इंटरनेट और मोबाइल टेलीफोन का जैसे विस्तार हो रहा है, वैसे ही विकास के इस दौर में समुदायों के बीच सूचना प्रौद्योगिकी विशेष-कर वेब टेक्नोलॉजी का प्रयोग बढ़ रहा है। इसके प्रयोग से जल सहित विभिन्न क्षेत्रों में पारदर्शिता, जवाबदेही और जन सहभागिता को बढ़ावा मिला है। हालांकि हम अभी भी आईसीटी के विकास में संभावित योगदानों को समझने के शुरूआती दौर में हैं। फिर भी शुरूआती सफलताओं में वेब आधारित सूचना क्रांति ने समाज के विभिन्न वर्गों में ज्ञान के आदान-प्रदान को बहुत सुगम बना दिया। स्कूलों, कॉलजों तथा उच्च शैक्षिक संस्थानों के वेब-एडेड शिक्षा, सुदूर शिक्षा, ई-लर्निंग, प्रशिक्षण कार्यक्रम तथा अनुसंधान से पानी पर्यावरण की शिक्षा जागरूकता में काफी परिवर्तन हो रहा है। जल और पर्यावरण पर पहले से ज्यादा जानकारी विभिन्न वेब पोर्टलों के माध्यम से समाज के विभिन्न तबकों तक पहुंचाई जा रही है। प्रस्तुत शोध पत्र इस बात का अध्ययन करेगा कि सोशल मीडिया (फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब, व्हाट्सअप) जैसे माध्यम कैसे जल और पर्यावरण के संरक्षण में अपना योगदान दे रहे हैं।
मैकिन्सी1 के अनुसार
इंटरनेट को दोतरफा संपर्क, आग्रह और डिलीवरी के माध्यम के रूप में इतनी बड़ी आबादी तक ले जाया जा रहा है, इससे ई-शिक्षा और पानी-पर्यावरण जैसे क्षेत्रों में काफी बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं।
शोध पत्र इसका भी अध्ययन करेगा कि कौन-कौन से मुख्य वेब पोर्टल भारत के बारे में जल और पर्यावरण संरक्षण संबंधी ज्ञानाधारित सामग्री उपलब्ध कराते हैं और साथ ही कुछ के तुलनात्मक प्रभावों का भी अध्ययन करेगा। केस स्टडी के रूप में हिंदी वाटर पोर्टल, जिसकी विजिटरशिप दो मिलियन मासिक से भी ज्यादा है, की सामग्री, संचार के तरीकों, समाज में पहुंच सामग्री के उपयोग और प्रभाव पर प्रकाश डालते हुए यह जानने का प्रयास किया जाएगा कि ऐसे वेब माध्यम जल और पर्यावरण संबंधी समस्याओं से निजात पाने और उत्तम प्रबंधन में किस प्रकार और कितना योगदान दे रहे हैं, बाढ़ प्रबंधन से लेकर अकाल-सूखे में लोगों तक जानकारी देने में मदद कर रहे हैं।
Since the popularization of the Internet and mobile telephony, there has been rising interest in the development community to use information communication technologies (ICTs); especially web based technologies. The use of ICTs have improved transparency, accountability, and public participation within many sectors, including water an environment. Even though we are still in the early stages of understanding what ICT can really do for development, a number of initial successes have shown ICT to enable the rapid transfer of knowledge to segments of society that were previously without.
Web-aided education in various schools, colleges and higher education institutions, distance education programmes, E-learning, training and research programmes are making a big change in awareness and education about water and environmental issues. Various web portals are providing now far more information on environmental issues to a large segment of society. Present paper will try to find out how social media (Facebook, twitter, WhatsApp; etc.) is playing its role in water and environmental education and conservation. The internet is being taken to such a large population as a means of two-way connectivity, solicitation and delivery, it is seeing huge changes in areas like e-education and water-environment.
Paper will study that which major web portal are providing educational contents on water-environment conservation and Will also study comparative effects of some. As a case study, an effort will be made to highlight the content, methods of communication, accessibility in society, use and impact of the content of Hindi Water Portal, whose visitor-ship is more than two million monthly. And how and how much they are contributing to get rid of environmental problems and good management, from flood to famine-drought management.
