जयपुर के ठीक दक्षिण-पश्चिम में फैली चंदलाई झील, कभी प्रवासी पक्षियों का ठिकाना हुआ करती थी। लेकिन आज यही झील किसी चेतावनी की तरह बिखरती दिखाई पड़ती है। यह झील सांगानेर इलाक़े में हो रहे कंक्रीट निर्माणों और कपड़ा उद्योगों के बीच सिमटती जा रही है और इसके साथ ही एक ज़िंदा पारिस्थितिक तंत्र भी सिमट रहा है।
यह एक दशक से ज्यादा का लंबा संघर्ष है, जिसमें औद्योगिक विकास, अधूरी प्रशासनिक तैयारी और पर्यावरण के लिए सजग नीतियों की कमी साफ़ दिखती है।
एनजीटी की संयुक्त समिति की रिपोर्ट और स्वतंत्र अध्ययनों के अनुसार जयपुर के सांगानेर क्षेत्र से निकलने वाले घरेलू सीवेज और कपड़ा उद्योगों के अपशिष्ट पहले द्रव्यवती नदी में मिलते हैं और बिना पर्याप्त उपचार के चंदलाई झील तक पहुंचते हैं।
पानी के नमूनों के विश्लेषण में औद्योगिक रसायन और घरेलू सीवेज की निरंतर उपस्थिति पाई गई है, जिससे झील का पारिस्थितिक संतुलन कमजोर हो रहा है। कुछ जगहों पर जैव-रासायनिक ऑक्सीजन मांग (BOD) और अन्य प्रदूषण संकेतक स्तर ऐसे पाए गए, जो यह दर्शाते हैं कि झील में पहुंचने वाला जल घरेलू सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट के मिश्रण से प्रभावित है।
द्रव्यवती नदी और उससे निकलने वाली नहरें (गुलार डैम और रामचंद्रपुरा डैम) अब केवल स्थानीय प्रवाह नहीं, बल्कि प्रदूषण का सीधा वाहक बन चुकी हैं।
संयुक्त समिति की रिपोर्ट कहती है कि चंदलाई झील के चारों तरफ बड़ी संख्या में लोगों के घर और कपड़ा-उद्योग स्थित हैं। इनसे निकलने वाला गंदा पानी द्रव्यवती नदी में बहता है और अंत में झील में मिल जाता है।
चंदलाई झील के प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए राज्य और केंद्रीय स्तर पर कई सरकारी कदम उठाए गए है।
सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) का निर्माण: द्रव्यवती नदी परियोजना के तहत सांगानेर इलाके में कुल पांच सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) स्थापित किए गए हैं, जिनकी कुल क्षमता प्रति दिन 17 करोड़ लीटर है। इन प्लांटों का लक्ष्य क्षेत्र के घरेलू और कुछ औद्योगिक सीवेज को उपचारित करके नदी और झील में छोड़ने लायक़ बनाना है।
इसके अलावा, चंदलाई झील के पास 40 MLD क्षमता वाला एक नए एसटीपी के निर्माण की प्रस्तावना भी दी जा चुकी है। इसके लिए राज्य सरकार ने लगभग 163.39 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत की वित्तीय मंजूरी दी है। इस परियोजना का लक्ष्य झील के आसपास औद्योगिक और घरेलू सीवेज को बेहतर तरीके से उपचारित करना है।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के नोटिस और बंदी आदेश: राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एसपीसीबी) ने 9 सितंबर 2024 को सांगानेर क्षेत्र में संचालित लगभग 1,163 कपड़ा इकाइयों को अंतिम “कारण बताओ” नोटिस जारी किया था। ये नोटिस वायु (1971) तथा जल प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम (1974) के उल्लंघन के आरोप में दिए गए थे।
