झिरी गॉंव में बेतवा नदी के उद्गम स्थल पर पार्वती कुंड में निकली जल धारा
मई का महीना और तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार। गर्मी इतनी कि सिर पर सूरज आते ही डिहाइड्रेशन का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। धूप में निकलना मतलब अपनी जान जोखिम में डालना। ऐसी भीषण गर्मी में रायसेन जिले में कुछ ग्रामीणों ने इस साल जमकर पसीना बहाया वो भी पैसा कमाने के लिए नहीं बल्कि बेतवा नदी के उद्गम स्थल को पुनर्जीवित करने के लिए। 50 से अधिक लोगों ने मिलकर नदी के ओरिजिन को फिर से जीवित कर दिया।
भोपाल के कोलार रोड से आगे रायसेन जिले के झिरी गांव की पहाड़ियों में सुबह की धूप धीरे-धीरे उतर रही है। कुछ लोगों का समूह श्रमदान और प्रकृति के लिए अपनी जिम्मेदारी निभा रहा हैं। यह नज़ारा हमने सुबह करीब 8 बजे देखा जब हम झिरी गांव पहुंचे। जैसे-जैसे सूरज चढ़ रहा था, वैसे-वैसे पसीना बहने की रफ्तार भी बढ़ रही थी। यह दृश्य इसलिए चकित करने वाला था, क्योंकि ये लोग खुद के लिए नहीं बल्कि बेतवा नदी के उद्गम को पुनर्जीवित करने के लिए फावड़ा, खुर्पी और बेलचा चला रहे थे।
10 मई से 16 मई के बीच हर रोज जन जागरण समूह के आह्वान पर 50 से 60 लोग आगे आये और बेतवा के उद्गम को पुनर्जीवित कर दिया है।
बेतवा राज्य की एक पौराणिक नदी है, बहुत पुरानी और सदानीरा है अर्थात 12 महीने बहने वाली नदी है। इसके उद्गम स्थल की बात करें तो बीते कई वर्षों से यह पूरी तरह उपेक्षित थी। लोग यहां कूड़ा-करकट भर ते जा रहे थे, सरकार ने भी इसे लगभग पूरी तरह दरकिनार कर दिया था। देखते ही देखते इस स्थल में पानी सूखते-सूखते न के बराबर पहुंच गया।
करीब तीन साल पहले जन जागरण समूह के डॉ.आर के पालीवाल, सेवानिवृत्त प्रिंसिपल चीफ कमिश्नर, इनकम टैक्स ने अपने साथियों के साथ एक अभियान शुरू किया। सबसे पहले उन्होंने 200 किलोमीटर लंबी बेतवा नदी का अध्ययन किया और फिर जन जागरण यात्रा निकाली, जो न धार्मिक थी, न प्रायोजित। देखते ही देखते लोग उनके साथ जुड़ने लगे और उनके साथ पानी के इस स्रोत को पुनर्जीवित करने के लिए आगे आने लगे।
डॉ. आर के पालीवाल
डॉ. पालीवाल के अनुसार बेतवा नदी मध्य भारत की महत्वपूर्ण नदियों में शामिल है। मध्य प्रदेश से निकलकर उत्तर प्रदेश तक बहने वाली यह नदी लाखों लोगों की खेती, पेयजल और आजीविका का आधार है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसका उद्गम स्थल गंभीर संकट का सामना कर रहा है। डॉ. पालीवाल कहते हैं कि पिछले 40-50 साल में प्रकृति का दोहन तो बहुत हुआ, लेकिन संरक्षण नहीं किया गया। वे कहते है - रिटायरमेंट के बाद जब मैं और मेरे कुछ साथियों ने देखा कि भोपाल से मात्र 15 किलोमीटर दूर बेतवा का उद्गम स्थल उपेक्षित पड़ा है, कूड़े से पटा है और पानी धीरे-धीरे कम हो रहा है, तो मुझे लगा कि अब अगर हमने कुछ नहीं किया तो देर हो जाएगी।
