2026 के केंद्रीय बजट से वाटर सेक्‍टर को काफी उम्‍मीदें हैं। देश में जलापूर्ति नेटवर्क के विस्‍तार के साथ ही पानी की गुणवत्‍ता सुधारने पर भी ध्‍यान दिए जाने की ज़रूरत है। 

 

स्रोत : आईडब्‍लूपी

नीतियां और कानून

केंद्रीय बजट 2026 : जलापूर्ति का दायरा बढ़ाने के साथ ही जल-सुरक्षा को मज़बूत बनाने की भी सख्‍़त ज़रूरत

पानी की गुणवत्ता में सुधार, वाटर ट्रीटमेंट सिस्टम, वेस्‍ट वाटर मैनेजमेंट, जल स्रोतों के संरक्षण और वर्षा जल संचय जैसे पानी से जुड़े महत्‍वपूर्ण पहलुओं को आगामी बजट में तवज्‍जो दिए जाने की उम्‍मीद

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय

‘जल ही जीवन है' या 'जल है तो कल है' जीवन में पानी के महत्‍व को बताते इस तरह के नारे हमारी सरकारी योजनाओं में खूब सुनने को मिलते हैं। इसके बावज़ूद देश के बजट में पानी जैसी मूलभूत ज़रूरत को अपेक्षित महत्‍व मिलता नहीं दिखता। भारत का ‘जल बजट’ लंबे समय से इस बुनियादी विरोधाभास से जूझ रहा है। हर साल जल संसाधन और पेयजल से जुड़े कुल बजटीय आवंटन का करीब 85–90% हिस्सा केवल पानी की आपूर्ति (वाटर सप्लाई) पर खर्च हो जाता है। 

इसमें जलापूर्ति की पाइप लाइनों का विस्‍तार, नई पंपिंग यूनिटें लगाना, टंकियां बनाना और नए इलाकों में पानी का कनेक्शन उपलब्‍ध कराने जैसी चीज़ें शामिल होती हैं। इसके उलट पानी की गुणवत्ता, ट्रीटमेंट सिस्टम, स्रोत संरक्षण, वर्षा जल संचय और अपशिष्ट जल प्रबंधन जैसे पानी से जुड़े महत्‍वपूर्ण पहलू बजट में या तो सीमित फंड पाते हैं या पूरी तरह हाशिये पर चले जाते हैं। नतीजा यह है कि देश के शहरों, कस्बों और गांवों में पानी की पहुंच तो बढ़ रही है, लेकिन उसकी सुरक्षा, शुद्धता और निरंतरता सुनिश्चित नहीं हो पा रही। इंदौर जैसे शहरों में दूषित पानी से हुई मौतों जैसी घटनाएं इसी नीति-गत असंतुलन के नतीजे के रूप में सामने आती हैं, जहां मजबूत सप्लाई नेटवर्क होने के बावजूद जल प्रबंधन की कमजोर कड़ियां पूरे सिस्टम को असुरक्षित बना देती हैं।

पानी है प्राथमिकता, पर ज़्यादातर फोकस वाटर सप्‍लाई पर

केंद्रीय बजट 2025-26 में जल संसाधन क्षेत्र को सरकार ने एक बार फिर “प्राथमिकता वाले सेक्टर” के रूप में पेश किया, लेकिन आवंटन का बड़ा हिस्सा पेयजल आपूर्ति और स्वच्छता तक सीमित रहा। जल शक्ति मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले विभागों, डिपार्टमेंट ऑफ ड्रिंकिंग वॉटर एंड सैनिटेशन और  डिपार्टमेंट ऑफ वॉटर रिसोर्सेज के लिए कुल मिलाकर करीब एक लाख करोड़ रुपये के आसपास का प्रावधान किया गया। यह राशि पिछले वर्षों की तुलना में अधिक थी, लेकिन इसके भीतर भी असंतुलन साफ दिखाई दिया, क्‍योंकि नदी, भूजल और जल संरक्षण से जुड़ी योजनाओं के मुकाबले नल से पानी पहुंचाने वाली योजनाओं को ही ज़्यादा तरजीह मिली।

