सिंधु ग्रीन कॉरिडोर परियोजना के तहत लद्दाख के शुष्क व ठंडे रेगिस्तान में हरियाली लाने की एक महत्वाकांक्षी पहल शुरू हुई है।
स्रोत : विकी कॉमंस
हाल ही में सरकार ने लद्दाख के लेह स्थित स्पितुक फर्खा में इंडस रिवर ग्रीन कॉरिडोर प्रोजेक्ट (Indus River Green Corridor) के नाम से एक इको-रिस्टोरेशन प्लांटेशन परियोजना शुरू की है। यह एक व्यापक वृक्षारोपण अभियान से आगे बढ़ कर लद्दाख की बंजर-उजाड़ पहाड़ियों पर हरियाली लाकर उसे जीवंत बनाने और पारिस्थितिक पुनर्स्थापन (Eco-restoration) परियोजना है। इसलिए इसे भारत के पहले कोल्ड डेजर्ट रिवर बैंक रिस्टोरेशन प्रोजेक्ट या शीत मरुस्थलीय नदी-तट पुनर्स्थापन परियोजना के रूप में भी देखा जा रहा है। साथ ही यह परियोजना न केवल कभी भारत की पहचान रही और अपने किनारों पर सुविकसित सैंधव सभ्यता को आश्रय देने वाली सिंधु नदी के तटों को पुनर्जीवित करने का प्रयास भी है। केंद्र सरकार की यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब पूरा हिमालयी क्षेत्र जलवायु परिवर्तन, मरुस्थलीकरण और घटती हरियाली, बढ़ते जल संकट और प्राकृतिक आपदाओं में बढ़ोतरी जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है।
मार्च 2026 में अंतरराष्ट्रीय वन दिवस के अवसर पर लद्दाख के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने इस परियोजना का शुभारंभ किया। इस पहल के तहत सिंधु नदी के किनारे लगभग 1 हेक्टेयर क्षेत्र में 1000 से अधिक स्थानीय प्रजातियों के पौधे लगा कर इस परियोजना की शुरुआत की गई है। इस परियोजना में वृक्षारोपण में पौधों क चुनाव में खास सावधानी बरती गई है। वृक्षारोपण में सी बकथॉर्न, इंडियन विलो, ब्लैक पॉपुलर, ओलियास्टर जैसी प्रजातियों को शामिल किया गया, जो लद्दाख की कठोर जलवायु में टिकाऊ मानी जाती हैं। साथ ही, लेह शहर में चेरी ब्लॉसम और खुबानी के पौधे भी लगाए गए ताकि सौंदर्य और पर्यटन को बढ़ावा मिल सके। व्यापक स्तर पर पौधों को लगाने की इस परियोजना में प्रशासन, सेना, स्थानीय समुदाय और स्पितुक मठ की महत्वपूर्ण भूमिका रही, जिसने भूमि उपलब्ध कराई। इस तरह यह प्रोजेक्ट “जनभागीदारी मॉडल” का एक बेहतरीन उदाहरण है।
लद्दाख से लेकर लेह तक का हज़ारों वर्ग किलोमीटर का बड़ा इलाका एक शीत मरुस्थल यानी कोल्ड डेजर्ट है, जहां रात में तापमान -30°C तक गिर जाता है। शुष्क वातावरण और कठिन भौगोलिक स्थिति के कारण इस पूरे इलाके में वर्षा बहुत ही कम होती है। कई इलाकों में तो दशकों से बारिश की एक बूंद भी नहीं गिरी है। इस कारण यहां हरियाली का घोर अभाव देखने को मिलता है और यहां का वन आवरण 1% से भी कम है। ऐसे में यहां की पारिस्थितिकी बेहद नाजुक है और यहां मुख्य रूप से निम्नलिखित समस्याएं देखने को मिलती हैं -
मरुस्थलीकरण (Desertification): तेज रफ्तार से चलने वाली शुष्क हवाओं और कम वनस्पति के कारण पूरे लद्दाख में मिट्टी का क्षरण तेजी से होता है।
नदी किनारों का क्षरण: सिंधु नदी के किनारे ढीली मिट्टी के कारण कटाव बढ़ रहा है। ज़मीन के इस कटाव का नतीजा कई बार भूस्खलन जैसी घटनाओं के रूप में देखने को मिलता है।