बोर्ड ने यह भी पाया कि अधिकांश इकाइयां स्थानीय प्राधिकरणों, राजस्व विभाग या एसपीसीबी की अनुमति के बिना संचालित हो रही हैं, जो एक नियामकीय असंगति को दर्शाता है।
हालांकि एसटीपी की संयुक्त क्षमता बहुत ज़्यादा है, लेकिन उपचारित जल की गुणवत्ता और वास्तविक डिस्चार्ज आंकड़े सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।
इसी क्रम में 29 अवैध रूप से संचालित कपड़ा इकाइयों को बंद करने के आदेश जारी किए, खासकर उन इकाइयों को जो सीधे नालों में अनुपचारित गंदा पानी छोड़ रही थीं। समस्या यह है कि इन्हें सामान्य अपशिष्ट उपचार संयंत्र (कॉमन एफ़ल्यूएंट ट्रीटमेंट प्लांट/सीईटीपी) नेटवर्क से जोड़ा नहीं जा सकता है।
ज़मीनी क्रियान्वयन और अंतर: मीडिया रिपोर्ट बताती है कि कई कपड़ा इकाइयां अभी भी अनियंत्रित या असंगत रूप से चल रही हैं, और उनके सीवेज का प्रभाव झील तक पहुंच रहा है।
हालांकि एसटीपी की संयुक्त क्षमता बहुत ज़्यादा है, लेकिन उपचारित जल की गुणवत्ता और वास्तविक डिस्चार्ज आंकड़े सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। जिससे यह पता करना मुश्किल है कि जल वास्तव में एकीकृत और मानक अनुरूप उपचार के बाद ही छोड़ा जा रहा है या नहीं।
वहीं कुछ इकाइयां एसटीपी नेटवर्क से जुड़ नहीं पाई हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि बुनियादी संयोजन ढांचे में ही कमी है, खासकर उन इकाइयों के लिए जो सीधे नालों में गंदा पानी छोड़ती हैं।
एनजीटी की रिपोर्ट ही नहीं, बल्कि राज्य और केंद्र सरकार के नियमों के तहत सुप्रीम कोर्ट ने भी औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण पर सख्त रुख अपनाया है।
राजस्थान में औद्योगिक इकाइयों पर नियंत्रण के नाम पर 121 इकाइयों को बंद किए जाने का रिकॉर्ड सुप्रीम कोर्ट के हलफनामे में भी सामने आया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि औद्योगिक प्रदूषण को लेकर क़ानूनी स्तर पर भी निगरानी बढ़ी है।
एसटीपी - क्षमता बनाम नियंत्रण का अंतर: एनजीटी ने चंदलाई झील में प्रदूषण और अतिक्रमण के मामलों पर तथ्यात्मक रिपोर्ट तलब करते हुए एक संयुक्त समिति का गठन किया था। इस समिति के दायरे में झील क्षेत्र से जुड़ी आईजी की रिपोर्टें, औद्योगिक अपशिष्ट की डंपिंग और पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील नियमों के उल्लंघनों की जांच शामिल थी।
यह दर्शाता है कि न्यायिक हस्तक्षेप के स्तर पर भी पर्यावरणीय नियंत्रण और अनुपालन की भूमिका को औपचारिक रूप से स्वीकार किया गया।
इसके बावजूद ज़मीनी हालात संकेत देते हैं कि झील के प्रदूषण से निपटने की नीति अब तक मुख्यतः संरचनात्मक उपायों तक सीमित रही है, जबकि नियामकीय प्रवर्तन और अनुपालन-आधारित हस्तक्षेप कमजोर बने हुए हैं।
1,163 कपड़ा इकाइयों को जारी “अंतिम कारण बताओ नोटिस” अपने-आप में यह स्वीकार करता है कि सांगानेर टेक्सटाइल क्लस्टर वर्षों से नियामकीय निगरानी से बाहर रहा।
चंदलाई झील तक पहुंचने वाला जल अब भी प्रदूषित है, जबकि सांगानेर क्षेत्र में स्थापित एसटीपी की संयुक्त क्षमता कागज़ों में पर्याप्त दिखाई देती है।
यह अंतर इस ओर संकेत करता है कि या तो झील क्षेत्र से निकलने वाला पूरा घरेलू और औद्योगिक सीवेज एसटीपी तक पहुंच ही नहीं पा रहा है, या फिर उपचार के बाद छोड़े जा रहे जल की गुणवत्ता निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं है।
समिति की रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि उपचारित जल के वास्तविक डिस्चार्ज, उसकी गुणवत्ता और अनुपालन से जुड़े आंकड़े सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं, जिससे एसटीपी की प्रभावशीलता का स्वतंत्र आकलन संभव नहीं हो पाता।
इससे यह स्पष्ट होता है कि चंदलाई झील में जारी प्रदूषण केवल क्षमता की कमी का नहीं, बल्कि कलेक्शन नेटवर्क, उपचार गुणवत्ता और डिस्चार्ज-स्तर निगरानी की संरचनात्मक विफलता का परिणाम है।
दूसरा, 1,163 कपड़ा इकाइयों को जारी “अंतिम कारण बताओ नोटिस” अपने-आप में यह स्वीकार करता है कि सांगानेर टेक्सटाइल क्लस्टर वर्षों से नियामकीय निगरानी से बाहर रहा।
हालांकि 29 इकाइयों को बंद करने के आदेश दिए गए, लेकिन क्लस्टर के पैमाने को देखते हुए यह कार्रवाई प्रतीकात्मक अधिक और सिस्टम-स्तरीय कम प्रतीत होती है।
तीसरा, चंदलाई झील को रामसर साइट के रूप में प्रस्तावित किया जाना संरक्षण की दिशा में एक अहम संकेत है, लेकिन घोषणा से पहले प्रदूषण नियंत्रण की न्यूनतम शर्तें भी पूरी नहीं हो पा रही हैं।
जब झील का जल स्रोत स्वयं एक प्रदूषण-वाहक नदी प्रणाली पर निर्भर हो, तो रामसर जैसे संरक्षण प्रस्ताव अपनी बुनियादी शर्तों पर ही सवाल खड़े करते हैं।
केवल रामसर साइटों की संख्या बढ़ाना आदर्श तरीका नहीं है। असल में संरक्षण का फोकस गुणवत्ता, वैज्ञानिक आधार और स्थानीय भागीदारी पर होना चाहिए, न कि सिर्फ सूचीबद्ध करने पर।जयराम रमेश, पूर्व केंद्रीय पर्यावरण मंत्री और पर्यावरण विशेषज्ञ
जैसा कि ऊपर उल्लेखित है राज्य सरकार ने चंदलाई झील को रामसर बनाने का प्रस्ताव पेश किया है। यह इसके संरक्षण की दिशा में पहला महत्वपूर्ण कदम है लेकिन सवाल यह है कि क्या इसके संरक्षण से ज़्यादा ज़रूरी इसकी सफ़ाई है।
रामसर कन्वेंशन के तहत किसी आर्द्रभूमि को अंतरराष्ट्रीय महत्व की मान्यता तभी दी जाती है, जब उसका पारिस्थितिक चरित्र संरक्षित हो या उसे संरक्षित रखने की स्पष्ट योजना मौजूद हो। लेकिन चंदलाई झील की मौजूदा स्थिति इस बुनियादी शर्त पर ही सवाल खड़े करती है।
रामसर कन्वेंशन की रणनीतिक ढांचे और दिशानिर्देश के अनुसार, किसी प्रस्तावित आर्द्रभूमि के लिए यह ज़रूरी है कि:
उसके जल स्रोत अपेक्षाकृत नियंत्रित हों,
प्रदूषण के मुख्य स्रोत चिन्हित और प्रबंधित किए जा रहे हों,
और पारिस्थितिक कार्य (जैसे जैव विविधता, पक्षी आवास) गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त न हो रहे हों।
चंदलाई झील के मामले में, ये तीनों शर्तें अभी अधूरी दिखाई देती हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, यदि किसी आर्द्रभूमि को प्रदूषित स्थिति में ही संरक्षण दर्जा दे दिया जाता है, तो इससे दो जोखिम पैदा होते हैं:
प्रदूषण की मौजूदा समस्या “प्रबंधन योग्य” मान ली जाती है, न कि “अस्वीकार्य”
सुधारात्मक कार्रवाई की समयसीमा और जवाबदेही कमजोर पड़ जाती है।
इसी क्रम में पूर्व केंद्रीय पर्यावरण मंत्री और पर्यावरण विशेषज्ञ जयराम रमेश ने कहा है कि केवल रामसर साइटों की संख्या बढ़ाना आदर्श तरीका नहीं है। असल में संरक्षण का फोकस गुणवत्ता, वैज्ञानिक आधार और स्थानीय भागीदारी पर होना चाहिए, न कि सिर्फ सूचीबद्ध करने पर।
इस संदर्भ में चंदलाई झील का रामसर प्रस्ताव दोनों हो सकता है, चेतावनी भी और अवसर भी। चेतावनी इसलिए, क्योंकि यह दिखाता है कि संरक्षण की प्रक्रिया प्रदूषण नियंत्रण से आगे निकल गई है।
और अवसर इसलिए, क्योंकि यदि रामसर प्रस्ताव को सख़्त प्रदूषण नियंत्रण, उद्योग अनुपालन और नदी-झील एकीकृत प्रबंधन से जोड़ा जाए, तो यह झील के पुनर्जीवन का ढांचा बन सकता है।
लेकिन यदि मौजूदा हालात बने रहते हैं, तो चंदलाई झील का मामला एक बार फिर यह दोहराएगा कि कानूनी दर्जा अपने-आप में इकोसिस्टम को नहीं बचाता, उसे बचाती है ज़मीनी कार्रवाई, सतत निगरानी और राजनीतिक-प्रशासनिक जवाबदेही।
नीतिगत और नियामकीय विफलताओं का सबसे प्रत्यक्ष असर झील के पारिस्थितिक तंत्र पर दिखाई देता है।
चंदलाई झील को सिर्फ पानी का एक बड़ा तालाब समझना अब संभव नहीं रहा। इसकी पारिस्थितिक अहमियत स्थानीय जैव विविधता से आगे निकलती है। दरअसल यह झील हज़ारों प्रवासी पक्षियों का आश्रय रही है, जो बढ़ते प्रदूषण और बदस्तूर बदलते पानी की प्रकृति के कारण संकट में हैं।
मीडिया रिपोर्ट बताते हैं कि आसपास की मिट्टी में जमा रंगाई-छपाई के रसायन खेतों को भी प्रभावित कर रहे हैं। नतीजतन फसलों की गुणवत्ता स्तर और मिट्टी की सेहत पर इसका बुरा असर पड़ रहा है।
यह पूरी स्थिति केवल एक झील या उस पर निर्भर पक्षियों और जलीय जीवों का नहीं है। बल्कि यह स्थानीय जीवन के स्वास्थ्य, कृषि और पानी के स्रोतों का सवाल है।
चंदलाई झील के संरक्षण और पारिस्थितिकी बहाली के लिए सरकार द्वारा उठाए जाने वाले सारे कदम अच्छे संकेत हैं। लेकिन ज़मीनी स्तर पर इन्हें लागू करने, उनकी सतत निगरानी और जिम्मेदार औद्योगिक व्यवहार के बिना स्थिति में बदलाव की उम्मीद नहीं की जा सकती है।
जब तक द्रव्यवती नदी–चंदलाई झील की इस एकीकृत प्रणाली में डिस्चार्ज, उपचार और निगरानी की जवाबदेही तय नहीं की जाती, तब तक किसी एक बिंदु पर किया गया सुधार टिकाऊ नहीं हो सकता।
चंदलाई झील आज सफल उद्यान नहीं, बल्कि एक चेतावनी का प्रतीक बन चुकी है। यह दिखाती है कि जब औद्योगिक विकास, पारिस्थितिक संतुलन और लोक स्वास्थ्य के बीच संतुलन बिगड़ जाता है, तो अंतरराष्ट्रीय महत्व रखने वाली आर्द्रभूमि तक प्रभावित होने लगती है।