वाटर बजट का दायरा जल-जीवन मिशन के इर्द-गिर्द 

बजट 2025-26 में जल जीवन मिशन (JJM) सबसे बड़ा लाभार्थी रहा। इसके लिए लगभग 67 हजार करोड़ रुपये का आवंटन किया गया। यह रकम 2028 तक  ग्रामीण क्षेत्रों में हर घर नल से जल पहुंचाने के लक्ष्य को हासिल करने के लिए दी गई, जिसे पहले  2024 तक पूरा करने का लक्ष्‍य था।  सरकार का दावा रहा कि देश के 80 प्रतिशत से अधिक ग्रामीण घरों तक नल कनेक्शन पहुंच चुका है। हालांकि, यह आंकड़ा विश्‍वसनीय नहीं लगता। इसके अलावा जल स्रोतों की स्थिरता, पानी की गुणवत्ता और संचालन-रखरखाव अभी भी बड़ी चुनौती बने हुए हैं। इसके बावजूद, जल जीवन मिशन के तहत इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण पर अधिक और स्रोत संरक्षण पर  ज़ोर अपेक्षाकृत कम दिखा।

गंगा और नदियों के लिए पैसा, फिर भी ठोस प्रगति नहीं

नदी संरक्षण के नाम पर नमामि गंगे मिशन-II के लिए लगभग 3,400 करोड़ रुपये आवंटित किए गए। सरकार ने इसे गंगा के साथ-साथ अन्य नदियों के लिए भी मॉडल बताया, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि यह मिशन अब भी मुख्यतः सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और घाट सुंदरीकरण तक सिमटा हुआ है। नदी के प्राकृतिक प्रवाह, फ्लडप्लेन संरक्षण और इकोलॉजिकल फ्लो जैसे बुनियादी मुद्दों पर बजट में कोई ठोस नई दिशा नहीं दिखाई दी। यानी पैसा तो आया, लेकिन नदी को एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में देखने का दृष्टिकोण अब भी अधूरा रहा।

बजट में भूजल, सिंचाई और जल संरक्षण हाशिए पर

भूजल संकट देश के कई हिस्सों में गंभीर रूप ले चुका है, इसके बावजूद अटल भूजल योजना और अन्य भूजल प्रबंधन कार्यक्रमों को सीमित आवंटन ही मिला। सिंचाई, कैचमेंट ट्रीटमेंट, पारंपरिक जल संरचनाओं और वर्षा जल संरक्षण जैसे मुद्दे बजट में मौजूद तो रहे, लेकिन वे बड़े राष्ट्रीय नैरेटिव का हिस्सा नहीं बन पाए। जल संसाधन विभाग के तहत आवंटित राशि का बड़ा हिस्सा भी बड़ी परियोजनाओं और प्रशासनिक खर्चों में चला गया, न कि सामुदायिक या विकेंद्रीकृत जल प्रबंधन में।

जलापूर्ति को बेहतर और सुरक्षित बनाने के लिए वाटर ट्रीटमेंट प्‍लांट जैसी सुविधाओं का विस्‍तार भी होना चाहिए ।

बजट 2026 से क्या हैं अपेक्षाएं

जल क्षेत्र को आगामी बजट से काफ़ी उम्‍मीदें हैं। उम्‍मीद की जा रही है कि इस बजट में महज़ जलापूर्ति के दायरे को बढ़ाने से आगे बढ़ते हुए सरकार पानी की स्‍वच्‍छता और जलापूर्ति की सुरक्षा जैसी ज़रूरी बातों पर भी फोकस करेगी, ताकि हाल ही में इंदौर में दूषित पानी पीने से होने वाली डेढ़ दर्ज़न मौतों जैसी घटनाएं दोहराई न जाएं। इस साल के बजट से वाटर सेक्‍टर की प्रमुख अपेक्षाएं इस प्रकार हैं-