जलवायु परिवर्तन: हिमालयी क्षेत्र में तापमान वृद्धि के कारण हाल के वर्षों में ग्लेशियरों के पिघलने की गति काफी बढ़ गई है, जिसका असर यहां स्पष्ट तौर पर देखने को मिल रहा है।
जैव विविधता पर खतरा: हरियाली के अभाव और मौसम के सख्त मिजाज के कारण यहां जीवों की कई प्रजातियां खतरे में हैं। इससे लद्दाख की जैव विविधता पर खतरा मंडरा रहा है।
इन समस्याओं खत्म करने के लिए ग्रीन कॉरिडोर परियोजना एक दीर्घकालिक समाधान के रूप में सामने आई है। क्योंकि इस परियोजना के तहत बड़े पैमाने पर किए जाने वाले वृक्षारोपण से इस इलाके में हरियाली आने से हालात बदल सकते हैं।
सिंधु नदी के जल की निर्मल धारा लद्दाख के दुर्गम व निर्जन पहाड़ी इलाकों में जीवंतता का रंग भर देती हैं।
इस परियोजना के कई व्यापक लक्ष्य हैं, जो केवल वृक्षारोपण तक सीमित नहीं बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित करने पर केंद्रित हैं -
लद्दाख जैसे ठंडे रेगिस्तानी इलाके में तेज हवाएं और ढीली मिट्टी नदी किनारों को तेजी से क्षतिग्रस्त करती हैं। सिंधु नदी के किनारों पर “ग्रीन बफर ज़ोन” तैयार करके मिट्टी के कटाव को रोकना इस परियोजना का प्रमुख उद्देश्य है। नदी के आसपास लगाए गए पेड़ों और झाड़ियों की जड़ें मिट्टी को बांधकर उसे स्थिर बनाएंगी, जिससे तटों का क्षरण कम होगा। इसके साथ ही यह हरित पट्टी बाढ़ या अचानक जल प्रवाह के समय प्राकृतिक सुरक्षा कवच का काम भी कर सकती है।
लद्दाख में वर्तमान में वन आवरण बेहद कम है, जो 1% से भी नीचे है। इस परियोजना के माध्यम से इसे धीरे-धीरे बढ़ाकर 5% तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। इससे क्षेत्रीय पारिस्थितिकी में एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव आ सकता है। उजाड़ पहाड़ों पर अधिक पेड़-पौधे लगने से यहां न केवल हरियाली बढ़ेगी, बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने और जल संरक्षण में भी मदद मिलेगी। इस तरह यह परियोजना लंबे समय में लद्दाख के भू-परिदृश्य को जीवंत और संतुलित बना सकती है।
इस परियोजना के तहत स्थानीय प्रजातियों जैसे सी बकथॉर्न, विलो और पॉपुलर जैसे पेड़-पौधों को बढ़ावा देकर इस लद्दाख की जैव विविधता को बढ़ाने पर जोर दिया गया है। ये पौधे न केवल कठोर जलवायु में जीवित रह सकते हैं, बल्कि स्थानीय जीव-जंतुओं के लिए भोजन और आश्रय भी प्रदान करते हैं। इससे पक्षियों, कीटों और छोटे स्तनधारियों की संख्या में वृद्धि हो सकती है। इस तरह यह परियोजना एक संतुलित और आत्मनिर्भर पारिस्थितिक तंत्र के निर्माण की दिशा में काम करती है।
लद्दाख जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से तेजी से प्रभावित हो रहा है, जिसमें ग्लेशियरों का पिघलना और तापमान में वृद्धि शामिल है। इस परियोजना के तहत लगाए जाने वाले पेड़ स्थानीय माइक्रो-क्लाइमेट को संतुलित करने में मदद करेंगे, जिससे तापमान में अत्यधिक उतार-चढ़ाव कम हो सकता है। पेड़ों की मौजूदगी से नमी बनी रहती है और हवा की गुणवत्ता भी सुधरती है। इससे क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक लचीला और अनुकूल बन सकता है।
लद्दाख में पानी की कमी सबसे बड़ी चुनौती है, इसलिए इस परियोजना में आधुनिक और टिकाऊ तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है-