Because the India Water Portal Hindi is understood as one of the most successful examples of a knowledge portal within the Indian water sector, it offers ample opportunity to learn more about this emerging approach to development, which uses ICTs to pursue developmental aims, will try to understand this with further facts and data.. Key word: water-environment education, web media, web technology
वैसे तो पानी-पर्यावरण के प्रति व्यवहार की शिक्षा व्यक्ति के जन्म के साथ ही शुरू हो जाती है। पानी-पर्यावरण के प्रति व्यक्ति के शिक्षण का काम परिवार के भीतर से शुरू होकर आजीवन जारी रहता है और यह पानी-पर्यावरणीय शिक्षण-समझ का काम किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व के लिए औपचारिक शिक्षण संस्थानों तक सीमित नहीं हो सकता है। व्यक्ति अपने सामाजिक ताना-बाना, नदी-त्योहारों, स्थानीय वातावरण के माध्यम से भी पानी-पर्यावरण के प्रति जागरूकता प्राप्त करता रहता है।
इस संदर्भ में, पानी-पर्यावरण शिक्षण में वेब-मीडिया एक महत्वपूर्ण उपकरण हमेशा से रहा है। पानी-पर्यावरण के मामले में प्राथमिक स्कूल एक अर्ध-नियोजित शिक्षण प्रदान करते हैं । साथ ही उच्च शिक्षा संस्थानों में भी पानी पर्यावरण शिक्षण पर्याप्त नहीं है, कहने को तो पानी-पर्यावरण के काम में बड़ी संख्या में संगठन लगे हुए हैं, फिर भी उनकी पानी-पर्यावरण शिक्षण गतिविधियां समय काल, स्थान की सीमाओं में बंधी और अपर्याप्त ही है।
इस अध्ययन का उद्देश्य ‘वेब आधिारित तकनीकों को पानी-पर्यावरण के लिए समाज-शिक्षण में योगदान को समझना है। पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान के संदर्भ में वेब आधारित तकनीकों के योगदान को मूल्यांकित व रेखांकित करना है। शोधार्थी के रूप में यह देखना चाहते हैं कि निम्न संदर्भों में क्या वेब आधारित तकनीकों से बदलाव हासिल हो रहा है ?
भारत में इंटरनेट का जन्म 15 अगस्त, 1995 में हुआ था। तब से लेकर उपयोगकर्ताओं की संख्या मे निरंतर वृद्धि हो रही है। पानी-पर्यावरण शिक्षण के क्षेत्र में इंटरनेट का उपयोग विश्वव्यापी तथ्यात्मक जानकारी प्रदान करने की दृष्टि से उपयोगी है। पानी-पर्यावरण के विविध पक्षों की जानकारी एवं आंकड़े इंटरनेट पर आसानी से प्राप्त किए जा सकते हैं। पानी-पर्यावरण से संबंधित अनुसंधान, नियोजन और प्रबंधन में इससे प्राप्त जानकारी अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी।
सूचना प्रौद्योगिकी का एक नया क्षेत्र मल्टीमीडिया है। इसमें लेखन सामग्री, ध्वनि, वीडिया, द्विआयामी या त्रिआयामी ग्राफिक और एनीमेशन शामिल हैं। इसका उद्देश्य लोगों को एक नियंत्रित ढंग से जानकारी, शिक्षा और मनोरंज प्रदान करना है। इसके माध्यम से जैव विविधता एवं वन्य जीवन पर जानकारी मनोरंजक के साथ शिक्षाप्रद भी बन जाती है। इसके माध्यम से यह लाभ होता है कि यदि वास्तविक दृश्यों पर फिल्म बनाई जाए तो लागत कई गुना आती है, जबकि मल्टीमीडिया से यह कार्य सस्ते में एवं सरलता से सम्पन्न हो जाता है। सूचना तकनीक एक अधिग्रहण, संग्रहण, मौखिक, चित्रमय, मूल पाठ तथा संख्यात्मक सूचनाओं का प्रक्रम है, जो कम्प्यूटर तथा दूरसंचार के मिश्रण पर आधारित है। यह प्रबंधन तकनीकी का एक ऐसा क्षेत्र है, जिसके अंतर्गत प्रक्रिया, कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर तथा हार्डवेयर, कार्यक्रम, सूचना तंत्र एवं ज्ञात आंकड़े आते हैं। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि सूचना तकनीक, बहु-माध्यम वितरण क्रिया-विधि की सहायता से दृष्टि की रूप रेखा में लिए गए आंकड़े, सूचनाएं, ज्ञान आदि का अनुभव है। विस्तार में सूचना तकनीक हार्ड-वेयर तथा सॉफ्टवेयर दोनों हैं, जो सूचनाओं को संग्रहित करने में सहायक है।