सिर्फ पाइप बिछाना नहीं, सुरक्षित जलापूर्ति के भी हों इंतज़ाम

आगामी केंद्रीय बजट 2026 से सबसे बड़ी अपेक्षा यह है कि सरकार ‘पानी पहुंचाने’ से आगे बढ़कर ‘पानी बचाने’ की नीति को केंद्र में लाए। जल जीवन मिशन के बाद अब सवाल यह नहीं रह गया है कि नल लगे या नहीं, बल्कि यह है कि उन नलों में पानी कितने साल तक आएगा। विशेषज्ञों की राय है कि अगले बजट में जल स्रोतों की सुरक्षा, रिचार्ज ज़ोन, तालाब-झीलों के पुनर्जीवन और वाटरशेड विकास के लिए अलग और ठोस वित्तीय प्रावधान होने चाहिए।

भूजल संकट को ‘राष्ट्रीय आपातकाल’ की तरह देखने का समय

देश के कई राज्यों में भूजल स्तर लगातार गिर रहा है, लेकिन बजटीय प्रतिक्रिया अब भी टुकड़ों में बंटी हुई है। बजट 2026 से यह उम्मीद की जा रही है कि भूजल को राष्ट्रीय सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा से जोड़कर देखा जाएगा। अटल भूजल योजना के विस्तार, वैज्ञानिक मॉनिटरिंग नेटवर्क, रियल-टाइम डेटा और स्थानीय समुदायों की भागीदारी के लिए अलग से संसाधन दिए जा सकते हैं। बिना भूजल प्रबंधन के जल जीवन मिशन जैसी योजनाएं लंबे समय तक टिक नहीं पाएंगी—यह समझ अब नीति स्तर पर भी झलकनी चाहिए।

नदियों की ‘स्वच्छता’ के साथ ही जैव विविधता का संरक्षण भी ज़रूरी

आगामी बजट से यह भी उम्मीद है कि नदी संरक्षण की परिभाषा बदलेगी। केवल सीवेज ट्रीटमेंट और रिवरफ्रंट विकास के बजाय नदी के प्रवाह, फ्लडप्लेन, जैव विविधता और तलछट प्रबंधन को बजट में जगह मिले। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर ई-फ्लो, बांध-बैराज संचालन और रेत खनन जैसे मुद्दों को बजटीय प्राथमिकता नहीं दी गई, तो नदियों पर खर्च होने वाला पैसा सिर्फ “दिखावटी सुधार” तक सीमित रह जाएगा।

शहरी जल संकट से निपटने के लिए वेस्ट वॉटर रीसाइक्लिंग ज़रूरी

तेजी से बढ़ते शहरों के बीच जल संकट एक बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक मुद्दा बनता जा रहा है। बजट 2026 में शहरी जल आपूर्ति, सीवरेज और वेस्ट वॉटर रीसाइक्लिंग के लिए पूंजीगत निवेश बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। खासकर ऐसे मॉडल, जहां उपचारित पानी का उपयोग उद्योग, निर्माण और शहरी हरित क्षेत्रों में किया जा सके, उन्हें प्रोत्साहन मिल सकता है। इससे ताजे पानी पर दबाव कुछ हद तक कम हो सकता है।

पाइप लाइनों से पर्याप्‍त जलापूर्ति न होने के कारण अकसर शहरी इलाकों में लोगों को पैसे देकर टैंकरों से पानी ख़रीदना पड़ता है। बजट में इस समस्‍या के समाधान को भी तरजीह दी जानी चाहिए। 