इस तकनीक के तहत सौर ऊर्जा से चलने वाले पंपों का उपयोग किया जाता है, जो नदी या अन्य जल स्रोतों से पानी खींचकर पौधों तक पहुंचाते हैं। लद्दाख जैसे धूप वाले क्षेत्र में यह तकनीक बेहद प्रभावी और किफायती साबित होती है। इससे बिजली की आवश्यकता कम होती है और पर्यावरण पर अतिरिक्त दबाव नहीं पड़ता। यह एक स्थायी समाधान है, जो दूरस्थ क्षेत्रों में भी आसानी से लागू किया जा सकता है।
ड्रिप सिंचाई प्रणाली में पानी को सीधे पौधों की जड़ों तक बूंद-बूंद करके पहुंचाया जाता है, जिससे पानी की बर्बादी न्यूनतम होती है। विशेष रूप से शुष्क और जल-संकट वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त यह तकनीक लद्दाख के लिए उपयुक्त व कारगर साबित हो सकती है। इससे पौधों को आवश्यक मात्रा में ही पानी मिलता है, जिससे उनकी वृद्धि बेहतर होती है। साथ ही, यह प्रणाली मिट्टी के कटाव और वाष्पीकरण को भी कम करती है।
इस तकनीक में ऊंचाई के अंतर का उपयोग करके बिना किसी बिजली के उपकरण का उपयोग किए यानी ऊर्जा के इस्तेमाल बिना ही पानी को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाया जाता है। लद्दाख के पहाड़ी भू-भाग में यह तकनीक बेहद उपयोगी साबित हो सकती है। इससे ऊर्जा की बचत होती है और सिंचाई की लागत भी कम हो जाती है। यह एक पारंपरिक और आधुनिक तकनीक का मिश्रण है, जो टिकाऊ विकास के सिद्धांतों के अनुरूप है।
लद्दाख की कठिन जलवाचुवीय परिस्थितियों के कारण यहां पेड़-पौधों का पनप पाना काफी मुश्किल होता है, इसलिए सिंधु ग्रीन कॉरिडोर परियोजना में वृक्षारोपण के लिए खासतौर पर स्थानीय प्रजाति के पौधों का चयन किया गया है।
यह परियोजना लद्दाख के पर्यावरण पर कई सकारात्मक और दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकती है-
मिट्टी का संरक्षण : पेड़ और झाड़ियां “शेल्टर बेल्ट” के रूप में काम करती हैं, जो तेज हवाओं की गति को कम करती हैं। इससे मिट्टी का उड़ना और कटाव कम हो जाता है, जो लद्दाख में एक बड़ी समस्या है। जड़ें मिट्टी को मजबूती से पकड़ती हैं, जिससे भूमि की उर्वरता बनी रहती है। इससे कृषि और वनस्पति दोनों को लाभ मिलता है।
जैव विविधता में वृद्धि : नई वनस्पति के विकास से पक्षियों, कीटों और छोटे जीवों के लिए अनुकूल आवास तैयार होंगे। इससे पारिस्थितिकी तंत्र में संतुलन स्थापित होगा और खाद्य शृंखला मजबूत होगी। धीरे-धीरे यह क्षेत्र जैव विविधता के एक छोटे केंद्र के रूप में विकसित हो सकता है। यह प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
माइक्रो-क्लाइमेट सुधार : पेड़ों की उपस्थिति से स्थानीय तापमान नियंत्रित रहता है और हवा में नमी बनी रहती है। इससे अत्यधिक गर्मी और ठंड के प्रभाव को कम किया जा सकता है। हरित क्षेत्र बढ़ने से धूल और प्रदूषण भी कम होता है, जिससे वायु गुणवत्ता में सुधार होता है। यह स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