आधुनिक सूचना तकनीकी ने फ्रैंसिस बेकन के कथन ‘Knowledge is Power’ को सच साबित कर दिखाया। सूचना तकनीक एक ऐसी तकनीक है, जो दुनिया में किसी भी व्यक्ति को, किसी भी समय, कहीं भी घटने वाली घटना या प्रसंग के बारे में संपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराती है। सूचना तकनीक के जरिए घर बैठे ही पर्यावरण से संबंधित सभी जानकारियां मिल जाती हैं, आज जैसे किस क्षेत्र में कितना प्रदूषण है, वन्य जीवों की सुरक्षा के क्या इंतजाम है।
देश-विदेश में पर्यावरण संरक्षण हेतु क्या शोध किए जा रहे हैं आदि प्राप्त कर सकते हैं। इसके साथ ही इन संवेदी उपग्रहों की सहायता से दुनिया भर में हो रही पर्यावरणीय घटनाओं जैसे-ओजोन क्षरण, प्राकृतिक प्रकोप, वन-विनाश इत्यादि से संबंधित सूचनाएं तुरंत ही संसार के विभिन्न भागों में पहुंच जाती हैं। इसके अलावा बहुत सी छोटी-छोटी घटनाओं की पूर्व सूचना भी विश्व के कोने-कोने में पहुचाई जा सकती हैं। आज एक आम व्यक्ति इंटरनेट और ई-मेल के जरिए किसी भी क्षेत्र की जानकारी प्राप्त कर सकता है। वर्तमान में पर्यावरण प्रबंधन में भी सूचना तकनीक अहम भूमिका निभा रही है।
पर्यावरणीय एवं वन मंत्रालय, भारत सरकार ने एक तंत्र की स्थापना की है, जिसे पर्यावरण सूचना-तंत्र कहा जाता है। इसका मुख्यालय राजधानी दिल्ली में स्थापित किया गया है। पर्यावरण सूचना तंत्र के द्वारा पर्यावरण संबंधी सभी जानकारियां जैसे-प्रदूषण के उपाय, नवीनीकरण ऊर्जा, मरुस्थलीकरण, जैव विविधता आदि के बारे में जानकारियों को हमेशा के लिए कंप्यूटर में संग्रहित किया जा सकता है। अतः वर्तमान युग में सूचना तकनीक इतनी विकसित हो गई है कि मानव-जीवन का कोई पहलू अब सूचना तकनीक से पृथक नहीं है तथा सूचना तकनीक आधुनिक युग की सबसे अधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
पर्यावरण के प्रति जागरूक होने की आवश्यकता प्रत्येक नागरिक को है, क्योंकि पर्यावरण हमारे जीवन का आधार है। शहरी इलाकों में औद्योगिकरण, शहरीकरण, आधुनिकता आने से पर्यावरण को क्षति तथा पर्यावरण में प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। साथ ही इन इलाकों में सूचना तकनीक का विकास तेजी से हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप यहां के लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता देखने को मिलती है, हमें आवश्यकता है पर्यावरण जागरूकता की उन ग्रामीण क्षेत्रों में, जो समाज में रहते हुए भी सामाजिक तौर से प्राप्त होने वाली कई सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं।
एक शोध के दौरान दुर्ग जिले के शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में सर्वे किया गया। दुर्ग जिला शिवनाथ महानदी घाटी के दक्षिण-पश्चिमी भाग में स्थित है। यहां की कुल जनसंख्या 28,10,436 (2001 जनगणना के अनुसार) है। इसका भौगोलिक क्षेत्रफल कुल 8,702 वर्ग किमी है। दुर्ग जिले में कुल 1,821 ग्राम हैं जिनमें से विद्युतिकृत ग्रामों की संख्या 1,775 है। सर्वे में ग्रामीण क्षेत्र के लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता के साथ-साथ पानी-पर्यावरण शिक्षण भी अपेक्षाकृत कम देखने को मिली।