बजट से उम्‍मीदें : क्‍या कहते हैं एक्‍सपर्ट

नाइट फ्रैंक इंडिया के इंटरनेशनल पार्टनर, चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर शिशिर बैजल का कहना है कि रेन वाटर हार्वेस्टिंग, ग्रीन बिल्डिंग इंसेंटिव और सस्टेनेबल जैसी चीजों को केंद्रीय बजट FY 2026-27 में बढ़ावा देने की ज़रूरत है, खासकर बड़े शहरों में। क्‍योंकि, नीति में बदलाव के बिना इस महत्वपूर्ण सेगमेंट की मांग दबी हुई है। इसे कर छूट और सब्सिडी जैसे बजटीय प्रोत्‍साहनों के ज़रिये सहारा दिया जा सकता है। तमिलनाडु जैसे राज्य रेजिडेंशियल प्रोजेक्‍ट्स में रेन वाटर हार्वेस्टिंग, जल संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े उपकरणों के साथ ही ग्रीन बिल्डिंग सर्टिफिकेशन पर होने वाले पूंजीगत खर्च पर 25% तक सब्सिडी दे रहे हैं। इसकी सीमा लगभग INR 1 करोड़ है। आंध्र प्रदेश में भी ऐसी ही योजनाएं हैं जो IGBC-रेटेड ग्रीन प्रोजेक्ट्स के लिए फिक्स्ड कैपिटल इन्वेस्टमेंट पर 25% तक सब्सिडी देती हैं। इसी तर्ज़ पर  एक केंद्रीय सब्सिडी कार्यक्रम शुरू किया जा सकता है जो ग्रीन बिल्डिंग मटीरियल और टेक्नोलॉजी पर अतिरिक्त पूंजीगत खर्च का 20-25% कवर करे। इसकी सीमा प्रति प्रोजेक्ट कम से कम 1-2 करोड़ रुपये की होनी चाहिए। 

काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायर्नमेंट एंड वाटर (CEEW) के फेलो नितिन बस्सी ने इंडिया वाटर पोर्टल (IWP) से बात करते हुए कहा कि FY 26-27 के बजट में पानी के लिए तीन बड़ी घोषणाएं होने की उम्मीद है-

  1. ग्रामीण इलाकों में पीने के पानी और सैनिटेशन को बेहतर बनाने के लिए फाइनेंशियल मदद, जिसे पिछले बजट में लगभग 74,000 करोड़ रुपये मिले थे। इस बार पानी के सोर्स की सस्टेनेबिलिटी, सप्लाई और शहरी इलाकों के आसपास के इलाकों में सर्विस को बेहतर बनाने पर फोकस जारी रहने की संभावना है। 

  2. इस्तेमाल किए गए पानी (घरेलू सीवेज) के मैनेजमेंट के लिए एक बड़े फाइनेंशियल आवंटन की उम्मीद है। इसमें सीवेज ट्रीटमेंट को मजबूत करना, ग्रे वॉटर मैनेजमेंट, वॉटर बॉडीज़ को फिर से जीवित करना और पीने के अलावा दूसरे कामों के लिए दोबारा इस्तेमाल को बढ़ावा देना शामिल होगा। CEEW के एनालिसिस के अनुसार 2047 तक ट्रीटमेंट टेक्नोलॉजी की 100 फीसदी कवरेज के लिए लगभग 1.6-2.3 लाख करोड़ रुपये के इन्वेस्टमेंट की ज़रूरत है। 

  3. बजट में शहरी बाढ़ मैनेजमेंट के लिए भी वित्‍तीय प्रतिबद्धता को बढ़ाए जाने की उम्मीद है। CEEW के आकलन के मुताबिक  बारिश की तीव्रता अक्सर 12-20 mm प्रति घंटे के लोकल ड्रेनेज डिज़ाइन क्राइटेरिया को पार कर जाती है, जिसे ज्‍़यादातर शहरों में मौजू़द ड्रेनेज सिस्‍टम ठीक से हैंडल नहीं कर पाता, जिससे जल भराव या बाढ़ की स्थिति बनती है। इसलिए शहरी बाढ़ के बढ़ते जोखिम से निपटने के लिए आगामी बजट में राष्ट्रीय अनुकूलन रणनीति के हिस्से के रूप में और शहरों को शामिल किए जाने की संभावना है।