कार्बन का अवशोषण (Carbon Capture) : पेड़ कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करके वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा को कम करते हैं। इससे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में मदद मिलती है। लद्दाख जैसे संवेदनशील क्षेत्र में यह पहल वैश्विक जलवायु लक्ष्यों में भी योगदान दे सकती है। लंबे समय में यह परियोजना कार्बन न्यूट्रलिटी की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।
यह परियोजना पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देने का काम कर सकती है—
सी बकथॉर्न एक बहुउपयोगी पौधा है। अपने जबर्दस्त औषधीय गुणों और पोषकता के कारण इसे “लद्दाख गोल्ड” भी कहा जाता है। इसके फलों से जूस, तेल और औषधीय उत्पाद बनाए जाते हैं, जिनकी बाजार में अच्छी मांग है। इस पौधे की खेती से स्थानीय लोगों को अतिरिक्त आय का स्रोत मिल सकता है। इससे लद्दाख में एक नई “ग्रीन इकोनॉमी” विकसित होने की संभावना है।
हरित कॉरिडोर बनने से लेह और आसपास के क्षेत्रों की सुंदरता और आकर्षण बढ़ेगा, जिससे पर्यटकों की संख्या में वृद्धि हो सकती है। “इको-टूरिज्म” के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास दोनों को साथ-साथ बढ़ाया जा सकता है। यह पहल लद्दाख को एक सतत पर्यटन मॉडल के रूप में स्थापित कर सकती है। इससे होटल, गाइड और अन्य सेवाओं में भी रोजगार बढ़ेगा।
इस परियोजना के तहत वृक्षारोपण, रखरखाव, सिंचाई और निगरानी जैसी गतिविधियों में स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा। इससे ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में आजीविका के नए अवसर पैदा होंगे। युवाओं को पर्यावरण संरक्षण से जोड़कर उन्हें कौशल विकास का मौका भी मिलेगा। यह सामाजिक-आर्थिक विकास की दिशा में एक सकारात्मक कदम है।
अपने बौद्ध मठों और साहसिक पर्यटन के लिए मशहूर लद्दाख, सिंधु ग्रीन कॉरिडोर परियोजना के बाद आने वाले समय में पर्यटकों को अपनी हरियाली से भी चकित करेगा।
इस परियोजना की सबसे बड़ी ताकत इसका कम्युनिटी ड्रिवन मॉडल है, जो इसे केवल सरकारी पहल न बनाकर जन-आंदोलन का रूप देता है।
लद्दाख में मठ (मोनास्ट्री) सामाजिक जीवन का केंद्र होते हैं, इसलिए उनकी भागीदारी इस परियोजना को सामाजिक स्वीकृति देती है। स्पितुक जैसे मठों ने भूमि उपलब्ध कराकर और लोगों को प्रेरित करके महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। स्थानीय समुदाय भी वृक्षारोपण और पौधों की देखभाल के काम से सीधे तौर पर जुड़ रहे हैं, जिससे परियोजना की स्थिरता बढ़ती है। इससे लोगों में प्रकृति से लगाव और पेड़ों से अपनेपन की भावना विकसित होती है।
इस परियोजना में स्कूल-कॉलेज के छात्र और युवा बड़ी संख्या में शामिल हो रहे हैं। वे वृक्षारोपण, जागरूकता अभियान और निगरानी जैसी गतिविधियों में भाग ले रहे हैं। इससे नई पीढ़ी में पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित हो रही है। यह पहल भविष्य के “ग्रीन लीडर्स” तैयार करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।
लद्दाख जैसे संवेदनशील क्षेत्र में सेना की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है, और इस परियोजना में उनका सक्रिय सहयोग देखने को मिलता है। सेना और स्थानीय प्रशासन मिलकर संसाधन, लॉजिस्टिक्स और तकनीकी सहायता प्रदान कर रहे हैं। इससे परियोजना को मजबूती और विश्वसनीयता मिलती है। यह सहयोग मॉडल आपदा प्रबंधन और अन्य विकास कार्यों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकता है।
