शहरी इलाकों की झुग्‍गी बस्तियों में कई बार जलापूर्ति की पाइप लाइनें नाले या सीवर के पास से गुज़रती हैं, जिनमें लीकेज होने पर नलों में दूषित जल की आपूर्ति होने लगती है।

 
स्रोत : इंडिया वाटर पोर्टल
नीतियां और कानून

इंदौर, भोपाल में प्रदूषित पानी से मौतों के मामलों की जांच करेगी एनजीटी की हाई लेवल कमेटी

IIT इंदौर और CPCB के विशेषज्ञों की 6 सदस्यीय समिति का गठन, एमपी के सभी जिलों के कलेक्टरों और नगर आयुक्तों को भेजी आदेश की प्रति

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय

मध्य प्रदेश के इंदौर और भोपाल में प्रदूषित पानी पीने से हुई मौतों के मामलों राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (NGT) ने मामले की जांच के लिए एक 6 सदस्यीय हाई लेवल कमेटी का गठन करने की घोषणा की है। न्यायमूर्ति शिव कुमार सिंह (न्यायिक सदस्य) और ईश्वर सिंह (विशेषज्ञ सदस्य) की एनजीटी पीठ ने पर्यावरण कार्यकर्ता कमल कुमार राठी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के बाद यह आदेश जारी किया और इस मुद्दे पर राज्य सरकार, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और सभी स्थानीय निकायों की जवाबदेही तय की।

इसके अलावा मध्य प्रदेश में विकास के नाम पर हरियाली का गला घोंटने पर भी ट्रिब्‍यूनल ने सख्‍ती दिखाई है। राज्‍य में सड़कों, रेलवे और कोयला खदानों के लिए करीब 15 लाख पुराने पेड़ों को काटने के मामले में सरकार से जवाब मांगा है। भोपाल, इंदौर, उज्जैन और विदिशा जैसे शहरों में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई के कारण हवा की गुणवत्‍ता (AQI) खराब होने के मामले में भी कोर्ट ने सरकार से जवाब-तलब किया है।

कौन-कौन होगा पैनल में शामिल

मध्य प्रदेश के शहरों में सीवेज से प्रदूषित पानी की आपूर्ति को जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा मानते हुए NGT की  भोपाल स्थित सेंट्रल ज़ोन बेंच ने हाल ही में इस मुद्दे की जांच के लिए छह सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति का गठन किया। मामले की गंभीरता को देखते हुए इस समिति में IIT इंदौर और CPCB के विशेषज्ञों को शामिल किया गया है। विशेषज्ञों की यह समिति 6 सप्ताह में NGT को अपनी रिपोर्ट देगी। समिति के सदस्‍यों में यह लोग शामिल होंगे - 

  • आईआईटी (IIT), इंदौर के निदेशक द्वारा नामांकित विशेषज्ञ।

  • केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB), भोपाल के प्रतिनिधि।

  • प्रमुख सचिव, पर्यावरण विभाग, म.प्र. शासन।

  • प्रमुख सचिव, नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग।

  • जल संसाधन विभाग के प्रतिनिधि।

  • म.प्र. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPPCB) के प्रतिनिधि (नोडल एजेंसी)।

इंदौर, भोपाल सहित भारत के तमाम शहरी इलाकों में लोग अवैध रूप से पानी के कनेक्‍शन जोड़ लेते हैं, जो पाइप लाइनों में लीकेज और पानी के प्रदूषित होने का कारण बनते हैं।

एमपी सरकार को दिए 14 सूत्री निर्देश 

इसके अलावा NGT ने राज्य में शुद्ध पेयजल सुनिश्चित करने के लिए राज्य भर में शुद्ध पेयजल सुनिश्चित करने के लिए विस्तृत निर्देश भी जारी किए हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार इस मामल में NGT ने जल आपूर्ति और गुणवत्ता की निगरानी के लिए एक मजबूत प्रबंधन सूचना प्रणाली (एमआईएस) और मोबाइल ऐप का तैयार करने और पेयजल और सीवेज लाइनों की जीआईएस-आधारित मैपिंग जैसे उपाय शामिल हैं। NGT ने इसे लेकर राज्‍य सरकार को 14 सूत्री निर्देश भी जारी किए हैं :

