छत्तीसगढ़ में औद्योगिक कारखानों के कचरे और रासायनिक प्रदूषण से ज़हरीला हो रहा है नदियों और जलस्रोतों का पानी।
स्रोत: विकी कॉमंस
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने प्रमुख नदियों में प्रदूषण के खतरनाक स्तर को लेकर राज्य अधिकारियों की कड़ी आलोचना की है। कोर्ट ने राज्य सरकार और प्रदूषण नियंत्रण अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे उल्लंघन करने वाली इकाइयों के खिलाफ की गई कार्रवाई का विस्तृत हलफनामा प्रस्तुत करें। न्यायालय ने इसे एक ‘प्रणालीगत विफलता’ करार दिया और स्थिति को ‘परेशान करने वाली तथा प्रतिगामी’ बताया है।
उच्च न्यायालय ने यह सख्त टिप्पणी राज्य की नदियों में अनुपचारित औद्योगिक अपशिष्ट, काले पानी और बड़े पैमाने पर मछलियों की मौत को उजागर करने वाली रिपोर्टों के मुताबिक इस मामले में दायर की गई जनहित याचिका (PIL) और समाचार पत्रों में प्रकाशित रिपोर्टों का स्वयं संज्ञान (Suo Moto) लेते हुए सुनवाई के दौरान की है।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने कहा कि कोर्ट के पिछले निर्देशों के बावजूद जमीनी स्तर पर कोई सुधार नहीं दिख रहा है, जो बेहद 'परेशान करने वाला और प्रतिगामी' है। पहले भी बार-बार निर्देश जारी किए जाने के बावजूद स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ है। अदालत ने कहा कि वर्तमान स्थिति पर्यावरण सुरक्षा उपायों का स्पष्ट उल्लंघन और महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा में सरकारी तंत्र की विफलता को दर्शाती है।
अदालत ने गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि नदियां, जो कभी आसपास के समुदायों के लिए जीवन रेखा थीं, अब औद्योगिक कचरे को ढोने का माध्यम बन गई हैं। साथ ही अदालत ने राज्य सरकार और प्रदूषण नियंत्रण अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे उल्लंघन करने वाली इकाइयों के खिलाफ की गई कार्रवाई का विस्तृत हलफनामा प्रस्तुत करें। हाईकोर्ट के इस सख्त रुख और आदेश के बाद नदियों के प्रदूषण का मुद्दा उठाने वाले राज्य के पर्यावरण प्रेमियों में एक उम्मीद जगी है कि यह मामला राज्य में जवाबदेही तय करने और पर्यावरण नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
नदियां अत्यधिक प्रदूषित : खबरों के अनुसार, औद्योगिक अपशिष्टों, सीवेज और ठोस अपशिष्ट के अनियंत्रित बहाव के कारण खारुन, शिवनाथ तथा अरपा जैसी नदियां अत्यधिक प्रदूषित हो गई हैं।
जीवन के मौलिक अधिकार का उल्लंघन : नदियों का गिरता स्तर भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत 'जीवन के अधिकार' को प्रभावित करता है, जिसमें स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण का अधिकार भी शामिल है।
‘शासन प्रणाली’ की बड़ी विफलता : न्यायालय ने माना कि यह प्रदूषण नियामक निकायों और प्रवर्तन तंत्र की विफलता को दर्शाता है।
निकायों में समन्वय की कमी : शहरी स्थानीय निकायों और प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों जैसे विभागों के बीच खराब तालमेल।
मानकों की अनदेखी : उद्योगों और नगर पालिकाओं द्वारा पर्यावरणीय मानकों का पालन करने में विफलता।
कानून मौजूद, क्रियान्वयन ढीला : जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 जल प्रदूषण के निवारण और नियंत्रण तथा जल की गुणवत्ता बनाए रखने का प्रावधान करता है।
निगरानी में लापरवाही : केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड पानी की गुणवत्ता की निगरानी करते हैं तथा नियमों को लागू करते हैं। पर, यह काम ठीक से नहीं हो रहा है।
NGT के आदेशों का पालन नहीं : राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) पर्यावरणीय विवादों का न्यायनिर्णयन करता है और पर्यावरण कानूनों का प्रवर्तन सुनिश्चित करता है। पर, अतीत में NGT द्वारा दिए गए आदेशों का राज्य में सही ढंग से पालन नहीं किया गया है।
कोर्ट ने समाचार रिपोर्टों का हवाला देते हुए बताया कि शिवनाथ नदी का पानी, जो कभी साफ और नीला दिखाई देता था, औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले अनुपचारित स्पिरिट और रसायनों के कारण पूरी तरह काला पड़ गया है। बिलासपुर के पास स्थित एक डिस्टिलरी से निकलने वाले प्रदूषित पानी के कारण बड़ी संख्या में मछलियों की मौत हो रही है। इसी तरह, रायपुर की जीवन रेखा मानी जाने वाली खारून नदी के किनारे स्थित शराब फैक्ट्रियों ने अवैध खनन से बने गड्ढों को जहरीले जलाशयों में तब्दील कर दिया है। स्थिति इतनी विकराल है कि अब जानवर भी इस पानी को पीने से कतरा रहे हैं।