इस तरह का बहु-हितधारक (multi-stakeholder) मॉडल भविष्य में अन्य पर्यावरणीय परियोजनाओं के लिए उदाहरण बन सकता है। जब सरकार, समुदाय, संस्थान और युवा एक साथ काम करते हैं, तो परिणाम अधिक प्रभावी और टिकाऊ होते हैं। यह मॉडल “टॉप-डाउन” के बजाय “बॉटम-अप” विकास की दिशा को मजबूत करता है।
सिंधु ग्रीन कॉरिडोर परियोजना को लद्दाख के लिए पर्यावरण और आर्थिक दृष्टि से काफी लाभकारी बताया जा रहा है। इसके प्रमुख लाभों को इस प्रकार समझा जा सकता है -
इस परियोजना से मिट्टी के कटाव को रोकने, जैव विविधता बढ़ाने और स्थानीय जलवायु को संतुलित करने में मदद मिलेगी। पेड़ों की संख्या बढ़ने से कार्बन अवशोषण भी बढ़ेगा, जिससे जलवायु परिवर्तन के प्रभाव कम हो सकते हैं। यह लद्दाख के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को स्थिर करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
इको-टूरिज्म और सी बकथॉर्न जैसे स्थानीय उत्पादों के जरिए आय के नए स्रोत विकसित हो सकते हैं। इससे स्थानीय लोगों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी और क्षेत्र में सतत विकास को बढ़ावा मिलेगा। पर्यटन बढ़ने से होटल, परिवहन और गाइड सेवाओं में भी रोजगार बढ़ेगा।
इस परियोजना में स्थानीय लोगों की भागीदारी उन्हें निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनाती है। इससे जागरूकता बढ़ती है और लोग अपने पर्यावरण के प्रति अधिक जिम्मेदार बनते हैं। सामुदायिक सशक्तीकरण से परियोजना की सफलता और दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित होती है।
भारत ने 2030 तक 2.6 करोड़ हेक्टेयर भूमि को पुनर्स्थापित करने का पर्यावरणीय लक्ष्य रखा है। यह परियोजना उस लक्ष्य की दिशा में एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण योगदान है। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की पर्यावरणीय प्रतिबद्धता भी मजबूत होती है।
अनेक लाभों के बीच इस परियोजनाओं से कुछ नुकसान या जोखिमों की संभावनाएं भी पर्यावरणविदों और विशेषज्ञों द्वारा जताई जा रही हैं, जिन्हें इस प्रकार समझा जा सकता है -
लद्दाख में पहले से ही पानी की कमी है, ऐसे में वृक्षारोपण के लिए अतिरिक्त पानी की आवश्यकता एक चुनौती बन सकती है। यदि जल प्रबंधन सही तरीके से नहीं किया गया, तो इससे स्थानीय जल स्रोतों पर दबाव बढ़ सकता है। इसलिए जल उपयोग का संतुलन बनाए रखना जरूरी है।
लद्दाख की कठोर जलवायु यानी अत्यधिक ठंड, तेज हवाएं और ऑक्सीजन की कमी पौधों के जीवित रहने को मुश्किल बनाती है। यदि सही प्रजातियों का चयन और उचित देखभाल नहीं की गई, तो पौधों की मृत्यु दर बढ़ सकती है। इससे परियोजना के परिणाम प्रभावित हो सकते हैं।
अगर बाहरी या गैर-स्थानीय प्रजातियों का उपयोग किया गया, तो यह स्थानीय पारिस्थितिकी संतुलन को बिगाड़ सकता है। इससे मौजूदा वनस्पति और जीव-जंतुओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रजातियों का चयन बेहद जरूरी है।
