ताजमहल की छाया में बहती यमुना नदी आगरा की पहचान भर नहीं, बल्कि शहर की रोज़मर्रा की गतिविधियों की सबसे बड़ी गवाह है।

 

चित्र: अमर उजाला

नदी और तालाब

आगरा की यमुना: प्रदूषण, शहरी कचरा और अनौपचारिक कामगारों की भूमिका

आगरा में यमुना नदी वर्षों से प्रदूषण के दबाव में है। जहां एक ओर योजनाएं और परियोजनाएं हैं, वहीं दूसरी ओर अनौपचारिक रीसाइक्लर और नागरिक पहल रोज़ाना नदी के किनारे काम कर रही हैं। यह लेख इन दोनों के बीच के अंतर और संभावनाओं को सामने रखता है।

Author : डॉ. कुमारी रोहिणी

ताजमहल की छाया में बहती यमुना नदी आगरा की पहचान भर नहीं, बल्कि शहर की रोज़मर्रा की गतिविधियों की सबसे बड़ी गवाह है। औद्योगिक अपशिष्ट, घरेलू कचरा, प्लास्टिक, पूजा सामग्री और निर्माण से निकलने वाला मलबा, शहर का यह सारा बोझ अंततः नदी तक पहुंचता है। इस बोझ को कम करने के लिए सरकारी तंत्र जहां काम से ज्यादा दावे करता नज़र आता है, वहीं एक तंत्र है, जो शांति के साथ सफाई के कार्य में लगा हुआ है। वो है अनौपचारिक कामगारों की टीम। इनके लिए कचरा प्रबंधन कोई नीति नहीं बल्कि रोज़ का संघर्ष है। 

यमुना के घाटों, तटबंधों और नालों के मुहानों पर सुबह सबसे पहले पहुंचने और शाम सबसे आख़िर में लौटने वाले लोग शहर की औपचारिक व्यवस्था का हिस्सा नहीं हैं। आम तौर पर कचरा बीनने वाले कहे जाने वाले ये अनौपचारिक कचरा पुनर्चक्रण (वेस्ट रीसाइक्लिंग) से जुड़े कामगार न पहचान पत्र रखते हैं, न तय मज़दूरी और न ही किसी योजना की सुरक्षा। फिर भी, घुटनों तक गंदे पानी में उतरकर और नंगे हाथों से कचरा छांटते हैं, जिसे शहर की कोई व्यवस्था पूरी तरह संभाल नहीं पाती।

सुबह के समय, जब घाटों पर आम आवाजाही कम होती है, अनौपचारिक रीसाइक्लर नदी तक सबसे पहले पहुंचते हैं। जलस्तर घटते ही किनारों पर फंसा प्लास्टिक, कपड़े और अन्य ठोस कचरा साफ़ दिखाई देने लगता है। यही उनके लिए काम का संकेत होता है, वही कचरा, जिसे शहर दिन भर अनदेखा करता है और जो अगर न उठाया जाए, तो दोबारा बहकर नदी में चला जाता है।

उनकी मेहनत भले ही सरकारी भाषा में दर्ज न हो, लेकिन यमुना के किनारे उनकी मौजूदगी साफ़ दिखाई देती है। ताजमहल की चमक के ठीक नीचे, यही अनदेखे हाथ उस यमुना के साथ खड़े हैं, जिसे बचाने की बातें तो बहुत होती हैं, पर जो अब भी इन्हीं के सहारे किसी तरह सांस ले पा रही है।

जलस्तर घटते ही किनारों पर फंसा प्लास्टिक, कपड़े और अन्य ठोस कचरा साफ़ दिखाई देने लगता है।

यमुना का आगरा खंड: एक स्थायी संकट

यमुना नदी का आगरा खंड वर्षों से प्रदूषण के दबाव में है। नगर निगम क्षेत्र से निकलने वाले दर्जनों नाले अनुपचारित और ठोस कचरे को नदी में गिराते हैं। इसके अलावा, धार्मिक गतिविधियों से उत्पन्न कचरा, घरेलू प्लास्टिक और निर्माण कार्यों का मलबा भी नदी के किनारों पर जमा होता रहता है।