  1. MIS और मोबाइल ऐप : एक मजबूत 'प्रबंधन सूचना प्रणाली' (MIS) और मोबाइल ऐप बनाया जाए, जिस पर पानी की गुणवत्ता रिपोर्ट, सप्लाई का समय और शिकायत निवारण की जानकारी हो।

  2. GIS मैपिंग : पूरे राज्य में पेयजल और सीवेज लाइनों की 'GIS-आधारित मैपिंग' हो ताकि यह पता चले कि कहां सीवेज का पानी पीने के पानी में मिल रहा है।

  3. एरेशन और क्लोरीनेशन: पानी की शुद्धता के लिए प्री-क्लोरीनेशन, पोस्ट-क्लोरीनेशन के साथ-साथ 'एरेशन प्रक्रिया' (Aeration process) अनिवार्य रूप से अपनाई जाए।

  4. टंकियों और सम्प-वेल की सफाई : सभी ओवरहेड टैंकों और सम्प-वेल (Sumps) को हमेशा चालू रखा जाए और उनकी नियमित सफाई व क्लोरीनेशन हो।

  5. पाइप लाइनों की मरम्मत: लीकेज और ट्रांसमिशन लॉस को रोकने के लिए युद्धस्तर पर पाइपलाइनों की मरम्मत हो।

  6. जल स्रोतों से अतिक्रमण हटाएं : जल स्रोतों (तालाब, कुएं, बावड़ी) के आसपास से सभी प्रकार के अतिक्रमण तुरंत हटाए जाएं।

  7. गर्मी में हो विशेष जल प्रबंधन : गर्मी के मौसम में मार्च से जुलाई के बीच पानी की कमी को देखते हुए निर्माण कार्यों पर रोक लगे और वार्ड-वार राशनिंग (वैकल्पिक दिन) की व्यवस्था हो।

  8. पानी की रीसाइकलिंग : पानी की किल्‍लत दूर करने के लिए  जल पुनर्चक्रण यानी पानी की रीसाइकलिंग की जाए और सार्वजनिक कुओं और बावड़ियों को पुनर्जीवित करने की योजना लागू की जाए।

  9. वाटर हार्वेस्टिंग : सरकारी और निजी भवनों (स्कूल/कॉलेज सहित) में रेन वाटर हार्वेस्टिंग अनिवार्य हो। पालन न करने पर दंडात्मक कार्रवाई (Punitive action) की जाए।

  10. क्या करें-क्या न करें की जानकारी : नागरिकों के लिए पानी के उपयोग के संबंध में क्या करें-क्या न करें यानी 'Do's and Don'ts' जारी किए जाएं।

  11. डेयरियों को करें शहर से बाहर : शहर सीमा के भीतर 2 से अधिक पशुओं वाली सभी डेयरियों को 4 महीने के भीतर शहर से बाहर शिफ्ट किया जाए।

  12. मूर्ति विसर्जन पर लगे रोक : किसी भी पेयजल स्रोत (डैम, तालाब) में मूर्तियों का विसर्जन पूरी तरह प्रतिबंधित रहे।

  13. सख्‍त हो मीटरिंग : सभी घरेलू और व्यावसायिक पानी के कनेक्शनों पर मीटर लगाए जाएं।

टैंकर से जलापूर्ति : जल संकट के समय टैंकरों से आपूर्ति के लिए पूर्व निर्धारित शर्तों के साथ योजना तैयार रहे।

कई बार जलापूर्ति के पानी की नियमित व ही ढंग से जांच न किया जाने के कारण भी प्रदूषित पानी की आपूर्ति होती है, जो लोगों में बीमारियों और मौत का कारण बनती है। 