देश में समय-समय पर काफी बड़े पैमाने पर पौधे लगाकर व्यापक वृक्षारोपण अभियान तो चलाए जाते हैं, पर इन पौधों की देखरेख के पर्याप्त इंतज़ाम न किए जाने के कारण पौधे जल्द ही सूख जाते हैं। इस तरह की परियोजनाओं की सफलता केवल पौधे लगाने तक सीमित नहीं होती, बल्कि उनके लंबे समय तक रखरखाव पर निर्भर करती है। इसके लिए लगातार फंडिंग, निगरानी और मानव संसाधन की जरूरत होती है। यदि यह निरंतरता नहीं बनी, तो परियोजना के सकारात्मक प्रभाव कम हो सकते हैं।
सिंधु ग्रीन कॉरिडोर परियोजना के तहत बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण किए जाने से लद्दाख में ऑक्सीजन की कमी को दूर करने में मदद मिल सकती है। वृक्षों के उगने से यहां वर्षा में भी बढ़ोतरी की उम्मीद है।
लद्दाख में अत्यधिक ठंड, तेज हवाएं और कम ऑक्सीजन स्तर पौधों की वृद्धि के लिए बड़ी बाधा हैं। सर्दियों में तापमान -20 से -30 डिग्री तक गिर जाता है, जिससे पौधों का जीवित रहना कठिन हो जाता है। इसके लिए विशेष प्रजातियों और तकनीकों की जरूरत होती है।
यह क्षेत्र जल संकट से जूझ रहा है, इसलिए सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध कराना एक बड़ी चुनौती है। ग्लेशियरों के पिघलने और अनियमित वर्षा से स्थिति और जटिल हो रही है। पानी का कुशल प्रबंधन इस परियोजना की सफलता के लिए जरूरी है।
दीर्घकालिक रखरखाव के लिए लगातार निवेश की जरूरत होती है, जिसमें सिंचाई, सुरक्षा और निगरानी शामिल हैं। सीमित संसाधनों के कारण यह एक चुनौतीपूर्ण कार्य हो सकता है। यदि पर्याप्त फंडिंग नहीं मिली, तो परियोजना की गति प्रभावित हो सकती है।
इस परियोजना में कई एजेंसियां—सरकार, सेना, स्थानीय निकाय और समुदाय—शामिल हैं। इनके बीच बेहतर तालमेल और समन्वय जरूरी है, ताकि कार्य सुचारू रूप से आगे बढ़ सके। समन्वय की कमी परियोजना के कार्यान्वयन को धीमा कर सकती है।
सिंधु नदी ग्रीन कॉरिडोर परियोजना केवल एक पर्यावरणीय पहल नहीं, बल्कि विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की एक कोशिश है। यह परियोजना दिखाती है कि अगर वैज्ञानिक तकनीक, स्थानीय ज्ञान और सामुदायिक भागीदारी को साथ लाया जाए, तो सबसे कठोर परिस्थितियों में भी हरियाली संभव है। सरकार की यह महत्वाकांक्षी पहल अगर सफल होती है, तो यह न केवल लद्दाख, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए एक नई दिशा तय कर सकती है, जहां विकास प्रकृति के साथ संघर्ष नहीं, बल्कि सहयोग करता है। हालांकि इसके साथ लद्दाख के अत्यंत सीमित जल संसाधन पर अतिरिक्त दबाव और शुष्क मरुस्थल की प्राकृतिक पारिस्थितिकी में हस्तक्षेप जैसी पर्यावरणीय चिंताएं भी इससे जुड़ी हुई हैं, जिनका प्रभाव आने वाले समय में देखने को मिलेगा। साथ ही परियोजना की सफलता भी अपने आप में एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि स्थानीय लोगों के जुड़ाव और प्रत्यक्ष सहभागिता के बिना लद्दाख की अत्यंत कठिन परिस्थितियों में इतनी बड़ी संख्या में लगाए जाने वाले पौधों का फलना-फूलना काफी मुश्किल होगा। उम्मीद है कि इस हरित पहल को जनता का भरपूर सहयोग मिलेगा।
लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें