सूखा के लिए भेद्यता (vulneraility) समय व स्थान के अनुसार परिवर्तित होती रहती है और यह बहुत से कारकों पर निर्भर करती है जैसे कि भौगोलिक, मौसम संबंधी, जलविज्ञानीय, सामाजिक और अन्य कारक, भौगोलिक कारक बेसिन की स्थिर भौतिक विशेषताएं होती हैं जैसे की स्थलाकृति, ढलान, भूमि उपयोग, मिट्टी का प्रकार, मिट्टी की गहराई, नदी की पहुंच के निकटता, उन्नयन क्षेत्र और जनसंख्या घनत्व। मौसम संबंधी और जल विज्ञान कारक क्रमशः मिट्टी की नमी की कमी से और मासिक वर्षा विचलन के अनुरूप औसत से सम्बंधित होते हैं। विभिन्न कारकों की स्थानिक जानकारी को विभिन्न उप- श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है और नक्शों को । ArcGIS द्वारा तैयार किया गया है। विभिन्न कारकों के विभिन्न उप-वर्गों को एकीकृत करने के लिए एक अंतर-प्रभावी (inter-weighting) योजना का उपयोग किया गया है। प्रस्तावित कार्यप्रणाली (methodology) को मध्य भारत में स्थित बुंदेलखंड क्षेत्र में केन नदी बेसिन में लागू किया गया हैं। Soil and water assessment tool (SWAT) निदर्श के अनुप्रयोग से जलविज्ञानीय समरूप क्षेत्रों जिनको कि hydrologic response यूनिट्स; HRUs भी कहते हैं को भूमि उपयोग, ढलान और मिट्टी के प्रकार, और अध्ययन बेसिन में मिट्टी की नमी के स्थानिक और सामयिक (Temporal) बदलाव का अनुमान लगाने के आधार पर निर्धारित किया जाता है। SoilMoisture deficit index (SMDI) की गणना SWAT से प्राप्त मिट्टी की नमी के आकलन से की गई है। एक Integrated Drought Vulnerability Index (IDVI) सम्बंधित HRU द्वारा विभिन्न कारकों के प्रभावी मानों (weight value) के योग को कारकों के अधिकतम प्रभावी मानों के योग से विभाजित कर प्राप्त किया जाता है। IDVI के उच्च मान के साथ HRU सूखा और इसके विपरीत के लिए उच्च स्तर की संवेदनशीलता वाले क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करता है। इस प्रकार प्राप्त किए गए नक्शे दस्तावेज की जानकारी और क्षेत्रीय सर्वेक्षणों का उपयोग कर प्रमाणित किए गए थे। इस तरह तैयार किए गए नक्शे में सूखे के लिए विभिन्न स्टारों की vulnerability के लिए प्रभावी क्षेत्रों का बहुत अच्छा सीमांकन किया गया है। अध्ययन बेसिन में भौतिक प्रेक्षणों के माध्यम से संवेदनशील क्षेत्रों का सत्यापन किया गया। प्रस्तुत प्रपत्र में दी गई कार्य प्रणाली ने मात्रात्मक मूल्यांकन और सूखे के लिए vulnerability वाले क्षेत्रों के सीमांकन के लिए एक उपयोगी और विश्वसनीय साधन को प्रस्तुत किया है। प्रस्तावित पद्धति का उपयोग सक्रियता के साथ-साथ वास्तविक समय निर्धारण, जांच और सूखे से निपटने के लिए प्रतिक्रिया कार्रवाई के नियोजन के लिए किया जा सकता है।
Keywords: Integrated Drought Vulnerability Index(IDVI), SWAT मॉडल, मृदा नमी कमी सूचकांक (SMDI),वर्षा विचलन, केन बेसिन।
This paper presents a methodology devised for integrated assessment of vulnerability to drought in spatial and temporal scales using physiographic, meteorological, hydrologic, social and other factors. The physiographic factors are static physical features of basin including topography, slope, land use, soil type, soil depth, proximity to river reach, elevation zones and population density. The meteorological and hydrological factors are monthly rainfall departures from corresponding mean and soil moisture deficit, respectively. The spatial information of multiple factors has been categorized in various sub-classes and maps have been prepared using ArcGIS. A differential weighting scheme has been used to integrate different sub-classes of various factors for assessment of vulnerability to drought. The methodology has been applied in the Ken River Basin in Bundelkhand region located in central India. The Soil and Water Assessment Tool (SWAT) model has been applied to demarcate hydrologically homogeneous areas called Hydrologic Response Units (HRUs) in respect of land use, slope and soil type, and for the estimation of spatial and temporal distribution of soil moisture in the study basin. The Soil Moisture Deficit Index (SMDI) has been computed from the soil moisture estimates obtained using SWAT model,. An Integrated Drought Vulnerability Index (IDVI) has been defined as the sum of weights of various factors scored by corresponding HRU (Hydrologic Response Unit) divided by the sum of the maximum weight value of the factors. The HRUs with higher value of IDVI represents the areas with high degree of vulnerability to drought and vice versa. The maps thus obtained were validated using the documented information and field surveys. The prepared map showed very good agreement with the physical field observations made in the study basin. The methodology presented in this paper puts forward a useful and reliable tool for quantitative assessment and demarcation of zones with different degree of vulnerability to drought in time and space. The proposed methodology can be used for proactive as well as near real time assessment, monitoring and planning of response actions to cope with drought.
Keywords: Drought Vulnerability Index, SWAT Model, Soil Moisture Deficit Index, Rainfall Departure, Ken Basin in India
पानी की औसत सापेक्ष कमी व उपलब्धता के आधार पर सूखे को परिभाषित किया जाता है, वो समय की निश्चित अवधि के लिए या तो वर्षा के रूप में, नदीय प्रवाह, जलाशय भंडार, भू-जल उपलब्धता और या मृदा नमी के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। इस प्रकार सूखा एक अस्थायी जलवायु संबंधी प्रक्रिया है जिसका सन्दर्भ सापेक्ष रूप में स्वाभाविक/औसत रूप से किसी भी समय व स्थान पर उपलब्ध जल की मात्रा की तुलना में होने वाली जल की कमी पर दिया जाता है। सूखे के दुष्प्रभाव मुख्य रूप से कृषि, जल की उपलब्धता और क्षेत्र की सामजिक व आर्थिक गतिविधियों पर पड़ते हैं तथा विभिन्न क्षेत्रीय जलवायु संबंधी भौतिकीय और सामाजिक-आर्थिक कारकों पर निर्भर करते हैं (एल्कामो व अन्य, 2008 पाण्डे व रामाशास्त्री, 2002 पाण्डे व अन्य 2010 विनीत अन्य 2015)।
प्रस्तुत प्रचलित साहित्य में प्रायः यह कहा गया है कि सूखा एक जटिल प्रक्रिया/घटना (phenomenon) है, सूखे की एक सटीक और सर्वव्यापी स्वीकृत परिभाषा देना अत्यंत कठिन है क्योंकि सूखे की सुद्येता को किसी क्षेत्र में होने वाली पानी की कमी के सन्दर्भ में देखा जाता है।
सूखे से निपटने की क्षमता बहुत से कारकों पर निर्भर करती है जिसमें कि भौगोलिक विशेषताएं, जलवायु संबंधी, पर्यावरणीय और सामजिक-आर्थिक मुख्य हैं।
शब्दों की परिभाषा | ||
सूखा | शुष्कता | पानी की कमी |
सूखे को अपनी औसत या सामान्य पानी की उपलब्धता की तुलना में किसी दिए गए क्षेत्र मेंएक सापेक्ष रूप में जल की कमी से परिभाषित किया गया है, यह कमी कुछ समय के लिए या तो वर्षा, नदीय प्रवाह, सतही/भूजल भण्डारण में कमी अथवा इनमें से कुछ के संयुक्त कारण से हो सकती है। (अतः सूखा एक अस्थायी phenomenon है) | किसी क्षेत्र में सामान्यतः लगातार पानी की आपूर्ति कम बनी रहे तो उत्पन्न परिस्थिति को आद्र्रता/शुष्कता कहते हैंै। यह किसी क्षेत्र की एक जलवायु विशेषता है। यह लगभग स्थाई रूप से शुष्क रहने वाले क्षेत्रों पर लागू होता है जैसे शुष्क क्षेत्र और रेगिस्तान, जहाँ पानी हमेशा कम आपूर्ति में होता है।(अतः शुष्कता/आद्र्रता किसी क्षेत्र विशेष का एक स्थायी फीचर है।) | दीर्घकालिक असतत पानी के संसाधनों के उपयोग को पानी की कमी कह सकते हैं। जिससे की पानी के प्रबंधक प्रभावितहो सकते हैं। और दूसरे शब्दों में इसका तात्पर्य जल संसाधनों के अधिक से अधिक दोहन से है जिस अवस्था में पानी की मांग इसकी उपलब्धता से अधिक है। (अतः जल की कमी मानव जनित है) |
सूखे की सुभेद्यता समय व स्थान के साथ-साथ परिवर्तित होती रहती है। जिन क्षेत्रों में अनावरण का स्तर उच्च होता है और सहन करने की क्षमताएं कम होती हैं, उन्हें सूखे की किसी घटना का खतरा अधिक होगा यह घटना इसके विपरीत भी घटित हो सकती है। सूखे की अनावृत्ति की डिग्री या पानी की कमी जलवायु, जलविज्ञानीय, पर्यावरणीय, सामजिक-आर्थिक क्रियाकलाप पर निर्भर करते हैं और भौतिकीय गुणधर्म जैसे की स्थलाकृति, भू-उपयोग, मृदा के प्रकार, मृदा की गहराई, सतही जल भण्डारण एवं इलाके में जल की मांग पर भी निर्भर करते हैं (विल्हेल्मी व अन्य 2002 हमौदा, 2009)। इस प्रकार सूखे की सुभेद्यता विभिन्न कारकों पर निर्भर करती है जैसे कि स्थलाकृतिक विशेषताएं, मृदा, भू-उपयोग, जल संसाधन विकास, स्वस्थानी जल संरक्षण, भूजल का उपयोग और घरेलू , औद्योगिक, व कृषि कार्यों के लिए स्थानीय जल की मांग (पाण्डे व अन्य, 2010 जैन व अन्य, 2015) अतः सूखे के प्रति सुभेद्यता में समय व स्थान कि विमाएं (dimension) होती हैं (डाउनिंग व बेक्केर 2000 विल्हित 2000)। सूखे के प्रति सामजिक सुभेद्यता काफी जटिल है और यह समाज के पूर्वानुमान, सहने व प्रतिक्रिया करने की क्षमता में दिखाई देता है (सकिरिस व पेंगालोऊ, 2009 इग्लेसिअस व अन्य 2009 बी)। सूखे के प्रबंधकों के अनुभवों और उभरते हुए सबक से विकास और कार्यान्वयन को दृष्टिगत रखते हुए, इग्लेसिअस व अन्य (2009) ने इस बात पर जोर दिया कि सूखे व पानी की कमी से निपटने के लिए भिन्न-भिन्न स्तरों कि सुभेद्यता को जोखिम आधारित दृष्टिकोण पर अपनाना चाहिए। इसके अतिरिक्त इग्लेसिअस व अन्य (2009 b) ने सूखे की सामजिक सुभेद्यता को आकलन करने की विधि को प्रस्तावित किया जिसमे प्राकृतिक संसाधनों के ढांचे, आर्थिक क्षमता, मानव और नागरिक संसाधन और कृषि नवीनता आदि के पहलुओं का उपयोग किया गया। उन्होंने उपरोक्त कारकों का उचित रूप से महत्व निकला और सुभेद्यता इंडेक्स की गणना की। हाल ही में दुनिया भर मे पड़े भयंकर सूखे की वजह से इससे होने वाले हानिकारक दुष्प्रभावों के प्रति जागरूकता बढ़ी है और साथ-साथ पहले से ही उचित न्यूनीकरण के उपायों द्वारा इन प्रभावों से निपटने के प्रति लोग सतर्क हो गए हैं (रोस्सी व अन्य, 2007)। सूखे की सुभेद्यता के उत्पत्ति की प्रेरणा की धारणा मूल रूप से भू-जल प्रदूषण के निर्धारण में प्रयुक्तविधि ‘DRASTIC’ से ली गई थी (अल्लेर व अन्य, 1987) इसके अलावा ईस्टमैन व अन्य (1997) के खाद्य सुरक्षा मापन और थिरुवेनागादाचारी और गोपाल कृष्ण (1993) के सूखा मापन की भी सहायता ली गई। USA के नेब्रस्क्स राज्य के लिए विल्हेल्म और विल्हिते (2002) और विल्हेल्मी व अन्य (2002) ने स्थानिक क्षेत्र में जैवभौतिक और सामाजिक कारकों को इस्तेमाल करते हुए सूखे की सुभेद्यता को वर्णित किया है। पांडे व अन्य (2010) ने एक विधि को प्रस्तावित किया जिसमें सूखे की सुभेद्यता के निर्धारण के लिए सभी भौतिकीय, मौसम विज्ञानीय व दूसरे कारकों के लिए एक समान मानों की योजना को प्रयोग किया है। इग्लेसिअस और अन्य (2009 b) ने भिन्न भिन्न सुभेध्यताओं पर सूखे के प्रभावोंसे निबटने के लिए जोखिम-आधारित सूखा प्रबंधन योजनाओं को विकसित करने के दिशा निर्देशों को प्रस्तुत किया।
इस अध्ययन का उद्देश्य एक नई विधि को प्रस्तुत करना है जिसमे एक डिफरेंशियल weighing योजना द्वारा बहुत से मौसम विज्ञानीय, प्राकृतिक भूगोल-संबंधी, जलविज्ञानीय, सामजिक आर्थिक और अन्य दूसरे कारकों को एकीकृत कर सूखे की सुभेद्यता का निर्धारण किया जा सके। यह विश्वास किया जाता है कि सूखे की सुभेद्यता को निर्धारण करने की वास्तविक विधि, जो की GIS के प्रयोग से बहुत से सामयिक व स्थानिक कारकों को आत्मसात कर लेती है, निर्णय कर्ताओं को खतरों की कल्पना करने में बहुत सहायता प्रदान कर सकती है और वे हितधारकों, प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधकों, कृषि उत्पादकों आदि को सुभेद्यता की संकल्पना को अग्रसारित कर सकते हैं।
केन नदी बेसिन मध्य भारत के 2307’ और 25054* तथा 78030 एवं 80040* के बीच प्रवाहित होती है। केन नदी समुद्र के औसत स्तर से 550.0 मी की ऊंचाई से प्रस्फुटित होती है और कुल 28,692 m2 बेसिन क्षेत्रफल को ड्रेन करती है उसके बाद यह समुद्र के औसत स्तर से 87.0 मी की ऊंचाई पर यमुना नदी में समाहित हो जाती है। बेसिन के मैदानी समतल क्षेत्रों की औसत ऊंचाई समुद्र के औसत स्तर से 328.0 मी है। चित्र सं0 1 में केन बेसिन की स्थिति को नक्शे पर दर्शाया गया है। अध्ययन बेसिन भारतवर्ष के अर्द्ध शुष्क व शुष्क उप आर्द्र जलवायु क्षेत्र में आता है जहाँ पर एक वर्षा का सीजन होता है (जून-सितम्बर) और उसके बाद शुष्क शीत के बाद बहुत शुष्क गर्मियां आती हैं। केन बेसिन में औसत वार्षिक वर्षा इसके उद्गम स्थल पर 1250mm से लेकर इसके संगम स्थल पर 800mm तक बदलती रहती है और बेसिन के स्तर पर इसका औसत मान 1165mm है (पांडे व अन्य, 2008)। बेसिन को वर्षा का लगभग 90% दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान (जून-सितम्बर) प्राप्त होता है। नदी बेसिन के ऊपरी हिस्से अधिकतर पहाड़ी हैं और घने जंगलों से आच्छादित हैं लहरदार स्थलाकृति लिए हुए हैं। मृदा मिश्रित लाल और काली से मध्यम काली की ओर परिवर्तनशील है। बेसिन के सबसे उत्तरी भाग में कहीं-कहीं रेतीले लोम मृदा के टुकड़े भी पाए जाते हैं।
सूखे से सबसे पहले कृषि क्षेत्र प्रभावित होता है क्योंकि यह मृदा नमी पर निर्भर है और यह बढ़ते हुए सूखे के साथ-साथ बहुत तेजी से खत्म होती है (नरसिम्हन व श्रीनिवासन, 2005)। वर्षा में कमी के साथ-साथ मृदा नमी में कमी व धारा प्रवाह में होती कमी सूखे की घटना के आरम्भ होने और उसकी गंभीरता का निर्धारण करते हैं। मृदा नमी व धारा प्रवाह मुख्य रूप में अनेक भौतिकीय कारकों पर निर्भर करते हैं जैसे की मृदा का प्रकार, भू-उपयोग, स्थलाकृति, ढाल, बेसिन की भौगोलिक स्थिति और मौसम। मृदा प्रकार, भू उपयोग एवं भू आवरण के स्थानिक वितरण किसी क्षेत्र की अंतःस्पंदन की दर, पारगम्यता, मृदा की नमी अवशोषित करने की क्षमता व वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करते हैं (लिऊ व अन्य 2008: रोज व पीटर्स 2001: ग्रेगोरी व अन्य 2006: प्राइस व अन्य 2010)। वर्षा व ET में होने वाली स्थानिक परिवर्तनीयता के कारण आने वाले परिणाम स्थलाकृतिक विशेषताओं जैसे कि जलसंग्रहण क्षेत्रो के परस्पर स्वरुप और ऊंचाई से भिन्न होते हैं। इसके अतिरिक्त किसी क्षेत्र की स्थलाकृति, भू उपयोग और भू-आकृति जल धारा प्रवाहों को प्रभावित करती है (विवोनी व अन्य 2008: तेत्ज्लाफ व अन्य 2009: प्राइस व अन्य 2011)। अतः उपरोक्त वर्णित भौगोलिक कारक बेसिन में समय व स्थान में सूखे के काल में जल की उपलब्धता और जल की कमी से प्रभावित होते हैं। मृदा नमी और धारा प्रवाह के मापित मान प्रायरू वांछित स्थानों पर उपलब्ध नहीं होते हैं। इसीलिए मृदा नमी के निर्धारण के लिए एक वितरित जलविज्ञानीय निदर्श को प्राथमिकता दी जाती है। इसके अलावा एक ही प्रकार के भू-उपयोग, मृदा प्रकार एवं ढलवापन वाले ढाल के क्षेत्र जलविज्ञानीय प्रतिक्रिया में समान व्यवहारकरते हैं (अर्नाल्ड व अन्य 1998)। SWAT निदर्श (नेइत्स्च व अन्य, 2005) में यह क्षमता है की बेसिन क्षेत्र, जो कि भू उपयोग, मृदा प्रकार और ढाल में समरूप हो, को HRUs में discretize कर सके तथा HRU स्तर पर मृदा नमी, वाष्पोत्सर्जन, व सतही प्रवाह के, आकलन उपलब्ध करा सकें।
उपरोक्त को दृष्टिगत रखते हुए भारतवर्ष के मध्य प्रदेश में केन नदी बेसिन में समय व स्थान के अनुसार सूखे की भेद्यता के आकलन के अध्ययन को लिया गया है।
भारत मौसम विज्ञान विभाग द्वारा उस क्षेत्र या स्थान को सूखाग्रस्त माना जाता है जहाँ वर्षा नार्मल वर्षा के 75 प्रतिशत या उससे कम होती है (अप्पा राव, 1986)। इस अनुसार प्रस्तुत अध्ययन में कोई वर्ष या मानसून सीजन (जून-सितम्बर) सूखा वर्ष या सूखा सीजन तब कहलाते हैं जब कि उस क्षेत्र के ऊपर होने वाली वर्षा सम्बंधित औसत मानों में 25 प्रतिशत या ज्यादा की कमी होती है । इस अध्ययन में 12 वर्षा मापन स्थलों के 110 वर्षों (1901-2011) के आंकड़ों का उपयोग किया गया है जिसमें वर्ष 2003 के आंकड़े अनुपलब्ध हैं। इस अध्ययन के द्वारा अध्ययन बेसिन के जलवायु गुणधर्म सम्बंधित सूखे के अध्ययन को मासिक, सीजन और वार्षिक समय स्केल पर किया गया है। किसी बेसिन में जलवायु सूखे को अवधि (वर्षा में कमी के काल को), गंभीरता (वर्षा में कमी के परिमाण को) एवं बारम्बारता (सूखे को बार-बार होने को) के आधार पर निर्धारित किया जाता है।
समीकरण 1 द्वारा केन बेसिन के विभिन्न स्टेशनों के सम्पूर्ण डाटा पीरियड के लिए सम्बंधित औसत मान के सन्दर्भ में वर्षा के वार्षिक व सीजनल departure मानों की गणना की गई और यह चिन्हित किया गया कि वर्ष या सीजन एक नम वर्ष है, सामान्य वर्ष है या सूखा ग्रसित वर्ष है। इनको निर्धारित करने की विधि तालिका 1 में प्रदर्शित की गई है।
यह समझा जाता है कि भौगोलिक स्थान, जलसंग्रहण क्षेत्र कि भौतिक गुण धर्म, सतही व भू-जल उपलब्धता, वर्षा की परिवर्तन शीलता, स्थानीय जलवायु कारक और सामाजिक-आर्थिक कारक ही सूखे के समय जल की कमी व फसल के नुकसान के लिए उत्तरदायी हैं (जनपद सांख्यकी हस्तपुस्तिका 1993 व 2007, पांडे व अन्य, 2010 और जैन व अन्य, 2015)। इस अध्ययन में केन बेसिन में 2006 से 2010 के मध्य सूखे के आने और क्रमिक प्रगति, सूखे की गंभीरता की मात्रा परिमाणन और बुआई क्षेत्र के विस्तार पर सूखे के प्रभाव और उपज की पैदावार के व्यापक क्षेत्र अनुसंधान किए गए थे। किस्मत से वर्ष 2006-2007 में अध्ययन बेसिन में सूखा पड़ा (पांडे व अन्य, 2010)। संभवतया कृषि क्षेत्र सबसे पहले सूखे से प्रभावित होता है क्योंकि यह मृदा की नमी पर निर्भर है और यह नमी, सूखे के समय में, तीव्र गति से सबसे पहले समाप्त होने लगती है (नरसिम्हन एवं श्रीनिवासन, 2005)। वर्षा में कमी के अलावा, मृदा नमी में आती हुई कमी और धारा प्रवाह में आने वाली कमी ऐसे कारण हैं जो की सूखे के आने को और इसकी गंभीरता को निर्धारित करता है। मृदा नमी और धारा प्रवाह वृहद रूप से बहुत से प्राकृतिक भूगोल-संबंधी कारकों पर निर्भर करते हैं जैसे कि मृदा के प्रकार, भूमि उपयोग, स्थलाकृति, ढाल, भौगोलिक स्थान और मौसम। मृदा के प्रकार का स्थानिक वितरण,भू-उपयोग एवं भूमि आवरण किसी क्षेत्र के अंतःस्पंदन, पारगम्यता, मृदा के नमी को पकड़ कर रखने की क्षमता और वाष्पन-वाष्पोत्सर्जन को प्रभावित करते हैं (लिऊ व अन्य, 2008 रोज व पीटर्स, 2001 ग्रेगोरी व अन्य, 2006 प्राइस व अन्य 2010)।वर्षा और वाष्पन-वाष्पोत्सर्जन में होने वाली स्थानिक परिवर्तनशीलता के परिणाम स्वरुप स्थलाकृतिक भिन्नताएं हो सकती हैं जैसे कि जलसंग्रहण क्षेत्र की आकृति और ऊंचाई। इसके अतिरिक्त किसी क्षेत्र की स्थलाकृति, भू उपयोग व भू-आकृति वहां के धारा प्रवाह को प्रभावित करते हैं (विवोनी व अन्य, 2008 तेत्ज्लाफ्फ व अन्य, 2009 प्राइस व अन्य 2011)। इस प्रकार उपरोक्त वर्णित प्राकृतिक भूगोल-संबंधी कारक जल की उपलब्धता वजल की कमी के स्तर को बेसिन में सूखे के दौरान समय और स्थान के अनुसार प्रभावित करते हैं। मृदा नमी और धारा प्रवाह के मापित मान बेसिन में वांछित स्थलों पर प्रायः उपलब्ध नहीं हैं। अतः मृदा नमी के निर्धारण के लिए बेसिन में एक distributed model को प्राथमिकता दी जाती है। साथ साथ समरूप भू-उपयोग, मृदा प्रकार और ढाल की तीव्रता वाले क्षेत्र जो की एक समान जलविज्ञानीय व्यवहार वाले हों पर विचार किया जाता है (अर्नोल्ड व अन्य, 1998)। Soil and water assesment tool ¼SWAT½ व अन्य, 2005) बेसिन एरिया को Hydrological response units (HRUs ) में discretize करने में समर्थ है जो कि समान भू उपयोग, मृदा प्रकार और ढाल वाले हों तथा HRU के स्तर पर मृदा नमी, वाष्पोत्सर्जन, सतही प्रवाह के आकलन उपलब्ध कराते हैं।