स्थानीय प्रशासनिक दस्तावेज़ों, नगर निगम रिकॉर्ड और क्षेत्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, नगर निगम क्षेत्र से निकलने वाले दर्जनों नाले अनुपचारित और ठोस कचरे को सीधे नदी में गिराते हैं।

समय-समय पर प्रशासन द्वारा नालों पर जाल लगाने, सफाई अभियानों और विशेष परियोजनाओं की घोषणा की जाती है। स्वच्छ भारत मिशन और यमुना एक्शन प्लान जैसी योजनाओं के अंतर्गत भी नदी सफाई के प्रयास हुए हैं। लेकिन ज़मीनी स्तर पर निगरानी, रखरखाव और निरंतरता की कमी के कारण इन पहलों का प्रभाव सीमित रहा है।
नदी के जलस्तर में कमी आने पर किनारों पर जमा कचरा साफ़ दिखाई देने लगता है, जो समस्या की गंभीरता को उजागर करता है।

नागरिक अभियान और स्वयंसेवी प्रयास

आगरा में यमुना तट पर हर सफ़ाई अभियान किसी औपचारिक उद्घाटन से नहीं, बल्कि बहुत साधारण तैयारी से शुरू होता है। आगरा में यमुना तट पर कई सफ़ाई अभियान औपचारिक घोषणाओं के बिना शुरू होते हैं। 

स्थानीय निवासी और स्वयंसेवी संगठन सुबह घाटों पर इकट्ठा होकर प्लास्टिक, पूजा सामग्री और घरेलू कचरा हटाते हैं। ये प्रयास सीमित संसाधनों के बावजूद नियमित रूप से किए जाते हैं, और औपचारिक व्यवस्था की अनुपस्थिति में एक अस्थायी सहारा बनते हैं। 

पिछले कुछ वर्षों में रिवर कनेक्ट कैम्पेन जैसे नागरिक अभियानों ने इसी तरह यमुना के किनारे नियमित सफ़ाई अभियान को एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया बना दिया है।

इन अभियानों में स्थानीय निवासी, स्वयंसेवी संगठन और पर्यावरण कार्यकर्ता साथ आते हैं। कई बार वही लोग, जो रोज़ाना नदी को प्रदूषित होते देखते हैं और चुप रहने के बजाय कुछ करने का फ़ैसला लेते हैं। 

सप्ताह में कई बार होने वाली इन गतिविधियों में प्लास्टिक, पूजा सामग्री, घरेलू कचरा और निर्माण मलबा यमुना के किनारों से हटाया जाता है। यह काम अक्सर धूप, बदबू और कीचड़ के बीच होता है, जहां नदी का हाल किसी रिपोर्ट से ज़्यादा साफ़ दिखाई देता है।

आगरा में यमुना तट पर कई सफ़ाई अभियान औपचारिक घोषणाओं के बिना शुरू होते हैं। स्थानीय निवासी और स्वयंसेवी संगठन सुबह घाटों पर इकट्ठा होकर प्लास्टिक, पूजा सामग्री और घरेलू कचरा हटाते हैं। ये प्रयास सीमित संसाधनों के बावजूद नियमित रूप से किए जाते हैं।

इन नागरिक अभियानों की एक अहम विशेषता यह है कि इनके पास न तो बड़ी सरकारी सहायता होती है, न ही स्थायी संसाधन। लोग अपने घर से दस्ताने, थैले और औज़ार लेकर आते हैं, और घंटों की मेहनत के बाद इकट्ठा किया गया कचरा नगर निगम के डस्टबीन या अस्थायी संग्रह केंद्रों तक पहुंचाया जाता है। कई बार यह भी स्पष्ट नहीं होता कि इसके बाद उस कचरे का क्या होगा, लेकिन फिर भी सफ़ाई की जाती है, क्योंकि गंदगी को वहीं छोड़ देना कोई विकल्प नहीं होता।