ग्रामीण इलाकों में हालांकि पानी-पर्यावरण शिक्षण में वेब-माध्यमों की भूमिका अभी भी अपेक्षाकृत कम देखने को मिली है, लेकिन धीरे-धीरे इंटरनेट की सस्ती-उपलब्धता ने उस परिस्थिति को बदलना शुरू कर दिया है।
इंटरनेट और मोबाइल के लोकप्रिय होने के बाद से ही पानी सहित विभिन्न सेक्टरो में पारदर्शिता लाने, जवाबदेही और सावर्जनिक भागीदारी में सुधार के लिए विकास कार्यों से जुड़े समुदाय में सूचना संचार तकनीकों (आईसीटी) के उपयोग के प्रति रूचि बढ़ गई है। वास्तव में आईसीटी विकास के लिए क्या कर सकता है, हम इसे समझने के शुरूआती चरण में हैं, लेकिन आईसीटी ने फंड ट्रांसफर में तेजी और ज्ञान के फैलाव को तेज गति से समाज तक पहुंचाकर कई शुरूआती सफलताओं में दिखाया है, जो कि हम पहले नहीं कर सकते थे। इंडिया वाटर पोर्टल को भारतीय जल क्षेत्र में ज्ञान पोर्टल (नॉलेज पोर्टल) के रूप में समझा जाता है, क्योंकि यह विकास के लक्ष्य को आगे बढ़ाने के लिए आईसीटी का उपयोग करता है और विकास के इस उभरते हुए दृष्टिकोण के बारे में अधिक जानने का पर्याप्त अवसर प्रदान करता है।
शोध की पद्वति विश्लेषणात्मक तुलनात्मक, विवेचनात्मक तथा सर्वेक्षणात्मक है। जिसमें वेब आधारित सर्वेक्षण और प्रत्यक्ष साक्षात्कार भी शामिल हैं।
पूरे शोध को विभिन्न कालांशों में भिन्न-भिन्न चरणों में नियोजित किया गया। यह शोध तीन चरणों में बांटा गया। चरण एक में विभिन्न वेब पेजों और उन पर डाली गई सामग्री का विश्लेषण किया गया।
Phase 1:Web and Content Analysis | TimelineNov 2013-May 2014 University of California, Santa Barbara |
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Phase 2:Institutional Research & Analysis of Non-Digital Outreach | Timeline:mid-Aug 2014-mid-Feb 2015 Delhi office (Aug-Oct) Bangalore office (Nov-Feb) Any other necessary locations |
|
Phase 3:Reception Research with IWP Users (3-4 months) | mid-Feb-May 2015 (at least)Bangalore & Key Sites of IWP User Reception | Interviews with a Sample of IWP Users |
शोध के दौरान पूछे जाने वाले प्रश्नों से हम जानने की कोशिश कर रहे थे किः
Total Content =(Round Figure = 64700)
| Books | Presentations | Audio & Videos | Glossary | Organisation database | Success Stories | IEC content |
| Approx 300 | Approx 400 | Approx 500 | Approx 20,000 | Approx 8,000 | Approx 340 | Approx 400 |
Answer Choices | Responses |
| 5 (बहुत ही उपयोही, यह अपरिहार्य है) | 23.76 % 24 |
| 4 (यह बहुत उपयोगी है) | 25.74 % 26 |
| 3 (उपयोगी) | 15.84 % 16 |
| 2 (उपयोगी लेकिन सिर्फ थोड़ा सा) | 8.91 % 09 |
| 1 (उपयोगी नहीं है) | 1.98 % 02 |
| पता नहीं, यह मेरी पहली बार है | 23.76 % 24 |
Total | 101 |
विभिन्न पोर्टलों के तुलनात्मक अध्ययन के पश्चात यह निष्कर्ष निकला कि पानी पर्यावरण के मुद्दों को लेकर हिंदी इंडिया वाटर पोर्टल की स्वीकार्यता लोगों के बीच तेजी से बढ़ी है। वेब एनालिटिक्स, प्रयोक्ता सर्वेक्षण, और विभिन्न साक्षात्कारों के माध्यम से एक विस्तृत और विशिष्ट रिपोर्ट भी निकल कर आई कि विभिन्न प्रयोगकर्ताओं की सामग्री को स्वीकार करने और इस्तेमाल करने की विभिन्न पद्धतियां क्या हैं।