उपरोक्त को दृष्टिगत रखते हुए, भारत वर्ष के मध्य प्रदेश में केन नदी के बेसिन में समय व स्थानमें सूखे से निपटने के लिए यह अध्ययन लिया गया। इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य बहुत से कारकों के integration के लिए विधि को devise करना है जो की सूखे कि vulnerability का सामायिक वस्थानिक निर्धारण कर सके और इसमें बहुत से कारकों के लिए एक वेरिएबल weighing scheme का प्रयोग किया गया हो । अध्ययन बेसिन में मौसमविज्ञानीय सूखे का आकलन भारत मौसमविज्ञान विभाग द्वारा यह निर्धारित किया गया कि अगर किसी क्षेत्र में वहां के सामान्य वर्षा से 75 प्रतिशत से कम वर्षा होती है तो वह क्षेत्र सूखा ग्रस्त कहलायेगा (अप्पा राव, 1986)। तद्नुसार प्रस्तुत अध्ययन में, किसी वर्ष या मानसून सीजन (जून से सितम्बर) को सूखाग्रस्त कहा जायेगा अगर उस क्षेत्र में कुल वर्षा औसत मानों से 20% या उससे कम होती है। इस विश्लेषण में 110 वर्षों (1901- 2011) के समय के लिए 12 वर्षा मापी स्थलों से मासिक वर्षा आंकड़ों (वर्ष 2003 के आंकड़े उपलब्ध नहीं थे) का प्रयोग किया गया है। प्रस्तुत अध्ययन में बेसिन की मौसम विज्ञानीय सूखे के गुणधर्मों का मासिक, सीजन व वार्षिक समय स्तरों पर आकलन किया गया है। अध्ययन बेसिन में मौसमीय सूखे की अवधि (वर्षा में कमी काल), severity (वर्षा में एमी का magnitude) एवं आवृत्ति (सूखें की पुनरावृत्ति) के आधार पर निर्धारण किया गया है। केन बेसिन में आंकड़ों के सम्पूर्ण समय काल (1901-2011) हेतु वार्षिक व सीजनल वर्षा departures को सम्बंधित औसत मानों (RD & Mean) के सन्दर्भ में आकलन किया गया जिससे कि यह निर्धारित किया जा सके कि वह सीजन या वर्ष wet year, सामान्य वर्ष या सूखा वर्ष रहा। मानदंडों के अनुसार wet और सूखा सीजन या वर्ष को तालिका 1 द्वारा निर्धारित किया जा सकता है।
यहाँ पर xi किसी माह की वर्षा को प्रदर्शित करता है व xt किसी माह, सीजन व वर्ष के लम्बे समय के वर्षा औसत को।
तालिका 1. किसी वर्ष को विभिन्न categories में वर्गीकृत करने के मानदण्ड
क्रम सं. | किसी वर्ष में हुई वर्षा | category |
1 | >125% औसत मान | mild wet |
2 | 125%-110% औसत मान | औसत |
3 | 109%-90% औसत मान | mild dry |
4 | 89%-75% औसत मान | moderate drought |
5 | 74%-65% औसत मान | severe drought |
6 | 64%-50%औसत मान | Ex |
7 | <50% औसत मान wet | treme drought |
सागर व छतरपुर स्थलों के लिए वार्षिक और सीजनल वर्षा departures के नमूना चित्रण रेखा-चित्र क्रमवार 2 (a और b) द्वारा दर्शाए गए हैं। जैसा कि रेखा-चित्र 2b में देखा जा सकता है, बेसिन में औसतन पिछली शताब्दी के अंतिम आधे भाग में प्रत्येक 5 वर्षों में एक बार सूखा पड़ा है। वर्षा departures आकलनों द्वारा वर्ष 1905, 1913, 1918, 1941, 1965, 1966, 1987, 1989, 1991, 1992, 1993, 2002, 2006, 2007, 2009 और 2010 को major drought वर्ष घोषित किया गया। जिला सागर में महत्तम वर्षा में वार्षिक कमी, वार्षिक औसत से – 50% पाई गई. आकलन से यह भी प्रमाण मिले कि वार्षिक सूखे का आगमन और सीजनल सूखा एक साथ होते हैं। यह पता चला है कि मानसून सीजन (जून से सितम्बर) में वर्षा की कमी प्राथमिक रूप में सूखा पड़ने के लिए उत्तरदायी है तथा अध्ययन क्षेत्र में वर्ष के शेष भाग में पानी की कमी हेतु जिम्मेदार है।
पूर्ववर्ती भाग में चर्चाओं के प्रकाश में एक differential weighing scheme को तालिका सं. 2 में प्रस्तावित किया गया है जिसमें बहुत से तुलनात्मक महत्त्वपूर्ण कारकों के ऊपर विचार किया गया है ।तालिका 2 में विभिन्न कारकों के weighted मानों की श्रेणी का विकल्प सूखे की समग्र जोखिम के कारण एक कारक के तुलनात्मक डिग्री की धारणा के आधार पर लिया जाता है। प्रस्तावित योजना में मृदा नमी में कमी जिसको (SMDI )soil moisture index½ के रूप में प्रस्तुत किया जाता है (नरसिम्हन और श्रीवास्तव, 2005) और वर्षा में कमी को वर्षा departure के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, इन दोनों को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाले कारकों में मानते हैं अत: SMDI और वर्षा departure को सबसे ज्यादा weight 0-25 दिया गया है (तालिका 2)। भू उपयोग एवं तुलनात्मक ऊंचाई को साधारणतया प्रभावित करने वाले कारकों के तौर पर माना जाता है. अत: इनके weight मान 0 से 10 के बीच परिवर्तित होते रहते हैं। यह एक सर्व विदित तथ्य है कि जल की मांग और उपलब्धता भू उपयोग के प्रकार व ऊंचाई के हिसाब से बदलती रहती हैं।ढाल, मृदा प्रकार, मृदा की गहराई, नदी या जलधारा से दूरी और जनसंख्या घनत्व थोड़े कम प्रभावशाली कारक माने जाते हैं और इनकी संख्यात्मक weight मान 0-5 के बीच परिवर्तनशील है। इसको ‘differential weighing scheme’ कहा जाता है क्योंकि कारकों के विभिन्नवर्गों के लिए विभिन्न weight की range नियत की गई हैं। weight मान 0 यह प्रदर्शित करता है कि किसी दिए हुए कारक के उप वर्ग के कारण सूखे की vulnerability पर न्यूनतम प्रभाव पड़ता है। इसके विपरीत उच्च weight मान यह प्रदर्शित करता है की उप-वर्ग गंभीर रूप से सूखे पर vulnerability का प्रभाव डाल रही है। उदाहरणत: भारी मिट्टी, जैसे कि बसंल, रेतीली मिट्टी की अपेक्षा ज्यादा पानी सोखने की क्षमता रखती है इसलिए रेतीली मिट्टी को ज्यादा weight वैल्यू assign की जाती है और क्ले को कम weight वैल्यू। इसी प्रकार, अन्य कारकों की उपवर्गों को विभिन्न weight नियत किए जाते हैं। प्राकृतिक भूगोल-संबंधी, मौसम विज्ञानीय एवं जल विज्ञानीय स्थानिक नक्शों की विभिन्न परतें। ArcGIS सॉफ्टवेयर द्वारा तैयार की गई व विभिन्न कारकों के उपवर्गों को तालिका 2 द्वारा weights प्रदान किए गए। कारकों के उप श्रेणियों को प्रदत्त weights को एकीकृत करने के लिए सम्बंधित HRU level के weights को जोड़ने की सरल योजना प्रयोग में लाई गई। एक संयुक्त weights मूल्य द्वारा जिसकी गणना चयनित HRU के प्रत्येक कारक के महत्तम weights मानों के योग द्वारा विभाजित करने पर प्राप्त मान होता है उसे Integrated Drought Vulnerability Index (IDVI) कहा जाता है। इस प्रकार IDVI उस अनुपात के रूप में वर्णित किया गया है जो कि प्रत्येक कारक के नियत किए गए weights मानों के योग और सभी चयनित स्थानिक व सामायिक कारकों के महत्तम weights के योग के बीच होता है। परिणाम स्वरूप, किसी दिए गए HRU के लिए सूखे की Vulnerability की गंभीरता का मात्रात्मक मूल्यांकन निम्नांकित समीकरण द्वारा आगणन किया जा सकता है।
Table
2
- Weights assigned tovarious sub&classes of considered drought vulnerability factors
Sr.No. | Factors | Sub-lasses of drought vulnerability factors | Weights of different classes of factors | |
| (i) | (ii) | (iii) | |
1.
| Land Use | Water Bodies (Areas under submergence) | -100 | |
| Waste Land | 0 | |||
| Range Land | 2 | |||
| Pasture Land | 4 | |||
| Forest | 6 | |||
| Urban Land | 8 | |||
| Agriculture | 10 | |||
2. | Irrigation Support | Irrigated | -5 | |
| Un-irrigated (rainfed) | 5 | |||
3. | Elevation zones | Lower elevation zone | <140m | 1 |
| 140m-210m | 2 | |||
| 210m-280m | 3 | |||
Middle elevation zone | 280m-350m | 4 | ||
| 350m-420m | 5 | |||
| 420m-490m | 6 | |||
Upper elevation zone | 490m-560m | 7 | ||
| 560m-630m | 8 | |||
| 630m-700m | 9 | |||
| >700m | 10 | |||
4. | Slope | 0-2% | 1 | |
| 2%-5% | 2 | |||
| 5%-8% | 3 | |||
| 8%-12% | 4 | |||
| >12% | 5 | |||
5. | Distance from River Reach | Upto 1km | 1 | |
| 1-3 km | 2 | |||
| 3-5km | 3 | |||
| 5-7 km | 4 | |||
| >7km | 5 | |||
6. | Soil Texture | Clay | 1 | |
| Loam | 2 | |||
| Silt Loam | 3 | |||
| Silt | 4 | |||
| Sand | 5 | |||
7.