यह सच है कि ऐसे प्रयास यमुना प्रदूषण की समस्या का पूर्ण समाधान नहीं हैं। न वे सीवेज के प्रवाह को रोक सकते हैं, न औद्योगिक अपशिष्ट को। लेकिन ये अभियान यह ज़रूर दिखाते हैं कि जब औपचारिक व्यवस्था सीमित या धीमी पड़ जाती है, तब नागरिक पहल कैसे उस खाली जगह को भरने की कोशिश करती है। 

यमुना के किनारे ये लोग सिर्फ़ कचरा नहीं उठा रहे, वे इस नदी के साथ अपना रिश्ता दोबारा गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं।

इनफॉर्मल रीसाइक्लर: शहर को साफ़ रखने की अदृश्य कड़ी

भारत में कचरा प्रबंधन का एक बड़ा हिस्सा अनौपचारिक क्षेत्र पर निर्भर करता है। अनुमान के अनुसार देश में लाखों लोग कचरा बीनने और रीसाइक्लिंग यानी पुनर्चक्रण से जुड़े हैं, जो नगर निगम की औपचारिक व्यवस्था के बाहर रहकर कचरे को अलग करते हैं और पुनर्चक्रण श्रृंखला तक पहुंचाते हैं।

आगरा के संदर्भ में, विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र (सेंटर फॉर साइंस एंड इंवायरन्मेंट) की एक रिपोर्ट के अनुसार शहर में सैकड़ों कचरा बीनने वाले सक्रिय हैं, जो लगभग हर वार्ड में काम करते हैं। ये लोग सड़कों, डंपिंग स्थलों और खुली जगहों से रीसायकल होने वाली चीजों को इकट्ठा करते हैं। उनकी पहुंच और काम करने की क्षमता नगर निगम की औपचारिक प्रणाली से कहीं अधिक विस्तृत है।

इसके बावजूद, इन कामगारों की भूमिका न तो सरकारी रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से दर्ज होती है और न ही उन्हें कचरा प्रबंधन योजनाओं का औपचारिक हिस्सा माना जाता है। जबकि वास्तविकता यह है कि यही लोग प्रतिदिन कचरे की मात्रा को कम करते हैं और उसे नदी तक पहुंचने से पहले ही अलग कर देते हैं।

अनौपचारिक रीसाइक्लर: भूमिका बड़ी, सुरक्षा और पहचान शून्य

आगरा जैसे शहरों में भी सैकड़ों कचरा बीनने वाले सक्रिय हैं, जो प्रतिदिन बड़ी मात्रा में प्लास्टिक, धातु और अन्य रीसायकल योग्य सामग्री को अलग कर लैंडफिल और जलस्रोतों तक पहुंचने से पहले ही रोक देते हैं।

आगरा में यमुना नदी के किनारे और शहर के विभिन्न हिस्सों में काम कर रहे अनौपचारिक रीसाइक्लर शहरी कचरा प्रबंधन तंत्र की एक महत्वपूर्ण लेकिन अदृश्य कड़ी हैं। ये वे लोग हैं जो सड़कों, घाटों, नालों के मुहानों और अस्थायी डंपिंग स्थलों से रीसायकल होने योग्य कचरे को इकट्ठा कर पुनर्चक्रण की श्रृंखला तक पहुंचाते हैं। 

नगर निगम की औपचारिक व्यवस्था जहां तय समय, मार्गों और संसाधनों तक सीमित रहती है, वहीं इन कामगारों की पहुंच शहर के उन हिस्सों तक भी होती है, जहां कोई नियमित व्यवस्था मौजूद नहीं है। 

विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र (CSE) और अन्य अध्ययनों के अनुसार, भारत में सूखे कचरे और प्लास्टिक के पुनर्चक्रण का 60-70 फ़ीसद हिस्सा अनौपचारिक क्षेत्र के ज़रिए ही होता है। 

आगरा जैसे शहरों में भी सैकड़ों कचरा बीनने वाले सक्रिय हैं, जो प्रतिदिन बड़ी मात्रा में प्लास्टिक, धातु और अन्य रीसायकल योग्य सामग्री को अलग कर लैंडफिल और जलस्रोतों तक पहुंचने से पहले ही रोक देते हैं। यह काम सीधे तौर पर ठोस कचरे के दबाव को कम करता है और नदी में जाने वाले कचरे की मात्रा घटाता है।

विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र (CSE) और अन्य अध्ययनों के अनुसार, भारत में सूखे कचरे और प्लास्टिक के पुनर्चक्रण का 60-70 फ़ीसद हिस्सा अनौपचारिक क्षेत्र के ज़रिए ही होता है। 

इसके बावजूद, इनफॉर्मल रीसाइक्लर न तो किसी आधिकारिक रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से दर्ज हैं और न ही उन्हें कचरा प्रबंधन प्रणाली का औपचारिक हिस्सा माना जाता है। अधिकांश कामगारों के पास पहचान पत्र, तय मज़दूरी या सामाजिक सुरक्षा का कोई ढांचा नहीं है। वे बिना दस्ताने, मास्क या अन्य सुरक्षा उपकरणों के काम करते हैं, जहां कचरे में मौजूद कांच, धातु, रसायन और जैविक अपशिष्ट उनके स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बनते हैं।

आगरा के एक घाट पर काम करने वाले अनौपचारिक रीसाइक्लर बताते हैं कि नदी का जलस्तर घटते ही किनारों पर जमा कचरा साफ़ दिखने लगता है। यही उनका सबसे सक्रिय समय होता है। अगर वे इस कचरे को नहीं उठाते, तो यह दोबारा बहकर नदी में चला जाता है। यह काम अक्सर घुटनों तक गंदे पानी और कीचड़ में, बिना किसी सुरक्षा उपकरण के किया जाता है, जहां स्वास्थ्य जोखिम लगातार बने रहते हैं। 

यह काम अक्सर घुटनों तक गंदे पानी और कीचड़ में किया जाता है, जहां किसी तरह की सुरक्षा उपलब्ध नहीं होती। 

ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 अनौपचारिक कचरा बीनने वालों की पहचान, पंजीकरण और उन्हें शहरी कचरा प्रबंधन प्रणाली से जोड़ने की बात करते हैं। लेकिन ज़मीनी स्तर पर इसका क्रियान्वयन बेहद सीमित रहा है। अधिकांश नगर निकाय निजी ठेकेदारों और केंद्रीकृत प्रणालियों पर निर्भर रहते हैं, जिसके चलते पहले से सक्रिय अनौपचारिक नेटवर्क या तो अनदेखा कर दिए जाते हैं या हाशिये पर धकेल दिए जाते हैं।

नतीजतन, जो लोग प्रतिदिन शहर के कचरे की मात्रा को कम करते हैं और उसे यमुना जैसी नदियों तक पहुंचने से पहले ही अलग कर देते हैं, वही व्यवस्था, सुरक्षा और अधिकारों से बाहर रह जाते हैं। उनकी भूमिका भले ही सरकारी रिपोर्टों और आंकड़ों में दर्ज न हो, लेकिन ज़मीन पर किया जा रहा उनका श्रम यह स्पष्ट करता है कि शहरी पर्यावरण प्रबंधन और नदी संरक्षण उनके बिना अधूरा है।

यमुना का प्रदूषण अब भी वैसा ही क्यों

यह सवाल स्वाभाविक है कि जब नागरिक समूह और अनौपचारिक रीसाइक्लर लगातार कचरा हटाने का काम कर रहे हैं, तब भी यमुना की स्थिति में सुधार क्यों नहीं दिखता। इसके पीछे कई संरचनात्मक कारण हैं:

