलंगाना, हरियाणा, गुजरात, पंजाब और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों ने जल जीवन मिशन के पहले चरण में लगभग सार्वभौमिक ग्रामीण नल-जल कवरेज हासिल किया। इसके अलावा अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, पुडुचेरी तथा दादरा और नगर हवेली और दमन और दीव जैसे केंद्र शासित प्रदेशों ने भी ‘हर घर जल’ लक्ष्य के करीब या पूर्ण कवरेज प्राप्त करने का दावा किया। यह “सार्वभौमिक कवरेज” मुख्य रूप से घर-घर नल कनेक्शन (coverage) के आधार पर था। विशेषज्ञों ने बाद में यह भी कहा कि कई जगह जल आपूर्ति की नियमितता, गुणवत्ता और स्रोत स्थिरता जैसे मुद्दे अभी भी चुनौती बने हुए हैं। यही कारण है कि जल जीवन मिशन 2.0 में सेवा-गुणवत्ता और O&M पर अधिक जोर दिया गया है।
JJM 1.0 की प्रमुख चुनौतियां :
कई जगह पाइपलाइन तो बिछीं, लेकिन निरंतर जलापूर्ति के लिए जल स्रोत स्थायी नहीं थे
जल गुणवत्ता परीक्षण की सीमित व्यवस्था
संचालन और रखरखाव (O&M) के लिए स्पष्ट वित्तीय मॉडल का अभाव
ग्राम पंचायतों और समुदायों की सीमित भागीदारी
पानी के लिए भूजल पर अत्यधिक निर्भरता
इन्हीं समस्याओं को देखते हुए सरकार ने मिशन के दूसरे चरण JJM 2.0 में योजना में संरचनात्मक स्तर पर कई बदलाव करने का निर्णय लिया।
मार्च 2026 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने जल जीवन मिशन को दिसंबर 2028 तक बढ़ाने और इसके कार्यान्वयन ढांचे में सुधार करने की मंजूरी दी।
नए चरण का लक्ष्य देश के लगभग 19.36 करोड़ ग्रामीण परिवारों को नल-जल सुविधा देना और सभी ग्राम पंचायतों को ‘हर घर जल’ प्रमाणित करना है।
इस विस्तार के साथ मिशन का कुल बजट बढ़ाकर लगभग ₹8.69 लाख करोड़ कर दिया गया है, जिसमें केंद्र और राज्य दोनों की भागीदारी होगी।
इस प्रकार JJM 2.0 केवल योजना की अवधि का विस्तार नहीं, बल्कि एक नीतिगत पुनर्गठन (policy restructuring) है।
जल जीवन मिशन योजना के तहत देश की एक बड़ी आबादी को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध होने के कारण जल जनित बीमारियों के मामलों में भी कमी आई है।
पहले चरण में पाइपलाइन, टंकी और कनेक्शन निर्माण प्राथमिकता थे। अब दूसरे चरण में 24×7 जल सेवा, गुणवत्ता और निरंतरता पर ध्यान दिया जा रहा है।
इस बदलाव का मतलब है कि सरकार अब जल आपूर्ति को महज़ एक “परियोजना” नहीं, बल्कि स्थायी ग्रामीण जल उपयोगिता सेवा (utility service) के रूप में देख रही है।
जल योजनाओं की विफलता का एक बड़ा कारण रख-रखाव की कमी रही है। JJM 2.0 में ग्राम पंचायतों और स्थानीय संस्थाओं को जिम्मेदारी देकर विकेंद्रीकृत प्रबंधन की दिशा में कदम उठाया गया है।
अब मोबाइल लैब, NABL-मान्यता प्राप्त परीक्षण केंद्र और समुदाय आधारित निगरानी प्रणाली पर जोर दिया जा रहा है। इससे जलजनित रोगों को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
JJM 2.0 में डिजिटल पोर्टल, डेटा मॉनिटरिंग और वित्तीय अनुशासन को मजबूत किया गया है, ताकि परियोजनाओं की प्रगति और खर्च की निगरानी बेहतर हो सके।
जलापूर्ति में स्थायित्व लाने के लिए JJM 2.0 में जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन और ग्रे-वॉटर प्रबंधन को योजना का अनिवार्य अंग बनाया गया है।
मिशन के दूसरे चरण में बजट में भारी वृद्धि की गई है, जो ग्रामीण जल क्षेत्र में अब तक का सबसे बड़ा निवेश माना जा सकता है। केंद्र की हिस्सेदारी भी पहले की तुलना में बढ़ाई गई है। नए प्रस्ताव के तहत JJM 2.0 के बजट की राशि 3.59 लाख करोड़ रुपये कर दी गई है। यह 2019 में JJM 1.0 के आरंभिक बजट में निर्धारित केंद्र सरकार की ₹2.08 लाख करोड़ की हिस्सेदारी से 1.51 लाख करोड़ रुपये अधिक है। केंद्र और राज्य की हिस्सेदारी को मिलाकर JJM 1.0 का शुरुआती बजट ₹3.60 लाख करोड़ था। योजना के बजट और निवेश में की गई इस बढ़ोतरी से से निम्नलिखित लाभ अपेक्षित हैं :