| Soil Depth (mm) | >=1000 | 1 | |
| <1000 to >=800 | 2 | |||
| <800 to >=600 | 3 | |||
| <600 to >=400 | 4 | |||
| <400 | 5 | |||
8. | Population Density/Km2 | 0-100 | Low | 1 |
| 100-200 | Moderate | 2 | ||
| 200-300 | Medium | 3 | ||
| 300-400 | High | 4 | ||
| 400-500 | Very High | 5 | ||
9. | Soil Moisture Deficit Index (SMDI) | >- 0.5 | Near Normal | 0 |
| -0.5 to -1 | Dry Spell | 5 | ||
| -1 to -2 | Mild Drought | 10 | ||
| -2 to -3 | Moderate Drought | 15 | ||
| -3 to -4 | Severe Drought | 20 | ||
| < -4.0 | Extreme Drought | 25 | ||
10. | Rainfall Departure | >−10% | Near Normal | 0 |
| −10% to −15% | Dry Spell | 5 | ||
| −15% to −25% | Mild Drought | 10 | ||
| −25% to −35% | Moderate Drought | 15 | ||
| −35% to −50% | Severe Drought | 20 | ||
| <−50% | Extreme Drought | 25 | ||
----------------------------------------समीकरण(2)
यहाँ पर, IDVI = एकीकृत सूखा भेद्यता सूचकांक
W_i = ith कारक के लिए HRU द्वारा बनाया गया वजन
W_ 1/4i_maxth = ith कारक का अधिकतम वजन
n = विचाराधीन कारकों की संख्या
एचआरयू पैमाने पर आईडीवीआई का मूल्यांकन इंगित करता है कि भौगोलिक क्षेत्र, यानी एचआरयू, आईडीवीआई के अधिक संख्यात्मक मूल्य को दर्शाता है, जो कम मूल्य की तुलना में सूखे की चपेट में है।
HRU पैमाने पर IDVI का मूल्यांकन यह प्रदर्शित करता है की एक भौगोलिक क्षेत्र, उदाहरणार्थ HRU जो कि IDVI का अधिक मान दिखाता है वो सूखे के लिए ज्यादा vulnerable होता है अपेक्षाकृत कम मान के।
सूखे पर vulnerability कई कारकों पर निर्भर करती है जैसे की प्राकृतिक भूगोल-संबंधी, मौसम संबंधी, जलविज्ञान संबंधी,कृषि, सामजिक-आर्थिक व पर्यावरणीय कारक। इन कारकों को निम्नलिखित श्रेणियो में बांटा जा सकता हैः (i) स्थिर कारकों जो समय के साथ-साथ नहीं बदलते परन्तु बदलते स्थान के अनुसार परिवर्तित हो सकते हैं। उदाहरनार्थ स्थलाकृति, भू-उपयोग, ढाल, मृदा के प्रकार और गहराई इत्यादि। (ii) अर्द्ध स्थिर कारकों जो की विकास की धारा के साथ-साथ परिवर्तित होते हैं। उदाहरनार्थ सिंचाई सहायताएं, जल संसाधन विकास, संग्रहण योजनाएं, फसल पद्धति और जनसंख्या घनत्व आदि। (iii) गतिशील कारकों जो समय व स्थान के अनुसार परिवर्तित होते हैं जैसे कि वर्षा, जलधारा प्रवाह व मृदा नमी इत्यादि।
एक IDVI (समीकरण 2) बहुत से कारकों को जोड़ता है जैसे कि मौसम संबंधी, जलविज्ञान संबंधी, कृषि, सामाजिक-आर्थिक एवं पर्यावरण संबंधी कारक। एकीकृत सूखा सूचकांक सूखे की indices की एक प्रयास में कुछ अस्पष्टता से उबरने हेतु अभिकल्पित किया जाता है। यह अपने आप में विशिष्ट है क्योंकि इसमें इतने अलग प्रकार के सूखा सूचना संसाधनों से जानकारी शामिल है। गतिशील परतें समय पर निर्भर हैं और time series आंकड़ों से सम्बंधित हैं। स्थान-समय और गतिशील परतों में ये सब सम्मिलित हो सकते हैं वर्षण, वाष्पोत्सर्जन, औसत तापमान, भूजल स्तर, सतही जल भण्डारण और पर्यावरणीय आवश्यकताएं।
इस अध्ययन में विचार किए गए प्राकृतिक भूगोल-संबंधी कारक निम्न प्रकार हैं भू-उपयोग, ढाल, किसी स्थान की तुलनात्मक ऊंचाई, नदी से दूरी, मृदा की संरचना, मृदा की गहराई, सिंचाई का सहयोग एवं जनसंख्या घनत्व। आगे आने वाले भाग में बहुत से भौतिकीय कारकों की उप श्रेणियों का वर्णन किया गया है।
भू उपयोग उन महत्त्वपूर्ण कारकों में से एक है जो सूखे की सुभेद्यता को प्रभावित करते हैं। Landsat ETM उपग्रह डाटा (NASA, 2003) को classify करके बहुउपयोग की सूचनाएं प्राप्त की जाती हैं। अध्ययन बेसिन में भूमि उपयोग मुख्य रूप से वर्षा आधारित फसल (लगभग 53.8%) उगाने में होता है उसके बाद वन (लगभग 23.48%) इसके अतिरिक्त चारागाह, जल निकायों, परती व आवासीय (लगभग 22.72%) अन्य उपयोगों में होता है। सभी भू-उपयोगों के मध्य यह निर्विवादित रूप से सत्य है कि पानी की कमी और सूखे की विभीषिका से सबसे अधिक दुष्प्रभाव कृषि उत्पादन पर पड़ता है अपेक्षाकृत वनों वअन्य भू-उपयोगों के क्योंकि कृषि मृदा जल पर निर्भर होती है। इस प्रकार कृषि भूमि को सूखे के प्रति सबसे अधिक सुभेद्य भू-उपयोग वर्ग में रखा जाता है और सबसे उच्चतम weight मान निर्दिष्ट किया जाता है। इसके विपरीत range भूमि और वेस्ट भूमि को सबसे कम महत्व दिया जाता है और परिणामस्वरूप पानी की कमी के प्रति सबसे कम संवेदनशील माना जाता है और न्यूनतम weight मान निर्दिष्ट किया जाता है। तालिका सं 2 में विभिन्न भू-उपयोगों की सूखे के प्रति सुभेद्यता के तुलनात्मक weight दिए गए हैं। चित्र 3 में बेसिन में विभिन्न भू-उपयोगों का स्थलीय वितरण दिखाया गया है। जल निकायों को ऋणात्मक weightvalue -100 निर्दिष्ट की गई है, क्योंकि जल निकायों को सूखे के प्रति अ-सुभेद्य माना गया है।
किसी बेसिन में सिंचाई सहायता सूखे की सुभेद्यता के लिए एक बड़ा कारक हो सकती है। केन नदी बेसिन में बहुत ही कम छोटे व मध्यम सिंचाई प्रोजेक्ट हैं। जैसा की चित्र सं 4 में दिखाया गया है, केन बेसिन का बरिअरपुर कमांड एरिया लगभग 572 km2 का है और इसको 5 ऋणात्मक (तालिका 2) मान दिया गया है जिससे पता चलता है की यह कम सुभेद्यता स्तर का क्षेत्र है, क्योंकि कमांड एरियाज सिंचाई सहायता की उपलब्धता के कारण कम अवधि के पानी की कमी के कारण कम एक्सपोज्ड रहते हैं। यद्यपि इसके अलावा अन्य क्षेत्र जो की वर्षा के द्वारा सींचे जाते हैं उनको 5 की उच्च वेट वैल्यू प्रदान की गई है, क्योंकि उनकी पूर्ण निर्भरता वर्षा पर है।
अध्ययन बेसिन का ढाल SRTM से प्राप्त ऊंचाई के आंकड़ों से प्राप्त किया गया है (जारविस व अन्य, 2008) एवं बेसिन को 5 ढाल श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है उदाहरनार्थ 0-2%, 2-5%, 5-8%, 8-12% एवं 12% से ज्यादा। केन नदी बेसिन में इन ढाल श्रेणियों का स्थानिक वर्गीकरण चित्र 5 में दिखाया गया है। बहुत से अध्ययनों से यह प्रमाणित किया गया है की मृदा की नमी मैदानी भूमि क्षेत्रों में ढालू और पहाड़ी क्षेत्रों की अपेक्षा ज्यादा समय तक टिकाऊ रहती है। इसलिए कम ढाल बाले क्षेत्र को सूखे के प्रति कम सुभेद्य माना जाता है अपेक्षाकृत थोड़े ज्यादा और ज्यादा ढाल वाले क्षेत्रों के इस केस में 0-2% रेंज के ढाल को सूखे के प्रति सबसे कम सुभेद्ता वाली श्रेणी में रखा गया है उसके बाद मध्यम व उच्च ढालों का नंबर आता है। इस प्रकार, प्रत्येक ढाल श्रेणी को दिए गए तुलनात्मक weights को तालिका 2 में दर्शाया गया है।
बेसिन में किसी स्थान में जल उपलब्धता मुख्य रूप से उस स्थान के उन्नयन पर निर्भर करती है। अप्रत्यक्ष रूप से विभिन्न उन्नयन क्षेत्रों में जल उपलब्धता को देखा जाएं तो केन बेसिन को तीन क्षेत्रों में विभाजित किया गया है। ये तीनों क्षेत्र हैं निचला उन्नयन क्षेत्र (280m तक), माध्यम उन्नयन क्षेत्र (280m-490m) एवं उच्चतर उन्नयन क्षेत्र (490m से अधिक)। उच्चतर उन्नयन क्षेत्र में अधिकतर पहाड़ी क्षेत्र व लहरदार स्थलाकृति होतीं हैं, उनका औसत ढाल 6% और 1st और 2nd श्रेणी की जलधाराएं होती हैं जो अधिकतर अल्पकालिक होती हैं। ऊपरी क्षेत्रों में प्रायःअक्टूबर/नवम्बर के बाद कोई जल प्रवाह नहीं रहता है अतः बिना वर्षा वाले सीजन में लगभग शून्य या न्यूनतम सतही जल उपलब्धता रहती है।
माध्यम उन्नयन क्षेत्रों में भू क्षेत्रों के ढाल 2-6% के मध्य होते हैं और तीसरे व चौथे श्रेणी की जलधाराएं होती हैं जिनमें दिसम्बर जनवरी माह तक जल रहता है एवं मध्यम प्रकार की सतह जल उपलब्धता रहती है। निचले उन्नयन क्षेत्रों के ढाल 2% से कम होते हैं और जल प्रवाह रुक-रुक कर या बारहमासी होते हैं। इसके अलावा, बेसिन के ऊपरी व बीच के हिस्सों के अपेक्षाकृत निचले हिस्से को जल धारण करने को ज्यादा समय मिल जाता है। प्रत्येक उन्नयन क्षेत्र हेतु जल की कमी के अनुसार सुभेद्यता के तुलनात्मक weights तालिका 2 में दिखाए गए हैं। अध्ययन क्षेत्र के उन्नयन वितरण चित्र 6 में दिखाए गए हैं।
यह माना जाता है कि जो क्षेत्र नदी के ज्यादा नजदीक होते हैं वो जल की कमी के कम सुभेद्य होते हैं क्योंकि ज्यादा पुनर्भरण विभव और लम्बे समय तक भू जल की उपलब्धता उपलब्ध होते हैं अपेक्षाकृत उन क्षेत्रों के जो नदी से ज्यादा दूरी पर हैं। इस अनुसार बेसिन क्षेत्र को, नदी से दूरी के अनुसार, 5 उप-श्रेणियों में बांटा गया और चित्र 7 में दिखाया गया है। नदी की सीमा के 1 किलोमीटर के अन्दर का क्षेत्र कम सुभेद्य माना गया है, जबकि 7 किलोमीटर से ज्यादा दूर के क्षेत्र बहुत सुभेद्य माने गए हैं। नदी से दूरी के अनुसार विभिन्न श्रेणियों को नामांकित weights तालिका 2 में प्रदर्शित किए गए हैं।
मृदा का एक महत्त्वपूर्ण कार्य है नमी को सोखकर रखना और बिना वर्षा वाले काल में इस जल को पौधों को आपूर्ति करना। मृदा की उपलब्ध नमी भण्डारण की क्षमता उस समय का निर्धारण करती है जिसमें सूखे के समय में पौधों को यह नमी दी जा सकती हो ताकि वह जीवित रह सकें। नेशनल ब्यूरो ऑफ सोइल सर्वेएंड लैंड यूज प्लानिंग (NBSS&LUP) मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश व soil series of bafM;k (NBSS, 1994) से प्राप्त कागजी नक्शों से मृदा नक्शों को digitize किया गया। केन बेसिन की मृदाएं 4 मुख्य संरचना वर्गों में वर्गीकृत की गई हैं जैसे की चिकनी मिटटी, चिकनी बलुई मिट्टी, गाद और रेत जैसा कि चित्र 8 में दिखाया गया है। जिनमें चिकनी मिट्टी (clay) सूखे के लिए सबसे कम सुभेद्य मानी जाती है क्योंकि वह अन्य प्रकार की मृदाओं से ज्यादा नमी सोखने की क्षमता रखती है (Cysadksos व अन्य, 1960)। दूसरी तरफ बजरीदार रेतीली लोम मिट्टी नमी सोखने की सबसे कम क्षमता होने के कारण सूखे के प्रति सबसे अधिक सुभेद्य होती है। इस प्रकार ज्यादा नमी सोखने की क्षमता रखने वाली मिट्टियां पौधों के जड़ों के क्षेत्र में ज्यादा पानी उपलब्ध कराती हैं और सूखे के प्रति सबसे कम सुभेद्य होती हैं। यद्यपि हल्की मिट्टियां पौधों के लिए कम पानी उपलब्ध कराती हैं और सूखे के प्रति बहुत सुभेद्य होती हैं। अतः हल्की मिट्टी वाले क्षेत्र चिकनी मिट्टी वाले क्षेत्रों की अपेक्षा सूखे के लिए ज्यादा सुभेद्य माने जाते हैं।
मिट्टी की गहराई बड़े स्तर पर पौधों के लिए कुल मृदा जल भण्डारण को नियंत्रित करती है (मैककुली और हौजकिंसन 1970)। ज्यादा गहराई वाली मृदाएं पौधों को अधिक पानी आपूर्ति करने में समर्थ होती हैं और सूखे के लिए कम सुभेद्य होती है एवं यह प्रक्रिया विपरीत दिशा में भी काम करती है। अध्ययन बेसिन में मृदा गहराई का स्थानिक वितरण चित्र 9 में दिखाया गया है।
किसी क्षेत्र में जल मांग के पैटर्न वहां के जनसंख्या घनत्व से प्रभावित होते हैं और lean period (बिना वर्षा वाले सीजन) में पानी की कमी होने का एक महत्त्वपूर्ण कारण माने जाते हैं। इस अध्ययन में अधिक जनसंख्या वाले क्षेत्रों को कम आबादी वाले क्षेत्रों की अपेक्षा सूखे के प्रति अधिक सुभेद्य माना गया है। इसका कारण यह है की अधिक जनसंख्या घनत्व वाले क्षेत्रों की जल मांग सूखे के समय बहुत ज्यादा होगी और यह स्थान परिणामस्वरूप सूखे के समय जल की कमी से ग्रसित होंगे। अतैव बहुत अधिक जनसंख्या वाले शहर, कस्बे और बड़े गाँव को अधिक सुभेद्य माना जाता है। जो स्थान कम जनसंख्या वाले होते हैं वे कम सुभेद्य माने जाते हैं। अध्ययन क्षेत्र का जनसंख्या घनत्व का तुलनात्मक स्थानिक वितरण चित्र 10 में प्रदर्शित किया गया है।
मौसमी व जलविज्ञानीय कारक वर्षा की कमी मूल रूप में एक ऐसा कारक है जो सूखा पड़ने और उसके फलस्वरूप पानी व मृदा नमी में कमी का कारण है। किसी क्षेत्र में सूखे की सुभेद्यता का आकलन करने के लिए मध्य मानों की तुलना में वर्षा प्रतिशत में कमी/अधिकता और मृदा नमी में SMDI की form में कमी ऐसे कारकों में शामिल किये जाते हैं जो समय व स्थान के अनुसार बदलते रहते हैं। SMDI के परिमाण और किसी माह में मध्य मान वर्षा की प्रतिशत कमी के अनुसार weigh मान 0-25 निर्धारित किए गए हैं जिनको तालिका 2 में दर्शाया गया है। SMDI की धनात्मक मानया तो सामान्य या नम परिस्थितियों को प्रदर्शित करती हैं, अतः इनको निरर्थक माना जाता है और 0 weigh माना जाता है, जबकि -4 से नीचे की weigh वैल्यू को नाजुक मृदा नमी माना जाता है और यह फसल के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा मानी जाती है, इन परिस्थितियों में weigh वैल्यू 25 दी जाती है। इसी प्रकार wt वैल्यू 0 के साथ 10% तक वर्षा में कमी को बहुत कम माना जाता है, जबकि 50% से अधिक की वर्षा कमी और 25 wt वैल्यू को अति गंभीर वर्षा कमी माना जाता है।
SWAT model एक distributed hydrologic model है जो बड़े ungauged बेसिन में बहुत ही एक्यूरेसी के साथ अपवाह प्राप्ति को मापने के काम आता है। यह जलविज्ञानीय प्रक्रमों (वाष्पोत्सर्जन, सतही अपवाह, अंतःस्पंदन, वापसी प्रवाह, मृदा नमी, भूजल प्रवाह, चैनल ट्रांसमिशन हानियां, ताल एवं जलाशय भण्डारण, चैनलरूटिंग वफील्ड ड्रेनेज) के निरंतर सिमुलेशन्स HRUs के स्तर पर उपलब्ध कराता है। यह निदर्श प्रत्येक दिन के समय अन्तराल पर चलाया जा सकता है। SWAT प्रत्येक बेसिन को स्थलाकृति के आधार पर कई सब बेसिनों में विभाजित कर देता है। प्रत्येक सब बेसिन कई HRUs में विभाजित किया जाता है, जो कि कई विशिष्ट कारकों का संयोजन है जैसे कि मृदा, ढाल और भू आवरण। SWAT&Model का विस्तृत वर्णन वैज्ञानिक साहित्य में उपलब्ध है (नेइत्स्च व अन्य, 2005) इस अध्ययन में SWAT&Model को प्राथमिकता दी गई है क्योंकि यह समय व स्थान के अनुसार जल संतुलन घटकों के वितरित आकलन को उपलब्ध कराता है। अतः मृदा नमी में कमी के वांछित निर्धारण को समय व स्थान के अनुसार प्राप्त किया जा सकता है और केन बेसिन में समय वस्थान के अनुसार सूखे की सुभेद्यता के वितरण को quantify किया जा सकता है।
केन बेसिन में HRUs के स्तर पर विभिन्न जलविज्ञानीय घटकों के आकलन प्राप्त करने के लिए SWAT&Model की जांच की गयी। SWAT&Model की जांच करने के लिए भू उपयोग, मृदा, और मौसमीय आंकड़ों की आवश्यकता होती है।।ArcGIS और Erdas imagineसॉफ्टवेयर को SWAT के डेटाबेस को तैयार करने के लिए pre&processer के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। DEM पर स्थानिक आंकड़ों के प्रयोग से, पहले वर्णित भू उपयोग व मृदा, केन बेसिन के सम्पूर्ण क्षेत्र को 104 उप जल संग्रहण क्षेत्रों, एवं तत्पश्चात 7942 HRUs में बांटा गया। उपलब्ध वर्षा आंकड़े 14 स्टेशन के हैं व तापमान आंकड़े 2 स्टेशन के हैं जिनकी अवधि 198-1997और सम्बंधित जलधारा प्रवाह के आंकड़े 4 स्थानों के उपलब्ध हैं जिनको तालिका 3 में दर्शाया गया है, इन आंकड़ों को SWAT की जांच वसत्यापन के लिए इस्तेमाल किया गया है। उपलब्ध जलविज्ञानीय आंकड़ों को दो भागों में विभाजित किया गया है 1982-90 के आंकड़ों को को SWAT की जांच के लिए व 1991-97 के आंकड़ों को सत्यापन के लिए प्रयोग किया गया है। जल प्रवाह को simulate करने की model की योग्यता का मूल्यांकन देखने से तुलना करने व सांख्यकीय मानदण्ड पर आधारित है जैसे कि Nash & Sutclife एफिशिएंसी (NSE, Nash andSutclife] 1970) और Coefficient of determination (R2)A
तालिका 3: गज और डिस्चार्ज स्थल की स्थिति और केन बेसिन में आंकड़ों की उपलब्धता
गेजिंग स्थल | नदी जिस पर स्थित है | ड्रेनेज एरिया (किमी) | ऊंचाई (मी) | प्रयुक्त प्रवाह आंकड़ों की लम्बाई |
गढ़कोता | सोनार | 5823.52 | 362 | 1984-1997 |
गैसाबाद | बेअरमा | 1335.72 | 291 | 1982-1997 |
मडला | केन | 20566.4 | 194 | 1982-1997 |
बांदा | केन | 25302.6 | 92 | 1982-1997 |
मृदा नमी एक महत्त्वपूर्ण जलविज्ञानीय चर है जो बहुत से भू सतह के प्रक्रमों को नियंत्रित करता है। हालांकि कुल वर्षा का एक छोटा सा प्रतिशत ही मिट्टी में संग्रहीत हो पाता है, यही नमी कृषि, चारा फसलों व जंगलों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। कृषि सूखे की मॉनिटरिंग के लिए ये अति महत्वपूर्ण है। कृषि और सूखे की मॉनिटरिंग के अलावा बहुत महत्त्वपूर्ण होते हुए भी, मृदा नमी के बारे में जानकारियां बहुत बृहद स्तर पर उपलब्ध नहीं हैं। आंशिक रूप से ये इसलिए भी है क्योंकि मृदा नमी स्थानिक व सामायिक रूप से बहुत परिवर्तनशील है और बड़े स्तर पर इसको नापना बहुत कठिन है (नरसिम्हन व अन्य, 2005)। यद्यपि SWAT Model उप बेसिन व HRU स्तर पर मृदा नमी का आकलन करने में समर्थ है। नरसिम्हन व श्रीनिवासन (2005) के अनुसार SWAT Model द्वारा आकलित मृदा जल का उपयोग SMDI के कंप्यूटरीकरण करने में किया जाता है। SMDI की गणना इंक्रीमेंटल आधार पर होगी (नरसिम्हन व श्रीनिवासन, 2005)।
----------------------------equation 3
जहां, SMDIj किसी दिए हुए महीने के लिए soilmoisture deficit index को प्रदर्शित करता है, और SIMDj- 1 इससे पहले महीने केs soil moisture deficit index को प्रदर्शित करता है। वांछित समय के SMDI की गरना की सम्पूर्ण की algorithm नरसिम्हन व श्रीनिवासन (2005) के प्रपत्र में उपलब्ध है। किसी भी महीने के दौरान SMDI के मान नम से सूखे की अवस्थाओं के साथ-साथ -4 से .4 तक की range में होते हैं। (तालिका 4). सभी सब बेसिनों के लिए सम्पूर्ण रिकॉर्ड पीरियड (1982-1997) के SMDI equation 3 का प्रयोग कर निकाले गए। सबसे खराब सूखा वर्ष 1993 के दौरान गणित SMDI के स्थानिक वितरणों को माह जुलाई, अगस्त और सितम्बर के लिए चित्र 11(a-c) में दिखाया गया है।
चित्र 11(a-c) से यह सिद्ध होता है कि माह जुलाई से अगस्त 1993 के दौरान बेसिन क्षेत्र का ज्यादातर हिस्सा मध्यम से गंभीर सूखे की चपेट में था। हालांकि सितम्बर 1993 में अच्छी बरसात के कारण बेसिन का ज्यादातर हिस्से में नमी में कमी की पूर्ति हो गयी और मृदा नमी अवस्था सामान्य हो गई।
क्लास | SMDI | अवस्था |
1 | 4.0 या अधिक | अत्यधिक नम |
2 | 3.0 से 3.99 | अधिक नम |
3 | 2.0 से 2.99 | मध्यम नम |
4 | 1.0 से 1.99 | आंशिक नम |
5 | 0.5 से 0.99 | शुरुआती गीली अवधि |
7 | -0.5 से -0.99 | शुरुआती सूखा अवधि |
8 | -1.0 से -1.99 | मामूली सूखा |
9 | -2.0 से -2.99 | मध्यम सूखा |
10 | -3.00 से -3.99 | बहुत सूखा |
11 | -4.00 या कम | अत्यधिक सूखा |
वर्तमान अध्ययन के लिए, 12 वर्षा गज स्थानों के 110 सालों (1901-2011, 2003 का उपलब्ध नहीं) के आंकड़ों के द्वारा 104 सब बेसिन के मासिक वर्षा मानों की गड़ना की गई। मासिक वर्षा departue की गणना इसी माह के दीर्घकालिक मध्य से सभी सब-बेसिनों के लिए समीकरण 1 के प्रयोग से की गई। अधिकतम वार्षिक एवं सीजनल वर्षा के हिसाब से वर्ष 1993 सबसे बुरा सूखाग्रस्त साल साबित हुआ। वर्ष 1993 के जुलाई, अगस्त एवं सितम्बर महीने के मासिक वर्षा कमचंतजनतम सूखे की सुभेद्यता के आकलन हेतु जलवायु कारकों के रूप में प्रयोग किए गए। इन महीनों के के दौरान वर्षा depature केs spatialextent चित्र 12 (a-c) में प्रदर्शित किए गए हैं।
सूखे की सुभेद्यता के स्थानिक और सामयिक क्षेत्रों में एकीकृत आकलन को प्राप्त करने के लिए विभिन्न भौतिक कारकों के नक्शें SMDI नक्शों के साथ संयुक्त किए गए, चित्र 11(a-b) एवं वर्षा departuremaps चित्र 12(a-c) जुलाई, अगस्त और सितम्बर 1993 माह के लिए प्रस्तावित weighing योजना (तालिका 2) के प्रयोग के साथ। जुलाई, अगस्त और सितम्बर 1993 महीनों के दौरान सूखे की सुभेद्यता के स्थानिक एवं सामायिक वितरण के निर्गत होने वाले नक्शों के परिणाम चित्र 13 (a-c) में प्रदर्शित किए गए हैं। आगे के आकलन के लिए कम सूखा सुभेद्य वर्षों के लिए समान प्रकार के नक्शे भी जनित किए गए हैं (यहाँ नहीं दिखाए गए)। IDVI मानों का चित्रण करने वाले समग्र मानचित्रों को 5 वर्गों में वर्गीकृत किया गया है। असुभेद्य, न्यूनतम सुभेद्य, मध्यम सुभेद्य, गंभीर सुभेद्य, अति गंभीर सुभेद्य। उपरोक्त श्रेणियों के लिए IDVI के सीमित मान और उनके साथ-साथ विभिन्न सुभेद्यता वर्गों के आकलन तालिका 5 में प्रदर्शित किए गए हैं।
तालिका 5 सूखा वर्ष 1993 के जुलाई, अगस्त और सितम्बर माह हेतु वर्षं का प्रयोग करते हुए विभिन्न सुद्येता श्रेणियों के अंतर्गत अंकित क्षेत्र में अंतर