  • ढांचागत सीमाएं: सीवेज और ठोस कचरे का स्रोत-स्तर पर प्रबंधन नहीं हो पा रहा है।

  • अनुपचारित अपशिष्ट:नालों के ज़रिए अपशिष्ट गंदे पानी का नदी में प्रवाह जारी है।

  • सामाजिक व्यवहार: नदी में कचरा फेंकने की प्रवृत्ति अब भी बनी हुई है।

  • नीतिगत अंतर: अनौपचारिक रीसाइक्लर को औपचारिक सिस्टम में शामिल न किए जाने से उनके काम का संस्थागत लाभ नहीं मिल पाता।

जब तक कचरा उत्पत्ति के स्तर पर नहीं रोका जाता और अनौपचारिक कामगारों को व्यवस्था का हिस्सा नहीं बनाया जाता, तब तक सफाई प्रयास अस्थायी ही रहेंगे।

अनदेखा श्रम अनदेखी भूमिका

आगरा में यमुना नदी के किनारे काम कर रहे इनफॉर्मल रीसाइक्लर और नागरिक समूह यह स्पष्ट करते हैं कि नदी संरक्षण केवल बड़ी परियोजनाओं या योजनाओं से संभव नहीं है।

यह एक सतत, स्थानीय और मानवीय प्रक्रिया है, जिसमें उन लोगों की भूमिका सबसे अहम है जो नदी के सबसे करीब से जुड़े हैं।

जब तक नीति निर्माण में इनफॉर्मल रीसाइक्लर को औपचारिक पहचान, सामाजिक सुरक्षा और कचरा प्रबंधन प्रणाली में स्थान नहीं दिया जाता, तब तक यमुना जैसी नदियों की सफाई अधूरी रहेगी।
सरकारी रिकॉर्ड में भले ही यह दर्ज न हो, लेकिन ज़मीन पर की जा रही मेहनत को देखकर यह स्पष्ट है कि वास्तविक बदलाव किन लोगों के हाथों में है। 

जब तक नीति निर्माण में इनफॉर्मल रीसाइक्लर को औपचारिक पहचान, सामाजिक सुरक्षा और कचरा प्रबंधन प्रणाली में स्थान नहीं दिया जाता, तब तक यमुना जैसी नदियों की सफाई अधूरी रहेगी।

आगे की राह: नदी संरक्षण में अनौपचारिक कामगारों की औपचारिक जगह

आगरा में यमुना नदी की स्थिति यह स्पष्ट करती है कि केवल बड़े प्रोजेक्ट्स और योजनाओं से नदी प्रदूषण की समस्या हल नहीं हो सकती। जब तक शहर के कचरा प्रबंधन तंत्र में ज़मीनी स्तर पर काम कर रहे लोगों को शामिल नहीं किया जाता, तब तक सुधार अस्थायी ही रहेगा।

इस संदर्भ में कुछ नीतिगत बिंदु उभरकर सामने आते हैं।

  • नगर निगम और राज्य प्रशासन को इनफॉर्मल रीसाइक्लर और कचरा बीनने वालों की पहचान और पंजीकरण की प्रक्रिया को प्राथमिकता देना।

  • ठोस कचरा प्रबंधन नियमों (2016) के तहत इन कामगारों की भागीदारी को ज़मीनी स्तर पर लागू करने की ज़रूरत।

  • नदी तटों पर चल रहे नागरिक और स्वयंसेवी अभियानों को नगर निगम की योजनाओं से जोड़ने की आवश्यकता ताकि इन प्रयासों को स्थायित्व मिल सके और प्रशासन को वास्तविक ज़मीनी जानकारी और सहयोग प्राप्त हो।

  • यमुना संरक्षण को केवल सफाई अभियान के रूप में देखने के बजाय शहरी कचरा प्रबंधन, सामाजिक व्यवहार और आजीविका सुरक्षा के संयुक्त मुद्दे के रूप में समझना।

आगरा में इनफॉर्मल रीसाइक्लर और कचरा बीनने वाले न तो किसी योजना के केंद्र में हैं, न ही किसी रिपोर्ट के प्रमुख पन्नों पर। लेकिन यमुना नदी के किनारे रोज़ाना होने वाला श्रम यह दिखाता है कि वे शहरी पर्यावरण प्रबंधन की एक अनिवार्य कड़ी हैं।

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