हिंदी वाटर पोर्टल की बढ़ती लोकप्रियता से स्पष्ट है कि पाठक इसे पसंद करने के साथ-साथ उपयोगी भी मानते हैं। हमारे शोध में शामिल किए गए साक्षात्कारों से स्पष्ट होता है कि पोर्टल को पानी-पर्यावरण के मुद्दों पर विश्व को सबसे बड़ा और विश्वसनीय पोर्टल माना जा रहा है। भारत में इसका उपयोग करने वाले लोगों में विभिन्न प्रकार के लोग शामिल हैं। जैसे किसान, मीडिया, अकादमिक, प्रशासनिक, सरकारी, गैर-सरकारी, जमीन पर काम करने वाले कार्यकर्ता और बड़ी संख्या में छात्र इस पोर्टल के मुख्य पाठक हैं। गूगल एनालिटिक्स के आंकड़े दर्शाते हैं कि इसका उपयोग पुरूष और महिलाएं समान रूप से करते हैं।
गत विभिन्न वर्षो में पोर्टल का इस्तेमाल अहम नीतिगत मामलों में निर्णय लेने के लिये किया गया है और आज भी किया जा रहा है। किसान लोग पोर्टल की सामग्री से प्रेरणा प्राप्त करके अपने खेती के तरीकों में बदलाव और सुधार ला रहे हैं, साथ ही जल संरक्षण के कामों को बढ़ावा मिला है। पोर्टल ने जमीन पर जन शक्ति को जोड़कर ज्ञान द्वारा जल शक्ति के अभियानों में जोड़ने का प्रयास किया है।
पोर्टल के माध्यम से ही विभिन्न छोटे संगठनों और आंदोलनों को एक आवाज और पहचान मिली है। बहुत से मुद्दों पर न केवल दृष्टिकोण और नजरिया स्पष्ट करने का प्रयास किया है बल्कि दूर-दराज के इलाकों में गुमनाम हीरो की तरह काम करने वाले लोगों की सफल कहानियों को इस मंच द्वारा अधिकतम लोगों तक पहुचाने का प्रयास भी किया है। हिंदी इंडिया वाटर पोर्टल आज न केवल भारत में बल्कि विभिन्न विदेशी विश्वविद्यालयों में भी छात्रों और शिक्षकों के बीच लोकप्रिय हो रहा है।
सूचना एवं संचार प्रौेद्योगिकी का शिक्षा में प्रभाव के पश्चात अब मैं बताना चाहूंगा कि आज पर्यावरण की दशा इतनी दयनीय हो चुकी है कि प्रत्येक नागरिक को पर्यावरण के प्रति जागरूक होने की आवश्यकता है। क्योंकि हमें ये ज्ञात होना चाहिए कि संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार साल 2018 में करीब 4857 सेटेलाइट आकाश (अंतरिक्ष) में थे। इनमें से करीब 2600 अब कार्यरत भी नहीं हैं. इसके फलस्वरूप वहां आकाशीय कचरा निर्मित हो रहा है। समय के साथ ये नीचे भी आयेंगे और पृथ्वी की कक्षा में प्रवेश के दौरान अत्यधिक तापमान व घर्षण से नष्ट भी हो जाएंगे। वह दिन दूर नहीं जब हमें अंतरिक्ष में भी प्रदूषण की समस्या से जूझना पड़ेगा।
इन सबके बावजूद दूसरी तरफ सूचना और तकनीक के माध्यम से सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं। वर्तमान में संसार के सभी क्षेत्रों में विकास एवं उन्नति संभव हो पाई है। सूचना तकनीक को समाज के विकास का मूल स्रोत कहा जा सकता है। सूचना तकनीक पर्यावरण शिक्षा, पर्यावरण के प्रति जागरूकता में भी अहम भूमिका निभा रही है। इसलिए आज के समाज को तकनीकी समाज कहा जाना उचित होगा। यदि इसी प्रकार सूचना तकनीक के माध्यम से लोगों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता एंव पर्यावरण शिक्षा का विकास होता रहा तो हम पर्यावरण, जो मानव जीवन का आधार है, को संरक्षित कर आने वाली पीढि़यों को इसके लाभ एवं महत्व से अवगत करा सकते हैं। इस उद्देश्य को पूरा करते हुए इंडिया वाटर पोर्टल हिन्दी ने पानी-पर्यावरण के संबंध में एक मुकाम हासिल किया है।
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