यही सोच कर डॉ. पालीवाल अपने मिशन में आगे बढ़ते गए। जब बेतवा के उद्गम स्थल को नया जीवन देने का अभियान शुरू किया तो उनके साथ आठ राज्यों के 50 प्रकृति प्रेमी जुड़े। सबसे पहले एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की गई जो मुख्यमंत्री और चीफ सेक्रेटरी को सौंपी गई।
रिपोर्ट में बेतवा नदी के अध्ययन की बात कही गई और आगे लिखा कि जो भी परिणाम निकलेंगे, वह लोग अपने-अपने इलाके में जाकर अपनी-अपनी नदियों पर उसको लागू कर सकते हैं। जन जागरण समूह के आह्वान पर पिछले साल जीरो बजट में केवल जन श्रमदान से 55 चेक डैम बनाए गए। सबसे पहला असर बारिश में दिखाई दिया जब नदी रिवाइव हुई और जनवरी के पहले सप्ताह में यहां से धारा का प्रवाह फिर से शुरू हुआ। यह पहली सफलता थी और सब बहुत खुश थे। डॉ. पालीवाल कहते हैं कि बेतवा नदी के उद्गम का जो आंशिक पुनर्जन्म हुआ है, वह इस समूह के श्रमदान की वजह से हुआ है, यह एक सच्चाई है।
प्रो. अरविंद द्विवेदी
झीरी नदी जो कभी सदा नीरा बहती थी आज अपने ही उद्गम स्थल पर दम तोड़ रही थी। पिछले तीन वर्षों से डॉ. पालीवाल के मार्गदर्शन में झीरी को पुनर्जीवित करने के अभियान में जुटे प्रोफेसर अरविंद द्विवेदी, सेंड मेरी पीजी कॉलेज, राष्ट्रीय सेवा योजना प्रभारी, ने बताया कि वर्ष 2023 में बेतवा अध्ययन एवं जन जागरण समूह ने पाया किया कि नदी में बढ़ता प्रदूषण घटता जलस्तर और आसपास के क्षेत्रों में हो रहे पर्यावरणीय बदलाव भविष्य में गंभीर संकट पैदा कर सकते है। इसी चिंता के चलते समूह ने फरवरी-मार्च 2023 में बेतवा नदी की अध्ययन एवं जन जागरण यात्रा आयोजित की।
यह सात दिनों की यात्रा बेतवा नदी के उद्गम स्थल झिरी गांव से शुरू होकर कुरवाई तक पहुंची। इस दौरान यात्रा में शामिल पर्यावरण कार्यकर्ताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और नदी प्रेमियों ने नदी किनारे बसे लगभग दो दर्जन गांवों और कई कस्बों-शहरों में लोगों से संवाद किया।
ग्रामीणों और स्थानीय नागरिकों को बताया गया कि बेतवा नदी किस तरह धीरे-धीरे प्रदूषण और जल संकट की चपेट में आ रही है। यात्रा के बाद समूह ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव से भी नदी संरक्षण के लिए पहल करने की अपील की।
वे बताते हैं की पिछली बार जब हमने काम शुरू किया था तब तो पानी की स्थिति बहुत खराब थी। पानी बूंद-बूंद टपक रहा था। जैसे वो ड्रॉप से पानी गिरता है, उस तरह ड्रॉप-ड्रॉप निकल रहा था। वर्तमान में पानी थोड़ा लगातार बह रहा है यही प्रभाव हमें एक साल में देखने को मिल रहा है। यह बड़ा महत्वपूर्ण और सुखद संकेत है।
"पानी को हम बना नहीं सकते, तो हम उसको सुरक्षित कर सकते हैं।"प्रोफेसर अरविंद द्विवेदी, राष्ट्रीय सेवा योजना प्रभारी
डॉ. आर. के. पालीवाल बताते हैं कि पिछले साल भी यहां श्रमदान हुआ था, लेकिन फरवरी के बाद पानी फिर कम हो गया। इसके बाद 10 मई से दोबारा अभियान शुरू किया गया। इस बार लोगों ने केवल प्रतीकात्मक कार्यक्रम नहीं किया, बल्कि जमीन पर लगातार काम किया। पांच दिनों तक रोज सुबह से शाम तक मिट्टी और पत्थर हटाने का काम चला। जिसमें पार्वती कुंड के पुनर्जीवन से हमें सफलता मिली है।
अभियान के चौथे दिन डॉ सुनील चतुर्वेदी व उपस्थित लोगों ने आसपास की हरियाली और मिट्टी की नमी देखकर अनुमान लगाया कि नीचे जल स्रोत मौजूद हो सकता है। इसके बाद श्रमदान कर रहे लोगों ने लगातार खुदाई की। लगभग आठ फीट तक मिट्टी और पत्थर हटाने के बाद प्राचीन चट्टानों के बीच से पानी रिसना शुरू हुआ। धीरे-धीरे जलधारा तेज हुई और सूखा पड़ा पार्वती कुंड भरने लगा।
जब पानी पहली बार दिखाई दिया, तो वहां मौजूद लोगों में उत्साह फैल गया। कुछ लोगों ने हाथ जोड़कर जलधारा को प्रणाम किया। सुनील चतुर्वेदी ने इसे बहुत ही ख़ुशी की बात कही और कहा की आज इसका जश्न मनाने का समय है। वहां उपस्थित कई लोगों ने इसे 3 साल की सफलता भी कहा।
डॉ सुनील चतुर्वेदी
इस अभियान में इस साल वन विभाग की सक्रिय भागीदारी रही । वन विभाग की ओर से इस जल संरक्षण अभियान में सक्रिय भूमिका निभा रहे शशि प्रकाश कोहली, कार्यवाहक वनपाल, झीरी अभयारण्य बताते है - यह स्वयंसेवी संस्था जो है, वाटर कंजर्वेशन के लिए कार्य कर रही है। जिन्होंने हमसे संपर्क किया तो हम यहां पर उनके साथ है।
चेक डैम की उपयोगिता समझाते हुए वे कहते है जगह-जगह पर जो ढलान वाले क्षेत्र है, नाले या छोटी झुरकियां है, उनमें छोटे-छोटे चेक डैम बना देते हैं। चेकडैम बनाने से क्या होता है की जो बरसाती पानी है, वह जमीन के अंदर बैठता है और बैठते हुए जो नीचे निचले एरिया में वाटर लेवल बढ़ता है ।
अभियान के दौरान पुरे सप्ताह में लगभग 85 नए चेक डैम बनाए गए और 55 पुराने चेक डैम की मरम्मत की गई। ये चेक डैम बड़े बांधों की तरह विशाल संरचनाएं नही है। पत्थरों, मिट्टी और स्थानीय संसाधनों से बनाए गए ये छोटे अवरोध बारिश के पानी को रोकते है। इससे पानी धीरे-धीरे जमीन में समाता है और भूजल स्तर बढ़ता है।
शशि कोहली, कार्यवाहक वनपाल, झीरी अभयारण्य
इस अभियान की एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि यह मुख्य रूप से जन सहभागिता पर आधारित है। डॉ.आर के पालीवाल बताते है की हम लोग ना तो सरकारी फंड लेते है और ना सीएसआर लेते है। क्योंकि उसमें तो प्रोजेक्ट बनता है, फिर कुछ लोगों को नौकरी मिलती है। हमारा यह था कि जनता की सहभागिता से हो, सभी लोग मिलकर काम करें, यह जो भी आतें है सब अपने खर्चे पर आते है।
"यह कोई धार्मिक यात्रा नहीं है, कोई पुण्य लाभ के चक्कर में इसमें शामिल न हो। जो भी प्रकृति प्रेमी है, नदी प्रेमी है - वह लोग इस यात्रा में शामिल हो और अपने खर्चे पर।"
आज के समय में हम सबका डायरेक्ट या इनडायरेक्ट रोल है। नदी में किसी का मल मूत्र उसमें जा रहा है, किसी का पेस्टिसाइड उसमें जा रहा है, किसी का इंडस्ट्रियल कचरा उसमें जा रहा है, दोहन तो हम कर रहे हैं लेकिन संरक्षण नहीं।
वे कहते है फाइव स्टार होटल में आप सेमिनार करेंगे प्रकृति पर्यावरण के ऊपर तो आप उसको प्रदूषित कर रहे है, अगर जंगल में आकर बात करेंगे तो अच्छा होगा। उनके अनुसार श्रमदान ही एकमात्र रास्ता है। श्रमदान का कोई दूसरा विकल्प नहीं है। अगर हम फंड से भी काम कराएंगे तो कुछ मजदूरों से श्रमदान ही कराएंगे क्योंकि नदी पर चेक डैम बनाना है तो किसी को तो पत्थर उठाना पड़ेगा।
विनोद पटेरिया, समाजसेवी, गंज बासौदा, विदिशा
बेतवा का सूखता उद्गम जलवायु परिवर्तन के स्थानीय प्रभावों को स्पष्ट रूप से दिखता है है। मध्य भारत के कई हिस्सों में पिछले वर्षों में बारिश के पैटर्न में बदलाव दर्ज किए गए है। लंबे सूखे और अचानक भारी बारिश जैसी घटनाएं बढ़ी है। इसका असर नदियों, खेती और जल स्रोतों पर पड़ रहा है। छोटी नदियां और उनके उद्गम स्थल सबसे ज्यादा संवेदनशील होते है।
विनोद पटेरिया, समाजसेवी, गंज बासौदा, विदिशा कहते है की अमरकंटक पर्वत से किसी समय सात नदियां निकलती थीं। आज नर्मदा निकल रही है और नर्मदा भी बूंद-बूंद निकल रही है।
अपनी जन्मभूमि की नदी की बात करते हुए वे कहते हैं बेतवा में जो आज पानी हम देख रहे हैं, वह भोपाल का गंदा पानी है। बेतवा का सूख जाना विदिशा के लिए एक बड़ा संकट है। बेतवा को अगर हमने जीवित नहीं किया तो विदिशा की ऐतिहासिक सभ्यता गुप्त काल से चली आ रही उस पर बहुत बड़ा संकट आने वाला है।
पूर्व भारतीय वन सेवा अधिकारी आज़ाद सिंह डबास ने कहा की बेतवा जैसी नदियों को केवल लिंक परियोजनाओं से नहीं बचाया जा सकता है, जरूरत उनके स्रोतों, जंगलों और जलग्रहण क्षेत्रों को संरक्षित करने की है। मध्य प्रदेश की नदियां ग्लेशियरों से नहीं बल्कि जंगलों से जीवित है। जब तक साल जैसी जल संरक्षक प्रजातियां और वन सुरक्षित रहेंगे, तब तक नदियों में पानी बना रहेगा।
हेमंत नागर, स्वयंसेवी, जल संरक्षण अभियान
झीरी में चल रहा यह श्रमदान केवल बेतवा उद्गम को बचाने का प्रयास नहीं है, बल्कि पूरी नदी को पुनर्जीवित करने की शुरुआत है। सरकारें बड़े प्रोजेक्ट बना सकती है, लेकिन अगर नदियों के स्रोत खत्म हो गए तो ये योजनाएं लंबे समय तक कारगर नहीं रहेगी।पूर्व भारतीय वन सेवा अधिकारी, आज़ाद सिंह डबास
झिरी गांव में बहती यह छोटी जलधारा शायद अभी बहुत बड़ी न दिखे, लेकिन इसका संदेश बड़ा है। इसके लिए समाज की भागीदारी, स्थानीय ज्ञान और प्रकृति के साथ संतुलन जरूरी है।
पुनर्जीवित हुए पार्वती कुंड का उदाहरण देते हुए जल संरक्षण अभियान से गहराई से जुड़े हेमंत कुमार नागर कहते है-
"हम पानी बना नहीं सकते, लेकिन पानी बचा सकते हैं - लेकिन मैं यह कहता हूं, हम पानी बना सकते हैं।"
दूषित जल के दुष्प्रभाव पर वे चिंता जताते हैं हुए कहते है की विगत 40 वर्ष पूर्व इस क्षेत्र में150 वर्ष तक के लोग जीवित थे। आज 40-60 वर्ष के लोगों को हार्ट अटैक, ब्रेन हेमरेज और नाना प्रकार की ऐसी बीमारियां जिनका डॉक्टरों के पास इलाज नहीं है, हो रही है।
केंद्रीय जल आयोग की रिपोर्ट के अनुसार देश के 166 जलाशयों का स्तर 40 प्रतिशत निचे चला गया है। ऐसे में बेतवा का यह अभियान दिखता है की दिखाता है कि छोटे प्रयास मिलकर बड़ा बदलाव ला सकते है। पत्थरों से बने छोटे चेक डैम, गांव के लोगों की भागीदारी और लोगों का सामूहिक श्रम आज उस सूखी धरती में फिर पानी ला रहा है, जिसे कुछ समय पहले लोग खोया हुआ मान चुके थे।