30 मार्च को होगी अगली सुनवाई 

याचिकाकर्ता पर्यावरण कार्यकर्ता कमल कुमार राठी ने अपनी याचिका में कोर्ट को बताया था कि भोपाल के तालाबों में फेकल कोलीफॉर्म (मल जीवाणु) की मात्रा खतरनाक स्तर (1600 मिलीलीटर) पर है और सीवेज लाइनें पेयजल लाइनों को दूषित कर रही हैं, जो संविधान के अनुच्छेद 21 (नागरिकों के जीवन की सुरक्षा का अधिकार) का सीधा उल्लंघन है। याचिकाकर्ता के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता हरप्रीत सिंह गुप्ता ने बताया कि एनजीटी ने विशेष रूप से आदेश दिया है कि इस आदेश की एक प्रति मध्य प्रदेश के सभी जिलों के कलेक्टरों और नगर आयुक्तों को भेजी जाए ताकि इन निर्देशों का तत्काल अनुपालन सुनिश्चित किया जा सके। गुप्ता ने बताया कि मामले की अगली सुनवाई 30 मार्च को होगी।

जलाशयों के पास कचरे पर भी सख्‍ती

एनजीटी ने मध्‍य प्रदेश के शहरों में हरित क्षेत्रों, जलाशयों के आसपास अवैध रूप से कचरा फेंकने और जलाने पर भी सख्त रुख अपनाया है। एनजीटी की सेंट्रल जोन बेंच ने इसे पर्यावरण संतुलन और नागरिकों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बताते हुए 28 जनवरी को नगर निकायों को सख्‍त चेतावनी दी है। 

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक एनजीटी ने भोपाल में आदमपुर खंती सहित अन्य स्थलों पर पड़े कचरे के निपटान को लेकर दायर एक याचिका की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण अनुच्छेद-21 के तहत नागरिकों का मौलिक अधिकार है और राज्‍य के स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी है कि वे पर्यावरण की रक्षा करें। 

आदेश में कहा गया है कि नियमों का पालन नहीं होने पर स्थानीय निकायों पर प्रति माह एक लाख से 10 लाख रुपए तक का पर्यावरणीय मुआवजा लगाया जा सकता है। भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर जैसे 10 लाख से अधिक आबादी वाले नगर निगमों को प्रति माह 10 लाख रुपये राशि देनी होगी। 

पांच से दस लाख की आबादी वाले निकायों पर पांच लाख रुपये प्रति माह का जुर्माना लगेगा। जबकि, अन्य छोटे स्थानीय निकायों के लिए जुर्माने की राशि एक लाख रुपये प्रति माह तय की गई है। स्थानीय निकाय जुर्माना भरने में असमर्थ रहते हैं, तो यह राशि राज्य सरकार को देनी होगी। इसके साथ ही जिम्मेदारी में लापरवाही दिखाने वाले अधिकारियों की गोपनीय चरित्रावली (एसीआर) में प्रतिकूल प्रविष्टि करने के निर्देश भी दिए गए हैं, जिससे उनकी वेतन वृद्धि और प्रमोशन प्रभावित होगा।

एनजीटी ने मध्य प्रदेश राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को निर्देश दिए हैं कि उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई करते हुए क्षति की भरपाई कराई जाए और पर्यावरण बहाली के लिए तत्काल कदम उठाए जाएं। नगर निगम में पर्यावरण सेल गठित कर प्रशिक्षित अधिकारियों की नियुक्ति भी की जाए। ट्रिब्यूनल ने कचरे की छंटाई, रीसाइकलिंग, वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट और कम्पोस्टिंग व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दिया है। इसके साथ ही निर्माताओं और ब्रांड कंपनियों को पैकेजिंग कचरे के निपटान में आर्थिक सहयोग देने के निर्देश दिए हैं।

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