दूरस्थ और जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में परियोजनाओं को गति मिलेगी
योजना के कामों में नई तकनीकों का उपयोग हो सकेगा
निजी क्षेत्र और निर्माण कंपनियों की भागीदारी होगी
ग्रामीण स्तर पर रोजगार के नए अवसर प्राप्त होंगे
हालांकि, वित्तीय संसाधनों के कुशल उपयोग और भ्रष्टाचार-नियंत्रण की चुनौती भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
सामुदायिक भागीदारी और महिला सशक्तीकरण
जल जीवन मिशन 2.0 में समुदाय आधारित जल प्रबंधन को प्राथमिकता दी जा रही है। महिला स्वयं सहायता समूहों को जल गुणवत्ता निगरानी में शामिल करने की पहल इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। पहले चरण के अनुभव बताते हैं कि घर तक जल पहुंचने से महिलाओं और लड़कियों को पानी लाने में लगने वाला समय कम हुआ, जिससे शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़े।
इसके अलावा, ग्राम स्तर पर ‘पानी समितियों’ (Village Water & Sanitation Committees) में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है, ताकि जल योजनाओं की योजना-निर्माण, क्रियान्वयन और रखरखाव में स्थानीय नेतृत्व विकसित हो सके। इससे निर्णय-प्रक्रिया अधिक समावेशी बनती है और योजनाओं की जवाबदेही भी मजबूत होती है।
साथ ही, कई राज्यों में महिलाओं को फील्ड टेस्ट किट (FTK) के माध्यम से जल गुणवत्ता परीक्षण का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इससे वे न केवल अपने गांव के जल स्रोतों की निगरानी कर पा रही हैं, बल्कि स्थानीय स्तर पर तकनीकी दक्षता और आजीविका के नए अवसर भी विकसित हो रहे हैं, जो ग्रामीण महिला सशक्तीकरण को व्यावहारिक आधार प्रदान करते हैं।
जल जीवन मिशन के तहत लाखों लीटर की क्षमता वाली पानी की टंकियों की स्थापना से जलापूर्ति व्यवस्था का तेजी से विस्तार करना संभव हो सका है।
भारत में पेयजल राज्य विषय है, इसलिए योजना के कार्यान्वयन की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की होती है। केंद्र तकनीकी और वित्तीय सहायता प्रदान करता है।
JJM 2.0 में सुधार-आधारित MoU मॉडल अपनाया जा रहा है, जिसमें राज्यों को लक्ष्य, समयसीमा और पारदर्शिता मानकों के अनुसार काम करना होगा।
उत्तर प्रदेश, हरियाणा और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में इस दिशा में नए समझौते हुए हैं, जिससे ‘हर घर जल’ लक्ष्य को गति मिलने की उम्मीद है।
यदि योजना प्रभावी ढंग से लागू होती है, तो इसके दूरगामी लाभ हो सकते हैं:
स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता से ग्रामीण स्वास्थ्य में सुधार।
भूजल प्रबंधन और जल संरक्षण को बढ़ावा।
सामाजिक असमानता, खासकर जल स्रोतों तक पहुंच के मामले में कमी।
पानी की उपलब्धता बढ़ने से कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सहारा।
जल-जनित बीमारियों और सूखे जैसी आपदाओं के प्रभाव में कमी।
योजना सभी के लिए सुरक्षित जल (SDG-6) का लक्ष्य प्राप्त करने में मददगार होगी।
जल स्रोतों की स्थिरता का संकट: कई ग्रामीण योजनाएँ अभी भी भूजल या सीमित सतही स्रोतों पर निर्भर हैं। सूखा, अनियमित वर्षा और जलवायु परिवर्तन के कारण दीर्घकाल में जल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।
भूजल पर निर्भरता : भारत के अधिकांश ग्रामीण जल योजनाएँ अभी भी भूजल आधारित हैं। इससे दीर्घकाल में जल स्तर गिरने का खतरा है।
कवरेज बनाम वास्तविक सेवा गुणवत्ता: घरों तक नल कनेक्शन तो पहुँच गए हैं, लेकिन कई क्षेत्रों में पानी की नियमितता, दबाव और प्रतिदिन मिलने वाली मात्रा तय मानकों से कम पाई जाती है।
संचालन और रखरखाव (O&M) की वित्तीय चुनौती: ग्राम पंचायतों और स्थानीय समितियों को जिम्मेदारी तो दी गई है, पर उनके पास पर्याप्त तकनीकी कौशल और स्थायी वित्तीय संसाधन हर जगह उपलब्ध नहीं हैं।
जल गुणवत्ता की निगरानी में असमानता: फ्लोराइड, आर्सेनिक, आयरन या बैक्टीरियल प्रदूषण वाले क्षेत्रों में परीक्षण और शोधन की व्यवस्था अभी भी कई जगह कमजोर है।