लेकिन एक तरह जहां देश में गंगा संवर्धन अभियान चल रहा है वहीं दूसरी और अन्य महत्वपूर्ण नदियों की ओर किसी का ध्यान नहीं है, उस बीच एक समूह द्वारा किया जा रहा यह कार्य सराहनीय है।
इस अभियान में परीक्षित सिंह, रामस्वरूप, राजकुमार पाथरे, रघुवीर धाकड़, प्रतिभा शुक्ला, वीरेंद्र शर्मा, सुनील जैन, डॉ कुसुम गर्ग एवं डॉ. सुरेश गर्ग, डॉ. परशुराम तिवारी, एन. के. भार्गव, कपिल खरे, वन विभाग से महेंद्र, जी. सी. तिवारी, मनीष विजयवर्गीय, अभिलाष खांडेकर, अरविंद श्रीधर, अंकित मिश्रा, सौरभ पोपली, नमन सेवा समिति, बैतूल के स्वयंसेवक, वीएनएस कॉलेज, भोपाल के एनएसएस स्वयंसेवक, सेंट मेरी पीजी कॉलेज, विदिशा के एनएसएस स्वयंसेवक का सहयोग प्राप्त हुआ है।
बेतवा श्रमदान सप्ताह के दौरान नदी के उद्गम स्थल के आस-पास कई कार्य किए गए। इनमें सबसे कठिन और सुखद अनुभति देने वाला कार्य था पार्वती कुंड में जल धारा को वापस लाना। इन तस्वीरों में देखें कि किस तरह 45 डिग्री सेल्सियस वाली भीषण गर्मी में इन प्रकृति प्रेमियों ने जलधारा को जमीन से निकालने का कार्य किया।
सुबह करीब 8 बजे प्राचीन हनुमान मंदिर के बाहर सभी प्रकृति प्रेमी एकत्र हुए और पार्वती कुंड की ओर जाने का निर्णय लिया।
पिछले दो वर्षों में दो बार श्रमदान सप्ताह का आयोजन किया जा चुका है। बीते दो वर्षों में बेतवा के अन्य उद्गम स्थलों को पुनर्जीवित करने का कार्य किया गया।
प्रकृति प्रेमियों की टीम रास्तों पर चल पड़ी।
रायसेन जिले के इस क्षेत्र में गर्मियों के मौसम में तापमान 45 के पार पहुंचना आम बात है। इसी रास्ते से होते हुए सभी प्रकृति प्रेमी पार्वती कुंंड तक पहुंचे।
जैसा कि पहले ही जगह का अध्ययन किया जा चुका था। टीम ने कीरब 10 बजे खुदाई का कार्य शुरू किया।
पार्वती कुड के आसपास सूखी चट्टानें हैं जो गर्मी के मौसम में और भी गर्म हो जाती हैं। इन चट्टानों के बीच श्रम दान कोई आसान कार्य नहीं था।
पार्वती कुंड के चारों ओर से मिट्टी व पत्थर हटाने का कार्य जारी रहा।
खुदाई में निकलने वाले पत्थरों का वज़न इतना कि हाथ से हटाना बेहद कठिन। लेकिन इस कठिन कार्य को इस सामूहिक प्रयास ने आसान बना दिया।
ग्यारह बज गए, सूरज चढ़ने लगा और गर्मी बढ़ने लगी, लेकिन श्रम दान जारी रहा।
खुदाई के दौरान जैसे-जैसे नम मिट्टी निकलने लगी, वैसे-वैसे सभी के चेहरों पर मुस्कान आने लगी। मिट्टी में नमी को देख मानों थकान काफिर होती दिखने लगी।
दोपहर करीब 12 बजे उम्मीद की किरण दिखाई देने लगी।
करीब पांच घंटे के श्रमदान के बाद जब पानी की धारा निकली तो सभी के चेहरे खिल उठे। आखिर क्यों न हो यह श्रमदान नहीं बल्कि बेतवा नदी को एक तोहफा है जो इन सभी ने दिया।
दोपहर करीब एक बजे सभी की कड़ी मेहनत तब रंग लायी जब पार्वती कुंड से पानी की धारा फूट कर बाहर आयी।
अभी पार्वती कुंड से धीरे-धीरे पानी बाहर आने लगा है। डॉ. पालीवाल व उनकी टीम को पूरी उम्मीद है कि मॉनसून आते ही जब जमीन के अंदर मौजूद एक्विफर रिचार्ज होंगे तब यहां से अच्छी मात्रा में पानी आयेगा और स्थानीय लोगों को राहत देगा।
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