प्रदूषण के मामले में राज्य में शिवनाथ नदी और खारुन नदी में संकट विशेष रूप से गंभीर है। इन दोनों ही नदियों में भारी मात्रा में जहरीला औद्योगिक कचरा बहाया जा रहा है। शिवनाथ नदी में, पास के कारखानों से निकलने वाले अनुपचारित अपशिष्टों के कारण पानी काला हो गया है और मछलियां मर रही हैं। नदियों के आसपास के इलाकों में रहने वाले लोगों ने भी पानी से त्वचा में जलन होने और प्रदूषण के कारण सांस संबंधी समस्याओं की शिकायत की है। अदालत ने खारुन नदी के किनारे की चिंताजनक स्थिति पर भी प्रकाश डाला है, जहां एक शराब कारखाने का कचरा खनन गड्ढों में जमा हो गया है। यह प्रदूषित पानी धीरे-धीरे नदी में रिस रहा है, जिससे नदी के पानी की गुणवत्ता और खराब हो रही है। इसके चलते नदी भयंकर रूप से प्रदूषित होकर एक नाले में बदल गई है। स्थिति यह है कि जानवर भी प्रदूषण के कारण इसके पानी से दूर रहते हैं।
सुनवाई के दौरान एक बेहद गंभीर पहलू पर टिप्पणी करते हुए कहा कि फैक्ट्रियों के आसपास रहने वाले ग्रामीण खुजली और सांस संबंधी बीमारियों से जूझ रहे हैं, लेकिन वे विरोध करने की स्थिति में नहीं हैं। कई जगहों पर ग्रामीणों को चुप रखने के लिए उन्हें फैक्ट्री में रोजगार दिया गया है और कथित तौर पर प्रतिदिन शराब बांटी जा रही है। अधिकारियों की निष्क्रियता के कारण ग्रामीणों ने अपनी नियति स्वीकार कर ली है, जिससे पर्यावरण को अपूरणीय क्षति हो रही है। हाई कोर्ट ने राज्य की प्रवर्तन एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए इसे 'सिस्टम की विफलता' करार दिया है। कोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है कि पूर्व में दिए गए निर्देशों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया है। अदालत ने तत्काल और कठोर सुधारात्मक उपायों की आवश्यकता पर बल दिया है।
बिलासपुर की अरपा नदी में बढ़ते प्रदूषण पर भी पिछले साल सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने नगर निगम के रवैये पर नारज़गी जताई थी। रिपोर्ट के मुताबिक जनहित याचिका साल 2019 से चल रहे इस मामले में 14 जनवरी 2025 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रमेश कुमार सिन्हा और न्यायाधीश रविंद्र कुमार अग्रवाल की बेंच ने नगर निगम को सख्त निर्देश दिए थे। इस मामले में कोर्ट में बताया गया था कि शहर के करीब 70 नालों का गंदा पानी बिना साफ किए सीधे अरपा नदी में बहाया जा रहा है, जिससे नदी और ज़मीन का जल बुरी तरह प्रदूषित हो रहा है। नगर निगम ने कोर्ट को जानकारी दी कि दिसंबर 2024 में सभी जरूरी कागजात जमा कर दिए गए हैं। निगम का दावा था कि मार्च 2025 तक 60% गंदे पानी को साफ करने का लक्ष्य था। बाकी 40% पानी के लिए पुणे की एक कंपनी से योजना मांगी गई थी, लेकिन मंजूरी नहीं मिली। इस तरह नगर निगम ने फंड की कमी को नदी की सफाई के काम में रुकावट बताया था। दूसरी ओर, याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि केंद्र सरकार की योजनाओं के तहत फंड की कोई कमी नहीं है। इसके बावजूद नगर निगम सही कदम नहीं उठा रहा है। उन्होंने काम में देरी और लापरवाही का आरोप लगाया। कोर्ट ने इस मामले में नाराजगी जताते हुए कहा था कि इतने सालों से मामला चल रहा है, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। नदी में गंदा पानी गिरने से पर्यावरण और लोगों की सेहत पर बुरा असर पड़ रहा है।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 22 जुलाई 2025 को एक मामले की सुनवाई करते हुए प्रदेश की नदियों के सूखते उद्गम स्थलों को लेकर सख्त रुख अपनाया था। नदियों के संरक्षण और संवर्धन के लिए दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि नदियों के उद्गम स्थलों की खोज और उनके सूखने के कारणों का पता लगाने के लिए एक विशेष कमेटी का गठन किया जाए। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि सभी नदियों और उनके उद्गम स्थलों को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज किया जाए, क्योंकि वर्तमान में ये कई जगह नाले के रूप में दर्ज हैं। हालांकि, नदियों के हाईटेक सर्वे के लिए 2.60 करोड़ रुपये के प्रस्ताव को कोर्ट ने खारिज कर दिया। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने अरपा नदी सहित अन्य नदियों के संरक्षण की मांग उठाई। राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि अरपा नदी में सालभर पानी उपलब्ध कराने और प्रदेश की 9 प्रमुख नदियों के पुनर्जनन की योजना पर काम चल रहा है। सरकार ने अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की। याचिकाकर्ताओं ने 2018 में गठित भागवत कमेटी का जिक्र किया, जो नदियों के संरक्षण के लिए बनाई गई थी। हाईकोर्ट ने जोर देकर कहा कि नदियों के उद्गम स्थल सूखने के कारणों की जांच और उनके संरक्षण के लिए तत्काल कदम उठाए जाएं। सरकार ने कमेटी गठन के लिए सहमति जताई।
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