शहरी इलाकों में वाटर सप्‍लाई नेटवर्क में सुधार के साथ ही साफ़ पानी की आपूर्ति के भी ठोस इंतज़ाम किए जाने चाहिए।

नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फार्मिंग के दूसरे चरण को अपनी महत्वाकांक्षाओं को बढ़ाना चाहिए। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि CEEW की रिसर्च इस बात पर जोर देती है कि नेचुरल फार्मिंग को बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए किसान संस्थानों को मजबूत करना और एक्सटेंशन सर्विस के लिए क्षमताएं बनाना जरूरी है। 2026 को महिला किसानों के अंतर्राष्ट्रीय वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है, इसलिए आने वाला बजट महिलाओं को नेचुरल फार्मिंग को आगे बढ़ाने में बदलाव के मुख्य एजेंट के रूप में पहचानने और उनका समर्थन करने का एक मौका है। महिला-नेतृत्व वाले संस्थानों और उद्यमों की लक्षित क्षमता निर्माण में निवेश करने से नेचुरल फार्मिंग को अपनाने में काफी तेजी आती है।
अपूर्व खंडेलवाल, फेलो, CEEW

क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क साउथ एशिया (CANSA) के सीनियर एडवाइजर, कम्युनिकेशंस एंड एडवोकेसी, शैलेंद्र यशवंत ने IWP बात करते हुए कहा  “केंद्रीय बजट 2026 से पहले, हमें यह समझना होगा कि एक हालिया UN रिपोर्ट के अनुसार दुनिया आधिकारिक तौर पर ‘ग्लोबल वॉटर बैंकरप्सी’ के दौर में प्रवेश कर चुकी है। ऐसे में उम्मीद है कि केंद्रीय बजट में जल सुरक्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकता माने जाने के स्‍पष्‍ट संकेत मिलेंगे। इसमें वॉटरशेड, भूजल रिचार्ज और पानी की कमी वाले क्षेत्रों में जलवायु-अनुकूल सिंचाई के लिए ज़्यादा रकम दी जाएगी। इसके साथ ही जल जीवन-मिशन में किया जाने वाला निवेश सिर्फ़ नल कनेक्शन तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसमें जल स्रोतों के संरक्षण और रखरखाव जैसी चीजें भी शामिल होंगी। बजट खेती में पानी की बचत, शहरी गंदे पानी के दोबारा इस्तेमाल और प्रकृति-आधारित समाधानों को भी बढ़ावा देगा। नीतिगत स्‍तर पर में पानी को सिर्फ़ सुविधा या इंफ्रास्ट्रक्चर के तौर पर नहीं, बल्कि एक साझा पारिस्थितिक संसाधन के तौर पर देखा जाना बहुत ज़रूरी है।

निष्‍कर्ष : तय होगी पानी के भविष्‍य की राह

पिछले बजट ने यह साफ कर दिया कि सरकार पानी को सोशल सेक्‍टर की प्राथमिकता मानती है, लेकिन इसका ज्‍़यादातर फोकस अब भी पेयजल आपूर्ति तक सीमित हैं। बजट 2026 इस मायने में निर्णायक हो सकता है कि नीति-निर्माता पानी को एक सीमित प्राकृतिक संसाधन के रूप में देखते हुए उसके मुताबिक नीतियां बनाने और कदम उठाने को कितने तैयार हैं। आगामी बजट में वाटर सेक्‍टर के लिए किया जाने वाले एलोकेशन का झुकाव अगर संरक्षण, स्थिरता और इकोलॉजिकल अप्रोच की ओर नहीं बदला, तो आने वाले वर्षों में जल संकट और गहराने और दूषित जल के प्रकोप से बीमारियों और मौतों की घटनाएं होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

SCROLL FOR NEXT