परियोजनाओं में देरी और लागत वृद्धि: ठेका प्रक्रिया, भू-अधिग्रहण, तकनीकी मंजूरी और आपूर्ति श्रृंखला की समस्याओं के कारण कई राज्यों में परियोजनाएँ समय से पीछे चलती हैं, जिससे लागत भी बढ़ती है।
भ्रष्टाचार पर नियंत्रण : हाल में कई मामलों में परियोजना में घोर भ्रष्टाचार लापरवाही के कई मामल देखने को मिले हैं, जिनमें ट्रायल में ही पानी की टंकियों का ध्वस्त हो जाना और पाइप लाइनों का घटिया स्तर जैसे मामलों की भरमार रही। ऐसे कई मामलों अधिकारियों पर कार्रवाई भी हुई है, पर बहुत ये मामलों में केवल कागज़ी लीपापोती भी देखने को मिली। इसलिए योजना में हो रहे भयंकर भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए एक कड़ी निगरानी प्रणाली की सख्त जरूरत है।
डेटा पारदर्शिता और ग्राउंड रियलिटी का अंतर : डैशबोर्ड पर ‘फंक्शनल कनेक्शन’ दिखने के बावजूद कुछ गांवों में वास्तविक जल आपूर्ति बाधित या अनियमित होने की शिकायतें सामने आती हैं।
सामुदायिक स्वामित्व की सीमित भावना: कई स्थानों पर योजनाएँ अभी भी “सरकारी योजना” के रूप में देखी जाती हैं, जिससे उपयोगकर्ता शुल्क संग्रह, रखरखाव और जल संरक्षण जैसे प्रयास कमजोर पड़ जाते हैं।
देश के कई दुर्गम इलाकों में जलापूर्ति की व्यवस्था न होने के कारण आज भी ग्रामीण व आदिवासी समुदाय के लोग प्राकृतिक जल स्रोतों पर निर्भर हैं, जो सिमटते जा रहे हैं।
स्मार्ट मीटरिंग, रिमोट मॉनिटरिंग और GIS मैपिंग : JJM 2.0 में IoT आधारित सेंसर, स्मार्ट मीटरिंग, रिमोट मॉनिटरिंग और GIS मैपिंग जैसे उपायों को बढ़ावा दिया जा सकता है। इससे लीकेज, जल चोरी और आपूर्ति बाधाओं को कम करने में मदद मिल सकती है। जल शोधन तकनीकों और विकेंद्रीकृत जल प्रणालियों का उपयोग ग्रामीण क्षेत्रों के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है।
डिजिटल डैशबोर्ड और रियल-टाइम डेटा एनालिटिक्स : जल स्रोतों के जलस्तर, आपूर्ति मात्रा, पंपिंग समय और ऊर्जा खपत जैसे डेटा का रियल-टाइम विश्लेषण करके योजनाओं की दक्षता बढ़ाई जा सकती है तथा समय रहते खराबी या आपूर्ति संकट की पहचान संभव हो जाती है।
सौर ऊर्जा आधारित पंपिंग और स्वचालित नियंत्रण प्रणाली : बिजली की अनियमित उपलब्धता वाले ग्रामीण क्षेत्रों में सोलर-पावर्ड पंप और ऑटोमैटिक वाल्व/कंट्रोल सिस्टम जल आपूर्ति को अधिक विश्वसनीय और लागत-प्रभावी बना सकते हैं, साथ ही कार्बन उत्सर्जन में भी कमी ला सकते हैं।
जल जीवन मिशन 2.0 केवल पेयजल योजना नहीं, बल्कि जल संसाधन प्रबंधन का व्यापक कार्यक्रम बन सकता है यदि इसे नदी संरक्षण, जल पुनर्भरण, वेटलैंड संरक्षण और जलवायु अनुकूलन से जोड़ा जाए।
आप जैसे जल-पर्यावरण विषयों पर काम करने वाले लेखकों के लिए यह योजना कई ग्राउंड रिपोर्ट और डेटा-एनालिसिस स्टोरी के अवसर भी देती है, जैसे- जल स्रोत स्थिरता, पाइपलाइन कवरेज बनाम वास्तविक जल आपूर्ति, या पंचायत स्तर पर जल प्रबंधन की स्थिति।
जल जीवन मिशन 2.0 भारत की ग्रामीण जल नीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ का प्रतिनिधित्व करता है। यह केवल एक विस्तार नहीं, बल्कि नीतिगत सोच में बदलाव है, जहां लक्ष्य ‘कनेक्शन’ से आगे बढ़कर ‘सतत सेवा’ बन गया है।
यदि वित्तीय संसाधनों का पारदर्शी उपयोग, सामुदायिक भागीदारी, जल स्रोत संरक्षण और तकनीकी नवाचार को प्रभावी ढंग से लागू किया गया, तो यह योजना ग्रामीण भारत के जीवन स्तर में ऐतिहासिक बदलाव ला सकती है।
हालांकि, जल संकट की जड़ें गहरी हैं। जलवायु परिवर्तन, भूजल दोहन, प्रदूषण और प्रशासनिक क्षमता जैसी चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। इसलिए JJM 2.0 की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे एक समग्र जल प्रबंधन अभियान के रूप में लागू किया जाए, न कि केवल पाइपलाइन परियोजना के रूप में।
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