weighing
योजना।
क्र.सं. | IDVI | सुभेद्यता | विभिन्न सुभेद्ता वर्गों केअंतर्गत क्षेत्रफल (किमी2) | |||||
जुलाई 1993 | अगस्त 1993 | सितम्बर 1993 | ||||||
1 | <=0 | असुभेद्य | 963.10 | 3.36 | 963.10 | 3.36 | 963.10 | 3.36 |
2 | न्यूनतम सुभेद्य | 0.00 | 0.00 | 0.00 | 0.00 | 4226.98 | 14.73 | |
3 | मध्यम सुभेद्य | 2118.28 | 7.38 | 1467.31 | 5.11 | 18804.12 | 65.54 | |
4 | गंभीर सुभेद्य | 18513.99 | 64.52 | 16559.87 | 57.71 | 4660.40 | 16.24 | |
5 | अति गंभीर सुभेद्य | 7097.47 | 24.74 | 9702.56 | 33.82 | 38.23 | 0.13 | |
परिणाम वाली फिगर्स से पता चलता है कि प्रस्तावित कार्य प्रणाली सूखे की सुभेद्यता की डिग्री को एक सूखे वर्ष (1993) के भिन्न-भिन्न महीनों के लिए स्पष्ट रूप से अलग करती है। उदाहरणार्थ, बेसिन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा जुलाई और अगस्त 1993 में सूखे की भेद्यता के गंभीर व अति गंभीर श्रेणियों के अंतर्गत आता था। इसका कारण था कि केन बेसिन के उप जल संग्रहण क्षेत्रों में औसत वर्षा मानों की अपेक्षा जुलाई व अगस्त महीनों में क्रमशः वर्षा में कमी-32% से-61% एवं-45% से -56% पाई गई। यद्यपि 1993 सितम्बर माह में अच्छी वर्षा हुई, अतैव, गंभीर व अति गंभीर के श्रेणी में आने वाले बेसिन क्षेत्र महत्त्वपूर्ण रूप से कम हो गए (चित्र सं. 12 (c) यह प्रदर्शित करता है कि यह विधि वर्षा departures के साथ संवेदनशील है एवं समय व स्थान के साथ-साथ सूखे की भेद्यता के वास्तविक वितरण को निश्चित करती है।
तालिका 5 यह प्रदर्शित करती है कि बेसिन क्षेत्र के लगभग 25.74%, 33.82%, एंव 0.13% गंभीर रूप से जुलाई, अगस्त एवं सितम्बर 1993 में सूखे के प्रति भेद्य थे। ये गंभीर रूप से भेद्य हिस्से इन तीनों महीनों में सागर जिले के पश्चिमी भाग में, छतरपुर के उत्तरी, दमोह के उत्तरी पूर्वी भाग और पन्ना जिले में स्थित थे (चित्र 13)। कृषि रिपोर्टों से यह पाया गया कि जिन भागों में पूरे वर्षा सीजन में गंभीर व अति गंभीर भेद्यता पाई गई थी वहां पैडी फसल यील्ड वर्ष 1993 में खरीफ सीजन में जल स्ट्रेस के कारण सबसे कम पाई गई। यागाम्भी क्षेत्र पूरी तरह से तर्कसंगत हैं क्योंकि सागर शहर पश्चिमी रिज क्षेत्र में स्थित है जहाँ पर सतही व भू-जल काफी नीचे हैं इसके साथ-साथ म्युनिसिपल जल की मांग बहुत ज्यादा है। इस क्षेत्र की documented सूचनाएं वर्ष 1993 के लिए इन तथ्यों का समर्थन करती हैं (डिस्ट्रिक्ट स्टेटिस्टिक्स हैंडबुक, 1993, 2007) । इसके विपरीत, जिन क्षेत्रों में सितम्बर माह में अच्छी वर्षा हुई (चित्र 12 (C ) वो भेद्यता की गंभीर श्रेणी से बाहर निकल मध्यम श्रेणी में आ गए (चित्र 13 ( C)। बेसिन के ये भाग उत्तर प्रदेश के हमीरपुर वबाँदा जिलों में पड़ते हैं, जहां पर,खरीफ फसल का उत्पादन हानि औसत से 30 प्रतिशत से कम थी। यद्यपि, सागर एवं दमोह जिले में यह 60 प्रतिशत से अधिक थी (डिस्ट्रिक्ट स्टेटिस्टिक्स हैंडबुक, 1993)। इसके अतिरिक्त बेसिन नं 18, 20, 22, 23 और 25 जो कि नहर कमांड एरिया के अंतर्गत आते हैं वहां पर सूखे की भेद्यता का प्रभाव समाप्त होता नजर आया क्योंकि वहां पर सिंचाई की सपोर्ट थी। इंटीग्रेटेड drought वल्न्राबिलिटी इंडेक्स (IDVI) को विभिन्न फैक्टर्स के योग द्वारा डिफाइन किया गया है जो कि सम्बंधित HRU को प्रत्येक फैक्टर के महत्तम वेट मान से विभाजित कर प्राप्त किया गया है। इंटीग्रेटेड drought वल्न्राबिलिटी इंडेक्स (IDVI) के उच्च मान के साथ HRU उच्चतर डिग्री के क्षेत्र के सूखे की सुद्येता को या इसके विपरीत को प्रदर्शित करता है। इस प्रकार प्राप्त हुए मानचित्र documented सूचनाओं और फील्ड सर्वेक्षणों द्वारा सत्यापित किये गए। यह विश्वास किया जाता है की प्रस्तावित विधि सूखे की भेद्यता को चिन्हांकित करने के लिए एक प्रभावशाली टूल है। प्राप्तनिर्गत मानचित्र जो कि प्रस्तावित डिफरेंशियल weighing स्कीम से मिले थे की तुलना पांडेय व अन्य, 2010 द्वारा दिए गए यूनिफार्म weighing स्कीम से की गई। यहां पर यह पता चलता है कि प्रस्तावित डिफरेंशियल weighing स्कीम से मिले मानचित्र मध्यम, दूसरी स्कीम की तुलना में, गंभीर व अति गंभीर सूखे की भेद्यता वाले क्षेत्रों का सही-सही अंकन करती है। अतः यह निष्कर्ष निकलता है कि डिफरेंशियल weighing स्कीम सूखे की भेद्यता के ज्यादा वास्तविक आकलन प्रस्तुत करती है और सूखे और उससे निपटने में उपर्युक्त परियोजनाओं को बनाने में डिसिजन मेकर्स की सहायता कर सकती है।
केन बेसिन भारत के सूखे-उप आर्द्र जलवायु क्षेत्र के अंतर्गत आता है। इसलिए पुनरावर्ती सूखे के प्रभाव को कम करने के लिए उपयुक्त सूखा शमन उपायों की मांग करता है। शुष्क-उप आर्द्र जलवायु क्षेत्रों को प्रत्येक 5 या 6 वर्षों में एक बार की औसत आवृत्ति के साथ सूखे का सामना करना पड़ता है और दस साल या उससे अधिक समय में गंभीर सूखे की घटनाओं का सामना करना पड़ता है। सूखे की घटनाओं की अपेक्षित दृढ़ता लगातार दो वर्षों तक होती है। इस तरह के क्षेत्रों के लिए सुझाए गए शमन (mitigation) विकल्प निम्नानुसार हो सकते हैं:
प्रस्तुत प्रपत्र भौतिकी, मौसम विज्ञान, जलविज्ञान और सामाजिक कारकों का उपयोग करते हुए स्थानिक और सामयिक स्केल पर सूखे की भेद्यता का आकलन करने के लिए एक वास्तविक अनुप्रयोग हेतु नई पद्धति को दर्शाता है। प्राकृतिक भूगोल-संबंधी कारक बेसिन की स्थैतिक भौतिक विशेषताएं हैं जिनमें स्थलाकृति, ढलान, भूमि उपयोग, मिट्टी के प्रकार, मिट्टी की गहराई, नदी की पहुंच के निकटता, ऊंचाई क्षेत्र और जनसंख्या घनत्व शामिल हैं। जलवायु और हाइड्रोलोजिक कारक प्रकृति में गतिशील होते हैं जिसमें क्रमशः वर्षा विचलन और मिट्टी नमी deficit शामिल होता है। विभिन्न कारकों की स्थानिक जानकारी को विभिन्न उप-वर्गों में वर्गीकृत किया गया है और नक्शे आर्कजीआईएस का उपयोग करके तैयार किए गए हैं। एक डिफरेंशियल weighing स्कीम के प्रयोग द्वारा सूखे की भेद्यता के विभिन्न कारकों को integrate किया गया है मॉडल एचआरयू नामक हाइड्रोलॉजिकल समरूप क्षेत्रों के चिन्हांकन के लिए लागू किया गया है, HRUs भूमि उपयोग, ढलान और मिट्टी केप्रकार, और अध्ययन बेसिन में मिट्टी नमी के स्थानिक और सामयिक वितरण के आकलन के संबंध में कारक हैं। परिणामतः soilmoisture deficitindex (SMDI) की गणना करने के लिए SWAT से प्राप्त मृदा नमी का उपयोग किया जाता है।
इस विधि की प्रासंगिकता को भारत के केन बेसिन में प्रदर्शित किया गया है, इस अध्ययन से प्राप्त निष्कर्ष निम्न प्रकार हैं:-
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